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मैंने मोहन भागवत को आतंकी नहीं कहा, एबीवीपी ने यह झूठ फैलाया: प्रो. चौथीराम यादव

बरेली कॉलेज में हिंदी विभाग की ओर आयोजित सेमिनार में बीएचयू के रिटायर्ड प्रोफेसर चौथीराम यादव पर गंभीर आरोप लगाते हुए एबीवीपी ने कहा था कि उन्होंने ‘आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत और गोलवलकर की तुलना आतंकी से की है.’ एबीवीपी कार्यककर्ताओं ने सेमिनार को बाधित करते हुए कॉलेज में तोड़फोड़ भी की. इस विषय पर प्रो. चौथीराम यादव से बातचीत:

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प्रो. चौथीराम यादव (फोटो साभार: सबरंग इंडिया)

अख़बारों में छपी ख़बर के मुताबिक, आप पर आरोप है कि आपने मोहन भागवत की तुलना आतंकी से की? क्या यह सच है? पूरा मामला क्या है?

जिस बात की चर्चा हो रही है, वह झूठ अखबार वालों ने प्रचारित किया. सेमिनार हो रहा था, उसी के बीच में एबीवीपी के लोग आ गए और उन्हीं लोगों ने यह सब फैलाया. आयोजकों की ओर से न कोई रिपोर्ट की गई, न व्याख्यान में कुछ था. मीडिया तो तैयार बैठा है. एबीवीपी ने जो कह दिया, बस वही छाप दिया कि मोहन भागवत को आतंकी कहा और आरएसएस की आलोचना की. यह मेरे व्याख्यान में कहीं पर था ही नहीं. न तो मैंने उन्हें आतंकवादी कहा था, न ही आरएसएस की आलोचना की थी. न ऐसा कहने का कोई अवसर था, न ही ऐसा कहने की वजह थी. सेमिनार का विषय था, ‘हिंदी साहित्य की विकास यात्रा और सूचना प्रोद्योगिकी’. दो प्रौद्योगिकी के विद्वानों ने अपनी बात रखी और उसे साहित्य से जोड़कर बोलना था. जो भूमिका सूचना प्रौद्योगिकी की थी, उसका साहित्य पर क्या असर पड़ा, अध्यक्षीय वक्तव्य में इसी पर बोल रहा था.

स्वाधीनता आंदोलन के दौरान जब सिर्फ़ प्रिंट मीडिया था तब उसकी क्या भूमिका थी और साहित्य के साथ उसका क्या संबंध था, साहित्य पर उसका क्या असर पड़ा. इसी विषय पर मैं अपनी बात रख रहा था. संक्षेप में बता दूं कि उस समय साहित्य और प्रिंट मीडिया का अंग्रेजी साम्राज्यवाद के ख़िलाफ़ संयुक्त मोर्चा था. उसका नारा ही था, जब तोप मुक़ाबिल हो अख़बार निकालो… उस समय के जितने बड़े साहित्यकार हैं, वे उतने ही बड़े पत्रकार हैं. चाहे भारतेंदु हरिश्चंद्र हों, प्रेमचंद हों. हंस और जागरण की फाइलों से इतिहास लिखा जा सकता है. गणेशशंकर विद्यार्थी, माखनलाल चतुर्वेदी जैसे लोग उतने ही बड़े साहित्यकार थे और पत्रकार भी.

साहित्य और पत्रकारिता की जो जुगलबंदी थी, इसने साम्राज्यवाद के ख़िलाफ़ लड़ाई को बहुत धारदार बना दिया था. मैंने ये कहा कि इसका प्रभाव उस समय की राजनीति पर भी पड़़ा. जितने बड़े नेता थे, गांधी, नेहरू, तिलक, लाला लाजपत राय, मौलाना अबुल कलाम आज़ाद आदि सभी दो-दो अख़बार निकालते थे, एक अंग्रेजी में और दूसरा अपनी क्षेत्रीय भाषा में. साहित्य और पत्रकारिता की इस भूमिका ने राजनीति को भी प्रभावित किया. इन संघर्षों के दम पर देश आज़ाद हुआ. उस समय जो साहित्य लिखा गया था वह देशभक्ति का साहित्य था, वह राष्ट्रीयता या राष्ट्रीय चेतना का साहित्य था. राष्ट्र का निर्माण कैसा होगा, इसकी झलक उस साहित्य में भी थी और पत्रकारिता में भी थी.

इसी क्रम में मैंने कहा, दुनिया जो जानती है वह इस देश को गांधी नेहरू के भारत के रूप में जानती है, अंबेडकर के भारत के रूप में जानती है. हमारे वर्तमान प्रधानमंत्री जब विदेशों में जाते हैं तो इन्हीं का नाम लेते हैं. गांधी, बुद्ध, अंबेडकर, नेहरू का नाम लेते हैं. मोदी जी अच्छी तरह जानते हैं कि आधुनिक भारत के निर्माण में उन लोगों की भूमिका रही है. वे इन्हीं लोगों का नाम लेते हैं. ज़ाहिर है कि वे इनके महत्व को स्वीकार करते हैं. वहां मोदी इन लोगों का नाम लेते हैं, मोहन भागवत का नाम नहीं लेते. इसी संदर्भ में मोहन भागवत का नाम आया था. उन्होंने इसी का अर्थ निकाला कि मैं मोहन भागवत को आतंकवादी कह रहा हूं.

अगर मैं कहूं तो हर कोई जानता है कि राष्ट्र के निर्माण में इनकी क्या भूमिका रही है? मेरी इसी को उन लोगों ने कह दिया कि इन्होंने मोहन भागवत को आतंकवादी कहा और आएसएस की आलोचना की. अब इसमें कहां से मैं मोहन भागवत को आतंकवादी कह रहा हूं? उसके बाद सारे अख़बार वालों ने उन्हीं के आरोप को हेडिंग लगाकर छाप दिया कि मोहन भागवत को आतंकवादी कह दिया. अख़बार तो भाजपा आरएसएस के भोंपू की तरह काम कर रहे हैं. विद्यार्थी परिषद के कार्यकर्ताओं ने जो ग़लत सही बता दिया, उसे ही छाप दिया.

अच्छा क्या यह संयोग है कि हर विश्वविद्यालय में ऐसे विवाद सामने आ रहे हैं? सेमिनारों को बाधित किया जा रहा है. विद्वानों-लेखकों पर हमले हो रहे हैं. इलाहाबाद, बनारस, लखनउ, डीयू, जेएनयू, राजस्थान, कश्मीर, मध्य प्रदेश हर जगह ऐसा क्यों हो रहा है?

अब यह हर सेमिनार में हो रहा है. बीएचयू में कोई भी सेमिनार या कार्यशाला होती है तो आरएसएस का एक आदमी ज़रूर आता है. मैं एक बार रांची में गया था, तो हर सत्र में एक आदमी लगातार बैठा हुआ था. तत्काल टोकाटोकी करते हैं. वहां उसका प्रतिवाद मैंने किया था. अब जिस भी विश्वविद्यालय में आएसएस के कुलपति हैं, वहां पर बराबर ये हो रहा है कि किसी भी तरह की आवाज़, आज़ादी की आवाज़, सांप्रदायिकता और पाखंड के ख़िलाफ़ बोलने वालों को बोलने न दिया जाए.

यह जो आतंक और आरएसएस की आलोचना वाली बात है, यह जान बूझकर षडयंत्रपूर्वक ऐसा किया. एबीवीपी और संघ के लोगों ने यह झूठ फैलाया. उन्होंने कहा भी कि हमारी सरकार है, हम पूरी सरकार में फैलाएंगे. लड़कों ने वहां पर नारा दिया कि हम यहां जेएनयू नहीं बनने देंगे. बिना वजह बवाल किया और आतंकवाद और आरएसएस की आलोचना का मसला उठाया गया. यह सब षडयंत्रपूर्वक किया जा रहा है. इनकी सरकार तो यूपी में बन ही गई है. मुख्यमंत्री बनकर योगी आदित्यनाथ गए हैं. उन्हें फायर ब्रांड बोला जाता है. वे आरएसएस के सच्चे प्रतिनिधि हैं जो उग्र हिंदुत्व को करने की पूरी क्षमता रखते हैं. जो हमने कहा, उससे इतर उनकी बात पर ही सारी चर्चा हो रही है. जबकि ऐसी कोई बात नहीं की हुई.

इस तरह हर विश्वविद्यालय में हमला, हर स्कॉलर पर हमला, प्रोफेसर पर हमला, सेमिनार पर हमला किया जा रहा है. तो क्या अब सेमिनार, बहस-मुबाहसे आदि बंद कर देना चाहिए?

ना… ना… बिल्कुल नहीं बंद होगा. वह इनके कहने से नहीं बंद होगा. वह तो अपनी प्रक्रिया में चलता रहेगा. अभी जिस तरह से महसूस किया जा रहा है, हम जैसे जो लेखक हैं, दलित लेखक, पिछड़े लेखक, बहुजन लेखक, मानवतावादी और प्रगतिशील लोग हैं, अपना बहस-विमर्श तो जारी रखेंगे. लेकिन इन लोगों ने दलित और पिछड़ों को बरगलाकर, गैरयादव पिछड़े और गैरचमार दलितों में सेंध लगाकर, सपा और बसपा को खत्म करने का प्रयास किया है. सपा-बसपा ने भी ग़लतियां की थीं. इस वजह से हमारे लोग जो नाराज़ थे, वे भी निकल गए. अब उन्हीं लोगों को इकट्ठा करके उसे जनाधार का रूप दिया जा रहा है. अब उसी विश्वास के आधार पर लाकर योगी को बिठा दिया है. अब वे जो भी करें, सब जायज़ होगा. अब इस मामले में जो उन्होंने किया है, वह मिसाल है कि वे क्या करने जा रहे हैं.

एक तरफ भाजपा दलित, पिछड़ों को अपनी पार्टी से जोड़ रही है, दूसरी तरफ आरएसएस दलित, पिछड़े व बहुजन लेखकों पर हमले भी कर कर रहा है. इसे कैसे देखा जाए?

मैं यह बात बराबर लिख रहा हूं जो कि उनकी निगाह में होगा. यह तो उनकी राजनीति का दोहरापन है, वोट बटोरने के लिए मुखौटा है और यह मुखौटा पिछड़े और दलित लोगों का ही इस्तेमाल करके तैयार किया गया है. यह दिखाने वाला दांत है, खाने वाला दांत तो उग्र हिंदुत्व है. इसे लागू करना तभी संभव है जब सपा और बसपा के गढ़ को तोड़कर अपनी सत्ता स्थापित की जाए.

केशव मौर्या को अध्यक्ष बनाया लेकिन बहुमत हासिल करके उन्हें किनारे कर दिया. मुख्यमंत्री नहीं बनाया. मुख्यमंत्री बनाया योगी आदित्यनाथ को. दलित पिछड़ों को मूर्ख बनाने के लिए उनको अध्यक्ष बनाया, वोट बटोर लिया, फिर किनारे कर दिया. किसी दलित या पिछड़े को मुख्यमंत्री नहीं बनाया. कलराज मिश्र ने मंच पर उससे हाथ मिलाने से इनकार कर दिया, हाथ झिटक दिया. इलाहाबाद की परिवर्तन यात्रा में केशव मौर्या को गाली दी गई. जो भी पिछड़े और दलित भाजपा में गए हैं, वे केवल दरी बिछाने की हैसियत रखेंगे. इससे इतर कुछ नहीं होगा. उनका इस्तेमाल करके ये अपना काम कर रहे हैं.

सपा-बसपा ने भी ग़लतियां की थीं, उसका परिणाम उन्हें भुगतना पड़ा. अब इसका परिणाम यह होगा कि दलित और पिछड़े समाज के बुद्धिजीवियों को बहुत संघर्ष करना पड़ेगा और साथ आकर नवनिर्माण के बारे में सोचना पड़ेगा. जब तक एक बहुजन समाज का कोई संगठन आप नहीं बनाएंगे, उसको समाज तक नहीं ले जाएंगे, तब तक अब कुछ भी कर पाना आसान नहीं रह गया. आगे की लड़ाई बड़ी जटिल है. दलित और पिछड़ा नहीं, अब बहुजन की बात करने की ज़रूरत है. बहुजन समाज नाम की पार्टी ज़रूर है, लेकिन कांशीराम ने जब इसे लिया था तो उसका मतलब तीन चौथाई पिछड़े समाज से है.

सपा बसपा के चुनाव हारने के बाद बहुतों ने कहा कि यह सामाजिक न्याय की हार है, या फिर अस्मितावादी राजनीति की हार है. क्या ऐसा आप भी मानते हैं?

अगर कहा जाए कि मार्क्सवाद असफल हो गया, तो मार्क्सवाद थोड़े असफल हो गया. वह तो मार्क्सवाद को लागू करने वाली ताक़तों की अपनी गड़बड़ियां हैं जो हार गईं. उसे मानने वाले सवर्ण लोग थे, ज़मीन पर पकड़ नहीं बना सके. जो जाति यहां की सच्चाई है, उस जात-पांत और ब्राह्मणवाद पर प्रहार करना बंद कर दिया. सांप्रदायिक फासीवाद को बढ़़ने दिया. अगर दलितों और स्त्रियों के सवालों को उठाया होता तो आज यह अलग से सवाल क्यों उठते? यह तो कहना बेमानी है कि समाजवाद और सामाजिक न्याय हार गया.

जब तक यह समाज रहेगा, सामाजिक न्याय का सवाल बराबर बना रहेगा, आरक्षण आदि की समस्या भी बराबर बनी रहेगी, क्योंकि असमानता है और रहेगी. समाज के पाखंड, जाति व्यवस्था, वर्ण विभाजन, भेदभाव आदि रहेंगे तो सामाजिक न्याय का सवाल बना रहेगा. मुलायम कौन सा समाजवाद ला रहे थे? मायावती कौन सा अस्मितामूलक आंदोलन कर रही थीं? दोनों ही सत्ता की राजनीति करने लग गए और दोनों ने एक दूसरे को दुश्मन बना लिया. इसका परिणाम यह हुआ कि दलित और पिछड़े समाज के लोग एक-दूसरे के दुश्मन बन गए. असली लक्ष्य से हटकर भाजपा वालों ने तीन बार इनके साथ सरकार बनाई. इसका फ़ायदा भाजपा ने उठाया और दोनों समाज के लोगों को अपनी तरफ खींचने में कामयाब रही. भाजपा ने तीन बार मायावती की सरकार बनवाकर इस दूरी को और मज़बूत किया कि दोनों साथ न आ पाएं. जो बिहार में हुआ, वह यूपी में हुआ होता तो भाजपा कभी सत्ता में न आती. हालांकि, दलित और पिछड़े समाज के जो लोग भाजपा में गए हैं, कुछ दिन में उन्हें भी महसूस होगा कि उनका सिर्फ़ इस्तेमाल हो रहा है.

जिस तरह से बहस-मुबाहसों, सेमिनारों आदि पर हमले हो रहे हैं, इसे कैसे देखते हैं?

उग्र हिंदुत्व को लागू करना आरएसएस का बड़ा पुराना एजेंडा है. उसको ये एकदम फासीवादी तरीक़े से लागू करेंगे. अभी तक छुप-छुप कर करते थे, अब खुलकर करेंगे. इन्होंने यह मान लिया था कि अगर यूपी में हमारी सरकार आ जाती है तो पूरे देश में कोई रोकने वाला नहीं होगा. अब कलबुर्गी और पानसरे की हत्याओं जैसी घटनाएं दोहराई जाएंगी. हमारे कार्यक्रम में जानबूझ कर मोहन भागवत को आतंकवादी कहने और आएसएस की आलोचना करने बात डाली गई और हल्ला मचाया ताकि अगर इस तरह की बातें हों और उसका प्रतिरोध न हो तो इसे आगे बढ़ाया जाए. आज मुझे निशाना बनाया, कल दूसरे को बनाएंगे. उसमें होता यह है कि लोग ऐसे मामलों में नहीं बोलेंगे. अगर तत्काल एकजुटता से विरोध होगा तब ठीक, वरना इसी तरह की घटनाएं फिर दोहराएंगे. इसीलिए मैं समझता हूं कि ऐसी हरकतों की तीखी प्रतिक्रिया होनी चाहिए. मैं समझता हूं कि यह संकट का समय है, लोगों को साथ आना चाहिए, क्योंकि यह अस्तित्व का सवाल है.