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योगी की ताजपोशी ‘हिंदुत्ववादी विकास’ की ओर अब तक का सबसे बड़ा कदम है

एक स्पष्ट और निर्णायक हिंदुत्व को आर्थिक विकास की व्यापक परियोजना का अभिन्न अंग बना दिया गया है. आने वाले समय में इसके कई और आयाम हमारे सामने धीरे-धीरे प्रकट होंगे.

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ. (फाइल फोटो: रॉयटर्स)

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में भाजपा की बड़ी जीत के ठीक बाद राज्य के प्रमुख हिंदी अखबारों में आरएसएस विचारक एमजी वैद्य का यह बयान प्रमुखता से छापा गया कि यह जनादेश राम मंदिर के निर्माण के लिए दिया गया है.

वैद्य ने जोर देकर कहा राम मंदिर का निर्माण भाजपा के घोषणा-पत्र का हिस्सा है. वैद्य के बयान के कुछ दिनों के भीतर ही भाजपा नेतृत्व ने 44 वर्षीय योगी आदित्यनाथ को उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाकर सबको चौंका दिया.

आदित्यनाथ 1998 से गोरखपुर से सांसद रहे हैं. यह बात किसी से छिपी नहीं है कि योगी आदित्यनाथ भाजपा के कट्टर हिंदुत्व का चेहरा हैं, जिन्होंने यूपी के सारे मस्जिदों में हिंदू मूर्तियां रखने की इच्छा जतायी थी.

उन्होंने खुलेआम भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने की भी बात की है. वे बार-बार यह भी धमकी भरे लहजे में कहते रहे हैं, ‘जब कोई कारसेवकों को बाबरी मस्जिद का विध्वंस करने से नहीं रोक सका, तो कोई उन्हें उस जगह पर मंदिर का निर्माण करने से कैसे रोक सकता है?’

आदित्यनाथ की ताजपोशी का स्वागत करने में आरएसएस की शाखा विश्व हिंदू परिषद (विहिप) सबसे आगे थी. राम मंदिर के निर्माण का आंदोलन विहिप ने चलाया था.

विहिप के लड़ाकू नेता और प्रचारक प्रवीण तोगड़िया ने कहा, ‘हमें अब पक्का विश्वास है कि यूपी में नये नेतृत्व में भगवान राम को अयोध्या में जल्दी ही एक भव्य मंदिर मिल जाएगा.’

तोगड़िया ने राम मंदिर आंदोलन में आदित्यनाथ के गुरु और उनके पालक पिता महंत अवैद्यनाथ के योगदान को भी याद किया. अवैद्यनाथ चार बार सांसद रहे और काफी जोशीले तरीके से 1980 के दशक से राम मंदिर आंदोलन का नेतृत्व किया.

ये वो वक्त था जब लालकृष्ण आडवाणी के नेतृत्व में भाजपा राष्ट्रीय स्तर पर पूरी तरह से राम-जन्मभूमि की मुहिम में कूद पड़ी. आडवाणी ने बाद में इसे आजादी के बाद देश का सबसे बड़ा राजनीतिक आंदोलन करार दिया.

2003 में राम मंदिर निर्माण की विहिप की समिति के अध्यक्ष के तौर पर अवैद्यनाथ ने राम मंदिर के निर्माण का रास्ता साफ करने के लिए संसद का विशेष सत्र बुलाने की मांग की.

उनकी मांग थी कि एक कानून बना कर ढहाई गई बाबरी मस्जिद की जगह पर राम मंदिर के निर्माण का मार्ग प्रशस्त किया जाए. यह सही है कि उनकी मांग को तब के एनडीए नेतृत्व ने ज्यादा तवज्जो नहीं दी, क्योंकि उनके पास संसद में तब बहुमत नहीं था. साथ ही यह भी तथ्य है कि एनडीए के घोषणापत्र. ने राम मंदिर जैसे विवादित मुद्दों को दूर रखा गया था.

यह याद रखना मुनासिब होगा कि आज भाजपा लोकसभा और यूपी विधानसभा- दोनों जगहों पर पूर्ण बहुमत में है. राज्य सभा में भाजपा को बहुमत मिलने में बस थोड़ी देर है. इसलिए तकनीकी तौर पर देखा जाए, तो मंदिर निर्माण के लिए विशेष कानून बनाने के महंत अवैद्यनाथ के प्रस्ताव को पुनर्जीवित करने के लिए भाजपा को अब इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का इंतजार करने की भी जरूरत नहीं रह गयी है.

यूपी की विधानसभा में भारी बहुमत इस लक्ष्य में भाजपा की और भी मदद करेगा. आदित्यनाथ की आश्चर्यचकित करनेवाली पदोन्नति को इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए.

एक तरह से यह 70 वर्षों के एक अटूट सिलसिले की भी याद दिला रहा है. इन वर्षों में नाथ संप्रदाय से संबंध रखनेवाले गोरखनाथ मठ के प्रमुखों ने लगातार और गैरकानूनी रूप से बाबरी मस्जिद की जगह पर राम मंदिर बनाने की मुहिम को अपना समर्थन दिया है.

यहां यह याद किया जा सकता है कि जिस तरह से आदित्यनाथ ने अवैद्यनाथ की विरासत को संभाला, ठीक उसी तरह से अवैद्यनाथ ने मठ की बागडोर अपने गुरु महंत दिग्विजयनाथ से संभाली थी.

दिग्विजयनाथ ने 1949 में बाबरी मस्जिद के भीतर गैर कानूनी रूप से राम लला की मूर्ति रखने की मुहिम का नेतृत्व किया था. बाद में 1967 में दिग्विजय नाथ लोकसभा के लिए भी चुने गये. उस वक्त वे हिंदू महासभा के राष्ट्रीय महासचिव थे. उन्होंने भी विहिप के साथ नजदीकी संपर्क में काम किया.

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गोरखनाथ मठ की राम मंदिर आंदोलन में भूमिका के इस लंबे इतिहास को देखते हुए यूपी में आदित्यनाथ की ताजपोशी तार्किक दिखती है. और यह सब एक ऐसे समय में हुआ जब संघ परिवार को यह लगने लगा है कि राजनीतिक हिंदुत्व समाज में इतनी गहराई तक रिस गया है कि अब बहुत समय से ठप्प पड़े राम मंदिर निर्माण के प्रोजेक्ट को आगे बढ़ाया जा सकता है.

राम मंदिर निर्माण उनके लिए देश में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की स्थापना का प्रमुख सूचक है. पिछले कुछ समय से भाजपा नेतृत्व इसके लिए जमीन तैयार करता रहा है. यह कहकर कि ‘विकास और हिंदुत्व’ एक ही सिक्के के दो पहलू हैं और इनमें किसी किस्म का विरोध नहीं देखा जाना चाहिए.

भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने 2014 से अब तक कई साक्षात्कारों में ये बात कही है. हाल ही में यूपी चुनाव प्रचार के संदर्भ में शाह ने संपादकों के एक छोटे से समूह को कहा कि ‘आप लोग प्रधानमंत्री द्वारा उठाये गये श्मशान घाट/ कब्रिस्तान को बराबरी देने के मुद्दे को सांप्रदायिक मुद्दा मान रहे हैं. लेकिन हम इसे विकास का मुद्दा मानते हैं.’

यह साफ तौर पर दिख रहा है कि एक स्पष्ट और निर्णायक हिंदुत्व को व्यापक आर्थिक विकास की परियोजना का अविभाज्य अंग बना दिया गया है. इसके कई दूसरे आयाम धीरे-धीरे सामने आएंगे. नोटबंदी के बाद मतदाताओं के व्यवहार ने भाजपा का मन और बढ़ाया है.

संघ नेतृत्व ने इसकी व्याख्या इस तरह की है कि लोगों ने नोटबंदी के पक्ष में दिये गये एक बड़े नैतिक/राष्ट्रवादी वृत्तांत को स्वीकार कर लिया है और वे ‘व्यापक लक्ष्य’ के लिए आर्थिक और भौतिक कुर्बानियां देने के लिए तैयार हैं. भाजपा नेतृत्व इसी तर्ज पर प्रस्तावित राम मंदिर को हिंदुत्व आधारित राष्ट्रवादी विकास के साथ नत्थी कर सकता है. इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए फिर से भौतिक बलिदान देना पड़ सकता है.

बाबरी मस्जिद विध्वंस के पहले के और बाद के वर्षों में देखी गयी सामाजिक अशांति और हिंसा ने भारतीय अर्थव्यवस्था को कई साल पीछे धकेल दिया. इसने भारतीय राजनीति में स्थायी दरारें पैदा कर दीं. मुंबई और कई वर्षों के बाद गुजरात में हुए दंगे इसका प्रमाण हैं.

लोकसभा और उत्तर प्रदेश विधानसभा में भारी बहुमत से लैस भाजपा इस बार और ज्यादा साहसी प्रयोग करने के लिए तैयार है. आदित्यनाथ को उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाना ‘हिंदुत्व आधारित विकास’ की दिशा में अब तक का सबसे साहसी कदम है.