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बाल विवाह के पक्ष में होना महज़ एक विचार नहीं, बल्कि एक घातक विचारधारा है

इस विचारधारा में स्त्रियों, बच्चों, क़ानून, समाज में बराबरी, सहिष्णुता और सुरक्षा के प्रति कोई सम्मान नहीं है. बाल विवाह केवल लड़कियों के जीवन को संकुचित और दुरूह नहीं बनाता है, लड़कों के जीवन को भी उतना ही प्रताड़ित करता है.

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(फोटो: रॉयटर्स)

पुरुष अपने पुरुषत्व बल की सत्ता में आ रहे उतार-चढ़ावों को देख बहुत घबराया हुआ है. इस समाज को बेहतर, समान और न्यायमूलक बनाने के लिए हो रही कोशिशों से उसके अपराधों और निरंकुशता पर नियंत्रण लग रहा है, तो वह बहुत बेचैन है.

उसकी पूंजीवादी, उपनिवेशवादी और मर्दवादी सत्ता को चुनौती मिल रही है. ऐसे में उसे कई बार नैतिक और अनैतिक, मानवीय और अमानवीय, क़ानूनी और गैरक़ानूनी पक्ष के बीच के अंतर का भान ही नहीं रह जाता है. मध्य प्रदेश की विधानसभा के सदस्य यानी चुने हुए विधायक श्री गोपाल परमार (आगर मालवा) ने अपनी वाणी से इन बिंदुओं को सच साबित किया है.

5 मई 2018 को आजीविका और कौशल विकास दिवस पर अपने विधानसभा क्षेत्र में आयोजित एक कार्यक्रम में उन्होंने भी अपने ‘मन की बात’ कह डाली. बहरहाल, इस बात का आयोजन की कथावस्तु से कोई सरोकार नहीं था, पर बेचैनी फुदक कर बाहर आ गई.

परमार ने कहा, ‘गांव में पहले संबंध बन जाते थे, जिससे उनकी मानसिकता बन जाती थी कि मेरा संबंध हो चुका है या शादी हो चुकी है, इसलिए वे गलत कदम उठाने से बच जाते थे. पहले देखते थे कि समाज में शादी होती थी. हमारे बड़े-बूढ़े ही संबंध तय कर लेते थे. भले ही बचपन में कर लेते थे, लेकिन वह संबंध ज्यादा टिके रहते थे, ज्यादा मजबूत थे. जब से यह 18 साल की बीमारी सरकार ने चालू की है, इसमें बहुत सारी लड़कियां घर से भागने लग गई हैं. लव जिहाद का बुखार चालू हो गया है. हमें घर में ध्यान ही नहीं है कि हमारी छोरी क्या कर रही है, हमें कह कर जा रही है कि पढ़ने के लिए कोचिंग क्लास जा रही हूं और वह किसी भी लड़के के साथ भाग गई.’

वे यहीं नहीं रुके. उन्होंने आगे कहा, ‘बहुत सारे शरारती लोग आते हैं. शातिर लोग आते हैं. हमारी माता-बहनें लिहाज़ पालने वाली होती हैं, इनके साथ कोई उपकार कर देता है तो उनका बहुत सारा अहसान मानती हैं. अगर वह किसी लड़के के साथ भाग गई तो आपकी इज्ज़त के साथ खिलवाड़ हो जाएगा. इसलिए यह पता लगाने की आपकी जिम्मेदारी बनती है कि लड़की गई तो कहां गई है? मैंने क़ानूनी उम्र में पंहुचने से पहले ही अपने तीनों बच्चों का विवाह कर दिया था, अब वे खुश हैं. वे मानते हैं कि जैसे पशुओं को पता होता है कि शाम को लौटकर कहां जाना है, वैसे ही शादी के बाद बच्चों को पता होता है कि कहां लौटना है?’

वे साथ ही बोले, ‘मुसलमानों में कुछ गुंडा तत्व होते हैं, जो नाम और पहचान छिपाकर लड़कियों को प्रभावित कर लेते हैं. यदि कम उम्र में शादी कर दी जाए, तो लव जिहाद से उन्हें बचाया जा सकता है.’

ये किसी एक व्यक्ति के विचार नहीं बल्कि एक विभाजनकारी विचारधारा के प्रतीक वाक्य हैं. इस विचारधारा में स्त्रियों, बच्चों, क़ानून, समाज में बराबरी, सहिष्णुता और सुरक्षा के प्रति कोई सम्मान नहीं है. याद रखिएगा कि बाल विवाह केवल लड़कियों के जीवन को संकुचित और दुरूह नहीं बनाता है, यह लड़कों के जीवन को भी उतना ही प्रताड़ित करता है.

परमार के विचार हमारे समाज के उस बड़े हिस्से का प्रतिनिधित्व करते हैं, जो स्त्रियों को स्वतंत्र जीवन जीने का अधिकारी नहीं मानते हैं. जो मानते हैं कि स्त्री को समय रहते स्थायी क़ैदी बना लिया जाना चाहिए, वरना वह पितृ-सत्तात्मक समाज द्वारा की जाने वाली हिंसा, शोषण, दुराचार और गैर-बराबरी का विरोध करने लगती है.

इसी को ध्यान में रखकर परमार कहते हैं कि कम उम्र में हुआ विवाह स्थायी होता है. वे अपरिपक्वता के संबंध और विकल्पहीनता की स्थिति को स्थायी रिश्तों का पर्याय मानते हैं.

ऐसी मानसिकता रखने वाले समाज के इस तबके की चिंता है कि अगर कम उम्र में लड़कियों की शादी नहीं होती है, तो वे अपने जीवन साथी का चुनाव खुद कर सकती हैं. इससे पितृसत्तात्मक समाज को निर्णय लेने का अधिकार नहीं रह जाएगा.

हम जानते हैं कि विवाह नामक व्यवस्था का एक किस्म से सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक व्यापार के उपक्रम के रूप में दुरूपयोग किया गया है. ऐसे उपक्रमों में बच्चों के हितों और गरिमा का स्थान कभी महत्वपूर्ण नहीं होता है, बच्चे इस प्रक्रिया में ‘वस्तु-विनिमय’ के रूप में इस्तेमाल किए जाते हैं.

(फोटो :रॉयटर्स)

(फोटो :रॉयटर्स)

सभ्य समाज में बाल विवाह को मानव विकास के लिए एक नकारात्मक सूचक और बड़ी चुनौती के रूप में स्वीकार किया गया है. इससे बच्चे पूरी शिक्षा हासिल करने से वंचित रह जाते हैं. उन्हें कौशल विकास के अवसर नहीं मिल पाते हैं. विवाह से उपजी जिम्मेदारियां उन्हें पनपने और अपने जीवन के बारे में सपने देखने के अधिकार से वंचित कर देती हैं.

इन अवस्थाओं में बच्चों, ख़ास तौर पर लड़कियों का यौन शोषण भी होता है. कम उम्र के विवाह का परिणाम होता है, कम उम्र में गर्भावस्था और कम उम्र में गर्भावस्था का परिणाम होता है, लड़की के मरने की ज्यादा आशंकाएं, बच्चों में कुपोषण, विकलांगता और शिशु मृत्युदर में बढ़ोत्तरी की आशंका.

2016 के चौथे राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के निष्कर्ष बताते हैं कि बिहार में 39.1 प्रतिशत विवाह क़ानूनी उम्र से पहले ही हो जाते हैं. आँध्रप्रदेश में 32.6 प्रतिशत, गुजरात में 24.9 प्रतिशत, मध्य प्रदेश में 30 प्रतिशत, राजस्थान में 35.4 प्रतिशत, पश्चिम बंगाल में 40.7 प्रतिशत और समग्र भारत में 26.8 प्रतिशत विवाह बाल विवाह होते हैं.

जरा सोचिये कि दुनिया में सबसे आगे होने की चाहत रखने वाले भारत ने 1980 के दशक में कंप्यूटर के इस्तेमाल को बढ़ावा देने के लिए दिन-रात की कोशिशें शुरू कर दीं. आर्थिक महाशक्ति बनने के लिए 1991 में आर्थिक उदारीकरण और निजीकरण की घातक नीतियों को तुरंत अपना लिया, पर बाल विवाह को रोकने का क़ानून वर्ष 2006 में ही आ पाया. क्योंकि रूढ़िवादी, जातिवादी और लैंगिक उत्पीड़न को सामाजिक-सांस्कृतिक मान्यता देने वाला समाज बच्चों के हितों पर संवेदनशील रहा ही नहीं है. बच्चे उसके लिए पहले उपनिवेश होते हैं और महिलायें दोहरी उपनिवेश, जिन पर पितृसत्तात्मक समाज शासन करता है.

गोपाल परमार के वक्तव्य से चौंकिए मत. यह व्यापक समाज की ही अभिव्यक्ति है. जिसे वे तो बस सामने रख रहे हैं. इसे सामाजिक-राजनीतिक मान्यता भी मिली हुई है. यही कारण है कि भारत की संसद के द्वारा बनाए गए एक बहुत महत्वपूर्ण क़ानून और नीति को खारिज करने के बाद भी उनके प्रति कोई कार्रवाई नहीं हुई.

आप अच्छे से जानते ही हैं कि आजकल सरकारें खुद दहेज़ देने की योजना चलाती हैं और सामूहिक विवाह कार्यक्रमों का आयोजन करवाती हैं. विवाह आयोजनों का उपक्रम सामुदायिक और कट्टरपंथी धार्मिक राजनीति में बड़ा प्रभावशाली महत्व रखता है. यही कारण है कि सरकार समर्थित सामूहिक विवाह कार्यक्रमों में बाल विवाह भी होते हैं.

इसकी सबको जानकारी होती है, अखबारों में खबर छपती हैं और फिर भी सांसद, विधायक और मंत्री उनमें बाकायदा मौजूदा रह कर ‘बाल-विवाहितों’ को आशीर्वाद देते हैं. क़ानून टूटता है. लेकिन बच्चे तो उस व्यवस्था की खिलाफत भी नहीं कर सकते हैं, क्योंकि हर कोई उस वक़्त उनके ख़िलाफ़ खड़ा होता है.

स्वतंत्रता के बाद से ही, ख़ासतौर पर जब से पूंजीवादी आर्थिक नीतियों की खाज़ (संक्रमित खुजली) के साथ साम्प्रदायिकता और लैंगिक-जातिवादी राजनीति के कोढ़ (कुष्ठ रोग) का गठजोड़ हो गया है, तब से संकट अपने चरम की तरफ बढ़ना शुरू हो गया है.

इस व्यवस्था में दो युवा अपनी समझ से एक निर्णय लेकर प्रेम करना और जीवन साथ गुजारना चाहें तो उन्हें कठोर सजा का पात्र माना जाता है. समाज चिंतित होता है कि हिन्दू लड़की मुसलमान लड़के से प्रेम करती है तो इससे उनका प्रभुत्व संकट में आ जाएगा.

इस संकट से निपटने के लिए वे दो इंसानों की हत्या कर सकते हैं, किसी समुदाय को सबक सिखाने के लिए सामूहिक बलात्कार कर सकते हैं. जमीन लूट सकते हैं, उनका सामाजिक बहिष्कार कर सकते हैं.

लेकिन, उन्हें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता है कि भारत में वर्ष 2008 से 2016 के बीच नौ सालों में 68 लाख बच्चे जन्म लेने के बाद 28 दिन भी नहीं जी पाए और मर गए. देश में अब भी हर साल 40 हज़ार महिलाएं मातृत्व मृत्यु की शिकार हो जाती है. साढ़े छह करोड़ बच्चे कुपोषित हैं.

कारण हैं- बाल विवाह, कम उम्र में गर्भावस्था, हिंसा, भेदभाव, स्वास्थ्य सेवाओं का अभाव और गरीबी का कुचक्र. बावजूद इसके परमार जैसे जिम्मेदार लोगों के मुखारबिंद से बदलाव के लिए पहल करने और संघर्ष के लिए प्रतिबद्धता के फूल नहीं झड़ते हैं. वे संघर्ष के लिए सड़क पर नहीं आते हैं. क्योंकि उनकी सत्ता में ये विषय महत्व के नहीं है.

परमार इस सच्चाई से रूबरू नहीं हुए हैं कि बाल विवाह मानव अधिकार का उल्लंघन है और इससे जीवन और समाज को बेहतर बनाने वाली बहुत सारी संभावनाएं और उम्मीदें मर जाती हैं.

वर्ष 2008 से 2015 के बीच भारत में 26.30 लाख नवजात शिशुओं की मृत्यु इसलिए हुई, क्योंकि वे 37 सप्ताह की गर्भावस्था पूरी करने से पहले जन्मे थे, यानी समय पूर्व प्रसव हुआ था.

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(प्रतीकात्मक फोटो: रॉयटर्स)

आज की स्थिति में भी भारत में लगभग 35 लाख बच्चे समय पूर्व प्रसव के जरिये जन्म लेते हैं. बाल विवाह और स्त्रियों के साथ शोषण इसका सबसे बड़ा कारण होता है. जब आप बाल विवाह का समर्थन करते हैं, तब आप यह भी साबित करते हैं कि लाखों नवजात शिशुओं की मौत आपके विवेक को कहीं झकझोरती नहीं है. भारत सरकार का ही अध्ययन बताता है कि हर दूसरा बच्चा हिंसा और उत्पीड़न का शिकार है.

समाज के इस समूह को इस बात से भी कोई फर्क नहीं पड़ता है कि भारत में 50.3 प्रतिशत गर्भवती महिलाएं ख़ून की कमी की शिकार होती हैं. लगभग 70 प्रतिशत किशोरी बालिकाएं ख़ून की कमी की शिकार हैं. उन्हें भोजन, पोषण, शिक्षा और सम्मान चाहिए, बाल विवाह नहीं.

अपने वक्तव्य में परमार ने समाज और परिवार को उनकी जिम्मेदारी से अवगत करवाया है कि लड़की कहां जा रही है, इस पर नज़र रखें. कोचिंग जाने का कह कर जाती है और किसी लड़के के साथ भाग जाती है. उनके इस वक्तव्य से कट्टरपंथी सांप्रदायिक राजनीतिक विचारधारा का स्त्रियों और लड़कियों को लेकर जो नज़रिया है, वह साफ़ झलकता है.

यह नज़रिया साबित करता है कि पितृसत्तात्मक समाज या मर्दवादी समाज इस बात को मानने के लिए कतई तैयार नहीं है कि लड़कियों या महिलाओं के जीवन से संबंधित निर्णय लेने का अधिकार उनके पास नहीं है.

वास्तव में यहां पता चलता है कि लिंगभेद (कि लड़की के बारे में निर्णय परिवार/बड़े-बुजुर्ग लेंगे, लड़की का कोई भी स्वतंत्र निर्णय अनैतिक और आपराधिक होगा) और सांप्रदायिकता (कि यदि एक हिंदू को मुस्लिम से प्रेम हो जाए तो वह हिंसा/टकराव का कारण बन जाएगा) का शासन वर्तमान समाज को बड़े स्तर पर झकझोर रहा है. वह लिंगभेद और सांप्रदायिकता दोनों को ही त्यागने के लिए तैयार नहीं है. इस गठजोड़ के शासन को मजबूत बनाने के लिए वह हिंसा, दंगे, कत्लेआम, बलात्कार, आगजनी, क़ानून और संवैधानिक संस्थाओं का दुरूपयोग तक सब कुछ करने के लिए तत्पर है.

जो हिंसा में विश्वास रखता है, उसे हिंसा में आनंद आने लगता है. बाल विवाह के समर्थन में आए इस वक्तव्य में उन्होंने कहा है कि हमारे बड़े-बूढ़े कम उम्र में ही शादी तय कर देते थे, इससे उनको (लड़कियों) को पता चल जाता था कि उनका संबंध हो चुका है, और वे गलत कदम नहीं उठाती थीं.

वास्तव में समाज लड़कियों को केवल यौनिक उपनिवेश के नज़रिए से महसूस करता है, ताकि वह अपने मर्दत्व को भोग सके.

बहुत पुरानी बात नहीं है, ऊपर जिक्र किए गए चौथे राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के ही आंकड़ों से पता चला कि भारत में केवल 54 प्रतिशत महिलाएं अकेले बाज़ार जा सकती हैं, 50 प्रतिशत अकेले स्वास्थ्य केंद्र जा सकती हैं, 48 प्रतिशत ही अकेले गांव या समुदाय के बाहर जा सकती हैं.

इन तीन स्थानों पर अकेले जाने का अधिकार केवल 41 प्रतिशत महिलाओं को दिया गया है. इससे साफ पता चलता है कि हम अभी भी ‘दास प्रथा’ में विश्वास रखने वाले समाज में जी रहे हैं, जिसमें स्त्रियों के चरित्र का निर्धारण, यौनिकता और उनके दैनिक व्यवहार पर मर्द का कब्ज़ा है.

इसी सर्वेक्षण के मुताबिक, 42 प्रतिशत पुरुष मानते हैं कि यदि महिला बिना बताए कहीं भी जाए, बच्चों का ध्यान नहीं रखे, खाना ठीक से न बनाए, शारीरिक संबंध बनाने से इनकार करे, पुरुष को स्त्री पर किसी तरह की शंका हो, यदि वह बहस करे तो उसकी पिटाई की जा सकती है. इसके उलट पुरुष को यह सब करने की सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और धार्मिक आज़ादी है. आखिर किसने तय किए हैं हमारे समाज के ये मानक?

इसी सर्वेक्षण से पता चलता है कि 31 प्रतिशत महिलाएं भावनात्मक, शारीरिक और यौनिक हिंसा का सामना करती हैं. जो समाज यह तर्क देता है कि कम उम्र में विवाह से समाज के नैतिक मानक सुदृढ़ होते हैं, उसे यह अच्छे से पता है कि कुछ संदर्भों में विवाह पुरुषों को स्त्रियों से हिंसा करने का सामाजिक अधिकार भी दे देता है. वर्ष 2016 के आंकड़ों के अनुसार, 100 में से 29 महिलाएं पति के द्वारा शारीरिक या यौनिक हिंसा की शिकार होती हैं.

बाल विवाह इस हिंसा का बड़ा कारण इसलिए भी है क्योंकि यह बच्चों को शिक्षा से वंचित कर देता है. सर्वेक्षण के निष्कर्ष बताते हैं कि जिन महिलाओं ने बिल्कुल भी स्कूली शिक्षा हासिल नहीं की है, उनमें से 38 प्रतिशत हिंसा की शिकार होती हैं, जबकि 12 साल या इससे ज़्यादा उम्र तक की शिक्षा हासिल करने वाली महिलाओं में 12 प्रतिशत ने हिंसा का सामना किया.

यानी हिंसा से मुक्ति के लिए शिक्षा एक अनिवार्यता है और बाल विवाह बच्चों से शिक्षित होने का हक़ छीन लेता है. आज जिन्हें हम अपना प्रतिनिधि चुनते हैं और व्यवस्था बनाने की जिम्मेदारी सौंपते हैं, उन्हें इस बात में कतई विश्वास नहीं है कि स्त्रियों को हिंसा से मुक्त गरिमामय जीवन का अधिकार मिलना चाहिए.

अध्ययन से पता चलता है कि महिलाओं के साथ होने वाली घरेलू हिंसा की 83 प्रतिशत घटनाओं में हिंसा करने वाला व्यक्ति उनका पति होता है.

सदियों से घर के भीतर भी एक युद्ध चल रहा है, स्त्रियों और बच्चों के खिलाफ. बच्चों के खिलाफ इसलिए क्योंकि पुरुष बच्चों को पितृसत्ता के मुताबिक़ व्यवहार करने के लिए हर पल प्रशिक्षित करता है. यह युद्ध पितृसत्ता में विश्वास रखने वाला पुरुष अपने आनंद और सत्ता को बनाए रखने के लिए छेड़ता है.

नियम है कि इस युद्ध में सदैव विजय पुरुष की ही होगी. विषय केवल बाल विवाह के समर्थन में दिए गए एक वक्तव्य तक ही सीमित नहीं है, इस वक्तव्य में छिपे सामाजिक चरित्र के वीभत्स रूप और राजनीतिक गैर-जवाबदेयता के तत्व को भी समझना जरूरी है.

(लेखक सामाजिक शोधकर्ता, कार्यकर्ता और अशोका फेलो हैं.)

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