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अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय: जो धार्मिक पाठ ही नहीं है, उसको लेकर हंगामा है क्यों बरपा…

एएमयू को एक लड़की की गुस्ताख़ी पसंद नहीं आई, इसलिए एक ऐसा नारा जो इस्लामिक भी नहीं है उस पर हायतौबा मची है. ये देखना भी कम दिलचस्प नहीं है कि यूनिवर्सिटी किसी ज़िम्मेदार शैक्षणिक संस्थान की तरह व्यवहार करने की बजाय फ़तवे की किताब खोलकर बैठ गई है.

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अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (फोटो साभार: india visit online)

कोई किसी धर्म विशेष को कैसे देखता है, उसके बारे में क्या सोचता है और सोशल मीडिया पर किस तरह के विचार व्यक्त करता है? ये किसी धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र में भी बातचीत का विषय ज़रूर है और ये इतना ज़रूरी विषय है कि इसके लिए बाक़ायदा क़ानूनी प्रावधान मौजूद हैं.

क़ानूनी प्रावधान की बात इसलिए कि अब सहनशीलता और सहिष्णुता के साथ परस्पर सामाजिक ‘समझ’ का युग भी शायद बीत चुका है. लोग-बाग ज़्यादा प्रतिक्रियावादी हो गए हैं.

अगर नहीं तो सोचना चाहिए कि समाज को प्रतिक्रियावादी कौन बनाता है? क्या आपका धर्म ऐसा तो नहीं कि आप किसी विशेष पहचान में पैदा होने की वजह से धार्मिक हैं या आपने झूठमूठ की परंपरा को ही धर्म समझ लिया है. हर दो सूरत में आपकी समझ की तरह ही आपका धर्म भी कमज़ोर है.

सोने पर सुहागा ये है कि सोशल मीडिया ने फ़तवों की दुकान खोल दी है और ऐसी खोली है कि ख़बरों में जगह पाने के लिए कोई प्राथमिकी दर्ज करवाता है तो कोई कल्चरल विंग पाबंदी की बात करता है. ऐसे में किस-किस की समझ पर रोते फिरेंगे.

संयोग से इस बार इस तरह की समझ के मामले में निल बटे सन्नाटा वाली कहावत को अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय ने चरितार्थ किया है.

ख़बर आई है कि विश्वविद्यालय के दो पूर्व छात्र और एक वर्तमान छात्रा ने अपने परिचित के साथ मिलकर रमज़ान के पवित्र महीने में इफ़्तार का मज़ाक़ बनाया, दिल्ली स्थित किसी पब के अंदर शराब पी और एक तथाकथित धार्मिक नारे की पैरोडी की, मतलब टोटल गुस्ताख़ी…

इस गुस्ताख़ी को लेकर विवाद उस समय शुरू हुआ जब इन सब हरकतों में शामिल छात्रों के परिचित भोले विश्वकर्मा ने फ़ेसबुक पर मौक़े की एक तस्वीर शेयर कर दी. दर-हक़ीक़त तस्वीर के कैप्शन में ‘नारा-ए-तकबीर किंग फ़िशर अकबर’ लिखा गया था जो कथित तौर पर नारा-ए-तकबीर अल्लाहु-अकबर की पैरोडी है.

इस गुस्ताख़ी से आहत विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र नेता ने जहां एफआईआर करने का सेहरा अपने माथे बांध लिया वहीं कल्चरल एजुकेशन सेंटर (एएमयू) ने आजीवन पाबंदी की घोषणा कर दी.

इंडियन एक्सप्रेस की ख़बर के मुताबिक़ विश्वविद्यालय ने मामले में संज्ञान लेते हुए छात्रा को कारण बताओ नोटिस जारी किया और कहा कि अगर जवाब संतोषजनक नहीं हुआ तो अनुशासनात्मक कमेटी ज़रूरी क़दम उठाएगी.

विश्वविद्यालय ने ये भी कहा कि वायरल वीडियो में छात्र बीयर पी रहे थे, जबकि उनका दोस्त धार्मिक-स्लोगन को बिगाड़ कर उसके विकृत रूप में नारा लगा रहा था.

धार्मिक भावनाओं को आहत करने के मामले में यही अब तक की रूदाद है, जिसमें ये जोड़ सकते हैं कि डरी-सहमी छात्रा ने माफ़ीनामा जारी किया, जिसको उस लड़की का खौफ़नामा कहना ज़्यादा सही होगा. इस ‘कुकृत्य’ में शामिल एक पूर्व छात्र ने भी वीडियो के माध्यम से अपनी सफ़ाई पेश की.

यूं इस मामले को लेकर हंगामा करने वाले और आरोपी छात्रा के चरित्र हनन में तमाम सीमाओं को लांघने वालों की फ़तह हो चुकी, यानि वो चाहें तो इस जीत पर भी नारा-ए-तकबीर अल्लाहु-अकबर की सदा बुलंद कर सकते है.

इस प्रसंग को आगे बढ़ाने से पहले दोहराने दीजिए कि सहनशीलता और सहिष्णुता के साथ परस्पर समाजिक ‘समझ’ का युग भी शायद बीत गया. ऐसे में इस उक्ति को साफ़ करने के लिए कुछ ज़रूरी संदर्भों को सामने रखना लाज़मी हो गया है.

दरअसल किसी धार्मिक-पाठ या क़ुरान की आयत (verse of the Quran) का बेजा इस्तेमाल ग़लत है और अगर किसी आयत में अल्लाह ने अपनी सिफ़त (विशेषता) बताई हो तो हम उसको किसी इंसान की विशेषता बताने की हिमाक़त नहीं कर सकते.

क़ुरान में ऐसी बहुत सी सूरतें हैं, उन्हीं में से एक सूरत में अल्लाह फ़रमाता है कि कह दो कि अल्लाह एक है…और इसी सूरत में आगे कहता है…लम यलिद वलम युलद, मतलब मेरा कोई मां-बाप नहीं है और ना ही मैं किसी का मां-बाप हूं.

अब अल्लाह की इसी सिफ़त को कोई अपने व्यक्तित्व के साथ विशेषण के तौर पर जोड़ ले तो वो धर्म का गुनहगार होगा, लेकिन उर्दू के मशहूर शायर मिर्ज़ा ग़ालिब ने अपने परिचित नवाब अमीनुद्दीन अहमद ख़ान को एक ख़त में लिख दिया कि मैं लम यलिद वलम युलद हूं. मतलब वही है कि मैंने किसी को नहीं जना और न ही जना गया.

ग़ालिब की इस गुस्ताख़ी पर समकालीन साहित्य और समाज में प्रतिक्रिया का अंदाज़ा शायद इसलिए नहीं होता कि ये बात किसी को व्यक्तिगत तौर पर लिखी गई थी. लेकिन बाद में जब ये ख़त छपा तो शायद इसलिए कोई प्रतिक्रिया नहीं दी गई कि मिर्ज़ा इस दुनिया से जा चुके थे.

हालांकि ये दोनों बातें सही नहीं हैं, माजरा ये है कि मिर्ज़ा के लिखे को उसके निहित और निश्चित अर्थों में पढ़ा ही नहीं गया बल्कि उस समाज की एक ‘समझ’ थी जिसमें अल्लाह की सिफ़त को अपने साथ जोड़ने पर भी ये समझा गया कि मिर्ज़ा ने बस ये कहा है कि उनके आगे पीछे कोई नहीं है.

अगर आज आपको ये सब जानकर आश्चर्य हो रहा है तो फिर सवाल आप ही से है कि आप क्यों इन पत्रों को एक बड़े साहित्यकार की जीवनी के तौर पर अपनी यूनिवर्सिटी में पढ़ते-पढ़ाते हैं, अपने लेखों में नक़ल करते हैं और इसको किसी सनकी साहित्यकार की सनक नहीं समझते.

तो सब से पहले अपनी यूनिवर्सिटी को ही ठीक कीजिए कि सिर्फ़ उर्दू शाइरी में ही कुफ़्र-ओ-इल्हाद (विधर्म) की परंपरा बड़ी मज़बूत है और शराब तो बात-बात में पी जाती है, फिर क्यों आप पाठ्यक्रम में इसको पढ़ा रहे हैं?

क्या ये आपकी बौद्धिक होशियारी है या आपकी समझ को ही सांप सूंघ गया है. मैं तो कहता हूं मरणोपरांत मिर्ज़ा पर फ़तवा आना चाहिए और उनके लिखे समेत उर्दू शाइरी के ‘विवादित पन्नों’ को जला देना चाहिए, यक़ीन जानिए इससे शायरों और मिर्ज़ा की आत्मा को कष्ट नहीं होगा, हां प्रतिक्रियावादियों के कलेजे को ठंडक पड़ जाएगी. सनद रहे यहां मिर्ज़ा ने पैरोडी नहीं की, सीधे क़ुरान की आयत को अपने लिए इस्तेमाल कर लिया.

आज जब एएमयू मामले में धार्मिक संस्थानों ने संज्ञान नहीं लिया है तो उनकी ‘तारीफ़’ करते हुए वर्ग विशेष के छात्रों के जोश से जारी कारण बताओ नोटिस को प्रतिक्रियावादियों के गले में तावीज़ की सूरत में देख कर मुझे ज़्यादा हैरत नहीं हो रही. शायद इसलिए कि अब धर्म का ज्ञान और ईमान नहीं बचा, बस उसका इश्तिहार लटका दिया गया है.

क्यों? क्योंकि धर्म विशेष की भावना बात-बात पर आहत होती है और अब इस पर तयशुदा एवं निश्चित- प्रतिक्रिया स्वभाविक से ज़्यादा कुछ हो गई है. लेकिन यहीं पर प्रतिक्रियावादी-कट्टरपंथियों से पूछना चाहिए कि क्या सचमुच आपको धर्म की चिंता है…?

और क्या ऐसे में जब आप किसी के व्यक्तिगत पहचान पर भी मुंह खोलने और गाली देने के आदी हैं, तो क्यों नहीं इस धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र में आपके ख़िलाफ़ भी फ़तवों का सिलसिला शुरू किया जाए.

कहने का मतलब सिर्फ़ इतना है कि आप अपने धर्म का पालन कीजिए. आप औरों के कमरे में क्यों झांकते हैं. यूं भी ताक-झांक में अपना ही लहू जलता है, धर्म तो वहीं है जहां था. लेकिन मैं आपसे विनती और दरख़्वास्त नहीं करना चाहता बस याद दिला रहा हूं कि हर किसी की अपनी च्वाइस होती है.

च्वाइस में ये भी जोड़ लीजिए कि हम और आप किसी इस्लामिक स्टेट के बाशिंदे नहीं हैं, इसलिए एक ख़ास तरह बल्कि लगभग तयशुदा सियासी हंगामे का सहारा लेकर आप किसी धार्मिक पहचान वाले नागरिक को भी किसी बात के लिए मजबूर नहीं कर सकते. और अगर सचमुच कुछ हुआ है तो ये सियासी हंगामा क्यों?

ख़ैर इस पूरे प्रसंग में एक बड़ी प्रतिक्रिया नारा-ए-तकबीर अल्लाहु-अकबर को लेकर है, तो सबसे पहले मैं व्यक्तिगत रूप से इस प्रतिक्रिया की घोर निंदा करता हूं और ये कहना चाहता हूं कि सोशल मीडिया पोस्ट को देख कर आप क्यों जोश में आ गए, पोस्ट को देख कर ये क्यों नहीं लगा कि ये सब हास्य और तफ़रीह के लिए था. और माफ़ कीजिएगा व्यंग प्रतिक्रियावादियों के मन का चोर भी तो हो सकता है. इसके बावजूद हम इसके धार्मिक पहलू पर भी बात कर लेते हैं.

जहां तक मेरी जानकारी है नारा-ए-तकबीर किसी भी तरह से धार्मिक पाठ नहीं है और इसका उल्लेख क़ुरान में है और ना ही हदीस में. लेकिन मुझे अपने इल्म पर बहुत ज़्यादा भरोसा नहीं था तो मैंने धर्म के जानकार और एक मुफ़्ती साहब को मिलाकर कुल तीन लोगों से बात की.

पहले का कहना था-  नहीं ये धार्मिक नारा नहीं है, ये एक सियासी नारा है और इसमें कुछ ग़लत भी नहीं है कि आज़ादी की लड़ाई के समय भी ये नारा ख़ूब लगाया गया, हिंदुओं के हर हर महादेव के जवाब में भी नारा-ए-तकबीर की सदाएं बुलंद की गईं और आज भी की जाती हैं. हां ख़ालिस इस्लामी परंपरा या धार्मिक पाठ से इसका कोई लेना-देना नहीं है, इस्लाम में सिर्फ़ तकबीर है जो नमाज़ का भी हिस्सा है.

दूसरे जो मुफ़्ती भी हैं उनका कहना था: ये तो हिंदुस्तानी परंपरा का हिस्सा है, एक जोश भरने वाला नारा है, इस्लाम में नारे के नाम पर बस एक बार हज़रत उमर के ज़माने में लोगों ने सिर्फ़ अल्लाहु-अकबर कहा था. नारा-ए-तकबीर तो हमने जोड़ा है. इसका इस्लाम और हमारे धार्मिक परंपरा से कोई सरोकार नहीं है, चूंकि इसमें अल्लाह की अज़मत का बयान है तो इसको कहने में कोई बुराई भी नहीं है.

तीसरे जो आलिम हैं उनका कहना था: मैं पूरे यक़ीन से नहीं कह सकता लेकिन मैंने ऐसी कोई किताब नहीं पढ़ी जिसमें नारा-ए-तकबीर अल्लाहु-अकबर का ज़िक्र हो.

इन बातों की रौशनी में मैं मान कर चलता हूं कि नारा-ए-तकबीर अल्लाहु-अकबर धार्मिक पाठ नहीं है. इस तरह देखें तो जो धार्मिक पाठ ही नहीं है, उसको लेकर हंगामा क्यों और अगर हंगामा ज़रूरी है तो इस पर संज्ञान लेने वाले छात्रों और यूनिवर्सिटी को किसने हक़ दिया कि वो धार्मिक मामले में कुछ बोलने की सोचें भी.

और मान लीजिए कि आपका सोचना ज़रूरी है तो पहले आपको साबित करना चाहिए कि यहां धर्म का मज़ाक़ उड़ाया गया है और अगर आप साबित नहीं कर पा रहें हैं तो फिर इसको इस्लामिक संस्थानों के स्वतः संज्ञान के लिए छोड़ दीजिए.

हो सकता है कि कुछ लोग ये भी कहें कि मैं इस मामले का आधा सच बयान कर रहा हूं कि यहां नारा-ए-तकबीर को ज्यों का त्यों लिखा गया और अल्लाहु-अकबर की पैरोडी की गई.

हालांकि ये पैरोडी के उसूल के हिसाब से भी पैरोडी नहीं है और अगर है तो आप ये क्यों नहीं मान लेते कि ‘अकबर’ एक लफ़्ज़ है जिस पर इस्लाम का या मुसलमानों का एकाधिकार नहीं है, फिर हास्य या उपहास के लिए ही सही जिसके जो चीज़ बड़ी लगती हो वो उसके लिए अकबर का इस्तेमाल करे नारा लगाए आप क्यों तिलमिला रहे हैं.

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तो इस मामले में यूनिवर्सिटी ने जिस तरह की प्रतिक्रिया दी है वो हैरान करने वाली है, सियासी तमाशा ये है कि स्टूडेंट यूनियन के नेता भी आहत हैं और सोशल मीडिया पर तो पता नहीं कितनों का इस्लाम ख़तरे में पड़ गया है. दरअसल इस्लाम इस तरह से ख़तरे में आ गया है कि सोशल मीडिया पर इन छात्रों को जान से मारने की धमकी तक दे दी गई है.

इन धार्मिक प्रतिक्रियाओं पर भी यूनिवर्सिटी-प्रशासन को संज्ञान लेना चाहिए या फिर ये बतलाना चाहिए कि नहीं, ये तो क्रिया की प्रतिक्रिया है. या फिर ये कि कोई इस्लाम के ख़िलाफ़ बोलेगा उसका मज़ाक़ बनाएगा तो इसके अनुयायी भला कैसे चुप रहेंगे.

हो सकता है कुछ लोगों को इस मामले में सोशल-मीडिया पोस्ट के Iftari with musical… वाले टेक्स्ट से भी मसला हो? अच्छी बात है कि हमें हर बात से दिक्क़त है, लेकिन क्यों, जबकि ये टेक्स्ट हास्य की शैली में लिखा गया है. ऐसे में आहत होने वाली आत्माओं से पूछना चाहिए कि आपकी उन किताबों में जो इस्लाम की व्याख्या के नाम पर लिखी गई हैं या बतौर मुसलमान लिखी गई हैं.

क्या आप उनके उस हिस्से की आलोचना करेंगे जिनमें औरतों की तालीम, उठने-बैठने और पहनने की हद बताते हुए दलित मुसलमानों को बुरे शब्दों में संबोधित किया गया है, या फिर इस मामले में आप वैचारिक तौर पर सर सैयद के साथ हैं, जी वही सर सैयद जो औरतों की तालीम के इतने बड़े पक्षधर थे कि अलीगढ़ के ही विख्यात इतिहासकार इरफ़ान हबीब को अपने एक साक्षात्कार में कहना पड़ा कि सर सैयद लड़कियों की तालीम के सिलसिले में ख़त-ओ-किताबत से ज़्यादा को पसंद नहीं करते थे, बाक़ी आप चाहें तो ख़ुद सैयद साहब का लिखा पढ़ सकते हैं.

तो क्या ये समझा जाए कि अलीगढ़ को एक लड़की की गुस्ताख़ी पसंद नहीं आई, इसलिए एक ऐसा नारा जो इस्लामिक भी नहीं है उस पर हाय-तौबा मची है. फिर तो बहुत-बहुत मुबारक हो कि इस बार भी आपका ‘धर्म’ जीत गया, लेकिन ये देखना भी कम दिलचस्प नहीं होगा कि यूनिवर्सिटी आगे क्या क़दम उठाती है. शैक्षणिक संस्थान की तरह व्यवहार करती है या फ़तवे वाली किताब खोल कर बैठ जाती है.

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