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क्या भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व ने वसुंधरा से दो-दो हाथ करने का मन बना लिया है?

एक ओर जहां वसुंधरा राजे अपनी पसंद का प्रदेश अध्यक्ष बनवाने पर अड़ी हैं तो वहीं दूसरी ओर मुख्य सचिव को सेवा विस्तार न देकर केंद्र ने भी अपने इरादे ज़ाहिर कर दिए हैं.

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राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी. (फाइल फोटो: पीटीआई)

विधानसभा चुनाव के मुहाने पर खड़े राजस्थान में मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे और भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व के बीच जारी रस्साकशी कौतुहल का विषय बन गई है. पार्टी के भीतर चल रहा यह सियासी संघर्ष अपने विश्वासपात्र को प्रदेशाध्यक्ष बनाने तक सीमित दिखाई दे रहा था, लेकिन केंद्र सरकार का प्रदेश के मुख्य सचिव एनसी गोयल को सेवा विस्तार देने से इंकार करना इसका दायरा बड़ा होने की ओर से साफ संकेत है.

यदि इसमें कर्नाटक विधानसभा चुनाव के लिए जारी भाजपा के स्टार प्रचारकों की सूची में वसुंधरा राजे का नाम नदारद होने की सूचना को भी जोड़ दिया जाए तो अंदरूनी सियासी संघर्ष के सिरे और स्पष्ट हो जाते हैं. तो क्या यह मान लिया जाए कि भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व ने वसुंधरा राजे से दो-दो हाथ करने का मन बना लिया है?

इस सवाल का जवाब देते समय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ‘गुड बुक’ और उनके मंत्रिमंडल में शामिल राजस्थान के एक नेता पसोपेश में पड़ जाते हैं. वे कहते हैं, ‘अभी सीधे संघर्ष की नौबत तो नहीं आई है, लेकिन जहां तक मुझे जानकारी है उसके हिसाब से पार्टी अध्यक्ष और प्रधानमंत्री ने इतना तो तय कर लिया है कि वसुंधरा राजे को मनमानी करने की इजाजत किसी भी सूरत में नहीं दी जाएगी. यह भी तय है कि अब उनकी किसी भी नाजायज शर्त के सामने पार्टी किसी भी सूरत में आत्मसमर्पण नहीं करेगी.’

यदि केंद्रीय मंत्री का उपरोक्त दावा सही है तो आने वाले दिनों में वसुंधरा राजे और भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व के बीच अविश्वसनीय खींचतान देखने को मिल सकती है. प्रदेश अध्यक्ष विवाद का पटाक्षेप निश्चित रूप से इस संघर्ष की दिशा तय करेगा.

गौरतलब है कि 16 अप्रैल को अशोक परनामी के इस्तीफे के बाद से ही यह पद खाली है. लोकसभा की दो और विधानसभा की एक सीट के लिए हुए जनवरी में हुए उपचुनावों में पार्टी की करारी हार के बाद परनामी की छुट्टी तय मानी जा रही थी. यह भी तय माना जा रहा था कि नया प्रदेश अध्यक्ष तय करने में पार्टी को कोई परेशानी नहीं आएगी, लेकिन ऐसा हुआ नहीं.

18 अप्रैल को अशोक परनामी का इस्तीफा सामने आते ही प्रदेश अध्यक्ष के लिए जो नाम सामने आए उनमें केंद्रीय कृषि राज्य मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत का नाम सबसे ऊपर था. मीडिया में यहां तक खबर आ गई कि भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व ने उनके नाम पर मुहर लगा दी है. केवल औपचारिक रूप से ऐलान होना बाकी है, जो शेखावत के विदेश से लौटने के बाद होगा.

पार्टी के कई नेताओं ने तो सोशल मीडिया पर शेखावत को प्रदेश अध्यक्ष बनने की बधाई तक दे डाली. इस घटनाक्रम के बाद वसुंधरा खेमे की ओर से आई प्रतिक्रियाओं ने पार्टी की पेशानी पर पसीना ला दिया.

सबसे पहले दिग्गज नेता देवी सिंह भाटी ने गजेंद्र सिंह शेखावत पर निशाना साधा. उन्होंने कहा, ‘शेखावत की छवि जाट विरोधी है. यदि उन्हें प्रदेशाध्यक्ष बनाया जाता है तो भाजपा का जाट वोट खिसक जाएगा. इससे पार्टी को भारी नुकसान होगा.’

भाटी यहीं नहीं रुके. उन्होंने शेखावत के राजनैतिक अनुभव पर भी तीखी टिप्पणी की. उन्होंने कहा, ‘गजेंद्र सिंह शेखावत जोधपुर में छात्र राजनीति में रहे हैं. वे जोधपुर से पहली बार सांसद बने हैं. अभी भी वे यहीं की राजनीति में सक्रिय हैं. उनको जोधपुर से बाहर जानता कौन है. प्रदेशाध्यक्ष ऐसे व्यक्ति को बनाना चाहिए जिसे पूरा राजस्थान जानता हो.’

देवी सिंह भाटी ने उक्त बयान स्वत: ही दिया या किसी के कहने पर, इस बारे में तो कयास ही लगाए जा सकते हैं, लेकिन उनके बोलने के बाद सियासी सरगर्मी जरूर बढ़ गई. वसुंधरा खेमे के कई मंत्रियों और विधायकों ने दिल्ली जाकर पार्टी नेतृत्व को गजेंद्र सिंह शेखावत को प्रदेशाध्यक्ष बनाने के नुकसान गिनाए.

सूत्रों के अनुसार सभी ने शेखावत की संभावित नियुक्ति को प्रदेश के जातिगत समीकरणों के मुफीद नहीं बताया. यहां यह भी काबिलेगौर है कि दिल्ली तक दौड़ लगाने वाले ज्यादातर नेता राजपूत व जाट जाति के ही थे. हालांकि पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व ने इन्हें खास तवज्जो नहीं दी. कुछ नेता ही पार्टी अध्यक्ष अमित शाह से मुलाकात कर पाए.

इस बीच, केंद्रीय जल संसाधन व गंगा विकास राज्य मंत्री अर्जुन मेघवाल के बेटे ने अमित शाह के फेसबुक पेज पर टिप्पणी कर विवाद को और बढ़ा दिया. उन्होंने लिखा, ‘आप राजस्थान के मतदाताओं की सोचो. गजेंद्र सिंह शेखावत फिट नहीं हैं और इससे जातिगत समीकरण नहीं साधे जा सकेंगे. राज्य में 32 प्रतिशत एससी/एसटी, जाट 18 प्रतिशत, मुस्लिम 10 प्रतिशत, राजपूत 3 प्रतिशत, ब्राह्मण 5 प्रतिशत, ओबीसी 16 प्रतिशत और बनिया 5 प्रतिशत हैं. यदि प्रदेश पर ध्यान नहीं दिया गया तो राजस्थान की 200 सीटों में से 140 सीटें कांग्रेस आगामी चुनाव में जीत सकती है.’

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राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह. (फोटो साभार: vasundhararaje.in)

हालांकि मामला तूल पकड़ने के बाद उन्होंने इस टिप्पणी को डिलीट कर दिया. उल्लेखनीय है कि अर्जुन मेघवाल भी प्रदेशाध्यक्ष की दौड़ में शामिल माना जा रहा है.

ऐसे समय में जब भाजपा में मोदी-शाह की मर्जी के बिना पत्ता भी नहीं हिलता है तब प्रदेश अध्यक्ष पद पर हो रही कशमकश अप्रत्याशित है. दरअसल, वसुंधरा की राजनीति करने की अपनी शैली है. एकदम रजवाड़ों की मानिंद. ना-नुकुर करने और ऑर्डर देने वालों को वे पसंद नहीं करतीं.

भाजपा के अध्यक्ष रहे राजनाथ सिंह उनकी इस शैली से रूबरू हैं. उस समय राजे ने पार्टी छोड़ने तक की धमकी दे दी थी. अंतत: पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व को उनके सामने आत्मसमर्पण ही करना पड़ा था. वर्तमान में वसुंधरा सत्ता में तो हैं ही, लेकिन संगठन पर भी वे अपनी पकड़ रखना चाहती हैं.

यह जगजाहिर है कि अशोक परनामी न सिर्फ उनकी कृपा से प्रदेशाध्यक्ष बने, बल्कि उन्होंने संगठन में उन्हीं नेताओं को तवज्जो दी जिन पर राजे की सहमति थी. चूंकि अब चुनाव नजदीक हैं इसलिए वसुंधरा ऐसा प्रदेशाध्यक्ष नहीं चाहतीं जो उनके वर्चस्व में बंटवारा कर ले. वे कोई ऐसे नेता को भी इस पद पर नहीं चाहती हैं कि जो उन्हें भविष्य में चुनौती दे सके.

पहले यह माना जा रहा था कि अमित शाह और वसुुंधरा राजे की 26 अप्रैल की बैठक में यह मामला सुलझ जाएगा, लेकिन पार्टी महासचिव रामलाल और वी. सतीश की मौजूदगी में हुए मैराथन चिंतन के बाद भी कोई नतीजा नहीं निकला. सूत्रों के अनुसार वसुंधरा राजस्थान में अपनी पसंद का अध्यक्ष चाहती हैं जिसके पार्टी नेतृत्व फिलहाल तैयार नहीं है.

कहा जा रहा है कि प्रदेशाध्यक्ष का फैसला अब कर्नाटक चुनाव के बाद ही होगा. हालांकि तब भी पार्टी नेतृत्व के सामने दो ही विकल्प होंगे. पहला वसुंधरा की जिद के सामने आत्मसमर्पण और दूसरा उनकी पसंद को दरकिनार कर निर्णय लेना. यह देखना रोचक होगा कि पार्टी इनमें से कौन सा विकल्प चुनती हैं, क्योंकि इसी से राजस्थान में भाजपा की राजनैतिक दिशा तय होगी.

इस बीच, केंद्र सरकार का वसुंधरा की इच्छा के बावजूद तत्कालीन मुख्य सचिव एनसी गोयल को सेवा विस्तार देने से इंकार करना इस ओर संकेत है कि पार्टी नेतृत्व फिलहाल आत्मसमर्पण के मूड में नहीं है.

गौरतलब है कि गोयल का कार्यकाल 30 अप्रैल को समाप्त हुआ था. सूत्रों के अनुसार वसुंधरा चाहती थीं कि केंद्र सरकार गोयल को छह महीने का सेवा विस्तार दे दे. इसके लिए उन्होंने आखिर तक काफी प्रयास किए, लेकिन वे कामयाब नहीं हुईं. अंतत: सरकार को देर रात डीबी गुप्ता को नया मुख्य सचिव बनाने के आदेश निकालने की पड़े.

बड़ा सवाल यह है कि वसुंधरा राजे और पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व के बीच जारी रस्साकशी का अंजाम क्या होगा. झुकना न तो राजे की सियासी तासीर है और न ही अमित शाह की. वसुुंधरा खेमे के एक मंत्री कहते हैं, ‘यदि शाह आर-पार की लड़ाई लडेंगे तो चुप राजे भी नहीं बैठेंगी.’

वहीं, मोदी-शाह के एक करीबी नेता कहते हैं, ‘मोदी और शाह किसी भी कीमत पर वसुंधरा के सामने सरेंडर नहीं करेंगे. होगा तो वही जो वो चाहेंगे.’ ऐसे में गजेंद्र सिंह शेखावत के नाम पर सहमति मुश्किल है. बीच का रास्ता यह हो सकता है कि किसी ऐसे संघनिष्ठ नेता को प्रदेश अध्यक्ष बना दिया जाए जिनके नाम पर वसुंधरा को आपत्ति न हो.

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं और जयपुर में रहते हैं.)

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