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क्या गया एसएसपी का ट्रांसफर शराब मामले में गिरफ़्तार भाजपा सांसद के बेटे की वजह से हुआ?

बिहार की गया लोकसभा सीट से भाजपा सांसद हरि मांझी के बेटे राहुल मांझी और उनके दोस्तों को शराब पीने की वजह से बीते 23 अप्रैल को गिरफ़्तार किया गया था.

गया से भाजपा सांसद हरि मांझी. (फोटो साभार: फेसबुक)

गया से भाजपा सांसद हरि मांझी. (फोटो साभार: फेसबुक)

गया लोकसभा सीट से भाजपा सांसद हरि मांझी के बेटे राहुल मांझी व उसके दोस्तों को शराब पीने के आरोप में गिरफ़्तार किए जाने के चार दिनों के भीतर गया की सीनियर सुप्रिटेंडेंट ऑफ पुलिस (एसएसपी) गरिमा मलिक का ट्रांसफर कर दिया गया.

उन्हें बिहार मिलिट्री पुलिस की 10वीं बटालियन में कमांडेंट बनाया गया है, जिसे कामकाज के लिहाज़ से ग़ैर-महत्वपूर्ण पद माना जाता है.

पुलिस अफ़सरों ने दबी जुबान कहा कि गरिमा मलिक एक सख़्त और काबिल अफ़सर हैं. कमांडेंट का पद उनके कामकाज के मिज़ाज़ के प्रतिकूल है.

मूलतः हरियाणा की रहने वाली गरिमा मलिक वर्ष 2007 बैच की आईपीएस अफसर हैं. गया आने से पहले वह एसएसपी दरभंगा थीं.

उनके ट्रांसफर को राजनीतिक गलियारों व पुलिस महकमे में हरि मांझी के बेटे की गिरफ़्तारी से जोड़ कर देखा जा रहा है.

कहा जा रहा है कि भाजपा सांसद के बेटे के केस को कमज़ोर करने व इसकी जांच में लेटलतीफी के लिए ही गरिमा मलिक का ट्रांसफर किया गया है और इसमें हरि मांझी की भूमिका है.

द टेलीग्राफ ने पुलिस मुख्यालय के एक स्रोत के हवाले से लिखा है, ‘गरिमा का ट्रांसफर इसलिए किया गया है, ताकि राहुल के ख़िलाफ़ चार्जशीट दाख़िल करने में देरी की जा सके.’ पुलिस सूत्रों के अनुसार, तबादले का उद्देश्य राहुल को कड़ी सज़ा से बचाना भी है.

यहां यह भी बता दें कि यह पहली बार नहीं है जब शराब के मामले में हरि मांझी के बेटे राहुल की गिरफ़्तारी हुई है. वर्ष 2016 के अप्रैल में भी इसी आरोप में राहुल की गिरफ़्तारी हुई थी. उस वक़्त भी एसएसपी गरिमा मलिक ही थीं.

राहुल की दोबारा गिरफ़्तारी उन्हें शराब मामले में ‘आदतन अपराधी’ बनाती है और अपराध साबित होने पर उसे कम से कम 7 साल क़ैद की सज़ा हो सकती है.

यहां यह भी बता दें कि गया एसएसपी रहते हुए गरिमा मलिक ने कई संवेदनशील मामलों को बेहद संजीदगी के साथ निपटाया था.

बहुचर्चित आदित्य सचदेवा हत्याकांड में जदयू एमएलसी व इलाके के बाहुबली नेता बिंदी यादव के बेटे रॉकी यादव को गिरफ़्तार कर सजा दिलवाने के साथ ही कई संवेदनशील मामलों को उन्होंने बड़ी चतुराई से हैंडल किया था.

आदित्य सचदेवा हत्याकांड की सुनवाई के दौरान कई चश्मदीद गवाह अपने बयानों से मुकर गए थे और एक बार तो ऐसा लगा था कि आदित्य के परिवार को न्याय नहीं मिल पाएगा, लेकिन मज़बूत चार्जशीट के कारण रॉकी यादव को उम्रक़ैद की सज़ा मिली.

इसके अलावा बोधगया में होने वाले बौद्धों के सलाना कार्यक्रम को सफलतापूर्वक संपन्न कराने में भी उनकी भूमिका काबिले-तारीफ रही है.

गया के एक स्थानीय पत्रकार ने कहा, ‘गरिमा मलिक किसी तरह के राजनीतिक दबाव से मुक्त होकर काम करती थीं. केस के डिटेक्शन व आरोपियों को सजा दिलवाने का उनका रिकॉर्ड बेहतरीन रहा है.’

सांसद हरी मांझी से रविवार को जब इस संबंध में बात की गई तो ट्रांसफर को केस से जोड़े जाने के आरोप को उन्होंने सिरे से खारिज कर दिया.

उन्होंने कहा, ‘गरिमा मलिक के ट्रांसफर से इस केस का कोई लेना-देना नहीं है. मेरा बेटा गिरफ़्तार हो चुका है. उस पर जो धारा लगनी थी, लग चुकी है. क़ानून अपने तरीके से काम कर रहा है और करेगा. मेरा बेटा हो या मुख्यमंत्री का बेटा हो या प्रधानमंत्री हों, क़ानून की नज़र में सब बराबर हैं.’

उल्लेखनीय है कि 23 अप्रैल को राहुल की गिरफ़्तारी के तुरंत बाद हरि मांझी ने गया के पुलिस प्रशासन पर तीखा हमला करते हुए कहा था कि उनके बेटे को शराब के केस में फंसाया गया है.

उन्होंने कहा था, ‘गया के नामा गांव में शराब होने की बात पुलिस को मैंने ही बताई थी, लेकिन पुलिस ने कार्रवाई करने के बजाय मेरे बेटे व उसके दोस्तों को ही पकड़ लिया.’

रविवार को उन्होंने अपने बयान से यू-टर्न ले लिया. उन्होंने फोन पर बातचीत में कहा, ‘मैंने डीआईजी को फोन कर नामा गांव में शराब होने की बात कही थी. डीआईजी ने सिटी एसपी (गरिमा मलिक) को इसकी जानकारी देकर कार्रवाई करने को कहा. शाम को तकरीबन 6:30 बजे मेरा बेटा रिश्तेदार के यहां से लौट रहा था, तभी उसे गिरफ़्तार कर लिया गया.’

मांझी ने आगे कहा, ‘मशीन से जांच की गई, तो उसमें शराब की पुष्टि हुई है. उसे किसी ने शराब पिला दी थी.’

बहरहाल, गरिमा मलिक के साथ ही 22 डीएम, 17 एसपी समेत कुल 70 आईपीएस अफ़सरों का भी तबादला किया गया है.

कहा जा रहा है कि जिन अफसरों का ट्रांसफर हुआ है, उनमें से अधिकांश की तैनाती महागठबंधन की सरकार के समय राजद के मुखिया लालू प्रसाद यादव के इशारे पर की गई थी.

लोकसभा चुनाव से पहले इतने बड़े पैमाने पर तबादले को राजनीतिक नज़रिये से भी देखा जा रहा है.

गरिमा मलिक के ट्रांसफर के संबंध में राजद प्रवक्ता व राज्यसभा सांसद मनोज झा ने कहा, ‘जब इस तरह के संवेदनशील (सांसद हरि मांझी के बेटे की गिरफ़्तारी) मामले चल रहे हों, तो तबादला कर देने से आम जनता में गलत संदेश जाता है.’

उन्होंने कहा, ‘हाई-प्रोफाइल मामलों के दरम्यान जब इस तरह का ट्रांसफर होता है, तो लोगों का शक़ मजबूत होता है कि रसूखदार लोगों के लिए क़ानून अलग तरीके से काम करता है. मेरे ख़याल में इस तरह के संवेदनशील मामलों में रूटीन ट्रांसफर से भी बचा जाना चाहिए.’

गौरतलब है कि वर्ष 2016 के अप्रैल में शराबबंदी क़ानून लागू होने के बाद से अब तक करीब सवा लाख लोगों की गिरफ़्तारी हो चुकी है. इनमें से ज़्यादातर आरोपित गरीब तबके से आते हैं.

नीतीश सरकार पर अक्सर यह आरोप लगता रहता है कि शराबबंदी क़ानून के ज़रिये केवल और केवल गरीब लोगों को परेशान किया जा रहा है.

इन आरोपों के बीच भाजपा सांसद के बेटे की गिरफ़्तारी और फिर गरिमा मलिक का ट्रांसफर सरकार की मंशा पर सवाल खड़ा करता है.

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं.)

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