भारत

चंद्रशेखर की हत्या करने वाली बंदूक ‘धर्मनिरपेक्ष’ थी

चंद्रशेखर ने कहा था, ‘हां, मेरी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा है- भगत सिंह की तरह जीवन, चे ग्वेरा की तरह मौत.’ उनके दोस्त गर्व से कहते हैं कि चंदू ने अपना वायदा पूरा किया.

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पेंटिंग: शबनम गिल

सबसे मासूम सपनों को
कुचलने वाले पैर
सबसे सुंदर संभावना को
छलनी कर देने वाली गोलियां
सबसे निश्छल आवाज़ को
दबा देने वाले क्रूर हाथ
इन सबकी छवियां धर्मनिरपेक्ष थीं…

31 मार्च, 1997 को जेएनयू के छात्रों को ख़बर मिली कि दो बार जेएनयू छात्रसंघ अध्यक्ष रह चुके चंद्रशेखर को बिहार के सीवान में सरेबाज़ार गोलियों से भून दिया गया है. वही चंद्रशेखर जो अपने दोस्तों के बीच चंदू थे, वही चंद्रशेखर जो अपने जेएनयू के छात्रों के कहकर गए थे- ‘हमारी आने वाली पीढ़ियां सवाल करेंगी, वे हमसे पूछेंगी कि जब नई सामाजिक ताक़तें उभर रही थीं तो आप कहां थे, वे पूछेंगी कि जब लोग जो हर दिन जीते-मरते हैं, अपने हक़ के लिए संघर्ष कर रहे थे, आप कहां थे जब दबे-कुचले लोग अपनी आवाज़ उठा रहे थे, वे हम सबसे सवाल करेंगीं.’

उस समय बिहार में धर्मनिरपेक्षता, सामाजिक न्याय और पिछड़ों के मसीहा लालू प्रसाद यादव की सरकार थी. चंदू की हत्या पर जेएनयू के छात्र भड़क उठे. नाराज़ छात्रों का हुजूम लालू यादव से जवाब मांगने दिल्ली के बिहार भवन पहुंचा तो वहां भी पुलिस की गोलियों से उनका स्वागत हुआ. चंदू की हत्या का आरोप लालू यादव की पार्टी के सांसद शहाबुद्दीन पर था और प्रदर्शनकारी छात्रों पर गोली चलाने का आरोप पुलिस के साथ-साथ साधु यादव पर.

न्याय न मिल पाने का चलन सिर्फ़ रोहित बेमुला की मां या नजीब की मां से ही नहीं शुरू हुआ. चंदू के शूटरों को तो सज़ा हो गई, लेकिन मुख्य आरोपी शहाबुद्दीन, जो चंदू के अलावा और भी हत्याओं के आरोपी रहे, उन्हें ख़ूब इनाम मिले. वे चार बार सांसद चुने गए और दो बार विधायक रहे. हाल ही में पत्रकार राजदेव रंजन की हत्या हुई तब शहाबुद्दीन जेल में थे लेकिन इस हत्या का आरोप भी उन्हीं पर आया. फ़िलहाल वे दिल्ली की तिहाड़ जेल में हैं और लालू की यादव की पार्टी राजद की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में शामिल किए गए हैं.

चंदू की हत्या का समय वह समय था जब दुनिया में वामपंथ का सबसे मज़बूत क़िला सोवियत रूस ढह चुका था. दुनिया तेज़ी से पूंजीवाद की ओर बढ़ रही थी. उदारीकरण भारत की दहलीज लांघकर अपने को स्थापित कर चुका था. तमाम धुर वामपंथी आवाज़ें मार्क्सवाद के ख़ात्मे की बात करने लगी थीं.

उसी दौर की बात है, जब जेएनयू कैंपस में एक युवा छात्रनेता अपने साथियाें से कह रहा था, ‘हम अगर कहीं जाएंगे तो हमारे कंधे पर उन दबी हुई आवाज़ों की शक्ति होगी जिनको बचाने की बात हम सड़कों पर करते हैं. अगर व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा होगी तो भगत सिंह जैसे शहीद होने की महत्वाकांक्षा होगी, न कि जेएनयू से इलेक्शन में गांठ जोड़कर चुनाव जीतने और हारने की महत्वाकांक्षा होगी.’

दबी हुई आवाज़ों को बचाने की अलख जगाने वाले इस युवक ने जेएनयू के अध्यक्ष पद से हटने के बाद दिल्ली छोड़ दी और सीवान जाकर परिवर्तन का बिगुल फूंक दिया. सीवान पहुंचकर चंदू ने बाहुबली नेता शहाबुद्दीन के ख़िलाफ़ उनके गढ़ में ही मोर्चा खोल दिया. उन्होंने बिहार की राजनीति में अपराध, बाहुबल, घोटालों और भ्रष्टाचार के मुद्दों को बहुत प्रमुखता से उठाया. जनता से उनको बेहतर प्रतिक्रिया मिल रही थी.

चंदू भारत के राजनीतिक परिदृश्य को बदलने का सपना देख रहे थे और इसकी शुरुआत भी कर दी थी. बिहार में जनसंहारों और घोटालों के विरोध में 2 अप्रैल, 1997 को बंद बुलाया गया था. इस बंद के लिए 31 मार्च शाम चार बजे जेपी चौक पर एक नुक्कड़ सभा को संबोधित करते हुए चंदू और उनके सहयोगी श्याम नारायण को गोलियों से भून दिया गया. इस गोलीबारी में एक ठेलेवाले भुटेले मियां भी मारे गए.

डॉक्यूमेंट्री 'एक मिनट का मौन' से साभार

डॉक्यूमेंट्री ‘एक मिनट का मौन’ से साभार

चंदू भगत सिंह की तरह अंग्रेज़ी साम्राज्यवाद से लड़ते हुए शहीद तो नहीं हुए, लेकिन लड़ते हुए मारे जाने की उनकी महत्वाकांक्षा पूरी हो गई. वे भ्रष्ट और राक्षसी राजनीति से लड़ते हुए सरेबाज़ार मारे गए.

चंदू उन चंद युवाओं में से थे जो व्यवस्था से टकराने का माद्दा रखता है, जो जनता की तरफ खड़े होकर भ्रष्ट तंत्र को बदल देने का सपना देखता है, जो ग़रीबों, मज़दूरों, दलितों और महिलाओं को संबोधित करता है. लेकिन दुर्भाग्य से वैसा युवा इस देश की राजनीति को पसंद नहीं है. इसलिए वह उसपर गोलीबारी कर देती है. चंद्रशेखर बिहार की ग़रीब जनता के लिए एक उम्मीद बनकर उनके बीच काम करने गए थे, लेकिन लोकतंत्र, सामाजिक न्याय और धर्मनिरपेक्षता का चोला ओड़ कर सामने आई बाहुबल की राजनीति ने उन्हें लील लिया.

20 सितंबर, 1964 को बिहार के सीवान ज़िले में जन्मे चंदू आठ बरस के थे जब उनके पिता का देहांत हो गया. सैनिक स्कूल तिलैया से इंटरमीडियट तक की शिक्षा के बाद वे एनडीए प्रशिक्षण के लिए चुने गए. लेकिन वहां उनका मन नहीं लगा और दो साल बाद वापस आ गए. इसके बाद उनका वामपंथी राजनीति से जुड़ाव हुआ और एआईएसएफ के राज्य उपाध्यक्ष के पद तक पहुंचे.

बाद में वे जेएनयू पहुंचे तो कम्युनिस्ट पार्टी आॅफ इंडिया लिबरेशन की छात्र इकाई आइसा के साथ अपना राजनीतिक सफर शुरू किया. एक छात्र नेता के रूप में वे बहुत तेजी से उभरे और लोकप्रिय हुए. 1993-94 में जेएनयू छात्रसंघ के उपाध्यक्ष चुने गए और फिर लगातार दो बार अध्यक्ष चुने गए. इसके बाद वे ज़मीनी स्तर पर काम करने के मक़सद से अपने गृह ज़िले सीवान गए, जहां उनका मुक़ाबला संगीन अपराधियों की ख़ूनी राजनीति से होना था.

चंद्रशेखर की हत्या के बाद भाकपा माले ने आरोप लगाया, ‘अब तक हमारे कई नेताओं कार्यकर्ताओं की हत्या हो चुकी है. श्याम नारायण और चंद्रशेखर की हत्या में राजद सांसद शहाबुद्दीन का हाथ है. वही सूत्रधार हैं. जिस समय हत्या हुई, हमारे कार्यकर्ता वहां पर मौजूद थे, जिन्होंने हत्यारों को पहचाना. वे शहाबुद्दीन के साथ के लोग थे. हत्या की वजह राजनीतिक है. हमारी पार्टी ने पिछले चुनाव में शहाबुद्दीन को सशक्त चुनौती दी थी. हमने चुनाव में अपराध के ख़िलाफ़ एजेंडा तैयार किया था. शहाबुद्दीन अपराध शिरोमणि हैं. अपराध को एजेंडा बनाने के बाद हमारे कार्यकर्ताओं पर चुन-चुनकर हमला हो रहा है.’

भाकपा माले के नेता रमेश एस. कुशवाहा ने उस समय बयान दिया था, ‘शहाबुद्दीन एक पेशेवर अपराधी रहे हैं. इसके पहले बिहार के बुद्धिजीवी उनके ख़िलाफ़ एक शब्द नहीं बोलते थे. पत्रकार क़लम चलाने से डरते थे. हम लोगों ने पहली बार अपराध को एजेंडा बनाया और उनके ख़िलाफ़ बोलना शुरू किया.’

भाकपा का आरोप आज भी सही प्रतीत होता दिख रहा है, जब जेल में रहते हुए शहाबुद्दीन पर पत्रकार राजदेव की हत्या का आरोप लगता है और राजदेव की पत्नी की याचिका पर उन्हें बिहार से दिल्ली की तिहाड़ शिफ्ट कर दिया जाता है.

चंदू की हत्या का समय ऐसा था कि बिहार चुनाव में हत्या आम बात थी. चंदू से पहले कई वामपंथी कार्यकर्ताओं की हत्या हो चुकी थी. लोगों को वोट देने से रोकने के लिए अपराधी नेताओं के गुंडे झुंड में पहुंचकर गोलियां चलाते थे और विरोधी पार्टी के मतदाताओं को मतदान से रोकते थे.

चंदू की हत्या के बाद देश भर में प्रदर्शन शुरू हो गए. चंद्रशेखर के गांव बिंदुसार में देश भर से हज़ारों छात्र पहुंचे और चंदू की मां के नेतृत्व में मार्च निकाला गया. इस सभा को संबोधित करते हुए चंदू की बूढ़ी मां कौशल्या देवी ने कहा था, ‘मेरा बेटा मर कर भी अमर है और सदा अमर रहेगा. मेरी झोपड़ी को झोपड़ी मत आंकना. इस झोपड़ी की बहुत कीमत है… मेरा बेटा मरा नहीं है. ये हज़ारों लाल मेरे बेटे हैं.’

चंदू के गांव से चलकर हज़ारों नौजवानों का जुलूस सीवान के जेपी चौक पहुंचा. बताते हैं कि इतना बड़ा जुलूस सीवान में शायद ही कभी निकला हो. दिल्ली में छात्र और बुद्धिजीवियों ने भारी विरोध मार्च निकाला. यह प्रदर्शन पूरे देश में हुआ और शहाबुद्दीन और साधु यादव को सज़ा देने की मांग की गई. जेएनयू के छात्रों के विरोध मार्च पर पुलिसिया लाठीचार्ज में बड़ी संख्या में लड़के लड़कियां घायल हुए. चंदू की हत्या के बाद दो अप्रैल का बंद और व्यापक हो गया और क़रीब-क़रीब हिंसक भी रहा. पूरे बिहार में जनता सड़क पर उतरी.

तत्कालीन प्रधानमंत्री इंद्रकुमार गुजराल ने दिल्ली से राहत राशि के रूप में एक लाख रुपये का चेक भेजा तो चंदू की मां ने यह कहकर लौटा दिया कि ‘बेटे की शहादत के एवज में मैं कोई भी राशि लेना अपमान समझती हूं… मैं उन्हें लानतें भेज रही हूं जिन्होंने मेरे बेटे की जान की क़ीमत लगाई. एक ऐसी मां के लिए, जिसका इतना बड़ा बेटा मार दिया गया हो और जो यह भी जानती हो कि उसका क़ातिल कौन है, एकमात्र काम हो सकता है, वह यह है कि क़ातिल को सज़ा मिले. मेरा मन तभी शांत होगा महोदय. मेरी एक ही क़ीमत है, एक ही मांग है कि अपने दुलारे शहाबुद्दीन को क़िले से बाहर करो या तो उसे फांसी दो या फिर लोगों को यह हक़ दो कि उसे गोली से उड़ा दें.’

तत्कालीन सरकार से मांग की गई कि शहाबुद्दीन की संसद सदस्यता खारिज की जाए और बिहार आवास पर प्रदर्शन के दौरान छात्रों पर गोली चलाने वाले साधु यादव को गिरफ़्तार किया जाए. प्रधानमंत्री गुजराल ने इन मांगों को अव्यवहारिक बताया. सांसद शहाबुद्दीन गिरफ़्तार हुए, लेकिन उनके ख़िलाफ़ ठोस सबूत और गवाह नहीं मिले. वे जमानत पर छूट गए.

अदालत में यह मामला 15 साल तक खिंचा. आख़िरकार बाहुबली नेताओं से संबंध रखने वाले तीन शार्प-शूटरों को उम्रक़ैद की सज़ा मिली. शहाबुद्दीन को जेल तो हुई लेकिन अन्य मामलों में. उनके खिलाफ चंद्रशेखर हत्याकांड और अन्य कई मामलों में गवाहों पर इतना अधिक दबाव डाला गया कि कई गवाह घर छोड़कर भाग गए या फिर गवाही से पलट गए. उस दौर में बिहार में शहाबुद्दीन की तूती बोलती थी.

चंदू जब जेएनयूएसयू के उपाध्यक्ष थे, तभी प्रणय कृष्ण अध्यक्ष थे. प्रणय कहते हैं, ‘प्रतिलिपियों से भरी इस दुनिया में चंदू मौलिक होने की जिद के साथ अड़े रहे. हमारी दोस्त प्रथमा कहती थी, ‘वह रेयर आदमी हैं.’ 91-92 में जेएनयू में हमारी तिकड़ी बन गई थी. राजनीति, कविता, संगीत, आवेग और रहन-सहन- सभी में हम एक से थे. हमारा नारा था, ‘पोएट्री, पैशन एंड पाॅलिटिक्स.’

चंदू इस नारे के सबसे ज़्यादा क़रीब थे. समय, परिस्थिति और मौत ने हम तीनों को अलग-अलग ठिकाने लगाया, लेकिन तब तक हम एक-दूसरे के भीतर जीने लगे थे. चंदू कुछ इस तरह जिये कि हमारी कसौटी बनते चले गए. बहुत कुछ स्वाभिमान, ईमान, हिम्मत, मौलिकता और कल्पना- जिसे हम ज़िंदगी की राह में खोते जाते हैं, चंदू उन सारी खोई चीज़ों को हमें वापस दिलाते रहे.’

भाकपा माले की नेता कविता कृष्णन कहती हैं, ‘चंद्रशेखर जैसे युवा का होना जेएनयू की भूमिका को दिखाता है. वे जेएनयू की पैदावार थे और ग़रीबों के पक्ष में लड़ने निकले थे. चंद्रशेखर की जो हत्या हुई, उससे पहले भी कई लोगों की हत्या हो चुकी थी. चंद्रशेखर यह जानते थे कि वहां ख़तरा है लेकिन उन्होंने चुना कि मैं वहां का हूं और वहीं जाकर काम करूंगा. वे वहां गए और वहां राजद सांसद ने उनकी हत्या करवाई.’

चंदू के व्यक्तित्व के बारे में कविता कहती हैं, ‘जितने लोग चंद्रशेखर को जानते थे, वे जानते थे कि उनमें कुछ ख़ास बात थी. वे कोई बहुत करिश्माई नेता नहीं थे. उनकी ख़ास बात थी कि वे 24 घंटे लोगों के लिए समर्पित रहते थे. साधारण से साधारण छात्र कभी भी उनके पास जाकर मदद मांगता था और वे प्रस्तुत रहते थे. जनता के लिए उनमें वास्तविक प्रेम था. उनका समर्पण उनकी ख़ास बात थी. उनके सीवान जाने के बाद विरोधियों को पता था कि वे एक जननेता के रूप में उभर रहे हैं. इस ख़तरे से बचने के लिए उनकी हत्या कर दी गई.’

उनके अनन्य सहयोगी रहे प्रणय कृष्ण के पास उनके बारे में बहुत सारे किस्से हैं. वे बताते हैं, ‘दिल्ली के बुद्धिजीवियों, शिक्षकों, छात्रों आैैर पत्रकारों के साथ उनका गहरा रिश्ता था. वे बड़े से बड़े बुद्धिजीवी से लेकर रिक्शावालों, डीटीसी के कर्मचारियों और झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वालों को समान रूप से अपनी राजनीति समझा ले जाते थे. महिलाओं में वे प्राय: लोकप्रिय थे क्योंकि जहां भी जाते खाना बनाने से लेकर, सफाई करने तक और बतरस में उनके साथ घुलमिल जाते. छोटे बच्चों के साथ उनका संवाद सीधा और गहरा था.’

प्रणय कृष्ण कहते हैं, ‘हाॅस्टल में चंदू का कमरा अनेक ऐसे छात्रों और विद्रोह करने वालों, विरल संवेदनाओं वाले लोगों की आश्रयस्थली था जो कहीं और एेडजस्ट नहीं कर पाते थे. मेस बिल न चुका पाने के कारण छात्रसंघ का अध्यक्ष होने के बावजूद उनके कमरे में प्रशासन का ताला लग जाता. उनके लिए तो जेएनयू का हर कमरा खुला रहता, लेकिन अपने आश्रितों के लिए वे चिंतित रहते. एक बार मेस बिल जमा करने के लिए उन्हें 1600 रुपये इकट्ठा करके दिए गए. अगले दिन पता चला कि कमरा फिर भी नहीं खुला. चंदू ने बड़ी मासूमियत से बताया कि 800 रुपये उन्होंने किसी दूसरे लड़के को दे दिए क्योंकि उसे ज़्यादा ज़रूरत थी.’

जेएनयू के छात्र आज जिस तरह देश भर के दलितों, महिलाओं, मजदूरों, छात्रों आदि के मुद्दे पर सक्रिय रूप में आंदोलन छेड़ते हैं, इसकी बुनियाद में चंदू का बहुत बड़ा योगदान है. जेएनयू में फीस न बढ़ने देने, आरक्षण लागू होने, विश्वविद्यालय के निजीकरण का विरोध करने जैसे मुद्दों पर उन्होंने निर्णायक लड़ाई लड़ी.

प्रणय कृष्ण बताते हैं, ‘जेएनयू छात्रसंघ को उन्होंने देश भर, यहां तक कि देश से बाहर चलने वाले जनतांत्रिक आंदोलनों से जोड़ दिया. चाहे बर्मा का लोकतंत्र बहाली आंदोलन हो, चाहे पूर्वोत्तर के राज्यों में जातीय हिंसा के ख़िलाफ़ बनी शांति कमेटियां हों, नर्मदा बचाओे आंदोलन हो या टिहरी आंदोलन हो- चंद्रशेखर उन सारे आंदोलनों के अनिवार्य अंग थे. उन्होंने बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर-पूर्व प्रांत के सुदूर क्षेत्रों की यात्राएं भी की थीं. आज़ाद हिंदुस्तान के किसी एक छात्र नेता ने छात्र आंदोलन को ही सारे जनतांत्रिक आंदोलनों से जोड़ने का इतना व्यापक कार्य अगर किया तो सिर्फ़ चंद्रशेखर ने. यह अतिशयोक्ति नहीं है.’

चंद्रशेखर के समय आइसा के राष्ट्रीय अध्यक्ष रह चुके वी. शंकर कहते हैं, ‘चंदू मास लीडर था. वह होता तो जनता का नेता होता. वह हमारा बहुत महत्वपूर्ण कॉमरेड था. जेएनयू में अध्यक्ष बनने के बावजूद उसने गांव जाकर काम करने को तवज्जो दी और वहां उसे ख़ूब समर्थन मिल रहा था. चंदू की हत्या के बाद सीवान में हुई रैली ऐतिहासिक थी. वह बेहद पढ़ा लिखा, समझदार और जनता की आकांक्षाओं को समझने वाला नेता था, जिसे मार दिया गया.’

जिन लोगों को युवा नेतृत्व में भरोसा है, उनके लिए चंद्रशेखर एक बहुत बड़ी उम्मीद का नाम था, जिसे यह देश संभाल नहीं पाया. चंदू में एक अंतरराष्ट्रीय नेता के रूप में उभरने की संभावनाएं भी मौजूद थीं.

प्रणय अपने एक लेख में लिखते हैं, ‘1995 में दक्षिणी कोरिया में आयोजित संयुक्त युवा सम्मेलन में वे भारत का प्रतिनिधित्व कर रहे थे. जब वे अमेरिकी साम्राज्यवाद के खिलाफ राजनीतिक प्रस्ताव लाए तो उन्हें यह प्रस्ताव सदन के सामने नहीं रखने दिया गया. समय की कमी का बहाना बनाया गया. चंद्रेशेखर ने वहीं आॅस्ट्रेलिया, पाकिस्तान, बांग्लादेश और तीसरी दुनिया के देशों के अन्य प्रतिनिधियों का एक ब्लाॅक बनाया और सम्मेलन का बहिष्कार कर दिया. इसके बाद वे कोरियाई एकीकरण और भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ चल रहे ज़बरदस्त कम्युनिस्ट छात्र आंदोलन के भूमिगत नेताओं से मिले और सियोल में बीस हज़ार छात्रों की एक रैली को संबोधित किया. यह एक ख़तरनाक काम था जिसे उन्होंने वापस डिपोर्ट कर दिए जाने का ख़तरा उठाकर भी अंजाम दिया.’

भाकपा माले की नेता कविता कृष्णन का आरोप है, ‘चंदू की हत्या के मुख्य आरोपियों को तो सज़ा नहीं हुई. शूटरों को सज़ा हुई थी. लेकिन अब ऐसा सुनने में आ रहा है कि उन्हें भी छोड़ने की कोशिश की जा रही है.’

चंदू के बारे में एक मशहूर घटना है. 1993 में छात्रसंघ के चुनाव के दौरान छात्रों से संवाद में किसी ने उनसे पूछा, ‘क्या आप किसी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा के लिए चुनाव लड़ रहे हैं?’ इसके जवाब में उन्होंने कहा था, ‘हां, मेरी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा है- भगत सिंह की तरह जीवन, चे ग्वेरा की तरह मौत.’ उनके दोस्त गर्व से कहते हैं कि चंदू ने अपना वायदा पूरा किया.

  • Anil Kumar

    बहुत ही उम्दा लेख.