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भीमा कोरेगांव: दलितों के ख़िलाफ़ हिंसा के आरोप में दलित कार्यकर्ता गिरफ़्तार

पुणे पुलिस ने माओवादियों से जुड़ाव का आरोप लगाते हुए तीन अलग-अलग शहरों से पांच सामाजिक कार्यकर्ताओं को हिरासत में लिया और दलितों के साथ हुई हिंसा का ज़िम्मेदार बताया.

भीमा कोरेगांव हिंसा के ख़िलाफ़ मुंबई में दलित समुदाय द्वारा विरोध प्रदर्शन (फोटो: पीटीआई)

भीमा कोरेगांव हिंसा के ख़िलाफ़ मुंबई में दलित समुदाय द्वारा विरोध प्रदर्शन (फोटो: पीटीआई)

मुंबई: जनवरी में हुई भीमा कोरेगांव हिंसा की जांच में बुधवार को नया मोड़ आ गया जब महाराष्ट्र पुलिस ने जनवरी में हुई हिंसा के मामले में तीन अलग-अलग शहरों से 3 दलित कार्यकर्ताओं, एक प्रोफेसर और एक सामाजिक कार्यकर्ता को गिरफ्तार किया.

यह गिरफ्तारियां मुंबई, नागपुर और दिल्ली में हुईं. गिरफ्तार किये गये लोगों में वरिष्ठ दलित कार्यकर्ता और राजनीतिक पत्रिका विद्रोही  के संपादक सुधीर धावले, वरिष्ठ मानवाधिकार वकील सुरेंद्र गाडलिंग, सामाजिक कार्यकर्ता महेश राउत, नागपुर यूनिवर्सिटी की शोमा सेन और दिल्ली के सामाजिक कार्यकर्ता रोमा विल्सन हैं.

मालूम हो कि इससे पहले की जांच में हिंदुत्ववादी नेता मनोहर उर्फ़ संभाजी भिड़े और मिलिंद एकबोटे को इस हिंसा का मुख्य आरोपी बताया जा रहा था, लेकिन अब पुलिस का दावा है कि 1 जनवरी को हुई इस हिंसा के पीछे ‘नक्सल और उनसे हमदर्दी’ रखने वाले शामिल हैं.

6 जून की सुबह मुंबई पुलिस ने देवनार स्थित धावले के घर, जिसमें उनकी पत्रिका का दफ्तर भी है, पर छापा मारते हुए उन्हें गिरफ्तार किया. उन पर भीमा कोरेगांव में दलितों के खिलाफ हिंसा भड़काने का आरोप है. इसके बाद ऐसे ही छापे एडवोकेट गाडलिंग और राउत के घर पर भी मारे गए और फिर उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया.

सुधीर धावले (फोटो साभार: यू ट्यूब)

सुधीर धावले (फोटो साभार: यू ट्यूब)

इसके बाद पुलिस ने बताया कि नागपुर से शोमा सेन और दिल्ली से रोमा विल्सन को भी संबंधित मामले में गिरफ्तार किया गया है, जहां से इन पांचों को पुणे के विश्रामबाग पुलिस स्टेशन ले जाया गया, जहां 8 जनवरी को एफआईआर दर्ज करवाई गयी थी.

पुणे पुलिस के संयुक्त पुलिस आयुक्त रवींद्र कदम ने बताया, ‘हमने भीमा कोरेगांव हिंसा मामले में पांच लोगों को गिरफ्तार किया है. पहली नजर में सभी पांचों के माओवादियों से जुड़ाव का पता चला है और मामले में उनकी संलिप्तता देखी जा रही है. इसकी जांच की जाएगी कि क्या इन लोगों ने हिंसा भड़कायी थी.’

इन सभी लोगों पर गैर-कानूनी गतिविधि (रोकथाम) कानून [यूएपीए- Unlawful Activities Prevention Act] की धाराएं लगायी गयी हैं. बताया जा रहा है कि मामले में और गिरफ्तारियों की भी संभावना है.

जनवरी में विश्रामबाग थाने में दर्ज शुरुआती एफआईआर में धावले के साथ-साथ कबीर कला मंच के कार्यकर्ताओं का भी नाम था, जिन पर कथित तौर पर भड़काऊ भाषण देने का आरोप है, जिसके चलते भीमा कोरेगांव में हिंसा भड़की.

धावले के सहकर्मी जो उनकी गिरफ़्तारी के समय दफ्तर में मौजूद थे. उनकी सहकर्मी हर्षाली पोतदार ने द वायर को बताया, ‘पुलिस की एक टीम ने हमारे दफ्तर पर छापा मारा और सभी कंप्यूटर और दस्तावेज जब्त कर लिए. हमारे बहुत पूछने पर पुलिस ने हमें बताया कि कौन-सी धारा में मामला दर्ज हुआ है. एफआईआर में बदलाव किये गये हैं और यूएपीए को जोड़ा गया है.’

हर्षाली का नाम भी एफआईआर में है, लेकिन अब तक उन्हें गिरफ्तार नहीं किया गया है.

शुरुआती एफआईआर में दो लोगों पर दो समूहों के बीच वैमनस्य भड़काने और आपराधिक साजिश की धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया था. पुलिस के मुताबिक उस कार्यक्रम में ‘भड़काऊ’ भाषणों के चलते दलितों और ब्राह्मणों के बीच हिंसा भड़की. लेकिन अब नागपुर पुलिस ने दावा किया कि हिरासत में लिए गये लोगों के ‘नक्सली’ लिंक हैं और इसलिए यूएपीए को एफआईआर में जोड़ा गया है.

बुधवार को गिरफ्तार किये गए सभी पांचों व्यक्ति सामाजिक रूप से सक्रिय हैं और वर्तमान सरकार की नीतियों की आलोचना में मुखर रहे हैं.

धावले भीमा कोरेगांव की हिंसा के पीड़ितों के लिए न्याय की मांग करते रहे हैं और मुंबई की कई फैक्ट-फाइंडिंग कमेटियों का हिस्सा रहे हैं. 2011 में पुलिस ने उनके नक्सल गतिविधियों में संलिप्त होने का दावा करते हुए उन्हें गिरफ्तार किया था. उन्होंने 40 महीने जेल में गुज़ारे, जिसके बाद उन्हें बरी कर दिया गया था. बाहर आने के बाद भी धावले ने अपनी द्विमासिक पत्रिका निकालना जारी रखा, साथ ही एक राजनीतिक संगठन रिपब्लिकन पैंथर भी शुरू किया है.

गाडलिंग नागपुर के एक प्रमुख वकील हैं, जो यूएपीए से जुड़े कई केस लड़ चुके हैं. दिल्ली यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर और कार्यकर्ता जीएन साईबाबा का केस इनमें से एक रहा है.

महेश राउत गढ़चिरौली के एक युवा एक्टिविस्ट हैं, जो महाराष्ट्र के विदर्भ क्षेत्र में आदिवासियों को विस्थापित करने और उनके खिलाफ अत्याचार के मामलों को लेकर सक्रिय हैं. वे टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज से पढ़े हैं और उन्हें प्रतिष्ठित प्रधानमंत्री रूरल डेवलपमेंट फेलोशिप भी मिल चुकी है.

रोमा विल्सन मूल रूप से केरल के रहने वाले हैं और दिल्ली में रहकर कमेटी फॉर रिलीज़ ऑफ पॉलिटिकल प्रिजनर्स से जुड़े हैं.

मिलिंद एकबोटे और संभाजी भीड़े (फोटो: फेसबुक)

मिलिंद एकबोटे और संभाजी भीड़े (फोटो: फेसबुक)

बुधवार को हुई इन गिरफ्तारियों से सरकार के रुख पर कई सवाल उठते हैं. विभिन्न संगठनों ने सवाल किया है कि क्या सरकार भीमा कोरेगांव हिंसा के लिए जिम्मेदार लोगों को बचाने की कोशिश कर रही है.

भीमा कोरेगांव पुणे के बाहरी हिस्से में बसा एक छोटा सा गांव है, जहां महार समुदाय द्वारा ब्रिटिशों के साथ ब्राह्मण पेशवाओं के खिलाफ युद्ध लड़ा गया था. इसी युद्ध की 200वीं वर्षगांठ मनाने के लिए इस साल 1 जनवरी को महार समुदाय के हजारों लोग इकट्ठे हुए थे.

पुणे पुलिस के मुताबिक भीमा कोरेगांव में हुए इस कार्यक्रम से कुछ दिन पहले मिलिंद एकबोटे ने पुणे में अपने समर्थकों के साथ एक बैठक करके इस कार्यक्रम में बाधा डालने की योजना बनाई थी. पुलिस ने पुणे में दलित-विरोधी संदेश लिखे पम्फलेट जब्त किये हैं.

जब हिंसा के बाद तनाव बढ़ा तब पुणे पुलिस को एकबोटे को गिरफ्तार करना पड़ा, जिसे अप्रैल में पुणे सेशन कोर्ट से ज़मानत मिल गयी. वहीं संभाजी भिड़े की अग्रिम ज़मानत याचिका सुप्रीम कोर्ट से ख़ारिज हो जाने के बावजूद उनकी गिरफ़्तारी नहीं हुई.

जहां एक तरफ एकबोटे और भिड़े के खिलाफ मामला चल रहा था, दूसरी तरफ पुलिस ने सामाजिक कार्यकर्ताओं, खासकर दलित और वामपंथ की ओर झुकाव रखने वाले कार्यकर्ताओं के ऊपर एक और मामला दर्ज किया. यह मामला भीमा कोरेगांव शौर्य दिन प्रेरणा अभियान द्वारा आयोजित ‘एल्गार परिषद’ कार्यक्रम में भाग लेने के चलते दर्ज किया गया था.

भीमा कोरेगांव शौर्य दिन प्रेरणा अभियान 260 संगठनों का एक गठबंधन है, जिसके अध्यक्ष सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जस्टिस पीबी सावंत और बॉम्बे हाईकोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस बीजी कोलसे पाटिल हैं. एल्गार परिषद का आयोजन भी 1 जनवरी को होने वाले कार्यक्रम से कुछ दिन पहले ही हुआ था.

इस कार्यक्रम में गुजरात के विधायक जिग्नेश मेवाणी, रोहित वेमुला की मां राधिका वेमुला और बाबा साहेब आंबेडकर के पोते और भारिप बहुजन महासंघ के अध्यक्ष प्रकाश आंबेडकर ने भी हिस्सा लिया था.

इन पांचों की गिरफ़्तारी पर नागरिक अधिकार संगठन और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने पुणे पुलिस पर ‘मुख्य आरोपियों’ से ध्यान हटाने का आरोप लगाया है. कमेटी फॉर प्रोटेक्शन ऑफ डेमोक्रेटिक राइट्स ने पुलिस के इस कदम की आलोचना करते हुए कहा है कि यह महाराष्ट्र सरकार के इशारे पर हो रहा है. भाजपा सरकार दलित और बहुजन वोटों को बांटने के इरादे से आतंक फैलाना चाहती है.

उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि सरकार द्वारा इस तरह का टेरर नैरेटिव असली अपराधियों मिलिंद एकबोटे और संभाजी भिड़े, जो उनके हिंदू वोट सुनिश्चित करेंगे, को बचाने के लिए तैयार कर रही है.

इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.

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