भारत

मोदी द्वारा ज़ोर-शोर से शुरू की गईं विभिन्न योजनाओं की ज़मीनी हक़ीक़त क्या है?

मोदी सरकार द्वारा बीते चार सालों में बदलाव के बड़े दावों के साथ शुरू की गईं विभिन्न योजनाएं कोई बड़ी उपलब्धि हासिल कर पाने में नाकाम रही हैं.

4 years of Modi Govt

फोटो साभार: ट्विटर

चार साल पूरे होने के बाद भी नरेंद्र मोदी सरकार की मुख्य योजनाएं दीन दयाल उपाध्याय ग्राम ज्योति योजना, स्किल इंडिया प्रोग्राम, उज्ज्वला योजना और जन धन योजना कोई बड़ी उपलब्धि हासिल करने में नाकामयाब रही है. इसके अलावा मुद्रा और हाउसिंग योजना के तहत 2022 तक सबको घर जैसी योजनाएं बैंकों के लिए नई मुसीबत बनी हुई है, जो पहले ही न चुकाए गए कर्जों के जाल में फंसे हुए हैं.

दीनदयाल उपाध्याय ग्राम ज्योति योजना

सरकार ने हाल ही में घोषणा की कि दीनदयाल उपाध्याय ग्राम ज्योति योजना के तहत 18,452  गांवों के विद्युतीकरण की प्रक्रिया पूरी कर ली गई है. लेकिन इस आंकड़े के हिसाब से देश की बिजली खपत में कोई इजाफा नहीं देखा गया है.

केंद्रीय विद्युत मंत्रालय की ओर से इकट्ठा किए गए आकड़ों के मुताबिक 2014-15 और 2017-18 के दौरान औसतन 5.66 फीसदी विद्युत का इजाफा देखा गया है जबकि 2010-11 और 2013-14 के बीच ये आकड़ा औसतन 5.9 फीसदी का था. और सरकार का ये दावा तब है जब हाल के सालों में थर्मल पावर प्लांट का परिचालन ऐतिहासिक तौर पर सबसे निम्न स्तर पर रहा है.

इतने बड़े पैमाने पर भारत के ग्रामीण इलाकों का विद्युतीकरण होने के बावजूद बिजली की खपत में इजाफा क्यों नहीं हुआ, इसका जवाब सरकार ने नहीं दिया है. सरकार के मुताबिक उस गांव का विद्युतीकरण हुआ माना जाता है जहां बिजली पहुंचने की आधारभूत संरचना मौजूद है और 10 फीसदी घरों और सार्वजनिक जगहों पर बिजली का क्नेक्शन है.

An Indian girl studies by kerosene lamp due to a power cut-off in the remote village of Lingsey, about 157 km (98 miles) from the northeastern Indian city of Siliguri, February 26, 2006. REUTERS/Rupak De Chowdhuri

फाइल फोटो: रॉयटर्स

अगर आप इस परिभाषा के मुताबिक देखे तो विद्युतीकरण हो रखे एक गांव में बिजली तो पहुंच चुकी है लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि गांव के सभी घरों में बिजली का कनेक्शन हो.

हालांकि कोई सरकार के दावें पर कैसे सवाल खड़ा सकता है, अगर इन दावों को सही भी मान लिया जाए तो गांव के विद्युतीकरण से गांववालों को कोई फायदा तो हुआ नहीं है क्योंकि विद्युत आपूर्ति को लेकर अनिश्चितता की हालत बनी हुई है. अगर इन्हें 24 घंटे बिजली दी भी जाती है तो इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि गांव वाले इस बिजली का उपभोग करने में सक्षम होंगे.

मोदी सरकार की महत्वकांक्षी प्रधानमंत्री सहज बिजली हर घर योजना या सौभाग्य योजना के तहत गरीब घरों को मुफ्त में बिजली का कनेक्शन दिया जाना था लेकिन बिजली की खपत जितना मीटर में उठे उसके हिसाब से देना था. इससे आर्थिक रुप से कमजोर घर शायद ही बिजली की खपत कर पाते.

Electricity Generation Chart

बीते सालों में बिजली उत्पादन में हुई वृद्धि (स्रोत: CEA)

प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना

1 मई, 2016 को प्रधानमंत्री ने प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना की शुरुआत की थी. इसके तहत पांच करोड़ गरीब घरों को मार्च 2019 तक एलपीजी कनेक्शन देने का लक्ष्य रखा गया था.

उज्ज्वला योजना की शुरुआत के बाद एलपीजी कनेक्शन की संख्या में हालांकि बड़ा इजाफा देखा गया है. लेकिन इसके हिसाब से एलपीजी की खपत उतनी नहीं हुई है.

पिछले दो सालों में उज्ज्वला योजना के तहत 3.6 करोड़ एलपीजी कनेक्शन जारी किए गए हैं लेकिन इसका असर एलपीजी की खपत पर नहीं दिखता है. एलपीजी की खपत में वृद्धि दर उतनी ही बनी हुई है जितनी योजना शुरु होने से पहले थी.

LPG Consumption Chart

बीते सालों में एलपीजी की खपत (स्रोत: पेट्रोलियम मंत्रालय)

एलपीजी की खपत में 2014-15 और 1015-16 के बीच 10.5 फीसदी और 9 फीसदी का इजाफा देखा गया है वहीं उज्ज्वला योजना शुरू होने के बाद 2016-17 और 2017-18 में एलपीजी की खपत में वृद्धि दर 10.1 फीसदी और 8 फीसदी देखी गई है जो कि योजना शुरू होने से पहले के बराबर ही है.

ऐसा इसलिए है क्योंकि उज्ज्वला योजना के तहत जिन लोगों ने कनेक्शन लिया है वो उस तरह से गैस खत्म होने के बाद एलपीजी भरवाने दोबारा नहीं आ रहे हैं जिसतरह से आम एलपीजी उपभोक्ता भरवाते हैं.

पेट्रोलियम मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने भी यह बात मानी है कि उज्ज्वला योजना के तहत कनेक्शन लेने वालों में प्रति व्यक्ति सालाना खपत औसतन 4.32 सिलेंडरों की ही है.

The Prime Minister, Shri Narendra Modi distributing the free LPG connections to the beneficiaries, under PM Ujjwala Yojana, at Ballia, Uttar Pradesh on May 01, 2016. The Governor of Uttar Pradesh, Shri Ram Naik is also seen.

1 मई 2016 को उत्तर प्रदेश के बलिया में ग्रामीण महिलाओं को उज्ज्वला योजना के तहत गैस कनेक्शन देते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (फोटो: पीआईबी)

उज्ज्वला योजना के तहत लाभ लेने वालों को सुरक्षा जमा राशि नहीं देनी होती है और एलपीजी कनेक्शन के लिए न ही कोई दूसरा अतिरिक्त भुगतान करना पड़ता है.

उनके पास चूल्हे और पहली बार गैस भरवाने का भुगतान किश्तों में करने का विकल्प भी है. हालांकि दूसरे बार से कोई छूट नहीं मिलती है.

विशेषज्ञों का मानना है कि एक बार एलपीजी भरवाने का खर्च लगभग 600 से ऊपर आता है. इस क़ीमत पर एलपीजी लेना गरीबों के लिए कोई आसान काम नहीं है. उन्हें खाना पकाने के लिए इससे कहीं सस्ता मिट्टी का तेल और जलावन मिल जाता है.

अगर उज्ज्वला योजना का लाभार्थी को लोन लेता है, तब एलपीजी चूल्हे और सिलेंडर दोनों की क़ीमत ऑइल मार्केटिंग कंपनी (ओएमसी) द्वारा हर रिफिल के बाद लाभार्थी को मिलने वाली सब्सिडी की रकम से मासिक किश्तों में सब्सिडी से ली जाती है.

इंडियन ऑयल के मुताबिक करीब 70 फीसदी लाभार्थियों ने एलपीजी चूल्हा और पहली बार गैस भरवाने के शुल्क के लिए ओएमसी से ब्याज रहित लोन लिया है. योजना के तहत हर बार गैस भरवाने पर सब्सिडी के तौर पर कटने वाली रकम से इस लोन को चुकाया जाता है. इसलिए 70 फीसदी उज्ज्वला योजना के लाभार्थी बाज़ार भाव पर सिलेंडर खरीदते हैं जब तक उनका लोन चुकता नहीं हो जाता है.

प्रधानमंत्री जनधन योजना

प्रधानमंत्री जनधन योजना के तहत 31.6 करोड़ बैंक खाते अब तक खुल चुके हैं. इन खातों में कुल मिलाकर 27 मई तक 81,203.59 करोड़ रुपये जमा है.

हालांकि हाल ही में संसद में वित्त राज्यमंत्री शिवप्रताप शुक्ला ने बताया है कि इसमें से करीब 20 फीसदी खाते निष्क्रिय पड़े हुए हैं. और 1.9 फीसदी खाते बंद हो चुके हैं.

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बीते दिनों संसद में पेश एक आंकड़े के अनुसार जन धन योजना के तहत खुले 59 लाख खाते बंद हो चुके हैं. (फोटो: पीटीआई)

यह दिखाता है कि ग्राहक अपने खातों को सक्रिय रखने को लेकर दिलचस्पी नहीं दिखा रहे हैं. शिवप्रताप शुक्ला ने राज्यसभा में लिखित जवाब में बताया कि करीब 31.20 करोड़ खाते जिनमें कुल 75,000 करोड़ धन राशि जमा है, फरवरी 2018 तक खुल गए थे. इनमें से 25.18 करोड़ (81 फीसदी) खाते सक्रिय थे.

उन्होंने आगे बताया कि फरवरी 2018 तक करीब 59 लाख जन धन खाते बंद हो चुके थे.

उनका जवाब था, ‘जन धन खाते ग्राहकों के अनुरोध पर बंद किए गए हैं. कुछ जन धन खाते ग्राहकों के अनुरोध पर साधारण बचत खातों में तब्दील करवाने की वजह से बंद हुए हैं. कुछ मामलों में ये खाते इसलिए बंद करवाए गए हैं क्योंकि एक ही बैंक में एक आदमी के कई खाते पहले से थे.’

इसबीच वर्ल्ड बैंक ने कहा है कि पिछले साल भारत में आधे से अधिक बैंक खाते निष्क्रिय रहे हैं.

वित्तीय समावेशन को मापने वाला ग्लोबल फाइंडेक्स डेटाबेस 2017 और वर्ल्ड बैंक की ओर से जारी फिनटेक रिवॉल्यूशन के मुताबिक, ‘दुनिया भर में 13 फीसदी वयस्क और 20 फीसदी खाताधारियों के पास निष्क्रिय खाता है जिसमें पिछले 12 महीने से कोई पैसा न जमा किया जा रहा है और न ही निकाला जा रहा है और न ही किसी डिजिटल तरीके से ही उसमें कोई लेन-देन हो रहा है.’

वर्ल्ड बैंक के मुताबिक भारत में निष्क्रिय खातों की संख्या 48 फीसदी है जो कि पूरी दुनिया में सबसे ज्यादा है. ये विकासशील देशों के औसत आंकड़े 25 फीसदी से लगभग दोगुना है.

वर्ल्ड बैंक के आंकड़ें मोदी सरकार के इस दावे को धत्ता बताते हैं जो जन धन योजना को वित्तीय समावेशन के क्षेत्र में एक क्रांतिकारी कदम बताता है.

नवंबर 2016 में नोटबंदी की घोषणा के बाद से जन धन खातों में जमा राशि में इजाफा हुआ है. सरकारी आंकड़ो के मुताबिक नवंबर 2016 के आखिर में इन खातों में जमा राशि 74,000 करोड़ से ज्यादा हो गई थी जबकि इसी महीने की शुरुआत में यह जमा राशि करीब 45,300 करोड़ रुपये थी.

ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि लोगों ने बेकार हो गए 500 और 1000 के नोट को अपने बैंक खातों में जमा करवाया था. इसके बाद इन खातों में जमा राशि में गिरावट आ गई और मार्च 2017 के बाद से फिर से इसमें बढ़ोतरी शुरू हुई.

दिसंबर 2017 में 73,878.73 करोड़ से बढ़कर फरवरी 2018 में ये 75,572 करोड़ की राशि तक पहुंचा और अब 80,000 करोड़ की राशि को पार कर गया है. वित्तीय भागीदारी में शामिल होने वालों की संख्या में भी इजाफा हो रहा है.

खातोंधारकों की संख्या 11 अप्रैल तक 2017 की शुरुआत में रहे 26.5 करोड़ से बढ़कर 31.45 करोड़ हो चुकी थी. 9 नवंबर 2016 तक जब नोटबंदी की घोषणा हुई थी, खातों की संख्या 25.51 फीसदी थी.

प्रधानमंत्री आवास योजना

सरकार ने प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत 2022 तक पांच करोड़ नए घर बनाने का लक्ष्य रखा है जिनमें से तीन करोड़ ग्रामीण और शहर के बाहरी इलाकों में बनाए जाएंगे.

लेकिन इस योजना पर बहुत ही धीमी गति से काम बढ़ रहा है. शहरी आबादी के लिए दो करोड़ मकान बनाने के लक्ष्य में से दिसंबर 2017 के आखिरी तक सिर्फ 4.13 लाख मकान ही तैयार हो पाए थे और 15.65 लाख मकान निर्माणाधीन थे.

शहरी आवास मंत्रालय ने 2018-19 में 26 लाख, 2019-20 में 26 लाख, 2020-21 में 30 लाख और 2021-22 में 29.8 लाख मकान बनाने की योजना बनाई हुई है. हालांकि निर्माण की धीमी गति को देखते हुए यह लक्ष्य एक चुनौती की तरह लग रहा है. उदाहरण के लिए 2016-17 में सिर्फ 1.49 लाख ही मकान तैयार हो पाए थे जबकि 32.6 लाख का लक्ष्य रखा गया था.

गांव में मकान बनाने की योजना के तहत सिर्फ 16 लाख मकान ही बने हैं.

विशेषज्ञों का कहना है कि निर्धारित लक्ष्य को पाने के लिए इन दोनों ही योजनाओं की रफ्तार उल्लेखनीय गति से बढ़ानी पड़ेगी.

बढ़ते लोन डिफॉल्ट

इस बीच इंटरनेशनल क्रेडिट रेटिंग एजेंसी मूडीज ने लोन नहीं चुकता करने के मामले में आई बढ़ोतरी की ओर ध्यान दिलाया है. एजेंसी ने 2018 में भी इसे जारी रहने की आशंका बताई है. हाल ही में जारी रिपोर्ट में मूडीज और इसके भारतीय अंग आईसीआरए ने कहा है कि प्रतिस्पर्धा का दबाव और स्व-नियोजन के ऊपर ध्यान देने की वजह से इस क्षेत्र में तनाव बढ़ा है.

आईसीआरए के वित्तीय प्रमुख विभोर मित्तल ने कहा है, ‘परंपरागत हाउसिंग क्षेत्र में स्थायित्व बने रहने की संभावना है जबकि किफायती हाउसिंग क्षेत्र में 2018 में अनियमितता और बढ़ सकती है.’

Money Reuters

फोटो: रॉयटर्स

संपत्ति-समर्थित सुरक्षा (एबीएस) के ऊपर लिखी गई इस रिपोर्ट में कहा है कि किफायती हाउसिंग क्षेत्र में कुल नॉन परफॉर्मिंग एसेट (एनपीए) में सितंबर 2017 तक 1.8 फीसदी की वृद्धि हुई है.

कम रकम वाले लोन के मामले में बढ़ते तनाव की वजहों पर मित्तल ने कहा है, ‘बढ़ती हुई प्रतिस्पर्धा से इस पर फर्क पड़ेगा. परिणामस्वरूप लोन देने के मापदंडों में गिरावट आएगी और स्व-नियोजित क्षेत्रों में अधिक मात्रा में लोन दिए जाएंगे.”

स्व-रोजगार वाले लोन धारकों को हाउसिंग फाइनेंस कंपनियों की ओर से मिलने वाले लोन में 30 फीसदी का इजाफा हुआ है. चार साल पहले तक ये आंकड़ा 20 फीसदी का ठहरता था. सरकार की ओर से किफायती हाउसिंग को प्रोत्साहन देने के बाद ये बदलाव आया है. एक दूसरी रेटिंग एजेंसी क्रिसिल ने लोन चुकाने को लेकर अनियमितता के मामलों में वृद्धि की चेतावनी दे चुकी है.

प्रधानमंत्री मुद्रा योजना

महिला और दलित उद्यमियों के लिए वित्तीय सहायता प्रदान करने को लेकर शुरू की गई मुद्रा योजना का खूब जोर-शोर से प्रचार किया गया और कहा गया कि ये मोदी सरकार की नौकरी पैदा करने की बड़ी कामयाब पहल है. हालांकि औसत कर्ज लेने की रकम को बारीकी से देखने पर पता चलता है कि वास्तविकता कुछ और ही है.

2015 में शुरू की गई इस योजना के तहत 50,000 तक, 5 लाख तक और 5 लाख से लेकर 10 लाख तक लोन दिए जाते हैं.

प्रधानमंत्री मुद्रा योजना के तहत करीब छह लाख करोड़ रुपये 12 करोड़ लोगों के बीच दिए गए हैं. हाल ही में द वायर  की आई एक रिपोर्ट के मुताबिक पांच लाख से ज्यादा का लोन लेने वालों, जिससे कि वाकई में रोजगार किया जा सकता है, की संख्या बहुत ही कम है. यह अब तक योजना के तहत दिए गए लोन का सिर्फ 1.3 फीसदी ही है. ज्यादातर लोन 50,000 से कम या फिर  50,000  और 5 लाख के बीच के है.

मुद्रा योजना के तहत 2017-18 में औसतन 52,700 रुपये लोन के तौर पर लिए गए हैं.

मोदी ने 2014 के आम चुनावों के प्रचार के दौरान नौकरी देने का वादा किया था. लेकिन सत्ता में आते उन्होंने पलटी मारते हुए कहा कि वो युवाओं को नौकरी देने की बजाए उन्हें नौकरी सृजित करने वाला बनाना चाहते हैं. लेकिन अर्थशास्त्री मोदी सरकार के इस यू-टर्न से सहमत नहीं हैं. वे इसे एक मुद्दे को भटकाने वाली चाल के रूप में देखते हैं. इस तरह के लोन बहुत कम समय के  लिए रोजगार तो पैदा कर सकते हैं लेकिन पूर्ण-कालिक रोजगार नहीं.

मुद्रा योजना के तहत मिलने वाले लोन बैंकों के लिहाज से जोखिम भरे होते हैं क्योंकि वो इसके एवज में कुछ गिरवी नहीं रखते हैं. किसी भी गड़बड़ी की हालत में पैसा वापस निकालने के लिए बैंक ज्यादा कुछ नहीं कर सकते हैं. इस योजना के तहत दिए जाने वाले लोन का 55 फीसदी रकम सार्वजनिक क्षेत्रों के बैंक की है.

सार्वजनिक क्षेत्रों के बैंकों की हालत नहीं चुकाए गए लोन की वजह से पहले से ही खराब है. अगर मुद्रा योजना के तहत दिए जाने वाले लोन की भी यही स्थिति रही तो ये सार्वजनिक क्षेत्रों के बैंकों के एनपीए में इजाफा कर सकती है.

प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना

प्रधानमंत्री ने जुलाई 2015 में 24 लाख लोगों को पहले चरण में प्रशिक्षित करने के कदम के साथ इस योजना की शुरुआत की थी. हालांकि भूमिका और जिम्मेदारियों को लेकर हुई गड़बड़ी ने इस योजना को परवान नहीं चढ़ने दिया और राजीव प्रताप रुडी के हाथ से मंत्रालय निकल गया. उन्हें पिछले सितंबर में कौशल विकास और उद्यमिता मंत्री के पद से इस्तीफा देना पड़ा था.

पहले चरण का प्रशिक्षण आसान था. इसमें सभी प्रशिक्षुओं को 5000-12,000 रुपये देने थे. इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं कि नेशनल स्किल डेवलपमेंट काउंसिल (एनएसडीसी) पहले चरण का लक्ष्य प्राप्त कर लिया. इसने 18 लाख लोगों को प्रशिक्षण दिया और अतिरिक्त 12 लाख लोगों को प्रमाणित भी किया.

हालांकि 2016 में शुरू किए गए दूसरे चरण के लक्ष्य जिसके तहत 2020 तक एक करोड़ युवाओं को प्रशिक्षित करना है, सरकार के लिए टेढ़ी खीर साबित हो रही है. दूसरे चरण के तहत 60 लाख युवाओं को नए सिरे प्रशिक्षित करना था और 40 लाख युवाओं को ‘रिकॉगनिशन ऑफ प्रायर लर्निंग (आरपीएल) प्रोग्राम’ के लिए प्रमाणित करना था.

Skill-India_Reuters

फोटो: रॉयटर्स

श्रम और रोजगार मंत्रालय में सामान्य रोजगार और प्रशिक्षण के पूर्व महानिदेशक शारदा प्रसाद की अध्यक्षता में गठित पांच सदस्यीय कमेटी ने पाया है कि यह योजना बहुत बुरी तरह से लागू की जा रही है और इसने अवास्तविक लक्ष्य निर्धारित कर रखे हैं.

कमेटी ने पिछले साल के अप्रैल में जारी की अपनी रिपोर्ट में कहा है कि हर कोई युवाओं को रोजगार देने या स्थानीय उद्योगों की जरुरतों पर ध्यान दिए बिना सिर्फ आकड़ों के पीछे भाग रहा है.

आंकड़े बताते हैं कि नेशनल स्किल डेवलपमेंट काउंसिल ने सितंबर 2017 तक सिर्फ छह लाख युवाओं को प्रशिक्षित किया है और सिर्फ 72,858 प्रशिक्षित युवाओं को 12 फीसदी की दर से काम दे सका है. प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना (पहला चरण) के तहत रोजगार देने की दर सिर्फ 18 फीसदी रही है.

शारदा प्रसाद के पैनल ने पाया है कि नेशनल स्किल डेवलपमेंट  प्रोग्राम 2015 के तहत 40 करोड़ युवाओं को स्किल यानी कौशल सिखाने की योजना बहुत बड़ी, ग़ैर-जरूरी और असाध्य है.

इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.

Categories: भारत, राजनीति

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