राजनीति

जिस संस्था की बुनियाद में नफ़रत हो वह भारत की बहुलता की समझ कैसे रख सकती है?

यदि धार्मिक आधार पर हम राष्ट्रीयता तय करेंगे तो देश में एक बहुत बड़ी खाई पैदा हो जाएगी, जिसकी वजह से भारत की प्रगति में बाधा आएगी.

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(फोटो: पीटीआई)

भारत की राजनीति को समझने के लिए दो पहलुओं पर विचार करना होगा. पहला ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक, दूसरा वर्तमान राजनीतिक परिप्रेक्ष्य.

भारत को सनातन धर्म के अलावा जैन, बौद्ध और सिख धर्म की जन्मधात्री धरती माना जाता है. देश में मुख्य रूप से सात तरह के धर्म, तीन संजाति- आर्य, द्रविड़ और मंगोल और 122 से ज्यादा भाषा बोलने वाले नागरिक रहते हैं.

भारत एक बहुलतावादी, मानवतावादी और अहिंसावादी देश के रूप में अपनी पहचान रखता है. एक कहावत के अनुसार भारत में प्रत्येक दस कोस पर वाणी और पानी की तासीर बदल जाती है. सभी धर्मों के मानने वाले ज्यादातर व्यक्ति एक दूसरे के धर्मों के रीति-रिवाज साथ-साथ मनाते हैं और अपनी सहिष्णुता का परिचय देते हैं.

लेकिन भारत में कुछ ऐसी शक्तियां भी हैं जो देश की बहुलतावादी छवि के विपरीत एकात्मकतावादी बातें करते हैं. वर्तमान एकात्मकतावाद सनातन परंपरा के ऋषि-मुनियों की वसुधैव कुटुंबकम की सोच के बिल्कुल विपरीत है.

भारतीय राजनीति के भी विभिन्न रंग है. संसदीय प्रणाली होने की वजह से अनेकों पार्टियां अपने कार्यक्रमों एवं योजनाओं पर कार्य करते हुए देश के संविधान में अपनी आस्था प्रकट करती हैं.

पार्टियां विभिन्न तरह के सामाजिक धार्मिक और अन्य कार्यक्रमों से अपनी बातें अपने समर्थकों के समक्ष रखती हैं. राजनीति समाज में एक बेहतर बदलाव के लिए हो तो निश्चित ही उसके परिणाम स्वरूप देश को सकारात्मक परिणाम मिलते हैं.

आज के परिप्रेक्ष्य में जिस तरह से भारतीय समाज में जातीय एवं सांप्रदायिक विद्वेष बढ़ रहा है उससे देश के हुक्मरानों को सावधान होने की जरूरत है. विभिन्न धार्मिक कार्यक्रमों में हमें एक-दूसरे की भावनाओं को समझना होगा जिससे एक मजबूत भारत का निर्माण होगा.

हाल ही में केंद्र सरकार ने लोकसभा के पटल पर सांप्रदायिक दंगों को लेकर जो आंकड़े प्रस्तुत किए हैं, उन्हें देखने पर भाजपा ही फंसती नजर आती है क्योंकि केंद्र एवं देश के ज्यादातर राज्यों में भाजपा की सरकार है.

कानून व्यवस्था को बनाए रखने का सबसे बड़ा दायित्व सरकारों का होता है. गृह राज्यमंत्री हंसराज अहीर ने लोकसभा के पटल पर बयान दिया कि साल 2016 में पूरे देश में 703 सांप्रदायिक दंगे हुए जिनमें 86 भारतीय मारे गए और 2,321 घायल हुए.

वहीं, 2017 में 822 सांप्रदायिक दंगे हुए जिनमें 111 भारतीय मारे गए और 2,384 घायल हो गए. इस तरह से देश में 2016 के मुकाबले 2017 में सांप्रदायिक दंगों में 17 फीसदी का इजाफा हुआ.

इसलिए देश के सभी सियासतदानों को सांप्रदायिकता बढ़ाने वाले बयानों से बचना होगा, जिससे देश में शांति रहे, शांति से ही विकास संभव है और विकास से ही व्यक्ति के जीवन में आमूलचूल परिवर्तन होता है.

रमजान के महीने में भी सभी राजनीतिक दलों ने अपने-अपने तरीके से रोजा इफ्तार की दावतों का आयोजन किया. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने भी रोजा इफ्तार की दावत की लेकिन संघ के बौद्धिक गुरु गोलवलकर अपनी पुस्तक ‘विचार नवनीत’ में मुसलमानों को आंतरिक खतरे के रूप में चिह्नित करते हैं.

जिस संस्था के बुनियाद में इस तरह के नफरत के बीज हों वह कैसे भारत के बहुलतावादी चरित्र की कोई समझ रख सकती है. विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों द्वारा सभी पार्टियां अपना वजूद 2019 के चुनाव के लिए परख लेना चाहती हैं.

देश में 1989 के पश्चात गठबंधन का दौर है और दोनों बड़े दल कांग्रेस और भाजपा अपने अपने-अपने गठबंधन साथियों को साधने में जुटे हुए हैं. वर्तमान केंद्र सरकार के चार साल बीतने के पश्चात उसके गठबंधन साथियों का या तो उससे मोहभंग हो रहा है या फिर वह सरकार पर दबाव बनाकर गठबंधन में अपने लिए ज्यादा ताकत प्राप्त करना चाहते हैं.

लोकसभा की सीटों के गणित में सभी दल अपने लिए ज्यादा सीटें प्राप्त करने हेतु दबाव की रणनीति पर काम कर रहे हैं. 2019 तक राजनीति परवान पर रहेगी. प्रत्येक दल के बड़े नेता के बयान, भाषण और कार्यशैली 2019 को ध्यान में रखकर ही बनाई जाएगी.

केंद्र सरकार जहां एक तरफ बेरोजगारी, ग्रामीण संकट, किसानों की बेचैनी, आर्थिक संकट, भ्रष्टाचार, विदेश नीति का पराभव, पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतें, दलितों और महिलाओं पर होने वाली आपराधिक बढ़ोतरी से जूझ रही है तो दूसरी तरफ गठबंधन के सभी साथियों की मांगों को लेकर भी दबाव में है.

दूसरी तरफ कांग्रेस पार्टी ने भी गठबंधन की राजनीति को अंगीकार कर लिया है. कर्नाटक में क्षेत्रीय दल के नेता को मुख्यमंत्री बनाकर कांग्रेस ने यह साबित कर दिया है कि गठबंधन की राजनीति के लिए और भाजपा की विनाशकारी नीतियों को रोकने को वह अपना बड़ा दिल रखती है.

कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व राहुल गांधी ने भी चुनाव प्रचार हेतु अपने सभी अस्त्र-शस्त्रों को इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है. एक तरफ पूरे देश में जहां राहुल किसान को साथ लेकर चलते हैं, वहीं दूसरी तरफ देश के नौजवानों के रोजगार के मुद्दे को पूर्ण प्राथमिकता दे रहे हैं.

भारत आज विश्व में सबसे जवान देश है भारत की कुल आबादी का 50 प्रतिशत 25 वर्ष की आयु से कम की है और भारत की 65 प्रतिशत आबादी 35 वर्ष की कम आयु की है. 2020 तक भारत की औसत आयु 29 वर्ष होगी जो कि चीन के 37 वर्ष और जापान के 48 वर्ष की औसत आयु से काफी कम है.

2019 के चुनाव प्रचार में यह देखना बड़ा दिलचस्प होगा कि कांग्रेस अपने धर्मनिरपेक्षता, विकास और प्रगतिशील समाजवाद के मुद्दे को कैसे देश की युवा जनसंख्या को आत्मसात करा पाती है वहीं दूसरी तरफ भाजपा किस तरह से सांप्रदायिकता की चौसर पर अपने पासे फेंकती है.

पिछले चार सालों में भाजपा ने तीन तलाक, घर वापसी, लव जिहाद, गोवध जैसे मुद्दों को ही विभिन्न राज्यों के चुनाव प्रचार में आगे रखा और विकास के मुद्दे को गौण कर दिया. देश के बहुसंख्यको एवं अल्पसंख्यकों को कबीर के इस दोहे से सीख लेनी होगी,

हिंदू कहत, राम हमारा, मुसलमान रहमाना
आपस में दौऊ लड़ै मरत हैं, मरम कोई नहिं जाना

प्रत्येक भारतवासी को इस दोहे से यदि सीख ली तो आगामी चुनाव जनता के लिए, जनता के द्वारा और जनता को साथ लेकर जनता के हित के लिए लड़ा जाएगा और कोई भी दल विकास के मुद्दे को गौण नहीं कर पाएगा.

विकासवादी राजनीति होने से ही भारत और भारतीयता जिंदा रहेगी और जिसकी वजह से भारत वर्ष पूरे विश्व में अपने लोकतंत्र की धाक जमाए रखने में ज्यादा कामयाब रहेगा. इसलिए भारतीयों को दीपावली मिलन, होली मिलन, ईद मिलन, गुरु नानक जन्मोत्सव, महावीर जयंती, बुद्ध पूर्णिमा, बड़ा दिन आदि त्योहार मिल-जुलकर मनाने होंगे.

देश के सामाजिक एवं धार्मिक ताने-बाने को अक्षुण्ण रखने की जिम्मेदारी हम सभी भारतीयों की है, लेकिन देश की एकता एवं अखंडता को कायम रखने की सबसे ज्यादा जिम्मेदारी सनातन धर्मियों की है क्योंकि वह बहुसंख्यक हैं.

अल्पसंख्यक एवं बहुसंख्यकों को एक-दूसरे पर विश्वास रखकर चलना ही होगा नहीं तो अंतरराष्ट्रीय ताकतें देश को अस्थिर करने के लिए बेताब है. यदि धार्मिक आधार पर हम राष्ट्रीयता तय करेंगे तो देश में एक बहुत बड़ी खाई पैदा हो जाएगी जिसकी वजह से भारत की प्रगति में बाधा पड़ेगी.

(लेखक कांग्रेस प्रवक्ता हैं)

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