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भगवतीचरण वोहरा: जिनके त्याग के आगे भगत सिंह को अपना बलिदान तुच्छ नज़र आता था

शहादत दिवस पर विशेष: क्रांतिकारी भगवतीचरण वोहरा के निधन पर भगत सिंह के शब्द थे, ‘हमारे तुच्छ बलिदान उस श्रृंखला की कड़ी मात्र होंगे, जिसका सौंदर्य कॉमरेड भगवतीचरण वोहरा के आत्मत्याग से निखर उठा है.’

भगवती चरण वोहरा. (जन्म: 04 जुलाई 1904 - अवसान: 28 मई 1930, फोटो साभार: शहीद कोश)

भगवती चरण वोहरा. (जन्म: 04 जुलाई 1904 – अवसान: 28 मई 1930, फोटो साभार: शहीद कोश)

देश की नई पीढ़ी को शायद ही मालूम हो कि भगवतीचरण वोहरा भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन के ऐसे अप्रतिम नक्षत्र थे, जिनके गर्वीले आत्मत्याग की आभा में शहीद-ए-आजम भगत सिंह को अपना बलिदान तुच्छ नजर आता था.

वोहरा का अनूठापन इस बात में भी है कि आंदोलन के लेखक, विचारक, संगठक, सिद्धांतकार व प्रचारक और काकोरी से लाहौर तक कई क्रांतिकारी कार्रवाइयों के अभियुक्त होने के बावजूद वे न कभी पुलिस द्वारा पकड़े जा सके और न ही किसी अदालत ने उन्हें कोई सजा सुनाई.

बावजूद इसके कि उन्होंने कभी भी पकड़े जाने के डर से उक्त कार्रवाइयों में अपनी भागीदारी नहीं रोकी और अपराजेय आदर्शनिष्ठा, प्रतिबद्धता, साहस और मनोयोग से आखिरी सांस तक भारतमाता की मुक्ति के लक्ष्य के प्रति समर्पित रहे.

सच कहें तो वे इस आंदोलन की नींव की ऐसी ईंट थे, जिसने कभी शिखर पर दिखने का लोभ नहीं पाला. वे कहते भी थे कि इस आंदोलन के लिए ऐसे लोग चाहिए जो आशा की अनुपस्थिति में भी भय व झिझक के बिना युद्ध जारी रख सकें. जो आदर-सम्मान की आशा रखे बिना उस मुत्यु के वरण को तैयार हों, जिसके लिए न कोई आंसू बहे और न कोई स्मारक बने.

वोहरा का जन्म चार जुलाई, 1904 को आगरा के रेल अधिकारी शिवचरण वोहरा के पुत्र के रूप में हुआ था. उनके माता-पिता बाद में लाहौर में बस गये थे, जहां अभी भगवतीचरण की शिक्षा-दीक्षा पूरी भी नहीं हुई थी कि गांधी जी ने असहयोग आंदोलन की घोषणा की और वे उसमें कूद पड़े.

उन्हें क्या मालूम था कि जिन महात्मा गांधी के आह्वान पर आज वे इस आंदोलन में शामिल हो रहे हैं, आगे चलकर उनके ही साथ उन्हें ‘बम की पूजा’ बनाम ‘बम का दर्शन’ के विवाद में उलझना पड़ेगा. असहयोग आंदोलन के वापस हो जाने पर उन्होंने लाहौर के उसी नेशनल कालेज से बीए किया, जहां वे ‘राष्ट्र की परतंत्रता और उससे मुक्ति के प्रश्न’ पर स्टडी सर्किल चलाते थे और भगत सिंह व सुखदेव जिसके प्रमुख सदस्य थे.

रामप्रसाद ‘बिस्मिल’ वगैरह की शहादतों के बाद हिंदुस्तान रिपब्लिकन आर्मी के प्रधान सेनापति चंद्रशेखर ‘आजाद’ ने अपनी आर्मी का पुनर्गठन कर हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन बनाया तो उसमें पंजाब से शामिल होने वालों में भी ये तीनों प्रमुख थे.

वोहरा ने नौजवान भारत सभा बनाई तो भगत सिंह को महासचिव बनाया और खुद प्रचार सचिव बने. वे अपने साथियों में ‘भाई’ के रूप में प्रसिद्ध थे और एक समय उन्होंने अपने कालेज के अध्यापक जयचंद्र विद्यालंकार का, जो खुद भी क्रांतिकारियों की जमात से जुड़े हुए थे, यह आरोप भी झेला कि वे सीआईडी के आदमी हैं और उससे वेतन पाते हैं. लेकिन उन्होंने यह कहकर इसका कोई जवाब नहीं दिया कि ‘मेरा काम जो उचित लगे, उसे करते जाना है, सफाई देना और नाम कमाना नहीं.’

उन दिनों उनके पास लाहौर में तीन-तीन मकान, लाखों की सम्पत्ति और हजारों का बैंक बैलेंस था, लेकिन उन्होंने विलासिता को ठुकराकर आजादी के लिए नाना कठिनाइयों वाला क्रांतिकारी रास्ता चुना. बाल विवाह आमतौर पर अभिशाप बनकर आता है लेकिन उनके मामले में उसे भी अपवाद बन जाना पड़ा.

1918 में जब वे 14 साल के ही थे, अभिभावकों ने उन्हें और इलाहाबाद की पांचवीं तक पढ़ी 11 वर्षीया दुर्गावती देवी को एक साथ ब्याह दिया लेकिन दुर्गावती एक पल को भी उनके रास्ते की बाधा नहीं बनीं. उनके रहते तो ‘प्रभाकर’ तक की पढ़ाई करके वे क्रांतिकर्म में कंधे से कंधा मिलाकर चलीं ही, बेटा पैदा हुआ तो उसका नाम क्रांतिकारी शचीन्द्रनाथ सान्याल के नाम पर रखा. वोहरा के असमय निधन के बाद भी वे उनके साथियों की मददगार व सलाहकार ‘दुर्गा भाभी’ बनी रहीं.

वोहरा की दो बड़ी कार्रवाइयां विफल नहीं हो जातीं तो हमारे स्वतंत्रता संघर्ष का इतिहास कुछ और होता. इनमें से एक 23 दिसंबर, 1929 को दिल्ली-आगरा रेललाइन पर वायसराय लार्ड इरविन की स्पेशल ट्रेन उड़ाने की कार्रवाई थी, जिसकी उन्होंने कोई महीने भर जमकर तैयारी की थी.

उन्हें ट्रेन के नीचे बम का विस्फोट कराने में सफलता भी मिली थी. विस्फोट से ट्रेन का खाना बनाने व खाने वाला डिब्बा बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया और एक व्यक्ति की मौत हो गई थी, लेकिन वायसराय बाल-बाल बच गए थे.

इस कार्रवाई के बाद महात्मा गांधी ने ईश्वर को धन्यवाद देते हुए ‘यंग इंडिया’ में ‘बम की पूजा’ शीर्षक लेख लिखकर क्रांतिकारियों को कोसा था. जवाब में वोहरा ने चंद्रशेखर आजाद और भगत सिंह से मशवरा करके ‘बम का दर्शन’ लिखा, जो आम लोगों में खासा लोकप्रिय हुआ और पुलिस लाख कोशिशें करके भी पता नहीं लगा पायी कि उसका उद्गमस्थल कहां है.

28 मई, 1930 को विफल हुई दूसरी कार्रवाई वोहरा की जान पर तो आ ही बनी, ऐतिहासिक लाहौर षडयंत्र कांड में भगत सिंह, सुखदेव व राजगुरु को सुनाई गई मृत्युदंड की सजा पर अमल से पहले उन्हें छुड़ा लिए जाने की सारी संभावनाओं का अंत कर डाला.

दरअसल, योजना यह थी कि उक्त तीनों को लाहौर जेल से न्यायालय ले जाते समय अचानक धावा बोलकर छुड़ा लिया जाए. चूंकि उन्हें कड़ी सुरक्षा के बीच लाया ले जाया जाता था, इसलिए इस धावे के लिए अपेक्षाकृत बेहतर तकनीक वाले और ज्यादा शक्तिशाली बमों की आवश्यकता महसूस की गई.

वोहरा बम बनाने में सिद्धहस्त थे और लाहौर की कश्मीर बिल्डिंग के जिस किराये के कमरे का वे इसके लिए इस्तेमाल करते थे, उसमें उन्होंने ऐसे नए बम बना भी लिए थे. लेकिन कहीं बम ऐन मौके पर दगा न दे जायें, इस संदेह का निवारण करने के लिए चाहते थे कि कम से कम एक बार उनका परीक्षण कर लिया जाए. इस परीक्षण के लिए उन्होंने रावी तट चुना और विफल रहकर अपनी जान गंवा बैठे.

बम से उनके एक हाथ की उंगलियां नष्ट हो गईं, दूसरा कलाई से आगे पूरा उड़ गया और पेट में हुए बड़े घाव से आंतें बाहर निकल आईं. मौत को कुछ ही पलों के फासले पर खड़ी देखकर भी वे विचलित नहीं हुए और साथियों से दो खास बातें कहीं.

पहली-ये नामुराद मौत दो दिन टल जाती तो इसका क्या बिगड़ जाता? उनका मतलब था कि तब वे भगत, सुखदेव व राजगुरु को छुड़ा लेते. दूसरी-अच्छा हुआ कि जो कुछ भी हुआ, मुझे हुआ. किसी और साथी को होता तो मैं भैया यानी ‘आजाद’ को क्या जवाब देता?

उनके निधन के बाद ‘आजाद’ ने कहा था कि उन्हें लगता है कि उनका दायां हाथ कट गया है और बाद में ‘आजाद’ भी नहीं रहे तो भगत सिंह के शब्द थे, ‘हमारे तुच्छ बलिदान उस श्रृंखला की कड़ी मात्र होंगे, जिसका सौंदर्य कॉमरेड भगवतीचरण वोहरा के दारुण पर गर्वीले आत्मत्याग और हमारे प्रिय योद्धा ‘आजाद’ की गरिमापूर्ण मृत्यु से निखर उठा है.’

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और फ़ैज़ाबाद में रहते हैं.)

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