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प्रधानमंत्री मोदी की हत्या के कथित षड्यंत्र वाली चिट्ठी महज़ चुनावी स्टंट है: प्रकाश आंबेडकर

साक्षात्कार: भीमा-कोरेगांव हिंसा में माओवादी लिंक, प्रधानमंत्री की कथित हत्या का षड्यंत्र और दलितों की स्थिति पर बाबा साहब भीमराव आंबेडकर के पौत्र और भारतीय रिपब्लिकन पक्ष (भारिप) बहुजन महासंघ के नेता प्रकाश आंबेडकर से प्रशांत कनौजिया की बातचीत.

प्रकाश आंबेडकर (फोटो: फेसबुक)

प्रकाश आंबेडकर (फोटो: फेसबुक)

पुणे के भीमा-कोरेगांव हिंसा में माओवादी लिंक और प्रधानमंत्री की हत्या की कथित साज़िश के संबंध में एल्गार परिषद के सुधीर धवले के अलावा चार अन्य लोगों की गिरफ़्तारी पर आप क्या कहना चाहेंगे?

सुधीर धवले पर सरकार ने पहली बार हमला नहीं किया है. लगभग छह साल पहले उन्हें माओवादी संगठन से संबंध रखने के आरोप में गिरफ़्तार किया गया था, लेकिन अदालत में सरकार ये बात साबित नहीं कर पाई और अदालत ने आरोपों को ख़ारिज कर उनको मामले से बरी कर दिया.

सरकार ने उसके ख़िलाफ़ हाईकोर्ट में भी अपील की थी, लेकिन वो भी ख़ारिज हो गई. सुधीर दलितों के अधिकारों की लड़ाई लड़ते रहे हैं. सरकार उनको षड्यंत्र के तहत गिरफ़्तार कर भीमा-कोरेगांव हिंसा के प्रमुख षड्यंत्रकारी संभाजी भिड़े और मिलिंद एकबोटे को बचाने का प्रयास कर रही है.

सरकार चाहती है कि इन दोनों षड्यंत्रकारियों ने लोगों की नज़र हट जाए. ऐसे असामाजिक लोगों को बचाने के लिए पूरे राज्य का प्रशासन और पुलिस लगी हुई है. दलितों पर हो रहे हमले सरकार को दिखते नहीं क्योंकि ये सब करने वाले सरकार के लोगों हैं. सरकार हरसंभव प्रयास कर रही है ताकि उन लोगों को बचा लिया जाए.

दंगा करने वालों पर और हिंसा भड़काने वालों पर कोई कार्रवाई न कर मासूम दलितों को जेल में डालकर पूरे समाज में भय का एक माहौल कायम करने का प्रयास सरकार कर रही है.

पुलिस द्वारा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हत्या के षड्यंत्र के दावे और इस संबंध में गिरफ़्तार किए गए एक व्यक्ति के पास से मिली योजना की कथित चिट्ठी के बारे में आप क्या सोचते हैं?

देखिए, यह एक हास्यास्पद दावा है. पुलिस को पहले ये बताना चाहिए कि 2014 से लेकर अब तक नरेंद्र मोदी को कितनी बार धमकी मिली. क्या सिर्फ़ यही चिट्ठी मीडिया में दिखाई गई है.

इस चिट्ठी की सत्यता साबित अभी नहीं हुई है. ऐसा है न जब-जब नरेंद्र मोदी को लगता है कि उनकी कुर्सी जाने वाली है तब-तब वे अचानक अपनी जान ख़तरे में बताकर जनता को गुमराह करने का काम करते हैं.

पिछले चार साल में मोदी ने कुछ नहीं किया. उन्हें भी पता है शायद कि जनता सब जान रही है. अपनी विफलता को छुपाने के लिए एक ढोंग किया जा रहा है, वरना प्रधानमंत्री के ख़िलाफ़ इस तरह के गंभीर षड्यंत्र की बात मीडिया में नहीं आ जाती.

इस मामले की पहले जांच होनी चाहिए. ये एक प्रोपेगेंडा है, चुनाव नज़दीक है, इसलिए मोदी ऐसा कर रहे हैं. ये सिर्फ मोदी की स्टंटबाज़ी है.

क्या आप मानते हैं कि महाराष्ट्र पुलिस का रवैया दलित और मुस्लिम विरोधी रहा है?

पुलिस क्या है? वो तो सरकार का हथियार है, जिसे वो अपने ख़िलाफ़ उठ रही आवाज़ों के दमन के लिए इस्तेमाल करती है. पुलिस का वही रवैया होता है, जो सरकार का होता है.

पुलिस में निचले स्तर पर अच्छे लोग हैं पर वो तो ख़ुद के विवेक का इस्तेमाल भी नहीं कर सकते. वे लोग तो सिर्फ़ शीर्ष अधिकारियों के आदेश का पालन करते हैं. पुलिस में जितने शीर्ष अधिकारी हैं सभी आरएसएस के लोग हैं और मनुवादी मानसिकता से ग्रस्त हैं.

हमें मुंबई में रमाबाई कॉलोनी गोलीबारी प्रकरण और 1992 के दंगों में पुलिस की भूमिका को देखना चाहिए. कैसे पुलिस सरकार की तरफ़ से दलितों और मुसलमानों को निशाना बना रही थी.

उसके बाद हाल ही में भीमा-कोरेगांव का प्रकरण हो जहां पुलिस ने निर्दोष और नाबालिग बच्चों को जेल में बंद कर दिया. कई लोगों पर फ़र्ज़ी मुक़दमे लगाए गए हैं. क्या पुलिस ने ये सब ख़ुद से किया? नहीं, वे सब तो अपने शीर्ष अधिकारियों का आदेश मान रहे थे, जो आरएसएस के लोग हैं.

भाजपा का दलितों के प्रति रवैया कैसा है?

अगर हमें भाजपा का दलितों के प्रति रवैया देखना है तो भीमा-कोरेगांव हिंसा, दलितों के भारत बंद आंदोलन में सरकार की भूमिका और सहारनपुर हिंसा पर ध्यान देना होगा.

सरकार अगर बाबा साहेब की हितैषी होती तो उनके समाज पर इतना अत्याचार नहीं करती. भाजपा देश में आपातकाल लाना चाहती है. वे सिर्फ बाबा साहेब को प्रतीकात्मक रूप से लेकर चलते हैं, लेकिन उनके विचारों को साथ लेकर नहीं चलना चाहते.

भारत बंद आंदोलन के समय हुए प्रदर्शन में पुलिस ने कितने निर्दोष दलितों को जेल में डाल दिया. भीमा-कोरेगांव हिंसा में पुलिस ने अपराधी लोगों को छोड़कर निर्दोष बच्चों तक को नहीं बक्शा.

सहारनपुर हिंसा के समय भीम आर्मी के मामले को देखिए, सरकार ने क्या किया. भीम आर्मी के प्रमुख चंद्रशेखर आज़ाद रावण को बिना वजह रासुका के तहत जेल में रखा गया है.

भाजपा जब से सत्ता में आई है तब से दलितों पर अत्याचार बढ़ गया है. न्याय देने के लिए बनी संस्था पर भाजपा ने क़ब्ज़ा कर रखा है. वे पुलिस और न्यायालय को प्रभावित कर रहे हैं. इनकी मानसिकता के तहत दलितों और अल्पसंख्यकों को न्याय मिलना मुश्किल है.

दलित आंदोलन और दलितों के मुद्दों पर मीडिया की भूमिका को किस तरह से देखते हैं?

हमें यह समझना होगा कि अभी हमारे देश के जो मीडिया घराने हैं वो सभी भाजपा के नज़दीकी लोगों द्वारा संचालित हैं या भाजपा से प्रभावित नज़र आते हैं.

न्यूज़ चैनलों की रिपोर्टिंग को देखकर ऐसा लगता है कि ये भाजपा के साथ मिलकर काम करते हैं. कुछ स्वतंत्र मीडिया घरानों को छोड़ दिया जाए तो सभी का झुकाव भाजपा की तरफ़ होता नज़र आता है. मीडिया घरानों को दलित की ख़बर तो चाहिए लेकिन उन्हें दलित और बहुजन समुदाय के लोग नहीं चाहिए.

अमूमन मीडिया घरानों के संपादक जो दलितों पर अत्याचार की ख़बर लगाते हैं, उन्हें लगता है कि वे दलित समाज का भला कर रहे हैं, उन पर एहसान कर रहे हैं लेकिन वास्तव में वे दलितों के आंदोलन को उपद्रव के रूप में पेश करते नज़र आते हैं.

वे दलितों पर अत्याचार की ख़बर बताना चाहते हैं, लेकिन दलितों के मुद्दों पर कभी चर्चा नहीं करते. दलितों के ख़िलाफ़ अपराध हो जाए, तो वो ख़बर है, लेकिन उनके आंदोलन, उनकी मांगें और उनके मुद्दों को मीडिया में कहीं जगह नहीं मिलती.

भीमा-कोरेगांव प्रकरण में मीडिया ने ग्राउंड रिपोर्ट का काम नहीं किया. सभी ने वही छापा जो सरकार छपवाना चाहती थी.

भारत बंद के वक़्त भी मीडिया ने रिपोर्टिंग का काम नहीं किया बल्कि स्टूडियो में बैठकर सरकार की मंशा को पूरी करने में लगे थे. वे उनकी मांगों पर चर्चा न करके ये बताने में लगे थे कि दलित समुदाय के लोग उपद्रव कर रहे हैं.

इस उपद्रव में शामिल गोली चलाने वालों पर कोई चर्चा नहीं हुई कि वो कौन थे और किसके आदमी थे. अगर दलित गोली चलाते तो फिर दलित की ही मौत कैसे होती? ये सवाल मीडिया से किया जाना चाहिए. मीडिया ने हरसंभव प्रयास किया कि कैसे अपना अधिकार मांग रहे दलित समुदाय को बुरे स्वरूप में दिखाया जाए.

महाराष्ट्र में बहुजन आंदोलन बहुत फला-फूला, लेकिन प्रदेश में बहुजन राजनीति क्यों मज़बूत नहीं हो पाई?

जब-जब दलित या बहुजन समुदाय के लोग अपने प्रतिनिधि या अपने समुदाय की पहचान बनाने में खड़े हुए तब भाजपा, कांग्रेस, राकांपा और शिवसेना जैसी पार्टियों ने उनके सामाजिक आंदोलन के साथ राजनीतिक आंदोलनों को भी तोड़ने का काम किया.

ये सभी दल कभी नहीं चाहते कि दलित समुदाय के लोग सदन में ख़ुद की ताक़त के तहत पहुंचे. वे चाहते हैं कि दलित समुदाय के लोग उनकी पार्टी की गुलामी करते हुए जी-हुज़ूरी का काम करें और प्रतीकात्मक रूप से पार्टी में पड़े रहें.

हालांकि अब ऐसा नहीं होगा. दलित समाज इन पार्टियों का चरित्र समझ चुका है. ये लोग दलित समुदाय का भला नहीं चाहते. चाहे भाजपा की सरकार हो या कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी, दोनों के राज में दलितों पर एक बराबर अत्याचार होता है.

दोनों दलितों के प्रति दमन की राजनीति अपनाते आए हैं. अब दलित, अति पिछड़ा और मुस्लिम समुदाय के लोग मिलकर इन लोगों को सबक सिखाएंगे और राजनीति के साथ समाज में अपने अस्तित्व और अपनी अस्मिता की लड़ाई ख़ुद के बलबूते पर लड़ेंगे.

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