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मध्य प्रदेश: ‘भारत का इथोपिया’ कहे जाने वाले श्योपुर में कुपोषण से पांच बच्चों की मौत

ज़िले के विजयपुर विकासखंड की इकलौद पंचायत के झाड़बड़ौदा गांव में दो हफ्तों के भीतर पांच बच्चों की मौत हो चुकी है. प्रशासन कुपोषण की बात से इनकार कर रहा है और मौतों को बुखार से होना बता रहा है.

Malnutrition Reuters

(प्रतीकात्मक फोटो: रॉयटर्स)

मध्य प्रदेश का श्योपुर जिला ‘भारत के इथोपिया’ के नाम से विख्यात है. इस विख्याती का कारण है कुपोषण. हर वर्ष कुपोषण के चलते जिले में कई मासूम काल के गाल में समा जाते हैं.

इसी कड़ी में जिले के विजयपुर विकासखंड की इकलौद पंचायत के झाड़बड़ौदा गांव में बुखार से बीते दिनों चार बच्चियों की मौत हो गई. तो वहीं, बुधवार को एक अतिगंभीर कुपोषित बच्ची ने भी अस्पताल में दम तोड़ दिया.

8 माह की रोशनी को मंगलवार को ही श्योपुर जिले की विजयपुर तहसील से पड़ोसी जिले ग्वालियर के सबसे बड़े अस्पताल जयारोग्य में भर्ती कराया गया था.

डॉक्टरों के अनुसार, वह कुपोषण के साथ-साथ बुखार और अन्य बीमारियों से ग्रस्त थी. उस पर दवाओं ने भी अपना असर दिखाना बंद कर दिया था, इसलिए उसे ग्वालियर रैफर किया गया था.

इससे पहले एक जुलाई को दो बच्चों ने तेज बुखार आने के बाद दम तोड़ दिया था. दोनों को अचानक तेज बुखार आया था, उन्हें अस्पताल ले जा पाते, उससे पहले ही उनकी मौत हो गई.

मृत बच्चियों के नाम मुस्कान और मधु थे. मुस्कान के रिश्ते में भाई बंटी आदिवासी ने बातचीत में मीडिया को बताया था कि इस घटना के कुछ दिन पूर्व गांव में ही 3 वर्षीय नीलम की भी इसी तरह बुखार के चलते मौत हो गई थी और नीलम से दो दिन पहले इसी तरह शिवानी ने भी दम तोड़ दिया था.

इस तरह दो हफ्ते के भीतर पांच मौतें हो चुकी हैं.

इस बीच, जब एक जुलाई तक चार मौतों की खबरें अखबारी सुर्खियां बनीं तो स्वास्थ्य विभाग की टीम मंगलवार को झाड़बड़ौदा गांव भी पहुंची थी जहां रहने वाले करीब एक सैकड़ा परिवारों में स्वास्थ्य परीक्षण किया, जिनमें 12 बच्चे बीमार पाए गए तो तीन बच्चे अति कुपोषित श्रेणी के थे, जिनमें रोशनी का कुपोषण गंभीर स्थिति में था.

गौरतलब है कि इकलौद वही जगह है, 2016 में जहां के गोलीपुरा इलाके में डेढ़ दर्जन बच्चे कुपोषण के चलते अपनी जान गंवा बैठे थे, करीब ही लगे झाड़बड़ौदा में तब चार बच्चों की मौत हुई थी.

ज्ञात हो कि 2016 में श्योपुर जिले में कुपोषण कहर बनकर टूटा था. वर्ष के सितंबर-अक्टूबर माह के बीच 116 बच्चों की मौत कुपोषण से हुई थी.

मामले ने तूल पकड़ा तो राज्य सरकार ने कुपोषण पर श्वेत पत्र लाने तक की घोषणा कर दी थी. हालांकि, वह बात अलग है कि सरकार अब तक श्वेत पत्र लाई नहीं है.

इस बीच, मंगलवार को पहुंची टीम ने मधु, मुस्कान और नीलम की मौत की बात तो स्वीकारी, लेकिन शिवानी की मौत को अप्रैल में होना बताया.

लेकिन, साथ ही कहा कि मौतें हुईं क्योंकि बच्चियों के परिजन बीमार होने पर उन्हें अस्पताल ले जाने के बजाय झाड़-फूंक के भरोसे रहे.

वहीं, स्वास्थ्य विभाग द्वारा अस्पताल में भर्ती कराई गई जिस अतिगंभीर कुपोषित बच्ची रोशनी ने बुधवार को दम तोड़ा है, प्रशासन उसे भी कुपोषण से हुई मौत मानने से इनकार कर रहा है.

श्योपुर सीएमएचओ का कहना है कि मौत बीमारी से हुई है, इसलिए बच्ची को ग्वालियर रैफर किया गया था. तो स्थानीय कलेक्टर सौरभ कुमार सुमन का कहना है कि उन्हें बच्ची को बुखार आने पर रैफर किए जाने की जानकारी है. उसकी मौत भी बुखार आने और समय पर उपचार के लिए न ले जाने के चलते हुई है.

लेकिन इस सबके बीच विजयपुर विकासखंड चिकित्सा अधिकारी (बीएमओ) डॉक्टर एसएन मेवाफरोस ने बालिका के कुपोषण की बात स्वीकारी है.

कुपोषण की स्थिति पर ऐसे मतभेद मध्य प्रदेश में नए नहीं हैं. कुपोषण की पर्देदारी के शासन-प्रशासन के हमेशा से ही प्रयास रहे हैं.

प्रदेश सरकार के ही दो विभाग और उसके मंत्री कुपोषण के आंकड़ों पर आपसी मतभेद रखते हैं.

गौरतलब है कि 2016 में श्योपुर में कुपोषण से हुई मौतों को जहां स्वास्थ्य विभाग और स्वास्थ्य मंत्री ने कुपोषण के चलते होना बताया था, वहीं महिला एवं बाल विकास मंत्री यह स्वीकारने ही तैयार नहीं थीं कि कोई बच्चा कुपोषण से मरा भी है.

महिला एवं बाल विकास मंत्री अर्चना चिटनिस ने तब सदन में एक सवाल के जवाब में कहा था कि पिछले तीन सालों में कुपोषण से कोई मौत ही नहीं हुई. जबकि प्रदेश सरकार के स्वास्थ्य मंत्री रुस्तम सिंह का कहना था कि श्योपुर में 116 बच्चे कुपोषण से मरे. वहीं, सरकार के एक अन्य मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने सतना और खंडवा में कुपोषण से हुई 93 बच्चों की मौत को अन्य बीमारियों से होना बताया था.

इसी तरह श्योपुर में कुपोषण से हुई मौतों को जब विपक्ष ने मुद्दा बनाया तो प्रदेश सरकार ने एक माह के भीतर कुपोषण पर श्वेत–पत्र लाने की घोषणा की थी. लेकिन लगभग दो साल होने को आया, घोषणा पर अमल नहीं हुआ है तो इसके पीछे भी सरकार की नीति कुपोषण को छिपाने की ही है.

वैसे छिपने–छिपाने का यह खेल पुराना है. मध्यप्रदेश सरकार कुपोषण पर आंकड़ों और बयानों की बाजीगरी करती रही है. प्रदेश सरकार ने जनवरी 2016 के मासिक प्रतिवेदन में प्रदेश में 17 प्रतिशत बच्चे कम वज़न के होना बताए. लेकिन अगले ही महीने आए चौथे राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के मुताबिक राज्य में 42.8 प्रतिशत बच्चे कम वजन के थे. जबकि वार्षिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण 2014 के आंकड़ों में मध्यप्रदेश में 40.6 प्रतिशत बच्चे कम वजन के थे. यहां 23 से 26 प्रतिशत बच्चों की संख्या छिपाने की कोशिश की गई थी.

हालांकि, राज्य सरकार के ही आंकड़े बताते हैं कि मध्य प्रदेश में हर दिन कुपोषण से 92 बच्चों की मौत होती है.

जहां तक हालिया मौतों का सवाल है तो स्वास्थ्य विभाग का यह तर्क कि बच्चों को इलाज के लिए अस्पताल न पहुंचा कर परिजन झाड़-फूंक करते रहे, तो कुछ हद इस बात में सत्यता भी है. ‘द वायर’ की ही एक पड़ताल में यह बात सामने भी आई थी.

लेकिन, यह भी उतना ही सत्य है कि कुपोषण प्रभावित श्योपुर के कई इलाकों में मीलों दूर तक कोई डॉक्टर नहीं मिलता. लाखों की आबादी पर एक डॉक्टर है. नतीजतन झोलाछाप डॉक्टर वहां डेरा जमाए बैठे हैं या फिर इलाज के लिए मीलों दूर जाने की अपेक्षा ग्रामीण झाड़-फूंक और टोनों- टोटकों पर यकीन रखते हैं.

सरकार जागरुकता के लिए योजनाएं तो चलाती है लेकिन वे प्रभावित इलाकों में पहुंचती नहीं पाई जाती हैं.

सामान्यत: माना जाता है कि श्योपुर में कुपोषण के मामले वर्ष के जून से नवंबर माह के बीच अधिक निकल कर सामने आते हैं. कारण है कि सहरिया आदिवासी बहुल इस इलाके की आबादी जीवनयापन के लिए मजदूरी पर निर्भर है जो फरवरी माह, जो कि फसल कटाई का समय होता है, में खेतों पर मजदूरी के लिए आसपास के जिलों और राज्यों में पलायन कर जाती है.

जून-जुलाई माह से वे वापस अपने घर लौटना शुरू करते हैं और जब वापस आते हैं तो साथ लाते हैं अपने वे बीमार बच्चे, जिनके स्वास्थ्य पर पलायन के दौरान वे पर्याप्त ध्यान दे नहीं पाते हैं, जिसके चलते इस चार-पांच महीने की अवधि में बच्चों को कुपोषण अपनी गिरफ्त में ले लेता है.

कह सकते हैं कि जुलाई माह शुरू हो गया है और श्योपुर की कुपोषण की यह कहानी फिर से दोहराई जाने लगी है.

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