कैंपस

जामिया मिलिया में रात नौ बजे के बाद छात्राओं के हॉस्टल से बाहर रहने पर फिर लगी रोक

सुरक्षा का हवाला देकर जामिया प्रबंधन ने छात्राओं के हॉस्टल बंद होने की समयसीमा रात 10:30 बजे से घटाकर नौ बजे की. इस नियम के ख़िलाफ़ प्रदर्शन पर भी लगाया प्रतिबंध.

हॉस्टल की समयसीमा बढ़ाने के लिए बीते मार्च महीने में जामिया मिलिया इस्लामिया की छात्राओं ने प्रदर्शन किया था. (फोटो साभार: फेसबुक/रियाजुद्दीन)

हॉस्टल की समयसीमा बढ़ाने के लिए बीते मार्च महीने में जामिया मिलिया इस्लामिया की छात्राओं ने प्रदर्शन किया था. (फोटो साभार: फेसबुक/रियाजुद्दीन)

नई दिल्ली स्थित जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय ने इस सत्र से छात्राओं के लिए रात में हॉस्टल बंद होने का समय घटाकर वापस नौ बजे कर दिया है. तीन महीने पहले छात्राओं के जबरदस्त प्रदर्शन के चलते हॉस्टल का समय रात आठ बजे से बढ़ाकर 10:30 बजे किया गया था.

इतना ही नहीं विश्वविद्यालय प्रशासन ने हॉस्टल बंद होने के समय को लेकर किसी भी तरह के विरोध प्रदर्शन पर भी प्रतिबंध लगा दिया है.

विश्वविद्यालय प्रशासन के इस कदम को लेकर छात्राओं में गुस्सा है. उनका कहना है कि एक वयस्क महिला के तौर पर उन्हें अपने जीवन से जुड़े निर्णय लेने का पूरा अधिकार है.

उधर, विश्वविद्यालय प्रशासन ने इस नियम के पीछे ‘अभिभावकों की शिकायत और चिंता’ को ज़िम्मेदार ठहराया है. विश्वविद्यालय का कहना है कि अभिभावकों ने सुरक्षा को लेकर चिंता जताई है और कहा है वे नहीं चाहते कि उनकी बच्चियां रात 10:30 बजे तक कैंपस से बाहर रहें.

मालूम हो कि जामिया में लड़कों के लिए सात हॉस्टल हैं जिनकी कुल क्षमता लगभग 1200 है और लड़कियों के लिए चार हॉस्टल हैं जिनकी क्षमता लगभग 830 है.

विश्वविद्यालय प्रशासन के इस फैसले पर मनोविज्ञान से बीए कर रहीं सायमा कहती हैं, ‘इस मुल्क के एक नागरिक के तौर पर वोट देने का हमें हक है, सरकार चुनने का हक है. शादी करने और बच्चे पैदा करने के लिए भी हमें वयस्क समझा जाता हैं पर रात को 9 बजे के बाद जामिया से बाहर निकलने के लिए हमें सक्षम नहीं समझा नहीं जाता. क्यों हमारे जीवन का ये निर्णय अभिभावक और विश्वविद्यालय प्रशासन अपने हाथ में ले लेता है. क्या सुरक्षा का हवाला देकर हमारे मौलिक अधिकार छीनना गलत नहीं है.’

सायमा कहती हैं कि तीन महीने पहले यानी 18 मार्च की रात को जबरदस्त प्रदर्शन के बाद हॉस्टल बंद होने की समयसीमा बढ़ाया गया था विश्वविद्यालय ने इस फैसले को अचानक से वापस लेकर छात्राओं के साथ धोखा किया है.

हॉस्टल बंद होने की समयसीमा वापस घटाए जाने को लेकर नाराज़ छात्राओं ने बीते चार जुलाई को कुलपति तलत अहमद को पत्र लिखकर हॉस्टल प्रमुख के इस्तीफे या उन्हें पद से हटाने की मांग की है.

छात्राओं द्वारा मार्च में किया गया प्रदर्शन. (फोटो साभार: फेसबुक/NSUI Jamia Millia Islamia)

छात्राओं द्वारा मार्च में किया गया प्रदर्शन. (फोटो साभार: फेसबुक/NSUI Jamia Millia Islamia)

छात्राओं ने पत्र में लिखा है, ‘हमें हॉस्टल के नए नियमों की जानकारी इस सत्र के लिए जारी हुए नए प्रॉस्पेक्टस से मिली जो कि उन मांगों के ख़िलाफ़ हैं जिन्हें प्रशासन इसी साल 18 मार्च को हुए विरोध प्रदर्शनों में पहले ही मान चुका था. उन मांगों में सबसे प्रमुख हॉस्टल की समयसीमा यानी कर्फ्यू टाइम बढ़ाने की बात थी. इस सत्र से इस समय को वापस घटाकर रात 10:30 बजे से नौ बजे कर दिया गया है.’

सायमा कहती हैं कि अगर किसी के मां-बाप ने शिकायत की भी है तो विश्वविद्यालय को समझना चाहिए कि मां-बाप की चिंता वाजिब है पर जब हम एक वयस्क के तौर पर अपने जीवन का निर्णय लेने के लिए सक्षम हैं तो हमारे मौलिक अधिकारों को सुरक्षा का हवाला देकर कैसे छीना जा सकता है.

मास कम्युनिकेशन की एक छात्रा ने नाम न बताने की शर्त पर कहा, ‘इस तरह की कोई भी शिकायत नहीं की गई है. प्रशासन झूठ बोलकर इस बात की ज़िम्मेदारी अभिभावकों पर डाल रहा है.’

उन्होंने कहा, ‘प्रशासन भले ही सुरक्षा का हवाला देकर हमसे हमारी आज़ादी छीन रहा हो और हमें नियमों में क़ैद कर रहा हो लेकिन असल में वो हमारी सुरक्षा की परवाह नहीं करते. अगर किसी को वापस आने में देर हो जाए तो वो हमारे प्रवेश पर रोक कैसे लगा सकते हैं. इतनी रात में 15 मिनट की देरी पर अंदर ही आने न देना कैसी सुरक्षा है.’

छात्राओं में विश्वविद्यालय प्रशासन की इस क़दम के ख़िलाफ भी गुस्सा हैं, जिसके तहत अब वे हॉस्टल बंद होने की समयसीमा बढ़ाने को लेकर प्रदर्शन भी नहीं कर सकेंगी.

छात्राओं ने हॉस्टल के फॉर्म पर हस्ताक्षर करने से इनकार दिया है जिसमें उन्हें प्रशासन के ख़िलाफ़ किसी भी तरह के विरोध-प्रदर्शन और आंदोलन में भाग न लेने की बात स्वीकारनी थी.

कुलपति को लिखे पत्र में छात्राओं ने लिखा है, ‘नए प्रॉस्पेक्टस के तहत हमें ये फॉर्म 14 जुलाई तक जमा कराने को कहा गया है. हम ऐसे किसी फॉर्म पर हस्ताक्षर करने से इनकार करते हैं जिसके अनुसार किसी भी गैर-लोकतांत्रिक और मनमाने नियम कानून के ख़िलाफ़ हमारे लोकतांत्रिक तरीके से विरोध करने के मौलिक अधिकार को छीना जाए.’

द वायर ने जिन छात्राओं से बात की उन सभी ने इस बात पर रोष व्यक्त किया है कि नए प्रॉस्पेक्टस में नियम-कानून के तहत प्रशासन ने इन नियमों के ख़िलाफ़ किसी तरह के विरोध-प्रदर्शन, आंदोलन या याचिका पर प्रतिबंध लगा दिया है और ऐसा करने पर हॉस्टल से तुरंत निकाल दिए जाने की बात लिखी गई है.

(फोटो साभार: पिंजरातोड़ फ़ेसबुक पेज)

(फोटो साभार: पिंजरातोड़ फ़ेसबुक पेज)

जामिया मिलिया इस्लामिया की वेबसाइट पर लड़कों के लिए भी मेस और कर्फ्यू टाइम यानी हॉस्टल बंद होने की समयसीमा को लेकर नियम-कानून लिखे हुए हैं लेकिन इस बारे में लड़कियों की कुछ और ही राय है.

जामिया से इसी साल अपनी पढ़ाई पूरी करने वाली एक अन्य छात्रा नाम न बताने की शर्त पर बताती हैं, ‘लड़कों के लिए नियम सिर्फ कागज पर लिखे हुए हैं, उन पर अमल नहीं किया जाता लेकिन लड़कियों के लिए इन नियमों को कड़ाई से लागू किया जाता है. उनको तोड़ने पर उनके ख़िलाफ़ कड़ी कार्रवाई भी की जाती है. लड़के कभी भी आ-जा सकते हैं, उनके लिए कोई भी समय सीमा नहीं है.’

वे आगे बताती हैं, ‘लड़कियों को खाने की बहुत समस्या होती है, हम न ही मेस में कुछ बना सकते हैं न ही बाहर से कुछ मंगा सकते हैं और न इलेक्ट्रिक केटल या कोई भी बिजली का समान रख सकते हैं. इस नियम का कोई भी मतलब नहीं है, क्योंकि हम हर चीज़ की फीस देते हैं पर उसका प्रयोग नहीं कर सकते.’

बीए एलएलबी की छात्रा सानिया बताती हैं, ‘लड़कों के लिए हॉस्टल का ऐसे कोई नियम नहीं है वो अगर समय से बाद में भी आएं तो कोई कार्रवाई नहीं की जाती है. लड़कियां कर्फ्यू टाइम के बाद हॉस्टल में कैद होती हैं, मेस का खाना अच्छा नहीं होता फिर भी उनके लिए उनके लिए मेस की सर्विस लेना आवश्यक है, वह बाहर से खाना नहीं मंगा सकतीं हैं. वहीं लड़को के लिए आने-जाने पर कोई कड़ी रोक नहीं है.’

लड़कियों और लड़कों के बीच भेदकारी नियम कानून को लेकर जामिया से एमफिल कर रहे एक छात्र ने नाम न बताने की शर्त पर कहा, ‘यह सच है कि लड़कों के लिए अधिकारिक रूप से जो समय रात 10 बजे का दिया हुआ है उसका पालन नहीं होता लड़के कभी भी आ-जा सकते है. नियम तोड़ने पर उनके ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई नहीं होती है.’

यह मानते हुए कि नियम-क़ानून भेदकारी हैं, वे बताते हैं, ‘हम भी नारीवाद आंदोलन के पक्ष में हैं लेकिन आए दिन जिस तरह की घटनाएं होती हैं उनको देखते हुए सुरक्षा का मुद्दा भी महत्व रखता है. अगर कर्फ्यू टाइम बढ़ाने के बाद देर रात किसी लड़की के साथ कोई अनहोनी होती है तो प्रशासन कैसे ज़िम्मेदार है. क्या किसी लड़की के माता-पिता यह लिख के देने को तैयार हैं कि उनकी बेटी के साथ कुछ होता है तो उसके लिए प्रशासन ज़िम्मेदार नहीं होगा.’

उधर, सानिया बताती हैं, ‘रात 11:30 बजे के बाद लड़कियां एक हॉस्टल से दूसरे हॉस्टल भी नहीं जा सकतीं. इन नियमों के ख़िलाफ़ एक लंबे समय से संघर्ष किया गया था और विरोध प्रदर्शन के बाद हॉस्टल बंद होने का समय रात 10:30 बजे कराया गया था. हमने लंबे समय से पितृसत्तात्मक और भेदकारी नियम-कानून के ख़िलाफ़ लड़ाई की है. तीन महीने पहले थोड़ी सी जीत हासिल की थी जिससे अब प्रशासन पलट रहा है.’

(फोटो साभार: फेसबुक/Shreya Ghosh)

(फोटो साभार: फेसबुक/Shreya Ghosh)

सानिया कहती हैं, ‘कुछ नियम तो इतने बेतुखे हैं जिनका कोई हिसाब नहीं, अगर मुझे छुट्टी पर जाना है तो 24 घंटे पहले इसके लिए अनुमति मांगनी पड़ती है. उसके बाद हमें गेट पास दिया जाता है. हमें अपने अभिभावकों को भी फोन, मैसेज और ईमेल कर इस बारे में सूचित करना होता है. ऐसे में अचानक कहीं आने जाने का सवाल ही नहीं.’

सानिया के मुताबिक, ‘जब हॉस्टल प्रमुख और वार्डन अपने परिवार (पति और लड़के) के साथ हॉस्टल में रह सकती हैं तो समझ नहीं आता आख़िर क्यों हमारे मां-बाप हॉस्टल के अंदर भी नहीं आ सकते. कई बार सुरक्षा का हवाला देकर हमारे भाई और पिता से पहचान पत्र मांगा जाता है जबकि हॉस्टल के अंदर और मेस में लगभग सारा स्टाफ पुरुष है.’

अभिभावकों के अंदर आने को लेकर जामिया मिलिया इस्लामिया की हॉस्टल प्रमुख अज़रा ख़ुर्शीद ने बताया, ‘हम अभिभावकों को ऑफिस तक आने की अनुमति दे सकते हैं, वहां कूलर-पानी हर चीज़ की व्यवस्था है पर उन्हें लड़कियों के कमरे में आने की अनुमति नहीं दे सकते इससे दूसरी लड़कियों को आपत्ति हो सकती है.’

हॉस्टल के अंदर वार्डन और केयरटेकर के परिवार के पुरुष सदस्यों के रहने को लेकर अज़रा ने कहा, ‘यह विश्वविद्यालय के नियम में शामिल है और आज से नहीं वार्डन और केयरटेकर अपने परिवार के साथ सालों से वहां रह रहे हैं.’

छात्राओं ने विश्वविद्यालय प्रशासन पर मोरल पुलिसिंग का आरोप लगाया है. सायमा का कहना है, ‘नियमों के अनुसार छात्राओं को मेस और मुख्य गेट के पास ‘ठीक तरीके’ से कपड़े पहनकर जाने के निर्देश दिए हैं.’

सानिया कहती हैं, ‘इतना ही नहीं लड़कियों के लिए यह भी क़ानून है कि उनका स्थानीय अभिभावक शादीशुदा होना चाहिए. ये कैसे ज़रूरी है कि दिल्ली में किसी का रिश्तेदार हो ही और वो शादीशुदा भी हो.’

जामिया की हॉस्टल प्रमुख अज़रा ख़ुर्शीद ने इस बारे में द वायर से अपनी बातचीत में कहा, ‘10:30 बजे के कर्फ्यू टाइम को लेकर अभिभावकों ने शिकायत नहीं की बल्कि वे छात्राओं की सुरक्षा को लेकर ‘चिंतित’ हैं.’

हॉस्टल की समयसीमा बढ़ाकर रात 10:30 बजे कर आपने छात्राओं की सारी बात मान ली थी, इस सवाल पर अज़रा कहती है, ‘तीन महीने पहले प्रदर्शन के दौरान लड़कियों की मांगों पर प्रशासन द्वारा हस्ताक्षर ज़रूर किया गया था लेकिन इतनी रात को प्रदर्शन के बीच इतना दबाव था कि उनके मांग पत्र को कैसे पूरा पढ़ा जा सकता है.’

अज़रा आगे कहती हैं, ‘हम जो कर रहें वह सिर्फ लड़कियों की सुरक्षा को लेकर कह रहे हैं, भला हमारा इससे क्या फायदा.’

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