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कॉलेजियम की सिफ़ारिश लौटाने का सरकार का फैसला अभूतपूर्व: न्यायमूर्ति कुरियन जोसेफ

न्यायमूर्ति कुरियन जोसेफ ने कहा कि ऐसा कोई उदाहरण नहीं है जब कॉलेजियम की सिफ़ारिश वाले नामों को केंद्र द्वारा वापस भेजा गया हो. इसलिए मामले पर और अधिक चर्चा किए जाने की ज़रूरत है.

जस्टिस कुरियन जोसेफ. (फोटो साभार: ट्विटर/@ashokmkini)

जस्टिस कुरियन जोसेफ. (फोटो साभार: ट्विटर/@ashokmkini)

कोच्चि: उत्तराखंड उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश केएम जोसेफ को शीर्ष अदालत में न्यायाधीश के रूप में पदोन्नति देने की उच्चतम न्यायालय कॉलेजियम की सिफ़ारिश को वापस भेजने का केंद्र सरकार का फैसला अभूतपूर्व है और इस पर व्यापक चर्चा किए जाने की आवश्यकता है.

यह बात कॉलेजियम सदस्य न्यायमूर्ति कुरियन जोसेफ ने कही.

उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश ने यहां एक कार्यक्रम से इतर संवाददाताओं से कहा, ‘चीज़ें जो नहीं होनी चाहिए थीं, वे हुईं… यह आम धारणा है.’

वह केंद्र द्वारा कॉलेजियम की सिफ़ारिश लौटाए जाने और उससे शीर्ष अदालत में न्यायमूर्ति केएम जोसेफ की पदोन्नति पर पुनर्विचार के लिए कहे जाने के बारे में पूछे गए एक सवाल का जवाब दे रहे थे.

शीर्ष अदालत के न्यायाधीश ने कहा, ‘ऐसा कोई पूर्व उदाहरण नहीं है जब कॉलेजियम की सिफ़ारिश वाले नामों को (केंद्र द्वारा) वापस भेजा गया हो. इसलिए (मामले पर) और अधिक चर्चा किए जाने की आवश्यकता है.’

मालूम हो कि केंद्र की मोदी सरकार ने उत्तराखंड हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश केएम जोसेफ को पदोन्नति देकर सुप्रीम कोर्ट जज संबंधी शीर्ष अदालत के कॉलेजियम की सिफारिश बीते 26 अप्रैल को लौटा दी थी.

इसी दिन वरिष्ठ अधिवक्ता इंदु मल्होत्रा को उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश नियुक्त किया गया था. कॉलेजियम ने 10 जनवरी को एक प्रस्ताव में जस्टिस जोसेफ और इंदु मल्होत्रा को शीर्ष अदालत में न्यायाधीश नियुक्त करने की सिफ़ारिश की थी.

जस्टिस जोसेफ का नाम उस समय सुर्ख़ियों में आया जब उनकी अध्यक्षता वाली उत्तराखंड उच्च न्यायालय की पीठ ने अप्रैल 2016 के फैसले में राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू करने की अधिसूचना रद्द करने के साथ ही हरीश रावत सरकार को बहाल कर दिया था.

पांच सदस्यीय कॉलेजियम में प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा, जस्टिस जे. चेलमेश्वर, जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस मदन बी. लोकुर और जस्टिस कुरियन जोसेफ शामिल हैं. सरकार के इस क़दम पर कांग्रेस ने सवाल उठाते हुए कहा था कि क्या उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन के ख़िलाफ़ फ़ैसले की वजह से उनके नाम को मंज़ूरी नहीं दी गई.

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