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‘रिटायरमेंट के बाद जजों को नियुक्ति देना अदालतों को प्रभावित करने में सरकार की मदद करता है’

2012 में अरुण जेटली ने कहा था कि रिटायरमेंट के फौरन बाद जजों को किसी नए सरकारी पद पर नियुक्त करना न्यायपालिका की स्वतंत्रता के लिए ख़तरनाक हो सकता है, लेकिन उनकी इस सलाह को उनकी ही सरकार में कोई तवज्जो नहीं दी गई है.

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(बाएं से) जस्टिस एकेगोयल, जस्टिस आरके अग्रवाल, जस्टिस पी. सदाशिवम और अरुण जेटली

‘सेवानिवृत्ति से पहले लिए गए फैसले सेवानिवृत्ति के बाद मिलने वाले पद की चाहत से प्रभावित होते हैं…मेरी सलाह है कि सेवानिवृत्ति के बाद दो सालों (नियुक्ति से पहले) का अंतराल होना चाहिए अन्यथा सरकार प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से अदालतों को प्रभावित कर सकती है और एक स्वतंत्र, निष्पक्ष और ईमानदार न्यायपालिका कभी भी वास्तविकता नहीं बन पाएगी.’

                                  – विपक्ष के नेता के तौर पर अरुण जेटली 2012 में

हाल के दिनों में की गई तीन नियुक्तियों ने सेवानिवृत्ति के बाद सरकार की ओर से पेश की गई नियुक्तियों को स्वीकार करने को लेकर जजों के विवेक पर फिर से बहस छेड़ दी है.

6 जुलाई को जस्टिस एके गोयल को सुप्रीम कोर्ट के जज के रूप में सेवानिवृत्त होने वाले दिन ही नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) का चेयरमैन नियुक्त किया गया है. इससे पहले मई के आखिरी हफ्ते में जस्टिस आरके अग्रवाल को नेशनल कंज्यूमर रिड्रेसल कमीशन (एनसीडीआरसी) का उनके सुप्रीम कोर्ट से सेवानिवृत्त होने के कुछ ही हफ्ते के अंदर चेयरमैन बनाया गया था.

ऐसे ही केरल हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस एंटोनी डोमिनिक के सेवानिवृत्त होने के बाद एक हफ्ते के अंदर ही मई के आखिरी हफ्ते में केरल सरकार ने राज्य मानवाधिकार आयोग का अध्यक्ष नियुक्त किया गया था.

सेवानिवृत्ति के कुछ ही दिनों के बाद हुए इन तीन नियुक्तियों पर कुछ लोगों ने सवाल खड़े किए हैं. सेवानिवृत्ति के तुरंत बाद हुई नियुक्तियों से पता चलता है कि इन नियुक्तियों को लेकर फैसले संबंधित सरकारों ने पहले ही यानी जजों के कार्यकाल के दौरान ही ले लिए थे. यहां तक कि सेवानिवृत्ति से पहले बार के सदस्यों के बीच इन नियुक्तियों पर अंतिम मुहर को लेकर अफवाहें चल रही थीं.

इससे निश्चित तौर पर उन फैसलों पर सवाल उठते हैं जिन मामलों में संबंधित सरकारों के दांव लगे हुए थे क्योंकि अर्ध-न्यायिक (क्वासी-जुडिशल) इकाइयों की नियुक्तियों में सरकार की बड़ी भूमिका होती है.

विडंबना यह है कि जस्टिस एके गोयल, जिन्हें केंद्र सरकार ने उनके सेवानिवृत्ति के दिन ही एनजीटी का चेयरमैन नियुक्त किया है, उनकी अगुवाई वाली बेंच रोजर मैथ्यू बनाम साउथ इंडियन बैंक लिमिटेड मामले में ट्रिब्यूनल के पुनर्गठन का मुद्दा देख रही थी. वहां एमीकस क्यूरी वरिष्ठ वकील अरविंद पी दातार ने ये  सुझाव दिए थे:

‘ट्रिब्यूनल सेवानिवृत्त होने वाले व्यक्ति के लिए सर्वश्रेष्ठ विकल्प नहीं होना चाहिए और अगर सरकार एक ही समय में किसी मामले की वादी और नियुक्ति करने वाली इकाई भी है तो नियुक्ति की प्रक्रिया से किसी मामले के फैसले पर प्रभाव नहीं पड़ना चाहिए. सेवानिवृत्त होने के बाद किसी भी नियुक्ति को स्वीकार करने पर पाबंदी होनी चाहिए.’

बेंच जब ट्रिब्यूनल के पुनर्गठन का मामला देख रही थी तब उसने कहा था कि उसने इस अवधारणा को ‘व्यापक रूप से माना’ है. यह बहस इस संदर्भ को ध्यान में रखते हुए और भी गंभीर हो जाती है कि इन जजों ने अपने कार्यकाल के अंतिम दिनों में कई संवेदनशील मुद्दों की सुनवाई की है.

जस्टिस आरके अग्रवाल ने उस बेंच का नेतृत्व किया था, जिसने सीबीआई के विशेष निदेशक के तौर पर आरके आस्थाना की केंद्र सरकार द्वारा नियुक्ति के फैसले पर सवाल उठाने वाली याचिका को ख़ारिज किया था.

इसके अलावा आरके अग्रवाल उस बेंच के अध्यक्ष थे जो प्रसाद एजुकेशन ट्रस्ट पर लगे भ्रष्टाचार के कथित मामलों की जांच की मांग करने वाली याचिका पर सुनवाई कर रही थी. इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया था.

जस्टिस आरके अग्रवाल विशेष रूप से गठित उस बेंच का भी हिस्सा थे, जिसने जस्टिस चेलमेश्वर के बेंच के उस आदेश को रद्द कर दिया था, जिसमें मेडिकल कॉलेज रिश्वत मामले में विशेष जांच के आदेश दिए गए थे. यानी जस्टिस अग्रवाल उन मामलों को देख रहे थे जिसमें सरकार और भारत के मुख्य न्यायाधीश शामिल थे.

एनसीडीआरसी के चेयरमैन की नियुक्ति केंद्र सरकार और भारत के मुख्य न्यायाधीश के परामर्श से होती है. सेवानिवृत्ति के तुरंत बाद मिलने वाली नियुक्ति को देखते हुए अगर कोई इन मामलों में आए फैसलों को सवालिया नजर से देखने पर मजबूर होता है तो उसे गलत नहीं ठहराया जा सकता है.

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केरल के मुख्यमंत्री पी. विजयन और राज्यपाल पी. सदाशिवम के साथ जस्टिस डोमिनिक (बाएं) (फोटो साभार: लाइव लॉ)

जहां तक केरल हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस एंटोनी डोमिनिक का सवाल है तो वो ऐसे मामलों को देख रहे थे जो केरल की सत्तारूढ़ पार्टी को राजनीतिक रूप से प्रभावित करने में सक्षम थीं.

यहां किसी भी तरह से यह नहीं कहा जा रहा कि उनके दिए फैसले गलत या फिर पक्षपात पूर्ण थे. यहां इन तथ्यों के आधार पर सिर्फ यह कहने की कोशिश की जा रही है कि सेवानिवृत्ति के तत्काल बाद होने वाली जजों की नियुक्तियों से उनके दिए फैसलों पर संदेह की गुंजाइश की संभावना बन जाती है भले ही वे फैसले सही हो.

चूंकि ऐसा माना जाता है कि किसी तरह के पक्षपात से न्यायिक प्रक्रिया की शुचिता पर सवाल नहीं उठते, बल्कि किसी पक्षपात की संभावना, जो वास्तविकता के आधार पर ही बनी हो, न्यायिक प्रक्रिया को ज्यादा नुकसान पहुंचाती है. इसलिए बार-बार यह कहा-सुना भी जाता है कि इंसाफ न केवल होना चाहिए, बल्कि ऐसा दिखना भी चाहिए कि इंसाफ हुआ है.

इसी तरह के सवाल उस वक्त भी उठे थे जब भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश पी सदाशिवम को सितंबर 2014 में केरल का राज्यपाल बनाया गया था. इस फैसले की यह कहते हुए खूब आलोचना हुई थी कि उन्हें सत्तारूढ़ दल की मदद करने का इनाम मिला है.

जस्टिस सदाशिवम ने हालांकि इस बात से इनकार किया था कि उनकी नियुक्ति का तुलसीराम प्रजापति मामले में भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के खिलाफ दायर की गयी दूसरी एफआरआई को खारिज करने के उनके फैसले के साथ कोई लेना-देना है.

केरल के राज्यपाल के रूप में जस्टिस सदाशिवम को उस समय काफी शर्मनाक स्थिति का सामना करना पड़ा था जब सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलटने के लिए लाए गए सरकारी अध्यादेश पर उन्हें हस्ताक्षर करना था और उस अध्यादेश पर बाद में सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा दी थी.

जजों के कार्यपालिका के अंतर्गत नियुक्तियों को स्वीकार करने से हितों के टकराव की स्थितियां पैदा होती हैं. हाल ही में ‘मास्टर ऑफ रोस्टर’ मामले में सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया कि जनता का विश्वास ही न्यायपालिका की सबसे बड़ी पूंजी है और कहा,

‘लोगों का विश्वास वो पत्थर की नींव है जिस पर न्याययिक समीक्षा की इमारत और किसी निर्णय का प्रभाव टिका हुआ है. जनता के दिमाग में न्यायपालिका की विश्वसनीयता को लेकर गिरावट आना, फिर चाहे उसकी कोई भी वजह हो न्यायपालिका की स्वतंत्रता के लिए बहुत बड़ा खतरा है.’

सेवानिवृत्ति के तत्काल बाद मिलने वाली नियुक्तियों को स्वीकार करने से निश्चित रूप से न्यायपालिका की स्वतंत्रता को लेकर जनता के विश्वास को ठेस लगती है. जस्टिस चेलमेश्वर ने घोषणा की है कि वे सेवानिवृत्ति के बाद सरकार की ओर से मिलने वाली किसी भी नियुक्ति को स्वीकार नहीं करेंगे. जस्टिस कुरियन जोसेफ ने भी इस तरह की किसी भी नियुक्ति को स्वीकार करने को लेकर अपनी अनिच्छा प्रकट की है.

इन दोनों के मुताबिक न्यायपालिका और कार्यपालिका को एक दूसरे के प्रति प्रशंसा का भाव रखने के बजाए एक दूसरे पर निगरानी रखनी चाहिए और सेवानिवृत्ति के बाद मिलने वाली नियुक्तियां अक्सर न्यायपालिका की स्वतंत्रता में गिरावट की वजह बन सकती हैं.

इस साल की शुरुआत में केरल हाईकोर्ट से सेवानिवृत्त हुए जज जस्टिस बी कमाल पाशा ने अपने विदाई समारोह में विवादास्पद टिप्पणी करने के साथ इस चलन के खिलाफ भी बोला था. उन्होंने कहा था,

‘जब एक जज सेवानिवृत्ति के बाद सरकार से किसी नियुक्ति की उम्मीद कर रहा हो तो वो आमतौर पर अपने सेवानिवृत्ति के आखिरी साल में सरकार को नाखुश नहीं करना चाहेगा. यह एक आम शिकायत है कि ऐसे जज सेवानिवृत्ति के बाद मिलने वाली नियुक्तियों की उम्मीद में सरकार को नाखुश करने की हिम्मत नहीं दिखाते.’

उन्होंने जस्टिस एसएच कपाड़िया और जस्टिस टीएस ठाकुर के कहे शब्दों को भी याद करते हुए कहा कि किसी भी जज को किसी भी सरकार से मिलने वाली वेतनभोगी नौकरियों को, कम से कम सेवानिवृत्ति के बाद के तीन साल के ‘कूलिंग पीरियड’ में स्वीकार नहीं करना चाहिए.

साथ ही साथ सेवानिवृत्त होने वाले जजों के व्यापक अनुभव और उनकी गहरी अंतर्दृष्टि को यूं ही गंवा देना भी एक आदर्श स्थिति नहीं है. इसके लिए एक व्यापक प्रणाली विकसित करनी होगी जिसकी मदद से सेवानिवृत्त जजों की क्षमता का उचित इस्तेमाल किया जा सके.

वर्तमान में ज्यादातर वैधानिक आयोगों और ट्रिब्यूनल की अगुवाई सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त जज कर रहे हैं. इस संदर्भ में भारत के पूर्व मुख्य न्यायधीशों जस्टिस कपाड़िया, लोढ़ा और टीएस ठाकुर के ‘कूलिंग पीरियड’ के दिए सुझाव प्रासंगिक हैं. जस्टिस लोढ़ा ने कहा था कि वे सेवानिवृत्ति के बाद दो सालों तक कोई भी लाभ नहीं लेंगे.

अरुण जेटली ने नेता प्रतिपक्ष की हैसियत से राज्यसभा में 2012 में जजों के लिए ‘कूलिंग पीरियड’ की वकालत की थी. उन्होंने कहा था कि, ‘सेवानिवृत्ति से पहले लिए गए फैसले सेवानिवृत्ति के बाद मिलने वाले पद की चाहत में प्रभावित होते हैं… मेरी सलाह है कि सेवानिवृत्ति के बाद दो सालों (नियुक्ति से पहले) का अंतराल होना चाहिए अन्यथा सरकार प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से अदालतों को प्रभावित कर सकती है और एक स्वतंत्र, निष्पक्ष और ईमानदार न्यायपालिका कभी भी वास्तविकता नहीं बन पाएगी.’

लेकिन विडंबना देखिए कि जेटली की पार्टी के सत्ता में आने के दौरान ही इन तीन जजों जस्टिस पी सदाशिवम, जस्टिस अग्रवाल और जस्टिस गोयल की सेवानिवृत्ति के तत्काल बाद नियुक्तियां की गई हैं. साथ ही मौजूदा सरकार ने वित्त अधिनियम, 2017 में कई ऐसे प्रावधान शामिल किए हैं जो न्यायिक स्वतंत्रता की जड़ों को काटते हैं.

ये प्रावधान ऐसे हैं जो कई अर्ध-न्यायिक निकायों जैसे एनजीटी, एनसीडीआरसी की स्वतंत्र कार्यशैली को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं. वे कई ट्रिब्यूनल के मूल कानूनों को संशोधित करने वाले हैं और नियम बनाने के जरिए केंद्र सरकार को नियुक्ति और योग्यता निर्धारित करने का अधिकार देते हैं. इस तरह से ट्रिब्यूनल की संरचना और उसका काम-काज कार्यपालिका के नियम निर्धारण करने से हो सकता है.

इन प्रावधानों को सुप्रीम कोर्ट में इस आधार पर चुनौती दी गई है कि ये प्रावधान शक्तियों के बंटवारे के सिद्धांत का उल्लंघन करते हैं और निकायों की स्वतंत्रता और स्वायत्ता को खोखला करते हैं. इसे मुद्दे पर मद्रास हाईकोर्ट ने फैसला दिया है कि 2017 के संशोधनों के मुताबिक होने वाली सभी नियुक्तियां संशोधन को चुनौती देने वाली याचिकाओं के अंतिम परिणाम के अधीन होंगी.

मद्रास बार एसोसिएशन बनाम यूनियन ऑफ इंडिया केस में, सुप्रीम कोर्ट के संविधान खंडपीठ ने नेशनल टैक्स ट्रिब्यूनल को असंवैधानिक माना था क्योंकि इसका गठन न्यायिक स्वतंत्रता और शक्तियों के बंटवारे के सिद्धांत को दरकिनार कर के हुआ था, जो संविधान की मूलभूत विशेषताएं हैं.

इस मामले में कोर्ट ने कहा था, ‘यह स्वीकार करना संभव नहीं है कि मुकदमे में शामिल कोई पार्टी उस चयन प्रक्रिया की भागीदार हो सकती है जिससे कि किसी न्यायिक निकाय के अध्यक्ष और सदस्य चुने जाते हो.’

उम्मीद की जाती है कि सभी पक्ष इन सारी बातों का ख्याल रखें. कम से कम सरकार के एक धड़े से निकल कर आसानी से दूसरे धड़े में जाना गरिमामयी आचरण तो बिल्कुल नहीं है.

(लेखक केरल हाईकोर्ट में वकील हैं.)

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