भारत

बेहद समृद्ध रहा है भारतीय संगीत में मुस्लिमों का इतिहास

रूढ़िवादी ताक़तों के उभार के कारण बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक समुदायों की मेल-जोल वाली संगीत जैसी सांस्कृतिक परंपराएं ख़तरे में आ गई हैं.

Bade Gulaam Ali

उस्ताद बड़े गुलाम अली खान साहब. (फोटो साभार: raagist.blogspot.com)

यह अजीब समय है. विभिन्न समुदायों से संबंध रखने वाली कट्टरपंथी और रूढ़िवादी ताक़तों का इस देश में खुला खेल चल रहा है. ये ताक़तें पुरानी दरारों को गहरा कर रही हैं और नई दरारें पैदा कर रही हैं. हिंदू और मुस्लिम धार्मिक नेता और संगठन युवाओं, ख़ासकर लड़कियों के सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन को बंदिशों में बांधने की लगातार कोशिश कर रहे हैं और इसके लिए वे अक्सर मॉरल पुलिसिंग पर उतर आते हैं.

मीडिया ऐसी गतिविधियों की रिपोर्टिंग करता है. वह मुस्लिमों से संबंधित मामलों को ज़्यादा तवज्जो देता है और राई का पहाड़ बनाने में काफ़ी उत्साह का प्रदर्शन करता है. और यहां तक कि मंत्रीगण भी चयनात्मक तरीक़े से इस तरह की घटनाओं पर टिप्पणियां करते हैं. ऐसा एक मामला हाल में देखा गया जब 46 मुस्लिम धार्मिक नेताओं, मदरसा शिक्षकों और सामुदायिक नेताओं ने 25 मार्च को असम के होजोजी में होने वाले संगीत के एक समारोह का बहिष्कार करने की अपील की. उनका मानना है कि जादू, संगीत, नाटक और इस तरह की कलाएं शरिया के ख़िलाफ़ हैं.

इस अपील में चेताया गया कि अगर ‘संगीत-संध्या जैसे शरिया-विरोधी आयोजन मस्जिदों, ईदगाहों, मदरसों और क़ब्रिस्तानों से घिरे मैदानों में किए जाते हैं तो आने वाली पीढ़ियों पर अल्लाह का क़हर बरपेगा.’ इसमें मुस्लिमों को हिदायत दी गई कि वे न सिर्फ़ इस आयोजन का बहिष्कार करें, बल्कि दूसरों को भी ऐसा करने के लिए मनाएं.

मीडिया ने चूक करते हुए इसे फ़तवा की संज्ञा दे दी और अनजाने में ही रूढ़िवाद के समर्थकों को मौक़ा दे दिया कि वे ‘फ़तवा’ और ‘अपील’ के बीच के तकनीकी अंतर पर ही टिके रहें. मीडिया अक्सर इस तथ्य को नज़रअंदाज़ कर देता है कि एक फ़तवा तभी दिया जाता है, जब एक कोई ख़ास सवाल मुफ़्ती के सामने लाया जाता है और मुफ़्ती उस सवाल पर समुचित तरीक़े से विचार करने के बाद इस्लामिक क़ानून की अपनी समझ और ज्ञान के हिसाब से उस सवाल का जवाब देता है. कोई भी मुल्ला या मौलवी फ़तवा जारी नहीं कर सकता.

एक टैलेंट प्रतियोगिता जीत कर लोकप्रिय हुईं नाहिद परवीन, इस इवेंट में प्रस्तुति देने वाली थीं. यह मान लिया गया कि यह ‘फतवा’ नाहिद परवीन के ख़िलाफ़ दिया गया है, क्योंकि वे इस आयोजन के प्रतिभागियों में शामिल थीं. एक सप्ताह पहले, कर्नाटक की 22-वर्षीय मुस्लिम लड़की सुहाना सईद को एक कन्नड़ टीवी चैनल पर भगवान बालाजी की प्रशंसा में भजन गाने के लिए सोशल मीडिया पर बुरी तरह से ट्रोल किया गया. उसके विरोधियों ने कहा कि भजन गाना ग़ैर-इस्लामिक है.

जो लोग ‘अपील’ और ‘फ़तवा’ के बीच का अंतर बताने में मशगूल थे, उन्हें यह नहीं भूलना चाहिए कि ऐसे मुद्दों पर पहले भी फ़तवे जारी किये जा चुके हैं. चार साल पहले संगीत के ख़िलाफ़ फ़तवा और किसी ने नहीं, कश्मीर के शीर्ष मुफ़्ती-मुफ़्ती बशीरुद्दीन ने तीन कश्मीरी लड़कियों के ख़िलाफ़ दिसंबर, 2012 में एक रॉक बैंड में परफॉर्म करने के लिए जारी किया था. अपने फ़तवे को न्यायोचित ठहराते हुए उन्होंने कहा था कि इस्लाम में संगीत पर पाबंदी है और लड़कियों को अच्छे मूल्यों को आत्मसात करना चाहिए. यह इस बात का प्रमाण है कि अपीलों और फ़तवों के माध्यम से लड़कियों को सार्वजनिक रूप से परफॉर्म करने से रोकने के लिए दबाव बनाया जा रहा है. और संगीत को ही ग़ैर-इस्लामी शय घोषित करने के लिए एक अभियान चलाया जा रहा है.

संगीत की एक समृद्ध विरासत

क्या संगीत वास्तव में ग़ैर-इस्लामी है? अगस्त, 1915 में गौहर जान, जो कि अपने समय की सबसे बड़ी दरबारी गायिका थीं, ने एक होरी की रिकॉर्डिंग की, जिसमें पैगंबर मोहम्मद के मदीना में होली का त्योहार मनाने की बात कही गयी थी! गीत इस तरह था: ‘मेरे हज़रत ने मदीना में मनायी होली.’

क्या एक कट्टर मुस्लिम-गौहर जान- ऐसा गीत गाकर ईशनिंदा कर रही थीं? उन्होंने या उनके समकालीनों ने ऐसा नहीं सोचा, क्योंकि वे बस भारत की समन्वयवादी, सामासिक परंपरा को आगे बढ़ा रहे थे और रूढ़िवादी मूल्य उनके लिए दूसरी धरती का विचार था. बड़े ग़ुलाम अली ख़ान के गाये भजन ‘हरि ओम तत्सत महामंत्र है, जपा कर, जपा कर’ को कौन भूल सकता है?

1952 की फ़िल्म बैजू बावरा का कभी न भुलाया जा सकने वाला भजन ‘मन तड़पत हरिदर्शन को आज’ हमारे संगीत की धर्मनिरपेक्ष प्रकृति का एक चमकता हुआ उदाहरण है. इसे लिखा था, शकील बदायुनी ने, संगीत दिया था नौशाद ने और आवाज़ दी थी मोहम्मद रफ़ी ने. ये तीनों मुस्लिम थे. ऑस्कर पुरस्कार प्राप्त भारतीय संगीतकार एआर रहमान भी एक मुस्लिम हैं.

इस तरह की संकीर्ण धार्मिक सोच भारत में कभी नहीं चली है और प्रसिद्ध हिंदू कव्वाल शंकर-शंभु द्वारा गाई गई यह कव्वाली इस बात का प्रमाण है कि भारतीय संगीत में कभी भी हिंदू-मुस्लिम बंटवारा नहीं रहा है.

भारतीय विशेषतः हिंदुस्तानी या उत्तर भारतीय संगीत में मुस्लिमों का असाधारण योगदान एक ऐसी सर्वविदित सच्चाई है कि इसे दोहराना ज़रूरी नहीं है. संगीत का नज़दीकी संबंध सूफ़ी ख़ानक़ाहों से रहा है. कहा जाता है कि राग पूर्वी सूफ़ी संत निज़ामुद्दीन औलिया को इतना पसंद था कि इसका गायन लगभग हर दिन उनके यहां होता था. ध्रुपद शैली के सबसे बड़े विशारद डागर खानदान वाले हैं, जो मुस्लिम हैं. ख्याल गायकी के जितने भी घराने हैं, सबका उद्भव मुस्लिम संगीतज्ञ परिवारों से हुआ है. फ़ैयाज़ ख़ान, अब्दुल करीम ख़ान, अल्लादिया ख़ान, अलाउद्दीन ख़ान, विलायत ख़ान, बिस्लिमल्ला ख़ान, अमजद अली ख़ान- 20वीं सदी के शीर्ष मुस्लिम संगीतज्ञों की अगर सूची बनाई जाए, तो वह कभी ख़त्म नहीं होगी.

इतिहास में मुस्लिम और संगीत

अतीत में सभी मुस्लिम शासकों ने संगीत को संरक्षण और बढ़ावा दिया. जौनपुर के शासक सुल्तान हुसैन शाह शरकी को भोर के राग जौनपुरी की रचना का श्रेय दिया जाता है. दरबारी, मियां की तोड़ी और मियां की मल्हार जैसे अमर रागों का निर्माण तानसेन ने किया, जो कि मुगल शहंशाह अकबर के नवरत्नों में से एक थे. मुगल वंश के छठे शहंशाह औरंगज़ेब की गिनती एक पवित्र और रूढ़िवादी मुसलमान के तौर पर की जाती है और यह माना जाता है कि उसने संगीत को अपने साम्राज्य से बाहर निकाल दिया, क्योंकि इस्लाम में संगीत पर पाबंदी थी. लेकिन, जैसा कि कैथरीन बटलर शोफील्ड ने पक्के तौर पर दिखाया है कि ऐसा बिल्कुल भी नहीं था.

गंभीर शोध के साथ लिखे गये अपने पर्चे, ‘क्या औरंगज़ेब ने संगीत पर पाबंदी लगाई’ (डिड औरंगज़ेब बैन म्यूजिक), जिसका प्रकाशन 2007 में मॉडर्न एशियन स्टडीज़ में हुआ था, शोफील्ड यह स्थापना देती हैं कि औरंगज़ेब ख़ुद एक कुशल संगीतज्ञ था जो संगीत की बारीक़ियों की समझ रखता था और उसकी प्रशंसा कर सकता था. औरंगज़ेब ने अपने जीवन के आख़िरी दशकों में संगीत के वाद्य-यंत्रों को बजाने पर पाबंदी इसलिए लगा दी थी, क्योंकि वह धार्मिक आचरण के तहत सुख का त्याग करना चाहता था.

शोफील्ड तत्कालीन साक्ष्यों के आधार पर लिखती हैं कि औरंगज़ेब ख़ुद यह मानता था कि इस्लाम में संगीत की इजाज़त है. इसलिए उसने सार्वजनिक स्थलों पर गायन या वादन पर पाबंदियां नहीं लगाई थीं. उसके सम्मान में रचित कई ध्रुपद आज भी मिलते हैं. इससे भी बढ़कर उसकी ताजपोशी के मौक़े पर उसके या उसके दरबारी कवियों द्वारा लिखी गई कविताओं में हिंदू देवी-देवताओं की वंदना मिलती है, जो यह बताने के लिए काफ़ी है कि औरंगज़ेब के दरबार में भी गंगा-जमुनी तहज़ीब की प्रवृत्तियों का त्याग नहीं किया था, जो उसके समय तक आते-आते काफ़ी मज़बूत हो चुकी थी.

भले ही ख्याल गायकी की जड़ों की तलाश अमीर ख़ुसरों और सूफ़ी ख़ानक़ाहों द्वारा गाये गानों में की जाती है, लेकिन हक़ीक़त यह है कि इसका विकास मुगल शहंशाह मोहम्मद शाह रंगीला के दरबार में ही हुआ. उनके दरबार के नइमत ख़ान ‘सदारंग’ की इसके विकास में विशेष भूमिका थी. सदारंग ने कई ख्यालों की रचना की, जिसने ध्रुपद के पराभव की नींव रखी. इसके बाद हिंदुस्तानी संगीत के अभिजात्य तबके में ख्याल का वर्चस्व क़ायम हो गया.

अपनी क़िताब ‘पोएट्री ऑफ किंग्स’ में एलिसन बुश ने ब्रजभाषा साहित्य के विकास में मुग़ल दरबार के महान योगदान को रेखांकित किया है. इस संदर्भ में ख़ासतौर पर अब्दुर्रहीम ख़ान-ए-ख़ाना का ज़िक्र किया जाना चाहिए, जिनकी ब्रजभाषा कविताएं हिंदू मिथकों के ज़िक्र और कृष्ण की प्रशंसा से भरी हुई हैं. रसखान एक दूसरे महत्वपूर्ण कवि हैं, जिन्होंने ब्रजभूमि के साथ-साथ कृष्ण और राधा की प्रशंसा में कविताएं लिखीं. बाद में नज़ीर अकबराबादी ने सफलता के साथ हिंदू त्योहारों पर शानदार कविताएं लिखीं.

निकट अतीत में, मौलाना हसरत मोहानी मथुरा और कृष्ण के घनघोर प्रशंसकों के तौर पर सामने आते हैं. यहां तक कि इक़बाल ने भी राम पर क़सीदा लिखा है.

फिर भी, सभी धार्मिक समुदायों में सक्रिय प्रतिग्रामी ताक़तें जी-जान लगाकर सांस्कृतिक मेल-जोल और एक सामासिक भारतीय संस्कृति के निर्माण की सतत जारी प्रक्रिया को असफल करने में जुटी हैं. बहुसंख्यक हिंदुओं के साथ ही मुस्लिमों जैसे अल्पसंख्यक समुदायों में पुनरुत्थानवादी प्रवृत्तियां सिर उठा रही हैं. ऐतिहासिक संशोधनवाद, चाहे यह बहुसंख्यक समुदाय की तरफ से आये या अल्पसंख्यक समुदाय से, आधुनिक भारत के सामाजिक ताने-बाते को कमज़ोर करेगा और सांप्रदायिक तनाव को बढ़ावा देगा.

(कुलदीप कुमार वरिष्ठ पत्रकार हैं, जो राजनीति और संस्कृति पर लिखते हैं.)

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