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‘प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना के तहत चलने वाले सेंटर ही बंद हैं तो रोज़गार कहां से पैदा होगा’

दिल्ली के कौशल विकास मंत्रालय के दफ़्तर के बाहर प्रदर्शन करने वाले केंद्र संचालकों का आरोप है कि सरकार ने सेंटर तो शुरू करवा दिया, लेकिन काम सिर्फ बड़े-बड़े उद्योग घरानों को दे रही है.

कौशल विकास मंत्रालय के दफ्तर के बाहर प्रदर्शन करते सेंटर संचालक (फोटो: प्रशांत कनौजिया)

कौशल विकास मंत्रालय के दफ्तर के बाहर प्रदर्शन करते सेंटर संचालक (फोटो: प्रशांत कनौजिया)

नई दिल्ली: प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना के तहत देशभर में चलने वाले सेंटरों को सरकार काम नहीं दे रही है. बुधवार को दिल्ली के कौशल विकास मंत्रालय के दफ्तर के बाहर सैकड़ों सेंटरधारकों ने काम न मिलने और पुरानी पेमेंट न मिलने के चलते प्रदर्शन किया. प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि सरकार ने सेंटर तो शुरू करवा दिया, लेकिन काम सिर्फ बड़े-बड़े उद्योग घरानों को दे रही है.

प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना को जुलाई 2015 में शुरू किया गया था. इस योजना के तहत 2020 तक एक करोड़ युवाओं को ट्रेनिंग देने की योजना बनाई गई थी.

इस योजना में तीन महीने, छह महीने और एक साल के लिए रजिस्ट्रेशन होता है. कोर्स पूरा करने के बाद सर्टिफिकेट दिया जाता है. यह सर्टिफिकेट पूरे देश में मान्य होता है. इस योजना का उद्देश्य ऐसे लोगों को रोजगार मुहैया कराना है जो कम पढ़े-लिखे हैं या बीच में स्कूल छोड़ देते हैं.

देश के चार राज्यों (हरियाणा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड) में लगभग 22 सेंटर चलाने वाले रिंकू बताते हैं, ‘हमनें पिछले फरवरी में सेंटर शुरू किया था, लेकिन तब से लेकर अभी तक सिर्फ 60 सीट का काम दिया गया. वैसे सेंटर लेते से समय कहा गया था कि हर पाठ्यक्रम में 120 सीट हर तीन महीने पर दी जाएंगी, लेकिन 15-17 महीनों से सिर्फ 60 सीट का काम मिला है, जिसके भी पूरे पैसे सरकार ने नहीं दिए हैं.’

रिंकू ने आरोप लगाया है कि सरकार को जो सीट ऐसे छोटे सेंटरों को देनी थी वो दरअसल बड़े-बड़े उद्योग घरानों को दे दी गई हैं.

उन्होंने आगे कहा, ‘एक सेंटर बनाने के लिए 15-20 लाख रुपये का खर्च आता है. सरकारी नियम के अनुसार सेंटर का क्षेत्र 1500 वर्ग फुट होना चाहिए, अपाहिजों के लिए रैंप और अलग से शौचालय होना चाहिए. सीसीटीवी कैमरा, जेनेरेटर, एसी के साथ कई सुविधाएं सेंटर में होनी चाहिए. उसके अलावा हर तरह के कर्मचारी होने चाहिए, जो कम से कम ग्रेजुएट हों.’

रिंकू बताते हैं कि एक सेंटर निर्माण में 15-20 लाख खर्च के अलावा कर्मचारियों के वेतन के लिए लगभग दो लाख रुपये लगते हैं. एक छात्र के पीछे सात-आठ हजार मिलते हैं वो भी तब, जब उसे नौकरी करते तीन महीने हो चुके होंगे, उससे पहले सिर्फ 50-70 प्रतिशत पैसा ही दिया जाता है.

रिंकू का कहना है कि देश भर में 10 हजार से ज्यादा सेंटर बंद पड़े हैं, क्योंकि उनके पास काम नहीं है. शिक्षक रखने के लिए टीओटी कोर्स करवाना पड़ता है, जिसके लिए 18,000 रुपये खर्च होता है. काम नहीं मिलेगा, तो शिक्षक और अन्य कर्मचारियों को वेतन कहां से दिया जाएगा.

राजस्थान के सीकर से आए हरिओम यादव का कहना है, ‘पिछले साल मई महीने में सेंटर की शुरुआत की थी, लेकिन तब से सिर्फ एक बार 60 छात्रों का काम मिला था, जिसका अभी भी 30 प्रतिशत पैसा दिया जाना बाकी है. हम क्या करें, कहां जाएं? जब पूछते हैं तब बोलते हैं कि अभी काम नहीं है. हमारा इतना पैसा लग गया है और काम नहीं मिल रहा है. अभी तक लाखों का नुकसान हो गया है. इसकी भरपाई कौन करेगा. ऐसा ही चलता रहा तो हम लोगों को आत्महत्या करनी होगी.’

झज्जर से आए तरुण भी सेंटर चला रहे हैं. उनका कहना है, ‘जब हमने सेंटर की शुरुआत की थी तो हर पाठ्यक्रम के हिसाब से 27,000 रुपये दिए गए था. कोई दो या तीन पाठ्यक्रम चला रहा है. जिस हिसाब से कहा गया था उसके अनुसार हर साल दो पाठ्यक्रम में 960 छात्रों की ट्रेनिंग का काम मिलना चाहिए था, लेकिन सिर्फ 60 लोगों को ट्रेनिंग का काम दिया गया. सेंटर की जांच क्वालिटी कंट्रोल आॅफ इंडिया करता है और हम सब की सेंटर को चार और पांच स्टार मिले हुए हैं. उसके बावजूद काम नहीं मिल रहा है.’

वे आगे कहते हैं, ‘सरकार ने जनता को बेवकूफ बनाने का काम किया. नौकरी दिलाने की जिम्मेदारी भी हमारे पास दी गई है. नौकरी होगी तो न मिलेगी. सरकार ने कहां रोजगार पैदा करने का काम किया. ट्रेनिंग देने के लिए हजारों सीटें बड़ी-बड़ी कंपनियों को दी गई हैं और उनके पास 10-10 कंपनी चल रही है, तो वो इस तरह दिखा देते हैं कि तीन महीना रोजगार दिया गया. ये सब काम अधिकारी और उद्योग घरानों की मिली भगत से हो रहा है.’

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पिछले साल अगस्त महीने में भी दिल्ली में कौशल विकास मंत्रालय के दफ्तर के बाहर सेंटर संचालकों ने प्रदर्शन किया था. उस समय सेंटर शुरू करने के बाद से उन्हें कोई काम नहीं मिला था. उस समय अधिकारियों ने फर्जी सेंटरों के चलते सारा काम बंद कर दिया था, जिस पर प्रदर्शनकारियों का कहना था कि जिसके पास क्वालिटी कंट्रोल ऑफ इंडिया का प्रमाणपत्र है, उसे तो काम मिलना चाहिए.

प्रदर्शन के कुछ दिनों बाद ही राज्य मंत्री राजीव प्रताप रूडी ने कौशल विकास मंत्रालय से इस्तीफा दे दिया था. संचालकों का कहना है कि रूडी के इस्तीफे का बाद सेंटर संचालकों को 60 लोगों को ट्रेनिंग देने का काम दिया गया और उसके बाद से कुछ नहीं मिला है.

आशिका ने नौकरी छोड़ कर सेंटर शुरू करने का काम किया था, लेकिन अब वो भी भारी कर्ज में हैं. वो कहती हैं, ‘सेंटर में लोग ऐसे ही नहीं आते. हम घर-घर जाकर महिलाओं को प्रोत्साहित करते हैं कि आप आइए सेंटर में ट्रेनिंग लेकर काम करिए और अपने पैरों में खड़े होईए. उनको तमाम सुविधाएं देते हैं, लेकिन सरकार है जो न काम देती है और न ही काम पूरे होने पर पैसे. सेंटर की सबसे ज्यादा जरूरत ग्रामीण इलाकों में है, जहां शिक्षा का अभाव है. वहां कोई अगर इस योजना के तहत कुछ सीख लेता है, तो कम-कम से अपने परिवार का पेट पाल लेगा. सरकार की नीयत में खोट है. वो सिर्फ इस योजना के तहत देश की जनता को बेवकूफ बना रही है. कोई रोजगार देने का काम नहीं हो रहा है.’

वो आगे कहती हैं, ‘प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना के दम पर ही सरकार ने रोजगार पैदा करने का वादा किया था. आप समझ सकते हैं कि जब सेंटर ही बंद है तो रोजगार कहां से पैदा होगा. क्योंकि किसी भी रोजगार में जाने के लिए काम आना चाहिए. 2020 तक 12,000 करोड़ का बजट है, वो सब अधिकारियों की मिलीभगत के चलते ऐसी ही खत्म हो जायेगा, जिसका जमीन पर कोई असर नहीं दिखेगा.’

हमनें प्रदर्शनकारियों की समस्या को लेकर मंत्रालय का पक्ष जानने के लिए कौशल विकास मंत्रालय को ईमेल के जरिए संपर्क किया, लेकिन स्टोरी छपने तक उनकी तरफ से कोई जवाब नहीं आया.

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