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शलभ श्रीराम सिंह: प्रेम और प्रकृति का नहीं, बग़ावत का कवि

पुण्यतिथि विशेष: शलभ श्रीराम सिंह ने नकारात्मकता के बजाय संघर्ष या युद्ध को अपनी कविता का महत्वपूर्ण पक्ष बनाया.

शलभ श्रीराम सिंह.

शलभ श्रीराम सिंह.

‘नफस-नफस कदम-कदम, बस एक फिक्र दम-ब-दम, घिरे हैं हम सवाल से हमें जवाब चाहिए, जवाब-दर-सवाल है कि इंकलाब चाहिए.’ हिंदी साहित्य प्रेमियों की नई पीढ़ी को न सही, पुरानी को अच्छी तरह याद है कि युयुत्सावाद के प्रवर्तक कवि शलभ श्रीराम सिंह का लासानी क्रांतिकारी चेतना से ओतप्रोत यह गीत एक समय देश के प्रायः सारे परिवर्तनकामी जनांदोलनों का प्रयाण-गीत हुआ करता था.

इससे अभिभूत बाबा नागार्जुन ने उन्हें प्रेम और प्रकृति के बजाय बगावत का कवि करार देते हुए कहा था कि वे अपने पाठकों को जनसाधारण की जिंदगी कठिन करने वाली क्रूर शक्तियों के विरुद्ध हथियारों जैसे शब्द देते हैं. इतना ही नहीं, ‘उनसे हिंदी कविता का एक नया गोत्र आरंभ होता है इसलिए उनको इसके किसी और मठ में शरण लेने की कोई जरूरत नहीं है.’

समूचे भारतीय समाज और राजनीति में आमूल क्रांति का स्वप्न देखने वाले भावुक, सरल व बेहद ईमानदार कवि के रूप में शलभ की आभा तो, कूढ़मगज आलोचकों द्वारा उन्हें अराजक और उद्दंड आदि जानें क्या-क्या करार देने के बावजूद, ऐसी निर्मल थी कि अनेक लोगों को उनमें कबीर की अक्खड़ता व नजरुल की क्रांतिचेतना के साथ निराला का ओज भी नजर आता था-एक साथ.

शलभ के अपने शहर फैजाबाद की बात करें तो वह तो उनके निधन के अठारह वर्षों बाद भी किसी भी तरह उन्हें बिसराने को तैयार नहीं दिखता और उसकी दंतकथाओं में वे अभी भी पहले जैसे ही जीवंत हैं. वहां कोई भी बता सकता है आपको कि शलभ बेहद अपरिचितों को भी पहली मुलाकात में ही बताना नहीं भूलते थे कि उनके नाम का ‘श’ शत्रुघ्न के लिए, ‘ल’ लक्ष्मण के लिए और ‘भ’ भरत के लिए है. फिर पूछते थे-इन भाइयों के बगैर श्रीराम हैं भी क्या?

फिर कोई काव्यप्रेमी आपको उनकी ये पंक्तियां सुनाकर चमत्कृत भी कर सकता है:

तुम खड़े-खड़े सहो रोबोट की मार
कंप्यूटर के डाटे चबाओ पड़े-पड़े
अलविदा, मैं चला
एक कविता मेरे इंतजार में है!
राकेटों, मिसाइलों, बमों और रसायनों से दूर
अपनी दुनिया में वापस जा रहा हूं मैं
एक बच्चा मेरे इंतजार में है
इंतजार में है एक फूल
एक पत्ती मेरे इंतजार में है!

पूछेंगे तो वह यह भी बतायेगा कि उनकी कवि प्रतिभा ने 1991 में ही पहचान लिया था कि सौ रुपये किलो पालक खरीदने के लिए/ तैयार हो रहा है देश/ तैयार हो रहा है जनगण/ एक कभी न खत्म होने वाले युद्ध के लिए सिक्कों से लड़ा जाने वाला यह युद्ध/ शुरू हो चुका है पृथ्वी पर!

प्रसंगवश, वे अपनों से प्रायः पूछा करते थे- तुम्हारा कभी लोगों से झगड़ा-वगड़ा होता है या नहीं, और जवाब में ‘नहीं’ सुनते ही झट सर्वोच्च न्यायालय जैसी व्यवस्था दे डालते थे-जिसका कभी किसी से झगड़ा नहीं होता, वह भी भला कोई आदमी है?

हां, आजीवन यायावर रहे शलभ भी मुंशी प्रेमचंद की तरह उर्दू से ही हिंदी में आये. उनके अभिन्न मित्र वरिष्ठ आलोचक विजय बहादुर सिंह बताते हैं कि उर्दू शायरी के लिए उन्होंने अपना ‘शलभ फैजाबादी’ नाम रखा था, जो हिंदी में सक्रियता के साथ ही शलभ श्रीराम सिंह हो गया.

युयुत्सावाद के प्रवर्तन के बाद उन्होंने इस संसार को कभी भी शांतिभूमि नहीं माना. सदैव समरभूमि ही समझते और अपने विचारों व सपनों के अनुकूल बनाने के लिए लड़ते रहे. इस चक्कर में विजय बहादुर सिंह से भी उनके प्रेम और घृणा के मिले जुले संबंध ही रहे.

लेकिन कोई नहीं जानता कि उनके अंतिम सांस लेने के दिन यानी 23 अप्रैल, 2000 से पहले अचानक ऐसा क्या हुआ कि फैजाबाद को ही बांटकर बनाए गए नए आंबेडकरनगर जिले में जलालपुर कस्बे के निकट अपने गांव मसोढ़ा में उनको ‘अनैतिक व अयोग्य’ लोगों से भरे हुए समाज में सांस लेना ‘पाप के समान’ प्रतीत होने लगा?

क्यों वे इस निष्कर्ष तक जा पहुंचे कि मौजूदा मूल्यहीन व भ्रष्टाचारग्रस्त भारतीय समाज में उनके जैसे व्यक्ति की आवश्यकता ही नहीं रह गई है इसलिए उन्हें इस संसार में और नहीं रहना चाहिए? अपने कथित सुसाइड नोट या कि अंतिम पत्र में उन्होंने क्यों लिख डाला कि उन्हें ‘अपनी शर्तों पर’ यह संसार छोड़कर चले जाना चाहिए?

दरअसल, इस संसार से शलभ का रिश्ता था ही कुछ ऐसा कि परिवार से लेकर शब्दसंसार तक में उनकी उपस्थिति खासी विवादास्पद हुआ करती थी. इतनी कि उसमें फंसने के डर से कई आलोचकों को उनकी चर्चा से भी परहेज रहता था.

शलभ विभिन्न आंदोलनों के मकड़जाल में फंसी, कृत्रिम, अराजक और लदी-लदाई हो चली हिंदी कविता को अराजकता के शिखर से उतारकर सच्ची जमीन और जनजीवन से जोड़ने का उपक्रम कर रहे थे, तो हर नई पहल को अपने खांचे में फिट करने की जुगत करने वाले आलोचक उनको हाशिये में डाल देने पर तुले हुए थे.

आज, शलभ के जाने के इतने वर्षों बाद भी ये आलोचक अपनी जिद पर कायम हैं. इसीलिए बाबा नागार्जुन के रूप में, अपने समय के सबसे बड़े कवि की प्रशंसात्मक और सब पर भारी टिप्पणी के बावजूद शलभ की झोली में, आलोचनाजगत के ‘महामहिमों’ की ज्यादा सम्मतियां नहीं हैं. लेकिन खांचावादी आलोचकों को प्रायः ठेंगे पर रखने वाले शलभ का यह विश्वास पूरे जीवन अपरिवर्तित रहा कि: कविता के बीच से तुम्हें गुजार देने की क्षमता से युक्त कोई न कोई पुरुष जन्म लेता रहेगा हमेशा.

इस स्थिति का दूसरा पहलू यह है कि अलग-अलग मोर्चों पर अपने-अपने तेवर और तरीके से सक्रिय साहित्यिक पीढ़ियों ने अपने इस पुरस्कर्ता कवि को बेहद सहृदयता से पहचाना और सिर आंखों पर बिठाया. ‘सदंर्श’ और ‘पुरुष’ जैसी लघु पत्रिकाओं ने उन पर केंद्रित अंक निकाले और उनके द्वारा प्रवर्तित युयुत्सावाद को अन्य कर्मविहीन आंदोलनों से अलग रेखांकित किया, उनके साहित्य की आत्मा को पहचाना और उनसे प्रेरणा ली.

माना कि आदमीयत ही शलभ के व्यक्तित्व और कविता की पुकार है, उनका शब्दसार्मथ्य असाधारण है, वे शब्द-छंद के मिश्रित संस्कार वाले कवि हैं, जिनकी रचना बंधी बंधाई चैहद्दियों का अतिक्रमण करती है और उनकी भाषा में न कृत्रिम प्रवाह है, न आरोपित शब्दचयन.

वस्तुतः शलभ को अलग पहचान देने और अपने समय का महत्वपूर्ण कवि बनाने वाली चीज है उनकी व्यापक, सकारात्मक पक्षधरता और पूर्वाग्रहता से पूर्णतः मुक्त जीवनदृष्टि. उन्होंने नकारात्मकता के बजाय संघर्ष या युद्ध को अपनी कविता का महत्वपूर्ण पक्ष बनाया.

लेकिन क्या शलभ सिर्फ कवि थे? नहीं, शलभ का विचार और चिंतन-संसार भी उतना ही समृद्ध है जितनी उनकी कविताएं. यह उनका चिंतन ही था जिसने युयुत्सा को ऐसे वाद के तौर पर प्रतिष्ठा दिलाई, जिसमें अस्पष्टता के लिए कोई जगह नहीं है.

उनकी मान्यता है कि मानव सभ्यता का इतिहास युद्धों का इतिहास है और अलग-अलग देश व काल में अलग-अलग कारणों से युद्ध होते रहे हैं. ये कारण व्यक्तिगत हों या वर्ग, वर्ण, राष्ट्र या राज्य को लेकर पैदा हुए राजनीतिक, सांस्कृतिक, आर्थिक, नस्ली या सांप्रदायिक कारण.

उनके अनुसार ‘ये युद्ध विचारों से जन्म लेते हैं और जिंदगी के किसी भी मोड़ पर इनसे आमना-सामना हो सकता है. इनसे नजरें फेरकर जो संसार को शांतिभूमि कहते हैं, वे और कुछ नहीं आने वाले इंकलाब की राह रोकने का निष्फल प्रयत्न कर रहे होते हैं.’

उनकी मानें तो विवेकानंद, गालिब, फ्रायड, कार्ल मार्क्स और महात्मा गांधी सब अलग-अलग युद्धों के जनक रहे हैं और युयुत्सा मानव की केंद्रीय प्रवृत्ति व इतिहास को प्रतिफलित करने वाला संघर्षबोध है. यह संघर्ष बोध उनके अनुसार जीवन में गति और सौभाग्य का सूचक है.

अब शलभ नहीं हैं और परिस्थितियां ऐसी कि उन्हें अभीष्ट इंकलाब की राह और कठिन होती लगती है. इंकलाब का झंडा बुलंद करने वाले हाथ या तो थककर पस्त हो गए हैं या उन्होंने अपनी दिशा बदल ली है. ऐसे में कई लोगों को आने वाला समय और अंधेरा लग सकता है. पर शलभ ऐसा नहीं मानते थे.

अपने निधन से कुछ ही समय पहले इन पंक्तियों के लेखक से एक मुलाकात में उन्होंने नई पीढ़ी में अपने असीम विश्वास का प्रदर्शन करते हुए कहा था-यह समय विलाप करने का नहीं, कुछ नया करने और नई प्रतिभाओं के पास जाने का है-पूरे आत्मविश्वास के साथ क्रांति के गीत गाने का.

आइये, उनकी पुण्य तिथि पर हम उन्हीं का रख यह क्रांतिगीत गाकर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करें, जिसकी बाबत कहा जाता है कि उनका शेष सारा सृजन नष्ट हो जाये तो भी यह उनकी स्मृतियों पर धूल नहीं पड़ने देगा:

नफ़स-नफ़स क़दम-क़दम
बस एक फ़िक्र दम-ब-दम
घिरे हैं हम सवाल से हमें जवाब चाहिए
जवाब-दर-सवाल है के इन्क़लाब चाहिए
इन्क़लाब ज़िन्दाबाद,
ज़िन्दाबाद इन्क़लाब
जहां आवाम के ख़िलाफ़ साज़िशें हो शान से
जहां पे बेगुनाह हाथ धो रहे हों जान से
जहां पे लब्ज़े-अमन एक ख़ौफ़नाक राज़ हो
जहां कबूतरों का सरपरस्त एक बाज़ हो
वहां न चुप रहेंगे हम
कहेंगे हां कहेंगे हम
हमारा हक़ हमारा हक़ हमें जनाब चाहिए
जवाब-दर-सवाल है के इन्क़लाब चाहिए
इन्क़लाब ज़िन्दाबाद,
ज़िन्दाबाद इन्क़लाब…

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार है और फ़ैज़ाबाद में रहते हैं.)

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