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फिल्म उद्योग में ‘एलियन’ की तरह हूं: डैनी

रवींद्रनाथ टैगोर की कहानी ‘काबुलीवाला’ पर आधारित फिल्म ‘बाइस्कोपवाला’ में अभिनेता डैनी डेनजोंग्पा मुख्य किरदार निभा रहे हैं. फिल्म 25 मई को रिलीज़ हो रही है.

(फोटो साभार: फॉक्स स्टार स्टूडियो)

(फोटो साभार: फॉक्स स्टार स्टूडियो)

नई दिल्ली: हिंदी फिल्म जगत में अपनी अलहदा पहचान रखने वाले अभिनेता डैनी डेनजोंग्पा ने कहा कि वह फिल्म जगत में किसी ‘एलियन’ की तरह हैं.

देश के उत्तर पूर्वी इलाके में स्थित खूबसूरत राज्य सिक्किम से ताल्लुक रखने वाले डैनी बॉलीवुड के बेहतरीन अभिनेताओं में से एक हैं.

उनका एक पैर सिक्किम में, जहां वह एक बीयर कंपनी चलाते हैं और दूसरा पैर बॉलीवुड रहता है, जहां वह 1971 से सक्रिय हैं और 70 साल की उम्र में भी साल में औसतन एक फिल्म कर अपनी अदाकारी का जलवा बिखेर रहे हैं.

गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कहानी ‘काबुलीवाला’ पर आधारित डैनी की फिल्म ‘बाइस्कोपवाला’ इस शुक्रवार यानी 25 मई को रिलीज़ होने वाली है. इसमें वह मुख्य भूमिका में नज़र आएंगे.

उनका मानना है कि संपन्न और संतोषजनक ज़िंदगी जीने का आसान तरीका है कि आप इस उद्योग की फिल्मी छवि से दूर रहें.

डैनी ने बताया, ‘मैं फिल्म इंडस्ट्री में एलियन की तरह हूं, क्योंकि मै सुदूरवर्ती प्रदेश सिक्किम से आता हूं. फिल्म उद्योग में होने के बावजूद मैं कभी ‘फिल्मी’ व्यक्ति नहीं रहा. मैं अलग रहकर सिर्फ अपना काम करता रहा.’

बॉलीवुड में कई तरह का किरदार निभा चुके इस अभिनेता का अपने गृह प्रदेश सिक्किम से बेहद लगाव रहा है और जब वह फिल्मों की शूटिंग नहीं कर रहे होते तो उन्हें सिक्किम के अपने फार्महाउस में वक़्त गुज़ारना अच्छा लगता है.

उन्होंने कहा, ‘एक ही तरह का काम मुझे परेशान करता है. मैं विविधता के लिए पेंटिंग, नक्काशी करने, गीत गाने और लिखने की कोशिश करते हैं. यह मुझे ज़िंदगी देता है. मैं कभी कोई योजना नहीं बनाता. जब भी मुझे लगता है कि अभिनय नहीं करना चाहिए तब मैंने ऐसा किया ही किया है. यह एक कारण हो सकता है कि जिससे मैंने इतने लंबे समय तक अपने अस्तित्व को बचा कर रखा.’

अभिनेता डैनी का मानना है कि उनका जन्मस्थान और परवरिश ऐसी रही है जिसने उन्हें बॉलीवुड के ग्लैमर से बचाए रखा है. पश्चिम सिक्किम के युकसोम गांव में जन्मे डैनी अपने गृह प्रदेश को एक जादुई जगह बताते हैं, जो पहाड़, जंगल और घास के मैदानों से भरा हुआ है.

वे कहते हैं, ‘मेरा गांव आख़िरी गांव है जिसके बाद कोई घर नहीं बल्कि सिर्फ़ जंगल हैं जो खूबसूरत घास के मैदानों तक ले जाता है और लंबी दूरी की चहलक़दमी करने के लिए पूरी तरह से उपयुक्त है. मैंने अपने गांव युकसोम पर अपनी बीयर कंपनी का नाम रखा है और मुंबई के अपने घर का नाम यहां घास के मैदान ‘ज़ॉन्ग्री’ पर रखा है.’

भारत के सुदूरवर्ती इलाके से निकलकर फिल्मों की अपनी यात्रा को लेकर वह अब भी हैरान रहते हैं. डैनी कहते हैं, ‘मुझे याद है कि स्कूल हॉस्टल की बस पकड़ने के लिए मुझे दो दिन तक पैदल चलना पड़ता था. उन दिनों हम या तो पैदल यात्रा करते थे या फिर घोड़ों पर सवार होकर. मैंने ये सब देखा है.’

उन्होंने कहा, ‘मैं अपने बेटे से कहता हूं कि जब मैं पुणे स्थित फिल्म एंड टेलीविज़न इंस्टिट्यूट आॅफ इंडिया (एफटीआईआई) से मुंबई आया था तब मेरी जेब में सिर्फ 1500 रुपये थे. यदि आज मैं सब कुछ खो देता हूं तो मेरे जूते की कीमत इससे अधिक होगी.’

उन्होंने कहा, ‘इसका श्रेय मैं अभिभावकों, शिक्षकों, मेरी परवरिश और बौद्ध धर्म को देता हूं. इसे आज लोग धर्म कहते हैं लेकिन वास्तव में यह दर्शन है. मैं अपने काम में शांति तलाशने की कोशिश करता हूं. मैं कभी चीज़ों के पीछे नहीं भागता.’

अभिनेता ने कहा कि वह हैरान हैं कि अलग रूप, अलग धर्म और अलग भाषा होने के बाद भी लोगों ने उन्हें अपना लिया. डैनी कहते हैं, ‘जब मैं मुंबई आया तो मेरी भाषा, चेहरा और धर्म अलग होने के बावजूद लोगों ने मुझे अपना लिया.’

डैनी ने कहा, ‘मैं शशि कपूर, विनोद खन्ना और शत्रुघ्न सिन्हा के भाई का किरदार निभा चुका हूं. इन किरदारों को निभाने का प्रस्ताव लेकर जब निर्माता मेरे पास आते थे तो मैं ख़ुद को ही इसके लिए उपयुक्त नहीं पाता था. मैं उन्हें कहता था कि मैं उनके भाई की तरह कैसे दिख सकता हूं? अपनी फिल्म में मुझे मत लें, यह नहीं चलेगी.’

फिल्म ‘धुंध’ में दूसरे को परेशान करने वाले पति और फिल्म ‘अग्निपथ’ में अपने खलनायक के किरदार के लिए याद किए जाने वाले डैनी का कहना है कि उनकी संवेदनशीलता यथार्थवादी सिनेमा के प्रति ज़्यादा रही है.

उनके अनुसार, इसी वजह से फिल्म ‘बाइस्कोपवाला’ ने उन्हें आकर्षित किया, जो कि रबींद्रनाथ टैगोर की क्लासिक कहानी काबुलीवाला पर आधारित है.

फिल्म का निर्माण डेब मेधेकर ने किया है. फिल्म अफगानिस्तान से पलायन कर भारत आए एक बाइस्कोपवाले और कोलकाता शहर में रहने वाली एक छोटी सी लड़की की कहानी है, जिसमें उसे अपनी बेटी नज़र आती है.

डैनी कहते हैं, ‘फिल्म में असली कहानी से काफी बदलाव किए गए हैं. फिल्म में कहानी के कालखंड में बदलाव किया गया है. फिल्म को 80 के दशक के शुरुआत के बैकड्रॉप पर फिल्माया गया है. टैगोर की कहानी इस इतर ड्राई फ्रूट बेचने की जगह मैं एक बाइस्कोपवाला बना हूं.’

उनके अनुसार, अब वह वही भूमिकाएं चुनते हैं जिसमें उनकी रुचि होती है. वे कहते हैं, ‘इंडस्ट्री में लोग एक-दूसरे के मिज़ाज़ को समझते हैं और लोगों को इंतज़ार कराने के बजाय ईमानदार रहने में मेरा भरोसा है. अगर मुझे स्क्रिप्ट पसंद नहीं आती तो मैं उन्हें बता देता हूं कि मुझे माफ कीजिए, स्क्रिप्ट अच्छी नहीं है. अगर मैं उस व्यक्ति को जानता हूं तो उससे कहा हूं, यार! ये फिल्म मत बनाओ.’

अभिनय के अलावा डैनी डेनजोंग्पा 1980 में ‘फिर वही रात’ फिल्म का निर्देशन कर चुके हैं. उनका कहना है कि अगर मूड करेगा तो वह आगे भी फिल्में बनाएंगे.

व्यावसायिक माहौल में वास्तविकता को तरजीह देने की वजह से खलनायक की ‘लार्जर दैन लाइफ’ छवि वाली जगह सिकुड़ रही है. वे कहते हैं, ‘70 और 80 के दशक में सिनेमा में एक्शन और बदले की कहानी होती थी. उस तरह की स्क्रिप्ट के लिए आपको एक मज़बूत खलनायक और मज़बूत हीरो की ज़रूरत होती थी. जब हमने शुरू किया था तो वह समय रोमांटिक और पारिवारिक फिल्मों का होता था, लेकिन अमितजी (अमिताभ बच्चन) के उदय से मारधाड़ वाली फिल्मों का दौर आया, जो कि तकरीबन तीन दशकों तक रहा और 90 के दशक में शाहरुख और सलमान ख़ान जैसे रोमांटिक अभिनेताओं के साथ यह समय भी बदल गया.’

डैनी का मानना है कि आज के दर्शक बहुत ही विविधतापूर्ण हैं और वास्तविक ज़िंदगी के किरदार देखना पसंद करते हैं. वे कहते हैं, ‘जिस चीज़ को लेकर मुझे चिंता होती है वह यह है कि आज भी हमारी गुणवत्ता बहुत अच्छी नहीं है. हम विश्व के सबसे बड़े फिल्म उद्योग से हैं और 1200 फिल्में बनाते हैं, लेकिन उनमें से कोई एक फिल्म ऐसी होनी चाहिए जो कि विश्व स्तर पर नाम और प्रसिद्धि कमा सके. ऐसा अब भी नहीं हो रहा है, जबकि ऐसा होने के लिए यह सही समय है.’

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)

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