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संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार विशेषज्ञों ने प्रो. जीएन साईबाबा को रिहा करने की अपील की

दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रो. जीएन साईबाबा माओवादियों से संबंध के आरोप में मई 2014 में गिरफ़्तार किया गया था. उन्हें उम्रक़ैद की सज़ा मिली हुई है.

GN Saibaba

दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रो. जीएन साईबाबा. (फोटो: पीटीआई)

संयुक्त राष्ट्र से जुड़े कुछ मानवाधिकार विशेषज्ञों ने भारत सरकार से दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रो. जीएन साईबाबा को रिहा करने का आग्रह किया है. जेल में बंद साईबाबा विभिन्न बीमारियों से ग्रस्त हैं.

माओवादियों से संबंध होने के आरोप में महाराष्ट्र पुलिस ने मई 2014 में उन्हें गिरफ़्तार किया गया था. मार्च 2017 में उन्हें उम्रक़ैद की सज़ा सुनाई गई. इसके बाद से वह नागपुर केंद्रीय जेल में बंद हैं.

समाचार वेबसाइट स्क्रॉल डॉट इन की रिपोर्ट के मुताबिक, स्विटज़रलैंड के जेनेवा शहर से जारी एक संयुक्त बयान में मानवाधिकार विशेषज्ञों ने कहा है, ‘हम लोग साईबाबा के 15 से ज़्यादा शारीरिक समस्याओं से जूझने की रिपोर्ट से चिंतिंत हैं, इनमें से कुछ गंभीर बीमारियां हैं.’

मानवाधिकार पर संयुक्त राष्ट्र उच्चायुक्त ज़ेड राद अल हुसैन ने बताया कि इन विशेषज्ञों में कैटालिना देवनदास, मिशेल फ्रॉस्ट, डेनियस पुरस और नील्स मेलज़र शामिल हैं.

विशेषज्ञों ने कहा है, ‘जेल की ख़राब स्थितियों और अप्रशिक्षित स्टाफ की वजह से साईबाबा का स्वास्थ्य लगातार गिर रहा है. जेल स्टाफ अक्षमताओं से ग्रस्त क़ैदियों की पर्याप्त देखरेख करने में असफल है.’

विशेषज्ञों ने कहा है कि साईबाबा को तत्काल इलाज की ज़रूरत है.

ग़ौरतलब है कि दिल्ली विश्वविद्यालय के रामलाल आनंद कॉलेज के प्रो. जीएन साईबाबा पोलियोग्रस्त होने की वजह से शारीरिक रूप से क़रीब 90 फीसदी अक्षम हैं.

उन्हें महाराष्ट्र पुलिस ने 9 मई 2014 को दिल्ली से गिरफ़्तार किया था. गिरफ़्तारी के बाद उन्‍हें नागपुर जेल के ‘अंडा सेल’ में रखा गया. वहां कई बार उनकी तबीयत बिगड़ी, जिसे लेकर पुलिस की काफ़ी आलोचना भी हुई थी.

रिपोर्ट के अनुसार, संयुक्त राष्ट्र से जुड़े विशेषज्ञों ने कहा है, ‘भारत सरकार को याद रखना चाहिए कि अक्षमताओं से जूझ रहे क़ैदियों की देखरेख में किसी तरह की लापरवाही न सिर्फ भेदभावपूर्ण है बल्कि इसे अत्याचार और प्रताड़ना भी माना जाना चाहिए.’

विशेषज्ञों ने कहा, ‘शारीरिक अक्षमताओं से जूझ रहे कैदी की स्थिति अगर बहुत ज़्यादा ख़राब है तो उसके कारावास की सज़ा पर रोक लगा देना चाहिए.’

मानवाधिकार पर संयुक्त राष्ट्र उच्चायुक्त के दफ़्तर से कहा गया है कि साईबाबा भारत में लंबे समय में विभिन्न अल्पसंख्यकों के अधिकारों के लिए लड़ते रहे हैं. दावा किया गया है कि ऐसा कोई भी उदाहरण नहीं है जिससे ये ज़ाहिर हो कि जीएन साईबाबा हिंसा भड़काने वाले षड्यंत्रकर्ता हैं या उन्होंने हिंसा भड़काने वालों की सहायता की हो.

क्या है मामला

इस मामले की शुरुआत साल 2013 से होती है जब महाराष्ट्र पुलिस प्रो. जीएन साईबाबा के दिल्ली विश्वविद्यालय स्थित आवास पर छापा मारती है. पुलिस का प्रोफेसर पर आरोप था कि वह माओवादियों के शहरी हिमायती हैं और हेम मिश्रा से उनके बारे में जानकारी मिली है.

जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के तत्कालीन छात्र हेम मिश्रा को अगस्त 2013 में महाराष्ट्र के गढ़चिरौली ज़िले के अहेरी में महेश तिर्की और पांडु नरोटे के साथ गिरफ़्तार किया गया था. उनके द्वारा मिले सुरागों के आधार पर इसी ज़िले के देवरी से प्रशांत राही और विजय तिर्की को गिरफ़्तार किया गया था.

साईबाबा को पहली बार मई 2014 में गढ़चिरौली पुलिस ने प्रतिबंधित भाकपा (माओवादी) का सदस्य होने तथा उन्हें साजो-सामान मुहैया कराने और समूह के लिए भर्ती में मदद करने के आरोप में गिरफ्तार किया था.

जून 2015 में बॉम्बे हाईकोर्ट ने मेडिकल आधारों पर उन्हें ज़मानत दे दी, जिसके बाद जुलाई 2015 में उन्हें रिहा कर दिया गया.

इसके बाद उसी साल दिसंबर में उन्हें फिर से जेल भेज दिया गया. फिर अप्रैल 2016 में उन्हें सुप्रीम कोर्ट से ज़मानत मिल गई. मार्च 2017 में माओवादियों से संबंध रखने के आरोप में उन्हें उम्रक़ैद की सज़ा मिली, जिसके बाद से वह नागपुर केंद्रीय जेल में बंद हैं.

प्रो. जीएन साईबाबा के अलावा हेम मिश्रा, पत्रकार प्रशांत राही समेत पांच लोगों को गढ़चिरौली कोर्ट ने आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई थी. आजीवन कारावास की सज़ा पाने वालों में दो अन्य लोग महेश तिर्की और पांडु नरोटे हैं. इसके अलावा कोर्ट ने छठे आरोपी विजय तिर्की को 10 साल की सज़ा सुनाई गई है.

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