राजनीति

मंत्रालयों-विभागों में ‘लैटरल एंट्री’ संस्थाओं के भगवाकरण का प्रयास: वीरप्पा मोइली

प्रशासनिक सुधार आयोग के पूर्व अध्यक्ष और पूर्व केंद्रीय मंत्री वीरप्पा मोइली ने कहा कि यह जल्दबाज़ी में उठाया गया कदम है. मोदी सरकार की घोषणा में पारदर्शिता की कमी है. उसने लैटरल एंट्री की घोषणा की लेकिन कोई नीति पेश नहीं की.

पूर्व केंद्रीय मंत्री वीरप्पा मोइली. (फोटो: पीटीआई)

पूर्व केंद्रीय मंत्री वीरप्पा मोइली. (फोटो: पीटीआई)

नई दिल्ली: नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा केंद्र के 10 मंत्रालयों और विभागों में ‘लैटरल एंट्री’ के ज़रिये 10 संयुक्त सचिवों की बहाली के लिए विज्ञापन निकाला गया है. यह निजी या सरकारी क्षेत्र में काम करने का कम से कम 15 साल के अनुभव वालों के लिए है.

लैटरल एंट्री का मक़सद स्पष्ट करते हुए विज्ञापन में कहा गया है कि इससे न केवल शासन व्यवस्था में नए विचार आएंगे बल्कि उसकी मानवशक्ति एवं दक्षता में भी इज़ाफ़ा हो सकेगा.

हालांकि विभिन्न राजनीतिक दलों ने इस प्रस्ताव का विरोध शुरू करते हुए आरोप लगाया है कि अस्थायी प्रकृति की इस बहाली में आरक्षण के नियमों का पालन नहीं किया जाएगा तथा यह एक और संवैधानिक संस्था को बर्बाद करने की साज़िश है.

इस मुद्दे पर प्रशासनिक सुधार आयोग के अध्यक्ष रहे पूर्व केंद्रीय मंत्री एम. वीरप्पा मोइली से बातचीत.

भारत सरकार ने लैटरल एंट्री के ज़रिये सरकार के कुछ विभागों में संयुक्त सचिव स्तर के पदों पर बहाली करने की घोषणा की है, इस फैसले को आप कैसे देखते हैं?

लैटरल एंट्री के बारे में प्रशासनिक सुधार आयोग ने सिफ़ारिश की थी जिसे पारदर्शी और उद्दश्यपूर्ण तरीके से किया जाना था. इसके मूल में भावना यह होनी चाहिए थी कि इसका राजनीतिकरण नहीं हो, लेकिन लोकसभा चुनाव के एक वर्ष से भी कम समय शेष रखने के बीच जिस अस्थायी और जल्दबाज़ी में किया गया है, उससे सरकार की मंशा पर सवाल खड़े होते हैं. मेरा मानना है कि यह संस्थाओं के भगवाकरण का वर्तमान सरकार का प्रयास है.

आप प्रशासनिक सुधार आयोग के अध्यक्ष रहे हैं, प्रशासनिक सुधारों के संदर्भ में केंद्र सरकार की यह पहल कितनी कारगर है?

इस निर्णय से विविध आयाम जुड़े हुए हैं लेकिन सरकार की घोषणा में पारदर्शिता का सख़्त अभाव है. मेरा मानना है कि यह सरकार पार्टी लाइन से इतर कुछ सोच ही नहीं सकती है. उसने लैटरल एंट्री की घोषणा की लेकिन कोई नीति लेकर नहीं आए.

पहले लैटरल एंट्री के बारे में नीति लेकर आएं. इसे लेकर विभिन्न पक्षकारों से चर्चा करें. तभी इसे आगे बढ़ाया जा सकता है. मेरा सुझाव है कि लैटरल एंट्री के विषय को आगे बढ़ाने के लिये ‘सिविल सेवा प्राधिकार’ का गठन किया जाना चाहिए .

आप मोदी सरकार की इस पहल में क्या खामी पाते हैं?

सबसे बड़ा सवाल केंद्र की मोदी सरकार की मंशा पर उठ रहा है. मुझे ज्ञात हुआ है कि आरएसएस की एक शाखा आईएसएस अधिकारियों के लिए ओरिएंटेशन कार्यक्रम चला रही है.

इसके तहत 25 प्रतिशत आईएएस अधिकारियों के भगवाकरण के कार्य को आगे बढ़ाया जा चुका है. ऐसे में अगर कुछ अच्छे अधिकारी भी आते हैं तब भी लोग उन्हें शक की नज़र से देखेंगे.

सरकार की इस पहल में यह भी स्पष्ट नहीं है कि इनकी नियुक्ति कौन सी एजेंसी करेगी. इससे सिविल सेवा की व्यवस्था बर्बाद हो जाने की आशंका है.

कुछ राजनीतिक दलों का आरोप है कि यह संविधान के प्रावधानों एवं आरक्षण की व्यवस्था को कमतर करने का प्रयास है, आप इन आरोपों से कितने सहमत या असहमत हैं?

यह आशंका सही है कि यह एससी, एसटी और ओबीसी को आरक्षण के प्रावधानों को कमतर करने का प्रयास है. इस पहल से जुड़ी यह सबसे महत्वपूर्ण बात है. लोकसभा और राज्यसभा में अनुबंध के आधार पर नियुक्त में इस बात स्पष्ट रूप से सामने आई है.

ऐसे में सरकार को सबसे पहले स्पष्ट करना चाहिए कि लैटरल एंट्री के तहत नियुक्ति में आरक्षण के प्रावधानों को किस प्रकार से लागू किया जाएगा. इस बारे में नीतियां स्पष्ट किए बिना अगर इन्हें लागू किया जाता है तब आने वाली पीढ़ियां हमें माफ़ नहीं करेंगी.

सरकार का कहना है कि इससे मानवशक्ति और कार्यकुशलता में इज़ाफा होगा. सरकार की इस दलील से आप कितने सहमत है?

अगर व्यवस्था में पारदर्शिता नहीं होगी, नीतिगत ढांचा नहीं होगा, तब कार्यकुशलता कैसे बढ़ सकती है. ऐसे में सबसे पहले नीति तैयार करें. सरकार का यह क़दम अस्थायी है और दलगत राजनीति से प्रेरित है.