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जसदेव सिंह: आवाज़ के ज़रिए तस्वीर बुनने वाला जादूगर

जसदेव सिंह को हमने जाना एक स्वर के रूप में जिसने लगभग आधी सदी तक आज़ादी और गणतंत्र दिवस का आंखों देखा हाल सुनाया, कभी लाल किले तो कभी इंडिया गेट के नज़ारे दिखाए. हमने उस आवाज़ के साथ क्रिकेट बाॅल के पीछे दौड़ लगाई, लपक लिया, पिच के उछाल को महसूस किया, ओलंपिक की मशाल की लौ की आंच से गर्मा गए.

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जसदेव सिंह (जन्म: 1931 – अवसान- 25 सितंबर 2018) (फोटो साभार: राज्यसभा टीवी)

छोटी पर ज़ेहन में बहुत लंबे वक़्त के लिए दर्ज हो गयी है एक मुलाक़ात. पूरी मुलाक़ात के दौरान ऐसा ऐसा लग रहा था जैसे किसी स्पूल से हौले-हौले से सरकती हुई टेप दूसरे स्पूल पर लिपटती जा रही घूम रही है. एक आवाज़ गूंज रही है… जसदेव सिंह की आवाज़.

वे आख़िरी समय तक दिल्ली में रहा करते थे. यूं तो स्वस्थ थे मगर उम्र का असर था कि लोगों को पहचान नहीं पाते, याद नहीं रख पाते. हां मगर, जब-तब यादों की उस टेप को रिवर्स करके सुनते रहते. जब भी कोई उस दौर की बात करता, तपाक से कहते, ‘मैं जसदेव सिंह बोल रहा हूं…!’

मशहूर रेडियो कमेंटेटर जसदेव सिंह से दो बरस पहले हुई मुलाकात के बाद की याद का हिस्सा है ये.

‘मैं हिन्दी में आज भी ऐसे ही दस्तखत करता हूं…’, कांपते लबों से एक बहुत नम आवाज़ निकली, जिसमें नन्हीं खिलखिलाहट भी थी. मुझे यक ब यक लगा कि वहां उन भीगी आंखों में आठ बरस का कोई बच्चा था जिसे मां के संदूक में से संजोकर रखी हुई, कच्ची पहली वाली वो काॅपी मिल गई जिसमें उसने बारहखड़ी लिखना सीखी थी. वो हैरान भी है… चहक भी रहा है.

उन्होंने अपने हस्ताक्षर को कांपती उंगलियों से छुआ. उसकी ठंडक को अपनी आठ दशक से भी पुरानी ऊष्मा में समाहित कर लिया. उन्होंने धीमे स्वर में कई बार दोहराई अपने दस्तखत वाली बात.

फिर बोले, ‘मैं हिन्दी ठीक से लिख नहीं पाता था लेकिन हस्ताक्षर हमेशा हिन्दी में ही करता था. आज भी ‘ऋ’ नहीं लिख पाता हूं… मैं तो गांधी जी की तरह लिखता हूं ‘र’ में ‘इ’ की मात्रा, ‘श’ में ‘ई’ की मात्रा.’

फिर कुछ लम्हों तक वे गुम बैठे रहे. खामोशी की टोह लेते रहे. लाल सरदारी पग, नीला सूट, सूट पर बांयी ओर हृदय के कुछ करीब लगा तिरंगे का ब्राॅच, सुनहरी फ्रेम की ऐनक, लेंसों की पीछे अथाह जीवन से भरी पुतलियां.

ये पोट्रेट उस श़ख्स का है, जिसे संसार और विकीपीडिया का साइबर संसार जसदेव सिंह, मशहूर कमेंटेटर कहता है और मैं कहती हूं ‘बाइस्कोप वाला.’

अपनी आवाज़ के ज़रिए चित्र खींचता है, जाने कैसी तरकीब जानता है कि बेहद तरतीब से उन्हें एक के बाद एक जोड़ता देता है, लगता है जैसे आवाज़ में दृश्य पिरो दिए गए हैं.

ये ख़ाका उन लम्हों में मैंने बनाया जब वे इक रोज आकाशवाणी जयपुर के अहाते में दरख़्शां हुए. इसी कंपाउंड में बने स्टूडियो से उन्होंने अपनी आवाज़ को हवाओं में घोल दिया था, उसी मुलाकात का ब्यौरा है आगे लिखे लफ़्जों में.

जसदेव सिंह को हमने जाना है एक स्वर के रूप में जिसने लगभग आधी सदी तक आज़ादी और गणतंत्र दिवस का आंखों देखा हाल हमें सुनाया, कभी लाल किले तो कभी इंडिया गेट के नजारे दिखाए.

हमने भी उस आवाज़ के साथ क्रिकेट बाॅल के पीछे दौड़ लगाई ,लपक लिया, पिच के उछाल को महसूस किया, ओलंपिक की मशाल की लौ की आंच से गर्मा गए.

हाॅकी के वर्ल्ड कप को तो जैसे हर श्रोता ने खुद छुआ हो. उस आवाज़ ने ख्वाज़ा के दर पर मन्नत के धागे बांधे, करोड़ों देशवासियों को नेहरू-शास्त्री की निर्जीव देह के दर्शन कराए और आंसुओं से तर कर दिया.

उस आवाज़ के जिस्म को अपने सामने बैठे देखा था उस रोज. पल-पल भावुक दिखे जसदेव सिंह जी, हाथ कांपते थे, अपने पहले समाचार बुलेटिन के दस्तावेज पर अपने हस्ताक्षर देखकर पलकें भिगो बैठे.

Jasdev Singh Commentary

कमेंट्री बॉक्स में जसदेव सिंह (फोटो: आत्मकथा से साभार)

वे कह रहे थे एक ब्राॅडकास्टर का सबसे बड़ा दोस्त और उससे भी बड़ा दुश्मन होता है… माइक, उससे एक निश्चित दूरी बनाकर रखना जरूरी है. स्टूडियो में घुसते ही सबसे पहले माइक्रोफोन के कानों में चापलूसी के स्वर में कह देना चाहिए, ‘देख भैया मेरी पोल मत खोल देना.’

किसी ने यूं ही पूछ लिया, ‘रेडियो का भविष्य कैसा है?’

चमकता हुआ लफ़्ज निकला उनकी जबां से, ‘उज्जवल! आज भी जब दिल्ली से जयपुर सड़क के रास्ते से आता हूं, बैलगाड़ी पर आगे की तरफ रेडियो लटके देख लेता हूं… उस वक़्त बेहद गुदगुदी होती है ,खुशी भी. पहली बार जब ट्रांज़िस्टर देखा तो समझ ही नहीं पाया, इस डिब्बे में आवाज़ कहां से आती है? मैंने कभी नहीं सोचा था कि ये लकड़ी का बक्सा मेरे जीवन में पहला प्यार बनकर आएगा. गीतों भरी कहानी सुनता तो मेरी मुहब्बत और बढ़ जाती.

फिर एक दिन सुनने में आया महात्मा गांधी को किसी ने गोली मार दी. उस दिन सारा शहर जैसे मुर्दाघर हो गया, सड़कें सूनी, लोग रेडियो के आसपास जमा. मैलविल डी मैलो की आवाज़ मैंने तब पहली बार सुनी,जब वो बापू की शवयात्रा का आंखों देखा हाल सुना रहे थे. उस दिन घर आकर मैंने मां को कहा कि मैं हिन्दी का कमेंटेटर बनूंगा. मां हौले से हंस दी मानो कहना चाहती हो, उर्दू ही आती है तुझे, हिन्दी कहां. उसे क्या मालूम था ये ख्व़ाब मैने पूरा करने के लिए ही बुना था.’

किसी ने एक सवाल उनकी ओर उछाला कि आप पहले क्या बनना चाहते थे?

हल्की-सी हंसी होठों के किनारों से छलक कर बाहर गिर गई, बोले, ‘कुछ बनने की नहीं सोची थी. पढ़ता यहीं चाकसू में था. रेडियो तब तक जयपुर में खुला नहीं था. लेकिन जाने दिल की किन परतों में छिपकर रहता था… कब से ही. हां, मगर स्कूल के दिनों मैं रामनिवास बाग में बैठकर माइक्रोफोन से रिकाॅर्डिंग करता फिर ग्रामोफोन से धुन डालकर स्काउटिंग पर फीचर बनाता.

मां कहती आगे और कुछ कर ले. फिर क्या था कुंजियों से पढ़कर एलएलबी की डिग्री ले ली, वकील बनकर मां के सामने खड़ा हो गया. काला कोट सिलवाया सफेद मखमली पतलून बनवाई, वकालत करने पहुंचे. एक सीनियर वकील की शरण में काम करना शुरू किया. उसने पहले ही दिन फाइल के साथ 2 रुपये का बदरंग नोट पकड़ाकर कहा इसे चुपके से मजिस्ट्रेट को दे देना, काम हो जाएगा.

उसी शाम घर आकर मां को ताकीद कर दिया मैं अब ये काम नहीं करूंगा. फिर जयपुर में जन्मा रेडियो, जन्मा जसदेव सिंह. अगर रेडियो कमेंटेटर न होता तो जरूर लेखक होता और धर्मयुग में काम करता. उन दिनों की चर्चित पत्रिकाओं, साप्ताहिक हिंदुस्तान तथा धर्मयुग में निरंतर लिखता रहा.’

बीच-बीच में वे अपनी कोट और पैंट की जेबें टटोलते रहे, जैसे कुछ तलाश रहे हैं. कमेंट्री करना पसंद था या समाचार पढ़ना इस सवाल पर बेहिचक बोले, ‘कमेंट्री मेरे दिल के सबसे क़रीब है. मैलविल डी मैलो के साथ कमेंट्री करने का मौका मिला, वो बहुत फास्ट थे, मैं धीमा पड़ता तो कहते बाॅल की रफ्तार से भागो, उसकी दिशा पकड़ लो. उनसे बहुत कुछ सीखने को भी मिला.

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हिन्दी के प्रसिद्ध समाचारवाचक देवकीनन्दन पाण्डे को एक दफ़ा कमेंट्री करनी पड़ी. वे बोले, ‘दूर दूर तक केवल सिर ही सिर, सिर ही सिर नज़र आते हैं, आगे का हाल जसदेव सिंह से सुनिए.’

पाण्डे जी बोले जसदेव सिंह ये मेरे बस की बात नहीं. देवकीनन्दन पाण्डे अब तक के श्रेष्ठ समाचार वाचक हैं, वे मेरे लिए ईश्वर का अवतार थे. उनके मुकाबले की आवाज़ अब तक सुनने को नहीं मिली. रेडियो या आवाज़़ की दुनिया के कलाकारों को एक बात ध्यान रखनी चाहिए… ‘बी योरसेल्फ’, आप माइक के सामने वो ही रहिए, जो आप हैं.

एक बार स्टूडियो में जाते हुए डी मैलो से मैंने प्रश्न किया कि ‘आपकी आवाज़ इतनी अच्छी क्यों हैं? उन्होंने उत्तर दिया, ‘मैंने अभी-अभी आइसक्रीम खाई है, उसके ऊपर ठंडा पानी पिया है.’

‘रेडियो पर बोलने का उसूल है शब्दों के बीच के ठहराव को महसूस कीजिए, श्रोताओं को खामोशी भी सुनने दीजिए.’

जसदेव सिंह जी जेबों में फिर से कुछ खोजने लगे, इस बार सफेद शर्ट में से कागज़ का एक पुर्जा निकाला, कुछ देर उसे देखा फिर कहने लगे, ‘मैं बातों के पॉइंट्स लिखकर लाया था.’

इतने में किसी ने जयपुर से जुड़ी अपनी यादें साझा करने को कह दिया, तो नाॅस्टेलजिया ने धंस गए, बोले, ‘जयपुर के परकोटे के भीतर से सम्पत की कचौरी निकली, इकन्ने की… आलू का मसाला भरी हुई कचौरी. एक आना अगर मुट्ठी में है तो कचौरी मिलती थी नहीं तो कचौरी वाला मुफ्त में मसाला दे दिया करता था कि कल पैसे लाना और कचौरी ले जाना. उसका ये सबक वो कभी नहीं भूल सकते कि जीवन में कभी उधार मत लेना.’

थिएटर से जुड़े कुछ किस्से भी बयां किए, कुछ राज़ भी खोले. उन दिनों वे एक राजस्थानी नाटक में ‘पांचू’ नामक किरदार निभाया करते थे, बहुत वक्त तक इसका किसी को मालूम ही न था. जयपुर में अंतर्राष्ट्रीय नाटक समारोह में ‘चन्द्रगुप्त’ नाटक में भी काम किया.

ड्रामा की बात कहते कहते एकाएक हंस पड़े बोले, ‘एक बार रेडियो नाटक में ‘लव सीन’ किया, घर जाकर मां तथा पत्नी की नाराज़गी झेलनी पड़ी. शुक्र है कि रेडियो था, टीवी होता जाने क्या हुआ होता!’

हाज़िरजवाबी का मिसाल देखिए, नज़दीक बैठे व्यक्ति ने चुटकी लेते हुए कहा, ‘आप रेडियो को अपनी पत्नी से ज्य़ादा महत्व देते हैं ?’ वो मुस्कराए और तपाक से बोले, ‘ये तो वो कहती हैं, मैं नहीं कहता.’

बीच में कुछ क्षण रुकते, सोचने लगते, फिर कहना शुरू करते, इस बार सर्द स्वर में बोले, ‘सबसे शदीद वक्त होता है जब किसी की अंतिम यात्रा की आंखों देखी सुनानी हो, गला रुंधा होता है, पलकों की किनारियों पर अश्कों के मोती उग आते हैं, शब्द जाने कौन से निहांखाने में छिप जाते हैं. एक वाकया नुमायां है.. शास्त्री जी की पार्थिव देह ज़मीन पर लेटी हुई थी, सब दम  साधे खड़े थे, उनके पुत्र हरिकृष्ण शास्त्री दुखी मुद्रा में थे. इतने में शास्त्री जी की पत्नी ललिता आईं… पछाड़ खाकर निर्जीव देह पर गिरीं… उस क्षण में रूह के जाने कितने टुकड़े हो गए… मेरी आवाज़ में क्रैक आ गया, बोलना मुनासिब नहीं था… लेकिन जे़हन में यही गूंजता रहा – कमेंटेटर इज़ ए कैमरा और कैमरा कभी रोएगा नहीं.

कमेंट्री के लिए स्क्रिप्ट लिखने को वे सबसे बड़ी मूर्खता बताते थे. ‘समाचार और कमेंट्री दोनों जुदा हैं, कमेंट्री ज़्यादा मुश्किल है क्योंकि वहां कुछ पढ़ना नहीं होता. यकीनन शब्दों का बड़ा ज़खीरा होना चाहिए. आसपास की तमाम छोटी-बड़ी चीजों को ग़ौर से देखकर, नोट्स बनाए जाने चाहिए.’

मसलन मूंगफली वाले की सिगड़ी की लौ, लौ से अमर जवान ज्योति… उससे देशभक्ति की लौ को जलाए रखने का संदेश भी दिया जा सकता है.

ज़ाकिर हुसैन साहब के इंतिकाल के दौरान जब उन्हें मय्यत की आंखोंदेखी सुनाने की ज़िम्मेदारी सौंपी गई तब वे मुस्लिम रस्मो-रिवाज से कतई वाक़िफ़ नहीं थे. वे मौलवी से मिले, उसने जो कुछ भी बताया, उन बातों को नोट किया और फिर इस्तेमाल किया.

उन्होंने यह भी बताया कि कैसे गणतंत्र दिवस की परेड से ठीक पहले माली से वहां उगे पीले फूलों का वैज्ञानिक नाम पूछा और उसे अपनी कमेंट्री में उगा दिया.

Indian soldiers march during the Republic Day parade in New Delhi, India January 26, 2016. REUTERS/Adnan Abidi

गणतंत्र दिवस परेड (फोटो: रॉयटर्स)

उनके चेहरे पर एक मंद मुस्कराहट खिंच आई, भावुक स्वर में कहने लगे, ‘मुझे मेरे देश से बहुत मुहब्बत है. मेरे पास विदेशी रेडियो में काम करने के कई अवसर आए लेकिन मैं गया नहीं. बीबीसी, वाॅइस आॅफ अमेरिका, रेडियो बीजिंग के आॅफर भी मैंने ठुकरा दिए. आज के हालात काफी ख़राब हैं… लोगों के जज्ब़े में कमी है. कैसा दौर था वो जवाहर लाल नेहरू लाल किले पर तिरंगा फहराते थे, सारा देश हिलोरें लेता था. रोंगटे खड़े हो जाते थे, बहुत सी यादें हैं उस समय से जुड़ी हुई.’

‘नेहरू जी के नाम से एक दिलचस्प दास्तान याद आती है, उस आदमी में बहुत भोलापन था. उस दिनों वे अपनी राजस्थान यात्रा पर थे, माउंट आबू में केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल का एक कार्यक्रम था. बालिकाओं को संबोधित करना था. चूंकि रेडियो माइक संवेदनशील होता है, उसका पर्दा ज़रा तेज़ आवाज़ से ख़राब हो सकता है. लिहाजा कुछ दूरी पर उसे रिकार्डिंग के लिए रखा गया था. नेहरू जी इससे नावाक़िफ थे, बार-बार माइक को उंगली से खटखटाते फिर पूछते, ‘आवाज़ आती है ?’

बालिकाओं का उत्तर आता, ‘नहीं, आती.’

परेशां नेहरू फिर ठकठकाते, पूछते वही सवाल, मिलता वही जवाब. किसी ने धीमे से उनके कान में फुसफुसाकर कहा ये ऑल इंडिया रेडियो का माइक्रोफोन है, लाउडस्पीकर का माइक नहीं, इसमें आवाज़ नहीं आती.

पंडित जी थोड़ा गुस्से से बोले, ‘कैसे नहीं आती, आएगी.’

फिर अपना प्रश्न दोहराया, लड़कियों ने उत्तर. तब स्टाफ के अधिकारी ने लड़कियों की प्रतिनिधि को कहा कि चाचा आवाज़ के लिए पूछें तो कह देना आती है.

अब कि जैसे ही प्रधानमंत्री ने पूछा, सब लड़कियां समवेत स्वर में बोलीं… ‘आती है’

जसदेव सिंह जी ने मुलाक़ात के बाद मुझे एक ब्राॅडकास्टर की जिम्मेदारी का एहसास हुआ. लगा कि रेडियो पर पानी अगर बोलूं तो हेलेन केलर बन जाऊं, वाॅटर का हर एल्फ़ाबेट, हर्फ़-हर्फ़ समंदर हो. यानी महज़ शब्द नहीं, दरिया, नदिया, तलैया, छम-छम बरखा की बूंदें हो.

यूं तो जसदेव सिंह परिचय के मोहताज तो नहीं, पर कुछ ऐसी रही उनकी ज़िंदगी:

1931 में सवाई माधोपुर के बोली गांव में जन्मे, 1955 में आकाशवाणी जयपुर में सबसे पहली नियुक्ति हुई.

फिर 1960 में चंबल पुल के उद्घाटन समारोह का प्रसारण उनका पहला रेडियो कार्यक्रम था. उसके 1962 से गणतंत्र दिवस और आज़ादी के जश्न का आंखों देखा हाल सुनाया, लगभग 50 वर्षों तक लगातार.

सालों तक ओलंपिक, विश्व कप हाॅकी, एशियन गेम्स में भारत की आवाज़ बने. 1964 में टोक्यो में भारत की ओलंपिक मेडल की जीत के भी गवाह रहे.

1975 में मलेशिया में भारत की वर्ल्ड कप हाॅकी विश्व को प्रस्तुत किया. लोगों फाइनल खेल में दिल थामकर इस मैच के उतार-चढ़ाव का उनकी आवाज़ में सुनते रहे.

1982 में दिल्ली में हुए एशियाई खेलों के साथ ही दूरदर्शन से जुड़ गए और 1989 में दूरदर्शन के डिप्टी महानिदेशक पद से सेवानिवृत्त हुए. फिर 1988 में उन्हें ओलंपिक आॅर्डर से नवाज़ा गया.

1985 में उन्हें पद्मश्री और 2008 में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया था. 2012 में उन्होंने अपने जीवन की कहानी को ‘मैं जसदेव सिंह बोल रहा हूं…’ के रूप में एक किताब की शक्ल दी थी.

(माधुरी आकाशवाणी जयपुर में न्यूज़ रीडर हैं.)

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