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पटना विश्वविद्यालय: बीएड परीक्षा होने के बाद सामूहिक नकल बताकर 97 छात्रों को फेल किया

पटना विश्वविद्यालय के पटना ट्रेनिंग कॉलेज का मामला. रिज़ल्ट में 97 छात्र-छात्राओं को दिए गए शून्य अंक.

बीएड छात्र-छात्राओं ने पटना विश्वविद्यालय के सामने धरना दिया और भूख हड़ताल पर भी बैठे, लेकिन कोई भी उनकी सुध लेने के लिए नहीं आया. (फोटो: उमेश कुमार राय/द वायर)

बीएड छात्र-छात्राओं ने पटना विश्वविद्यालय के सामने धरना दिया और भूख हड़ताल पर भी बैठे, लेकिन कोई भी उनकी सुध लेने के लिए नहीं आया. (फोटो: उमेश कुमार राय/द वायर)

पटना विश्वविद्यालय के अधीन 100 साल से भी पुराना बीएड कॉलेज, पटना ट्रेनिंग कॉलेज में पढ़ने वाले 97 छात्र-छात्राओं ने पहले वर्ष की परीक्षा मई में दी थी तो उन्हें उम्मीद थी कि वे पास हो जाएंगे. लेकिन आठ जून को पटना ट्रेनिंग कॉलेज की तरफ से भेजे गए पत्र ने उनकी नींद उड़ा दी है.

इस पत्र में बिना कोई वजह बताए लिखा गया है कि 19 मई को हुई 7(ए) पेपर की परीक्षा में सभी 97 विद्यार्थियों को शून्य अंक दिया जाता है.

कॉलेज के आचार्य ललित कुमार के दस्तख़त वाले उक्त पत्र में लिखा गया है, ‘बीएड प्रथम वर्ष परीक्षा 2018 के 7(ए) पेपर के संदर्भ में परीक्षा नियंत्रक, पटना विश्वविद्यालय के पत्रांक 1448 दिनांक 8.06.2018 के हवाले से सूचित किया जाता है कि रोल नंबर 301 से 397 तक की उक्त परीक्षा एग्जामिनेशन बोर्ड के द्वारा रद्द कर दी गई है और बोर्ड ने यह भी निर्णय लिया है कि इस पत्र में संबंधित विद्यार्थियों को शून्य अंक दिया जाए.’

इस पत्र में शून्य अंक दिए जाने और इसका निर्णय एग्जामिनेशन बोर्ड की तरफ से लिए जाने का ज़िक्र है, लेकिन कहीं भी यह नहीं कहा गया है कि आखिर शून्य अंक क्यों दिया गया.

अलबत्ता, यूनिवर्सिटी की तरफ़ से अपने अधीन आने वाले तीन बीएड कॉलेजों को जो पत्र भेजा गया था, उसमें एग्जामिनेशन बोर्ड की बैठक का ज़िक्र करते हुए नकल की बात कही गई है.

पत्र में लिखा गया है कि एग्जामिनेशन रिपोर्ट (जिसमें एग्जामिनेशन कंट्रोलर, सेंट्रल सुपरिटेंडेंट, मजिस्ट्रेट व चार वीक्षक के हस्ताक्षर थे) में बताया गया है कि रूम नंबर 17 (जिसमें 97 छात्र परीक्षा दे रहे थे) में परीक्षा नियमों का उल्लंघन किया गया और भारी पैमाने पर नकल की गई. साथ ही छात्रों द्वारा वीक्षकों यानी कमरे में परीक्षा के दौरान ड्यूटी पर रहे वालों को धमकाने की बात भी कही गई है.

छात्र-छात्राओं के अनुसार, उन्होंने जब पटना विश्वविद्यालय प्रबंधन से बात की, तब उन्हें पता चला कि सामूहिक नकल के कारण उन्हें उक्त विषय में शून्य नंबर दिया गया है.

एग्जामिनेशन रिपोर्ट संबंध में छात्रों का कहना है कि छात्रों ने सामूहिक नकल नहीं की थी. उन्होंने इसके लिए परीक्षा के दौरान जांच करने आए मजिस्ट्रेट व वीक्षक को सीधे तौर पर ज़िम्मेदार मानते हुए न्याय की मांग की है.

छात्रों का कहना है कि परीक्षा हॉल में गहमागहमी थी और छात्रों व वीक्षकों के बीच नोकझोंक हुई थी, क्योंकि पेपर बांटने में गड़बड़ी हो रही थी और वक्त भी जाया हो रहा था.

पटना ट्रेनिंग कॉलेज के बीएड के छात्र कृष्ण मुरारी कहते हैं, ‘मैं दावे के साथ कह रहा हूं कि परीक्षा में नकल नहीं हुई थी. हम मांग करते हैं कि परीक्षा के दौरान की गई वीडियोग्राफी को सार्वजनिक किया जाए. इससे दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा.’

कृष्ण मुरारी ने बताया, ‘हमनें परीक्षा दी थी तो इस उम्मीद में थे कि पास कर जाएंगे, लेकिन हमें खत भेजकर कहा गया कि शून्य अंक दिया जा रहा है. हमने जब यूनिवर्सिटी प्रबंधन से जिरह की तब कारण बताया गया.’

उन्होंने सवाल उठाया कि अगर सामूहिक नकल हो रही थी तो उसी वक्त दोषी छात्रों को बाहर निकाल दिया जाना चाहिए था. परीक्षा ख़त्म हो जाने के बाद ऐसा करना उनकी समझ से परे है और इससे एक ही बात समझ में आ रही है कि मजिस्ट्रेट ने मनमानी कर छात्रों के भविष्य के साथ खिलवाड़ किया है.

पटना विश्वविद्यालय की तरफ से तीनों कॉलेजों को भेजे गए पत्र में कमरा नंबर 17 में परीक्षा देने वाले दो छात्रों का ज़िक्र करते हुए यह बताया गया है कि प्रॉक्टर ने नकल करते हुए उन्हें पकड़ा था और उनकी कॉपियां छीन ली गई थीं, लेकिन परीक्षा हाल में मौजूद छात्रों ने हंगामा कर वीक्षक से कॉपियां व चिट वापस ले लीं.

छात्रों ने इस आरोप को भी ख़ारिज करते हुए कहा कि छात्रों के मत्थे मनगढ़ंत आरोप मढ़े जा रहे हैं.

बीएड प्रथम वर्ष की परीक्षा देने वाले पटना के अनीसाबाद के छात्र विवेक कुमार ने कहा, ‘यह सही है कि दो छात्रों की कॉपियां छीनी गई थीं, लेकिन बाद में वीक्षक ने ख़ुद दोनों कॉपियां छात्रों को दे दीं. जहां तक चिट मिलने का सवाल है तो नियम यह है कि चिट अगर मिलता है तो आरोपित छात्र की कॉपी के साथ उस चिट को अटैच कर छात्र को निष्कासित कर दिया जाए. लेकिन, इस केस में ऐसा कुछ नहीं हुआ है. इससे साफ है कि आरोप झूठे हैं.’

परीक्षा में हिस्सा लेने वाले छात्रों का यह भी कहना है कि नियम को ताक पर रख कर उक्त कमरे में क्षमता से अधिक छात्रों को बैठाया गया था.

विवेक कुमार कहते हैं, ‘एक ही परीक्षा हॉल में 97 छात्रों की परीक्षा हुई थी. एक-एक बेंच पर चार-चार छात्रों को बैठाया गया था, जबकि नियमतः अधिकतम दो छात्रों को बैठाया जाना चाहिए.’

उन्होंने आगे कहा, ‘अधिक छात्र होने से गहमागहमी का माहौल था. परीक्षा के लिए जब पेपर बंटने शुरू हुए तभी जांच के लिए मजिस्ट्रेट कमरे में दाख़िल हुए. वह एक बेंच पर चार-चार छात्रों को बैठा देख वीक्षक पर भड़क गए, जिससे दोनों में बहस हो गई. इससे हमें पेपर मिलने में देर हो गई, तो हमने जल्दी पेपर बांटने को कहा. इसको लेकर वीक्षक के साथ छात्रों की भी बकझक हो गई.’

विवेक कुमार भी सामूहिक नकल के आरोप को सिरे से ख़ारिज करते हुए कहते हैं, ‘मैं साफ तौर पर यह कहता हूं कि सामूहिक नकल नहीं हुई थी. यह संभव भी नहीं है कि क्योंकि 7(ए) पेपर में 10-15 किस्म के विषय होते हैं. अलग-अलग छात्रों के मुख़्तलिफ़ विषय होते हैं, ऐसे में सामूहिक नकल कैसे हो सकती है.’

छात्रों का कहना है कि मजिस्ट्रेट तीन घंटे तक कमरे में घूमते रहे और इस दौरान कई छात्रों को खड़ा करवाकर उनकी जांच की गई लेकिन किसी के पास से चिट नहीं निकली.

बीएड के 97 छात्रों को पटना ट्रेनिंग कॉलेज की तरफ से पत्र भेजकर बताया गया है कि उनकी 19 मई की परीक्षा रद्द कर उन्हें उक्त विषय में शून्य अंक दिया जाता है.

बीएड के 97 छात्रों को पटना ट्रेनिंग कॉलेज की तरफ से पत्र भेजकर बताया गया है कि उनकी 19 मई की परीक्षा रद्द कर उन्हें उक्त विषय में शून्य अंक दिया जाता है.

गौरतलब हो कि बीएड की परीक्षा दो वर्ष में ही पूरी कर लेनी होती है. इसमें अगर पहले वर्ष की परीक्षा में किसी विषय में कोई छात्र फेल हो जाता है तो दूसरे वर्ष में उसे पास करने के लिए सिर्फ एक मौका दिया जाता है.

फेल होने वाले छात्र दूसरे वर्ष में जब नए बैच के छात्रों के पहले वर्ष की परीक्षा होती है, तब फेल हुए विषय की परीक्षा दे सकते हैं और फिर उसी साल दूसरे वर्ष की परीक्षा देकर दो वर्ष में ही डिग्री पा लेते हैं.

यानी कि किसी विषय में फेल होने पर उन्हें एक ही मौका मिलता है. वह मौका भी अगर चूक गए तो उन्हें नए सिरे से नामांकन करवाना होता है, जिसमें और दो साल बर्बाद हो जाते हैं.

ऐसे में छात्र पूरी कोशिश करते हैं कि पहले वर्ष की परीक्षा में किसी भी हालत में फेल न हों.

पटना विश्वविद्यालय में बीएड की महज़ 200 सीटें हैं. वर्ष 2017-2019 के लिए करीब 1400 छात्रों ने आवेदन भरा था. एंट्रेंस टेस्ट में अच्छा अंक लाने वाले 200 छात्रों को दाख़िला मिला था.

काफी सालों के बाद स्टेट टीचर्स एलिजिबिलिटी टेस्ट और सेंट्रल टीचर्स एलिजिबिलिटी टेस्ट होनी थी. स्टेट टीचर्स एलिजिबिलिटी टेस्ट में पास करने वाले छात्रों को राज्य के सरकारी स्कूलों में और सेंट्रल टीचर्स एलिजिबिलिटी टेस्ट पास करने वाले छात्रों को केंद्रीय विद्यालय, नवोदय विद्यालय आदि में नौकरी मिल जाती है.

बीएड छात्रों का टारगेट यही दो परीक्षाएं थीं, लेकिन एग्जामिनेशन बोर्ड के फैसले ने इन छात्रों के करिअर को अनिश्चिचतता की ओर धकेल दिया है.

अव्वल तो वे दोनों परीक्षा नहीं दे पाएंगे और दूसरी तरफ उनका समय भी बर्बाद हो जाएगा.

कृष्ण मुरारी कहते हैं, ‘हम लोग लंबे समय से सेंट्रल व स्टेट टेट का इंतज़ार कर रहे थे, लेकिन अब तो दोनों ही परीक्षा हम नहीं दे सकेंगे.’

उसी परीक्षा हॉल में 2016-2018 बैच के भी एक बीएड छात्र उपेंद्र कुमार भी परीक्षा दे रहे थे. वह एक विषय में फेल हो गए थे, जिस कारण दूसरी बार परीक्षा दे रहे थे. इस परीक्षा में पास हो जाते, तो कुछ दिन बाद ही दूसरे वर्ष की परीक्षा देकर डिग्री हासिल कर लेते. लेकिन, अब बीएड करने के लिए उन्हें दोबारा एंट्रेंस टेस्ट देकर दाख़िला लेना होगा.

उपेंद्र कुमार अपने विषय के इकलौते छात्र थे अतः उनके केस में सामूहिक नकल का आरोप संदेहास्पद लगता है.

उपेंद्र कहते हैं, ‘मैं नवादा का रहने वाला हूं. दो साल से यहां रहकर बीएड की पढ़ाई कर रहा था. दाखिले से लेकर रहने-खाने और पढ़ाई के पीछे करीब दो लाख रुपये ख़र्च हो गए हैं. मैं किसान परिवार से आता हूं. हमारे आर्थिक हालात ऐसे नहीं हैं कि दोबारा दो लाख रुपये ख़र्च करके बीएड करूं.’

विवेक कुमार बीएड करने के बाद निजी स्कूलों में टीचर की नौकरी के लिए अप्लाई करने का सपना संजोए हुए थे, लेकिन रिज़ल्ट से वह टूट चुके हैं. वह कहते हैं, ‘मेरी समझ में नहीं आ रहा है कि क्या करूं.’

छात्र अपनी बात विश्वविद्यालय प्रबंधन तक पहुंचाने की सारी तरकीबें अपना चुके हैं, लेकिन कहीं से कोई सकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं मिली. उन्होंने पटना विश्वविद्यालय के सामने धरना भी दिया. भूख हड़ताल भी की और राज्यपाल व मानवाधिकार आयोग को पत्र भी भेजा.

छात्रों को पटना विश्वविद्यालय की तरफ से जवाब के नाम पर सिर्फ इतना ही कहा गया है कि उनके हाथ में कुछ नहीं है.

छात्रों के मुताबिक, पटना विश्वविद्यालय के वाइस चांसलर ने कहा कि पूरे मामले में एग्जामिनेशन बोर्ड का फैसला ही अंतिम फैसला होता है अतः वे कुछ नहीं कर सकते हैं.

विश्वविद्यालय प्रशासन, राज्यपाल और मानवाधिकार आयोग की तरफ से कोई सकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं मिलने से मायूस छात्र अब कोर्ट की शरण में जाने का मन बना रहे हैं. छात्रों ने कहा कि जल्द ही वे पटना हाइकोर्ट में केस दायर करेंगे.

कोर्ट का फैसला क्या होता है, यह तो आने वाले समय में पता चल ही जाएगा, लेकिन इस मामले में शिक्षाविदों का कहना है कि प्रथम दृष्ट्या वीक्षक और मजिस्ट्रेट की तरफ से चूक लग रही है, छात्र उतने दोषी नहीं हैं.

एक रिटायर प्रोफेसर ने कहा, ‘परीक्षा में एक बेंच पर चार छात्रों को बैठाया ही नहीं जाना चाहिए. यह पूरी तरह से नियम के ख़िलाफ़ है. पूरी गलती वीक्षकों की है. एक बेंच पर चार छात्र बैठेंगे तो ज़ाहिर है कि उनकी नज़र एक दूसरे की कॉपी पर जाएगी. ऐसे में अगर वे नकल नहीं भी करेंगे तो लगेगा कि नकल कर रहे हैं.’

मगध यूनिवर्सिटी पूर्व वाइस चांसलर मो. इश्तियाक ने कहा, ‘कमरे की जितनी क्षमता थी, उतने ही छात्रों की परीक्षा ली जानी चाहिए थी. पैसे के चक्कर में परीक्षा का मज़ाक बना दिया गया है.’

उनके मुताबिक, छात्रों की शिकायतों के मद्देनज़र अब दोबारा परीक्षा ली जानी चाहिए.

उन्होंने कहा, ‘अगर सभी छात्रों को औसत अंक देकर पास कर दिया जाता है तो वह मेरिट के साथ खिलवाड़ होगा, ऐसे में बीच का रास्ता यही है कि दोबारा परीक्षा ली जाए. विकल्प भी यही है.’

पूरे मामले को लेकर पटना विश्वविद्यालय प्रबंधन का पक्ष जानने के लिए वाइस चांसलर प्रो. रासबिहारी प्रसाद सिंह और एग्जामिनेशन कंट्रोलर डॉ. आरके मंडल से संपर्क किया गया, लेकिन उन्होंने फोन नहीं उठाया.

वहीं, डिप्टी रजिस्ट्रार डॉ. नजमुज्जमां से जब इस संबंध में बात की गई तो उन्होंने कहा कि एग्जामिनेशन कंट्रोलर ही इस पर कोई टिप्पणी कर सकते हैं.

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं और पटना में रहते हैं.)

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