भारत

सुषमा जी, जिन्हें आप भाषा की सभ्यता सिखा रही हैं, उन्हें सिर्फ अपमान करना आता है

विदेश मंत्री सुषमा स्वराज उन ट्रोल सेनानियों को सभ्य भाषा का प्रयोग करना सिखा रही हैं, जो 2014 में केंद्र में नरेंद्र मोदी सरकार बनने के बाद से ही महिलाओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं को नितांत असभ्य ढंग से निशाना बनाते आ रहे हैं.

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(फोटो: द वायर)

अब इसे अपनी और पराई पीर के फर्क के तौर पर देखें या कहें कि अपने पर आ पड़ती है तो ऐसा ही होता है! एक अंतरधर्मी दंपत्ति के पासपोर्ट के विवाद में अपनी भूमिका को लेकर ‘राष्ट्रवादी’ ट्रोल सेना के निशाने पर आई विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने ऐसी शहीदाना मुद्रा अपना ली है, जैसे इस सेना के हाथों ‘वीरगति’ पाने वाली वे पहली ‘शहीद’ हों!

उनकी इस मुद्रा का बांकपन कुछ ऐसा है जैसे इस सेना के उनकी ही भारतीय जनता पार्टी के आईटी सेल की पैदाइश होने और जिस जमात या ‘महानायक’ के लिए वह जान लड़ाए रहती हैं, उसके सत्तासुख में हिस्सेदारी के बावजूद, उसके 2014 से अब तक के किए-धरे से उनका कुछ भी लेना-देना न हो!

असहनीय पीड़ा के क्षणों में भी वे सायास जताना चाहती हैं कि वह तो ट्रोल सेना उनको ट्रोल करने की गलती कर बैठी वरना ‘दूध की धुली’ वे उससे अनजान ही बनी रहतीं!

उनकी और साथ ही उनके जीवन साथी स्वराज कौशल की पीड़ा अपनी जगह रहे, लेकिन किसी को तो हमारी इन विदेश मंत्री महोदया से पूछना चाहिए कि क्या उनकी यह हरकत, जैसी कि हमारे प्रधानमंत्री ने लोकसभा में डाॅ. मनमोहन सिंह पर तोहमत लगाई थी, रेनकोट पहनकर नहाने जैसी नहीं है?

गौर कीजिए: ट्रोल सेना ने श्रीमती स्वराज को ‘असहनीय’ दर्द दिया तो वे आहत होकर ट्विटर पर सर्वेक्षण कराने लगीं. इस सर्वेक्षण में सोशल मीडिया के यूजरों से पूछा गया कि क्या वे किसी को उस तरह, जैसे सुषमा को किया गया, ट्रोल करने को सही ठहराते हैं?

जैसा कि बहुत स्वाभाविक था, इस सर्वेक्षण में भाग लेने वाले 1,24,305 में 57 प्रतिशत यूजरों ने कहा कि नहीं, वे ऐसी किसी ट्रोलिंग का समर्थन नहीं करते. इस जीत के बाद ‘भलीमानस’ सुषमा ने पहले तो यह कहा कि लोकतंत्र में मतभिन्नता स्वाभाविक है, फिर ट्रोल करने वालों को उपदेश दिया कि ‘आलोचना अवश्य करो, लेकिन अभद्र भाषा में नहीं. सभ्य भाषा में की गई आलोचना ज्यादा असरदार होती है.’

इतने पर भी संतोष नहीं हुआ तो लोकप्रिय कवि गोपालदास ‘नीरज’ की पंक्तियां भी ट्वीट कर डालीं:

निर्माण घृणा से नहीं
प्यार से होता है
सुख शांति खड्ग पर नहीं फूल पर चलते हैं
आदमी देह से नहीं नेह से जीता है
बम्बों से नहीं बोल से बज्र पिघलते हैं!

‘नीरज’ की ये पंक्तियां पढ़कर आपका ‘वाह, क्या बात है!’ कहने का मन हो रहा हो तो पल भर को रुक जाइये.

सुषमा इसकी मार्फत उन ट्रोल सेनानियों को सभ्य भाषा का प्रयोग करना सिखा रही हैं, जो 2014 में केंद्र में नरेंद्र मोदी सरकार बनने के आसार दिखने के बाद से ही महिलाओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं को नितांत असभ्य ढंग से निशाना बनाते आ रहे हैं.

लेकिन आज सभ्य भाषा में आलोचना की हिमायती बन गई सुषमा की उनके कृत्यों के खिलाफ चुप्पी उतनी ही पुरानी है, जितनी उनकी असभ्यता.

भूल गए हों तो याद कर लीजिए, सुषमा को तब भी सभ्य भाषा की जरूरत नहीं महसूस हुई थी, जब उनके एक सहकर्मी ने देश के पत्रकारों को प्रेस्टीच्यूट बता डाला था. उन्होंने इस सहकर्मी का विरोध करने को कौन कहे, उसे मीठी झिड़की देने के लिए भी मुंह नहीं खोला था.

अब वे निजी तौर पर क्षुब्ध हुईं हैं और उन्हें किसी और के न सही, अपने पक्ष में ही मुंह खोलना जरूरी लगा है, तो भी लगता हैं कि वे ऊंट को ‘निहुरे-निहुरे’ ही चराना चाहती हैं, अपने क्षोभ के मूल पर उंगली नहीं रखना चाहतीं.

वरना ट्रोल करने वाले उन्हें प्रत्यारोपित की गई किडनी तक को इस्लामिक करार देते हुए उनको भारतीय जनता पार्टी के उस गैंग की सदस्य बता रहे हैं, जिसने 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाने का विरोध किया था और उनके पति से पूछ रहे हैं कि जब वे घर लौटती हैं तो उनके मुस्लिम तुष्टीकरण की सजा देने के लिए वे उन्हें पीट-पीटकर यह क्यों नहीं बताते कि मुसलमान भाजपा को कभी वोट नहीं देने वाले तो क्या यह समझने में कोई कठिनाई रह जाती है कि ट्रोलरों की इस घृणा का उत्स कहां हैं?

सुषमा द्वारा साझा किए गए ट्रोलर के ट्वीट

सुषमा द्वारा साझा किए गए ट्रोलर के ट्वीट

क्या वहीं नहीं, जहां से निकले छल-छद्मों, फरेबों और सब्जबागों ने देश में अनेक नाराज भीड़ों को आदमखोर बना डाला है और बर्बरताओं पर कोई अंकुश नहीं रहने दिया है.

‘भली’ सुषमा को जब तक वे देश की विदेश मंत्री हैं, इतनी भोली होने की इजाजत तो नहीं ही दी जा सकती कि वे इतना भी न समझ सकें कि उन्हें ट्रोल करने वालों को इकतालीस भाजपा सांसदों समेत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी क्यों फॉलो करते हैं?

क्या कारण है कि ये पंक्तियां लिखने तक उनकी खुद की पार्टी या प्रधानमंत्री ने इन ट्रोलरों की औपचारिक निंदा भी नहीं की है और न उनके साथ एकजुटता जताई है? गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने उनके खिलाफ अभद्र भाषा के प्रयोग पर एतराज जताया भी है तो ऐसे, जैसे कोई किसी को पीटने वाले से कहे कि उसे पिटाई में इतनी मोटी छड़ी का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए था, थोड़ा रहम करना चाहिए था.

जुलाई, 2017 में इन्हीं राजनाथ सिंह ने खुद को ट्रोल करने वाली इसी ‘राष्ट्रवादी’ ट्रोल सेना की एक महिला ‘कमांडर’ को दिये जवाब में कश्मीरियत की रक्षा को अपना कर्तव्य बता दिया था तो उसने पलटकर पूछा था-आज कश्मीरियत की किसको पड़ी है?

मुश्किल यह कि फिर भी सुषमा नहीं समझना चाहतीं कि जिन्हें वे आलोचना में असर के लिए सभ्य भाषा के प्रयोग की तमीज सिखा रही हैं, उन्हें आलोचना में असर की पड़ी ही नहीं है.

वे तो उन्हें ही नहीं, जिस किसी को भी ट्रोल, माफ कीजिएगा, अपमानित करके अपने (अब तो सुषमा के भी) ‘महानायक’ का 2019 के आगे का रास्ता भी हमवार करना चाहते हैं.

यकीनन, उन्हें विश्वास होगा कि जैसे 2014 में इस महानायक के नेतृत्व के खिलाफ आवाज उठाने के बाद सुषमा ने परिस्थितियों से समझौता कर ‘हेल हिटलर’ कह डाला था, आगे भी कह देंगी.

पिछले चार सालों में उन्हें जिस तरह विदेशमंत्री के रूप में सम्यक भूमिका के निर्वाह से रोककर पीड़ितों को वीजा और पासपोर्ट दिलाने वाली ममतामयी मदर टेरेसा के फ्रेम में जड़ा जाता रहा है और इस जड़े जाते रहने को उन्होंने जिस तरह स्वीकार किए रखा है, उससे हेल हिटलर का यह विश्वास बढ़ता ही है, कम नहीं होता.

बहरहाल, सुषमा अपने ही दुःख से दुःखी होती हैं, अपने पहाड़ से दुख को राई और दूसरों के राई जैसे दुख को पहाड़ जैसा समझने की पुरानी भारतीय मान्यता में यकीन नहीं करतीं, साहस की कमी या किसी अन्य कमजोरी के कारण इस सवाल की ओर लगातार पीठ ही किए रहना चाहती हैं कि न सिर्फ अकेली उन्हें बल्कि दूसरे बहतेरों को भी यों ट्रोलरों के दिलोदिमाग में बजबजाती सांप्रदायिक घृणा के मुहाने पर ला खड़े करने के पीछे किसका ‘करिश्मा’ है और अभी भी अभिव्यक्ति के सारे तो क्या, एक भी खतरा नहीं उठाना चाहतीं तो उनको और कुछ नहीं तो हिटलर-काल के कवि और फासीवाद विरोधी कार्यकर्ता पास्टर निमोलर की यह लोकप्रिय कविता जरूर पढ़नी चाहिए:

पहले वे आये कम्युनिस्टों के लिए
और मैं कुछ नहीं बोला
क्योंकि मैं कम्युनिस्ट नहीं था
फिर वे आये ट्रेड यूनियन वालों के लिए
और मैं कुछ नहीं बोला
क्योंकि मैं ट्रेड यूनियन में नहीं था
फिर वे आये यहूदियों के लिए
और मैं कुछ नहीं बोला
क्योंकि मैं यहूदी नहीं था
फिर वे मेरे लिए आये
और तब तक कोई नहीं बचा था
जो मेरे लिए बोलता

कौन जाने, इसे पढ़ने के बाद ही वे ‘तब तक कोई और नहीं बचा था, जो मेरे लिए बोलता’ जैसे अकेलेपन के खतरे का अहसास कर और यह समझ सकें कि लोकतंत्र में न कोई पीर पराई होती है, न वैसी घृणाओं के लिए कोई जगह, जिन्हें उनके बहुरूपिए महानायक और उनके कारिदें नाना प्रकार से पाल-पोस रहे हैं.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और फ़ैज़ाबाद में रहते हैं.)

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