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आर्थिक सलाहकार परिषद के अध्यक्ष ने कहा, न्यायपालिका ने ख़ुद को सुधारने में कुछ ख़ास नहीं किया

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आर्थिक सलाहकार परिषद के अध्यक्ष बिबेक देबरॉय ने यह भी कहा कि जजों की नियुक्ति में टैक्सपेयर्स का बहुत ज़्यादा पैसा ख़र्च होता है और जज की पद के लिए ख़ाली 25 प्रतिशत पोस्ट कोई बड़ी बात नहीं है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आर्थिक सलाहकार परिषद के अध्यक्ष बिबेक देबरॉय. (फोटो: पीटीआई)

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आर्थिक सलाहकार परिषद के अध्यक्ष बिबेक देबरॉय. (फोटो: पीटीआई)

नई दिल्ली: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आर्थिक सलाहकार परिषद के अध्यक्ष बिबेक देबरॉय का कहना है कि न्यायपालिका में करीब 25 प्रतिशत सीटें खाली हैं और सरकारी तंत्र में 25 प्रतिशत रिक्तियां बहुत अधिक नहीं होती हैं.

देबरॉय का ये बयान ऐसे समय पर आया है जब सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से बार-बार ये कहा कि वे कॉलेजियम द्वारा सिफारिश किए गए जजों की नियुक्ति को पूरा करें. नियुक्ति नहीं करने की वजह से कोर्ट में विचाराधीन मामलों का भार बढ़ता जा रहा है.

बिबेक देबरॉय ने पीएचडी चैंबर ऑफ कॉमर्स द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में कहा कि देश को अधिक न्यायाधीशों की क्या जरूरत है जब इसमें करदाताओं की भारी राशि खर्च होती है.

उन्होंने कहा, ‘न्यायाधीश के हर एक पद पर चालू खर्च पांच करोड़ रुपये और पूंजीगत खर्च 10 करोड़ रुपये सालाना होता है. यह पैसा कहीं न कहीं से तो आएगा. क्या हम नागरिक इसके लिए यह भारी राशि का वहन करने को तैयार हैं?’

बता दें कि सुप्रीम कोर्ट में इस समय कुल स्वीकृत 31 जजों में से सिर्फ 22 जज ही हैं, बाकी के 9 पद अभी भी खाली पड़े हैं जिस पर नियुक्तियां होनी हैं. देबरॉय ने सुप्रीम कोर्ट की छुट्टियों पर सवाल उठाते हुए कहा, ‘सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश निचली अदालतों के न्यायाधीशों की तुलना में अधिक छुट्टियों का लुत्फ उठाते हैं. निचली अदालतों के जजों को कम छुट्टियां मिलती हैं.’

उन्होंने कहा कि पुलिस विभाग और विश्वविद्यालय जैसा कोई भी महत्वपूर्ण विभाग छुट्टियों में बंद नहीं होते हैं तो सुप्रीम कोर्ट क्यों बंद किया जाता है. हालांकि आपको बता दें कि गर्मियों की छुट्टी के दौरान सुप्रीम कोर्ट पूरी तरह से बंद नहीं होता है. इस दौरान कोर्ट में कम से कम दो अवकाश पीठ होती है जो कि छुट्टियों में भी मामले की सुनवाई करती है.

हाल ही में उत्तराखंड हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस केएम जोसेफ की नियुक्ति को लेकर सुप्रीम कोर्ट और मोदी सरकार के बीच काफी विवाद हुआ था. सुप्रीम कोर्ट के कॉलेजियम ने जस्टिस जोसेफ के नाम की सिफारिश की थी लेकिन केंद्र सरकार ने अपनी आपत्ति जताते हुए जस्टिस जोसेफ को सुप्रीम कोर्ट में नियुक्त करने से मना कर दिया था.

कॉलेजियम के तत्कालीन सदस्य जस्टिस चेलमेश्वर ने कहा था कि केंद्र सरकार ने कॉलेजियम के फैसले के खिलाफ जो भी तर्क दिया है वो अपर्याप्त और आधारीन है. जस्टिस जोसेफ बेहतरीन जजों में से एक हैं और उन्हें जरूर सुप्रीम कोर्ट में नियुक्त किया जाना चाहिए.

आरोप है कि मोदी सरकार ने केएम जोसेफ के अलावा कई अन्य न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए की सिफारिश पर कोई फैसला नहीं लिया है. कोर्ट में जजों की कमी की वजह से विचाराधीन मामलों की संख्या बढ़ती जा रही है.

वहीं सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि न्यायिक नियुक्तियों और उच्चतर न्यायपालिका में खाली पदों को भरने के लिये कदम उठाए जा रहे हैं. मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा, न्यायमूर्ति एएम खानविल्कर और न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड़ की पीठ ने कहा कि कॉलेजियम इस संबंध में कदम उठा रहा है.

सुप्रीम कोर्ट ने दो जुलाई को मद्रास बार संघ की याचिका पर सुनवाई के दौरान इसी तरह की टिप्पणी करते हुए कहा था कि न्यायिक नियुक्तियों के संबंध में कुछ प्रगति हुई है.

पीठ इस मामले में यूथ बार एसोसिएशन ऑफ इंडिया द्वारा दायर जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही है. याचिका में सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम और कलकत्ता हाईकोर्ट कॉलेजियम को हाईकोर्ट में रिक्तियों को भरने का निर्देश देने की मांग की है.

(समाचार एजेंसी भाषा के इनपुट के साथ)

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