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बिहार में एक अहिंसक आंदोलन हिंसक होने की राह पर है

बिहार में बागमती परियोजना को लेकर चल रहे अहिंसक आंदोलन को लेकर राजनेता-नौकरशाह और ठेकेदार की तिकड़ी इस फिराक़ में है कि आंदोलन हिंसक हो जाए, ताकि पुलिस बल का इस्तेमाल कर विरोध को दबा दिया जाए.

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बागमती परियोजना के विरोध में प्रदर्शन करते लोग.

आकंठ भ्रष्टाचार में डूबा बिहार सरकार का सिंचाई विभाग बागमती परियोजना का विरोध करने वाले अहिंसक आंदोलन को हिंसा की ओर ले जा रहा है. मुजफ्फरपुर जिले के बेनीबाद में करीब दो हजार शांतिप्रिय लोगों के सब्र का बांध 19 मार्च को उस समय टूट गया जब पुलिस की मौजूदगी में लाठी-बंदूक से लैस ठेकेदार के गुंडों ने जबरन बांध का निर्माण कराना चाहा.

नतीजा यह हुआ कि एक जूनियर इंजीनियर सहित कई लोग घायल हो गए. आखिरकार ठेकेदार के कारिंदों को भागना पड़ा. आदोलन को शांतिपूर्ण बनाए रखने के संकल्प के बावजूद हुई इस घटना को भविष्य की चेतावनी के रूप में देखा जाना चाहिए.

आंदोलनकारियों के समक्ष यह स्थिति तब आई है जब जिले के कलेक्टर इस परियोजना के खिलाफ अपनी रिपोर्ट सरकार को भेज चुके हैं.

पर्यावरण चिंतक व गंगा मुक्ति आंदोलन के संयोजक अनिल प्रकाश के साथ बातचीत में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार बागमती परियोजना के विनाशकारी असर से सहमत हो चुके हैं.

सिंचाई मंत्री ललन सिंह भी परियोजना की समीक्षा के लिए रिव्यू कमेटी बनाने के लिए तैयार हैं. और लंबे समय से परियोजना का काम रुका भी हुआ था.

अपने आरंभ से ही यह परियोजना अपनी निरर्थकता को लेकर चर्चा में रही है. इस पर बिहार विधानसभा में ही नहीं लोकसभा में भी चर्चा हो चुकी है. परियोजना की निरर्थकता का अहसास सरकारी अफसरों को लंबे समय से है.

अगस्त 2013 में इंडिया टुडे में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, सीतामढ़ी के डीएम अशोक कुमार ने कहा था, ‘लोग इसके काफी खिलाफ हैं. मेरे विचार से यह पूरी परियोजना इस इलाके के लिए बेकार है. यदि लोगों में पुलिस का डर नहीं होता तो वे स्वयं ही इसे तोड़ देते. एक-दो स्थानों पर उन्होंने ऐसा किया भी है. यह उनके अस्तित्व का सवाल है.’

फिर भी क्यों जारी है परियोजना का कार्य?

अनिल प्रकाश बताते हैं, ‘16 मार्च को ही सीएम से बात हुई थी. उन्होंने ललन सिंह से मिलने को कहा. यह भी कहा कि उन्हें निर्देश दे दिया गया है. ललन सिंह और अधिकारियों के साथ करीब एक घंटा बातचीत हुई. उसके बाद हम लोग निश्चित होकर लौट आए, लेकिन जमीन पर असर उल्टा ही हुआ. ठेकेदार के कारिंदे 17 मार्च को तटबंध का निर्माण करने फिर पहुंच गए, जबकि 9 मार्च से काम रुका हुआ था. स्थानीय प्रशासन ने आंदोलनकारियों से वादा किया था कि तटबंध का निर्माण रुका रहेगा.’

मौके पर ठेकेदारों को तगड़े जनविरोध का सामना करना पड़ा और वे लौट गए. फिर 18 मार्च को भी संघर्ष मोर्चा के संयोजक जितेंद्र यादव के नेतृत्व में हजारों आंदोलनकारियों ने ठेकेदारों को भगा दिया. इसी दिन सीएम को इमेल भेजकर उन्हें अवगत करा दिया गया कि कैसे सरकारी तंत्र सीएम के वादे के खिलाफ काम कर रहा है. बावजूद इसके फिर 19 मार्च को ठेकेदार के गुंडे पूरी तैयारी के साथ धमक गए और निहत्थे आंदोलनकारियों को डराना चाहा.

19 मार्च की हिंसक झड़प के बाद ठेकेदार की तरफ से करीब 400 अज्ञात लोगों के खिलाफ मामला दर्ज कर लिया गया. बाद में ऊपरी दबाव के कारण आंदोलन से जुड़े 24 प्रमुख लोगों के नाम भी इसमें शामिल कर दिया गया.

21 मार्च को कुछ बाहर के लोगों को परियोजना के पक्ष में इकट्ठा कर हिंसक टकराव की भूमिका बना ली गई है. राजनेता-नौकरशाह और ठेकेदार की तिकड़ी इस कोशिश में है कि आंदोलन हिंसक हो जाए, ताकि पुलिस बल का इस्तेमाल कर विरोध को दबा दिया जाए.

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अनिल प्रकाश बताते हैं कि सारा खेल कमीशन का है. परियोजना के पक्ष में कोई तर्क नहीं बचा है तो अब गुंडों के सहारे किसी तरह काम पूरा करवाना चाहते हैं. एक तरफ आंदोलनकारियों को समीक्षा का वादा करके शांत कराने की कोशिश है तो दूसरी तरफ ठेकेदार का काम पूरा कराकर लाभ का बंदरबांट करने की मंशा साफ दिखती है.

नदी घाटी परियोजनाओं के जानकार एक्टिविस्ट रणजीव कहते हैं, ‘ठेकेदार से कमीशन ले लिया गया है तो काम पूरा करवाना तंत्र की मजबूरी है. लेकिन स्थानीय लोग भी कमर कस चुके हैं. किसी भी कीमत पर निर्माण नहीं होने देंगे.’

विडंबना है कि इस परियोजना का काम पिछले 60 सालों से जारी है, जो अब तक पूरा नहीं हुआ है.

चासबास बचाओ बागमती संघर्ष मोर्चा पिछले कई वर्षों से बागमती तटबंध परियोजना का विरोध कर रहा है. इससे पहले बागमती बचाओ अभियान के तहत परियोजना का विरोध चल रहा था.

साल 2012 में भी अनिल प्रकाश के नेतृत्व में एक प्रतिनिधिमंडल ने बिहार सरकार को मेमोरेंडम दिया था जिसमें परियोजना का काम तुरंत रोकने की मांग की गई थी.

आंदोलनकारियों का कहना है कि बिहार में नदियों को बांधे जाने के कारण हर साल व्यापक तबाही हो रही है. 1950 में जब सिर्फ 165 किमी तटबंध थे, मात्र 25 लाख हेक्टेयर भूमि ही बाढ प्रभावित थी. अब (2012) जबकि, 3400 किमी तटबंध बनाए जा चुके हैं, 79 लाख हेक्टेयर भूमि बाढ़ग्रस्त हो गई है.

वर्षों से बागमती परियोजना का विरोध करनेवाले आइआइटी इंजीनियरिंग डॉ दिनेश मिश्र कहते हैं, ‘भैया, यह नदी है. आपके घर के सामने से गुजरनेवाली नाली नहीं है. नदियों को स्थिर होने में सदियां गुजर जाती हैं. कुछ तो तकनीक की ही बात मान लीजिए और पूछिए उनलोगों से जो बार-बार कहते रहे हैं कि इस दूरी में नदीं बांधना उचित नहीं है. इंजीनियर तो आपके ताबेदार हैं, जो आप कहेंगे वो कर देंगे. इसे प्रतिष्ठा का प्रश्न मत बनाइए. जिनके फायदे के लिए आप यह काम करना चाहते हैं, अगर उन्हें वो फायदा नहीं चाहिए तो जिद न करें. उनकी भी सुने.’

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दरअसल, पश्चिम बंगाल में बने फरक्का बैराज पर सवाल उठाकर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने बिहार की नदी घाटी परियोजनाओं के विरोध को स्वयं ही भड़का दिया है. उसके बाद से ही ऐसे आंदोलन और जोर पकड़ते जा रहे हैं.

25-26 फरबरी-17 को पटना में गंगा की अविरलता पर बिहार सरकार ने एक अंतरराष्ट्रीय सेमिनार का आयोजन किया था. इसमें गंगा की अविरलता बरकरार रखने के प्रति संकल्प लिए गए. उसके बाद से ही बिहार की अन्य नदी परियोजनाओं पर पहले से चले आ रहे विरोध को बल मिल गया है.

चासबास बचाओ बागमती संघर्ष मोर्चा के बैनर तले पिछले 9 मार्च को नेशनल हाइवे जाम किया गया था, जिसके कारण प्रशासन ने तटबंध निर्माण का काम रुकवा दिया था.

अनिल प्रकाश बताते हैं कि गंडक परियोजना के खिलाफ भी लोग सड़क पर उतर रहे हैं. ऐसे आंदोलनों को एकसाथ लाने की कोशिश की जा रही है. आनेवाले दिनों में इसका असर दिखेगा.