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अगर हेडगेवार भारत माता के महान सपूत हैं तो आज़ादी की लड़ाई के नायक क्या हैं?

प्रणब दा आप नागपुर में संघ को यह नहीं बता पाए कि नेहरू की भारत माता और हेडगेवार की भारत माता में ज़मीन-आसमान का फ़र्क़ है. इसीलिए आप यह फ़र्क़ करने में भी चूक गए कि भारत माता के महान सपूत होने की बुनियादी कसौटी क्या है.

Nagpur: Former president Pranab Mukherjee with Rashtriya Swayamsevak Sangh (RSS) chief Mohan Bhagwat at the birthplace of RSS founder Keshav Baliram Hedgewar, in Nagpur, Maharashtra on Thursday, June 07, 2018. (PTI Photo)(PTI6_7_2018_000105B)

नागपुर में केशव बलिराम हेडगेवार के जन्मस्थान पर पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी (फोटो: पीटीआई)

राष्ट्र, राष्ट्रवाद और देशभक्ति पर बहस उलझती चली जा रही है. अभी तक गुत्थी फंसी थी कि भारत माता कौन है? प्रणब मुखर्जी द्वारा आरएसएस के संस्थापक केशव बलिराम हेडगेवार को ‘भारत माता का महान सपूत’ कहने के बाद नया सवाल खड़ा हो गया है कि भारत माता का ‘महान’ सपूत कौन है?

वैसे तो भारत की धरती पर जन्म लेने वाला हर कोई भारत माता का पूत, सपूत या कपूत हो सकता है. लेकिन भारत माता के करोड़ों-करोड़ सपूतों में ‘महान’ सपूत कौन है यह इस पर निर्भर करता है कि आपके हिसाब से आपकी भारत माता कौन है?

प्रणब दा को उनकी बेटी शर्मिष्ठा मुख़र्जी ने उनको चेताया था-‘भाषण भुला दिया जाएगा, तस्वीरें रह जाएंगी और उनको झूठे संदेशों के साथ फैलाया जाएगा.’ यह शब्दशः सच साबित हुआ और प्रणब मुखर्जी के भाषण के कुछ ही घंटों बाद उनकी तस्वीर को फोटोशॉप करके फैलाया जाने लगा.

लेकिन इन तस्वीरों से जितना नुकसान भाजपा-आरएसएस की आईटी सेल नहीं पहुंचा सकती थी, खुद प्रणब मुखर्जी ने हेडगेवार पर लिखी अपनी टिप्पणी से पहुंचा दिया. उन्होंने लिखा-‘मैं यहां भारत माता के महान सपूत को श्रद्धांजलि देने आया हूं.’ कोई भोला व्यक्ति ही विश्वास करेगा कि उन्होंने ऐसा भोलेपन में कर दिया.

इसके पीछे की योजना कुछ भी हो लेकिन जिस राष्ट्रवाद की बात एक स्टेट्समैन की तरह वो आरएसएस मुख्यालय में कर रहे थे, क्या प्रणब मुखर्जी नहीं जानते कि हेडगेवार और उनका संगठन उसकी कब्र खोदने में पिछले 90 साल से लगे हुए हैं.

उन्होंने अपने भाषण में सम्मिलन, सहअस्तित्व, आत्मसातीकरण, सहिष्णुता, बहुलतावाद जैसे भारी-भरकम अकादमिक शब्दों का उपयोग करते हुए भारत की आधारभूत सांस्कृतिक एकता की बात की. ऐसा तो है नहीं कि उन्हें पता नहीं है कि हिंदू राष्ट्र की पूरी अवधारणा ही इन उच्च सांस्कृतिक मूल्यों के जनाजे पर टिकी है.

उन्हें यह भी पता ही है कि इस सोच का प्रतिनिधि संगठन आरएसएस हेडगेवार के दिमाग की ही उपज थी. तो क्या हेडगेवार अपने योगदान के इन्हीं अर्थों में ‘भारत माता के महान सपूत’ हुए?

या साझा राष्ट्रवाद, जिसकी बात वो आरएसएस के मंच से कर रहे थे, इस देश में बहुसंख्यक हिंदुओं और अल्पसंख्यकों के बीच परस्पर एकता और सहयोग की बुनियाद पर खड़ा है. डॉ साहब को यह स्पष्ट करना चाहिए कि क्या उन्हें वाकई यह नहीं पता था कि जिन हेडगेवार के नाम का वो कसीदा पढ़ आए, उन्होंने देश के सबसे बड़े अल्पसंख्यक समुदाय यानी मुसलमानों को ‘फुफकारते यवन सांप’ कहा था.

ध्यान रहे हेडगेवार का यह कथन उनके ह्रदय में उन मुसलमानों के प्रति उपजे गुस्से की अभिव्यक्ति थी जो खिलाफत और असहयोग आंदोलनों में हिंदुओं और सिखों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर लड़ रहे थे.

कुछ लोगों को आपत्ति हो सकती है कि यह सवाल बेवजह खड़ा किया जा रहा है. उनको बताना जरूरी है कि हेडगेवार को इस पदवी से नवाजने से एक भारी समस्या यह खड़ी होती है कि जिन लोगों के प्रति आम जनता में चिढ़ पैदा करने पर ही आरएसएस का पूरा दुष्प्रचार टिका है, स्वाधीनता संघर्ष के उन नायकों को अब हम क्या कहेंगे?

‘भारत माता के महान सपूत’ दरअसल कोई शब्द-समुच्चय भर नहीं है. आम तौर पर यह भारतीय स्वाधीनता संघर्ष के नायकों का स्तुतिगान है. हम बचपन से सुनते आये हैं कि आजादी की लड़ाई के तमाम दीवानों ने इस लड़ाई में अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया और इसलिए वे सब भारत माता के महान सपूत कहलाये.

अब जिस संगठन के संस्थापक ने आजादी की लड़ाई से न सिर्फ अपने संगठन को दूर रखा, उसे कमजोर करने की साजिश भी की, उसे क्या अब भारत माता के महान सपूतों की श्रेणी में रखा जाना उचित है?

एक तरह की विचारधारा को मानने वाले लोग अपने लिए नायक और खलनायक गढ़ते ही हैं. स्वाभाविक है कि आरएसएस के लिए हेडगेवार-सावरकर-गोलवलकर श्रद्धेय हैं, प्रातः स्मरणीय हैं. इसी क्रम में उन्होंने अपने लिए जवाहरलाल नेहरू जैसे खलनायकों की रचना भी की है.

क्या आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत इलाहाबाद में जवाहरलाल नेहरू के पैतृक आवास आनंद भवन जाकर उन्हें ‘भारत माता का महान सपूत’ लिखेंगे?

हो सकता है कि आपकी तरह अपनी मूल विचारधारा की ओर से कुछ मिनट मुंह मोड़कर वो लोकलाज में ऐसा कर जाएं. लेकिन क्या वो हृदय से नेहरू के प्रति इतना सम्मान व्यक्त कर पायेंगे जितना काल्पनिक रूप से वो उन पन्नों पर लिख बैठे हैं? हम उम्मीद करते हैं कि आप भी बस जमाने के दस्तूर में ही कुछ ऐसा कर गुजरे हैं.

इस सवाल को ऐसे भी पूछा जा सकता है कि क्या गांधी और गोडसे दोनों को एक साथ ‘भारत माता का महान सपूत’ पुकारा जा सकता है? जाहिर है गांधी और गोडसे को ऐसा मानने वाले दो अलग और प्रतिकूल सोच के लोग हैं.

या जनरल डायर और जलियावाला बाग के शहीदों की एक स्वर में प्रशंसा की जा सकती है? क्या लाला लाजपतराय और लाहौर के सुपिरिटेनडेंट ऑफ पुलिस जेम्स ए स्कॉट को एक बराबर रखा जा सकता है? जाहिर है इन सभी को महान उपाधियों से नवाजने वाले लोग अलग-अलग सोच के प्रतिनिधि होंगे.

हमारी दुविधा यह है कि अगर आज हेडगेवार भारत माता के महान सपूत हो गए हैं तो क्या कल गोडसे को भी ऐसे ही याद किया जाएगा? क्योंकि गोडसे जिस हिंदू राष्ट्र की संकल्पना के वशीभूत होकर गांधीजी की जान लेने पर तुला हुआ था, हेडगेवार उस विचारधारा के शलाका पुरुष हैं.

फिर हेडगेवार ने जिस संगठन की नींव रखी थी, गोडसे लंबे समय तक उसका बौद्धिक कार्यवाह रहा था. गोडसे तो सांप्रदायिक सोच का एक छोटा मोहरा-भर था, हेडगेवार उस सोच को संगठन में तब्दील करने वाले व्यक्ति थे.

गांधी के सपने का राष्ट्र धार्मिक आधार पर भेदभाव का निषेध करता है. वहां शांति का हरकारा बनने की तमन्ना है और अपनी मातृभूमि के लिए जीने और मरने की उत्कट इच्छा. गांधी के पास ऐसे देश की कल्पना है जहां सभी समुदाय आपस में पूरे सौहार्द के साथ जिएंगे.

इसके उलट हेडगेवार के लिए देश का अर्थ हिंदुओं और सिर्फ हिंदुओं का संगठन है जहां अल्पसंख्यकों के लिए यह धमकी है कि वे न भूलें कि वो हिंदुओं के हिंदुस्तान में रह रहे हैं. उनके हिंदू राष्ट्र में अल्पसंख्यक दोयम दर्जे के नागरिक हैं जो हिंदुओं की दया पर निर्भर हैं.

हेडगेवार ‘भारत माता के महान सपूत’ थे या नहीं यह इससे भी तय होता है कि आप साम्प्रदायिकता को कैसे समझते हैं. अंग्रेजों की ‘फूट डालो-राज करो’ की नीति की तात्कालिक सफलता यह थी कि मुस्लिम और हिंदू सांप्रदायिक चेतना भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के लिए गंभीर चुनौती बनती चली गई.

सांप्रदायिकता वो विचारधारा है जिसने न सिर्फ आजादी की लड़ाई को भीतर से कमजोर किया, बल्कि देश का बंटवारा भी करवा दिया. आज भी हम सांप्रदायिक फासीवाद के खतरे से टकराना इसलिए जरूरी समझते हैं क्योंकि यह हमारी भारत माता की आंख में आंसू लाने वाली प्रवृत्ति है.

अब अगर आप इस ऐतिहासिक सत्य को समझते हैं तो फिर आजाद भारत के सबसे सांप्रदायिक संगठन के संस्थापक को ‘भारत माता का महान सपूत’ कैसे कह सकते हैं? अगर हम ऐसा मान लें तो सांप्रदायिकता के खतरे को पहचानकर उससे टकराने वाले सभी लोग तो भारत माता के अपराधी ही कहलायेंगे.

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नागपुर में केशव बलिराम हेडगेवार को श्रद्धांजलि देते पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी (फोटो: पीटीआई)

आरएसएस का इतिहास आजादी की लड़ाई से द्रोह का इतिहास है. हेडगेवार शायद उन इक्का-दुक्का लोगों में थे जिन्होंने अपने शुरुआती दौर में आजादी की लड़ाई में कुछ हिस्सा लिया था. लेकिन 1925 के बाद उनकी मुख्य चिंता हिंदुओं को संगठित करने और उनको स्वाधीनता संघर्ष से दूर करने पर केंद्रित हो गई.

इसके बाद तो वे कांग्रेस और उसके नेताओं के राष्ट्र की कल्पना का एंटीडॉट तैयार करने में जुट गए. सविनय अवज्ञा के समय उन्होंने आरएसएस को आंदोलन से दूर रखा, लेकिन खुद उसमें भाग लेने इसलिए गए ताकि गांधी के आंदोलन से तोड़कर उत्साही हिंदू युवाओं को संघ में लाया जा सके.

इसके बाद हेडगेवार ने कभी ब्रिटिश राज के खिलाफ एक शब्द अपने स्वयंसेवकों को नहीं सिखाया. उनकी सारी ऊर्जा इस बात में खर्च हुई कि कैसे कांग्रेस और उसकी समझ के राष्ट्रवाद की मुखालफत की जा सके.

उन्होंने संघ के स्वयंसेवकों से अपील कि 1930 में कांग्रेस के प्रस्ताव पर देश भर में मनाये जाने वाले स्वतंत्रता दिवस के दिन सभी शाखाओं में कांग्रेसी तिरंगे की जगह भगवा ध्वज फहराया जाए. तिरंगे के प्रति यही विरक्ति आगे चलकर उसे ‘अशुभ’ मानने की सोच की बुनियाद बनी क्योंकि हेडगेवार के मुताबिक तो तिरंगा नहीं भगवा ही हिंदू राष्ट्र का ध्वज हो सकता था.

विरोधी विचारधारा से संवाद के नाम पर किए गए इस भाषण में कुछ मूलभूत खामियां हैं. स्वस्थ संवाद की दो पूर्व शर्तें होती हैं-पहली कि दोनों पक्ष के संवादी तार्किक हों और दूसरा कि दोनों खुले दिमाग से एक-दूसरे से ग्रहण करने की क्षमता रखते हों. आरएसएस इन दोनों ही मापदंडों पर खरा नहीं उतरता.

उसकी वैचारिक बुनियाद या तो कपोल कल्पना पर आधारित है या फिर झूठ और अफवाह की बुनियाद पर. रही बात उसको प्रभावित करने की तो जो संगठन गांधी से प्रभावित न हुआ, वो प्रणब मुखर्जी से तो क्या ही प्रभावित होगा.

याद रखिये गांधी जब पहली और आखिरी बार 16 सितंबर 1947 को दिल्ली स्थित आरएसएस की एक शाखा में ले जाए गए थे तो उन्होंने साफ कहा था कि मैं आपको चेतावनी देता हूं-‘अगर आपके खिलाफ लगाया जाने वाला यह आरोप सही है कि मुसलमानों को मारने में आपके संगठन का हाथ है, तो उसका परिणाम बुरा होगा.‘

काश! प्रणब मुखर्जी भी वहां जाकर 16 साल के बच्चे जुनैद की निर्मम हत्या पर सवाल खड़े कर देते और पूछते कि इन हत्याओं में शामिल लोगों की आंखों में भला हिंदू राष्ट्र का सपना क्यों तैरता रहता है? कितना अच्छा होता अगर वो गांधी की तरह कह देते कि ‘मुझे हिंदू होने का गर्व अवश्य है लेकिन मेरा हिंदू धर्म न तो असहिष्णु है और न बहिष्कारवादी.’

आप उन्हें यह नहीं बता पाए कि नेहरू की भारत माता और हेडगेवार की भारत माता में जमीन-आसमान का फर्क है. इसीलिए आप यह फर्क करने में भी चूक गए कि भारत माता के महान सपूत होने की बुनियादी कसौटी क्या है.

(लेखक राष्ट्रीय आंदोलन फ्रंट नामक संगठन के राष्ट्रीय संयोजक हैं.)

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