भारत

कोई नहीं जानता, अपने अधपके स्वरूप में जीएसटी क्या गुल खिलाएगा

वैश्विक अनुभव बताते हैं कि वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) को जिन देशों में लागू किया गया वहां इसने अर्थव्यवस्था में छोटी अवधि से लेकर मध्यम अवधि तक का गंभीर व्यवधान उत्पन्न किया. भारत में जीएसटी के अधपके स्वरूप से हमें इससे बेहतर की उम्मीद नहीं करनी चाहिए.

A man sits on top of a rickshaw loaded with card boxes at a wholesale market in the old quarter of Delhi, India, August 2, 2016. REUTERS/Adnan Abidi

(फाइल फोटो: रॉयटर्स)

हाल में आई एक अखबारी रिपोर्ट में कहा गया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 1 जुलाई से लागू किये जा रहे वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) के केंद्रीय संदेश को देश के कोने-कोने तक लेकर जाना चाहते हैं. जीएसटी एक जटिल अप्रत्यक्ष कर प्रणाली है. मोदी अपनी टीम के साथ मिलकर इसके फायदों को राजनीतिक संदेश में ढालकर किस तरह व्यापक जनता तक पहुंचाते हैं, यह देखना वास्तव में दिलचस्प होगा.

कोई शक नहीं कि प्रधानमंत्री के पास राजनीतिक संवाद कायम करने की जबरदस्त क्षमता है. प्रधानमंत्री के तौर पर शपथ लेने के बाद लगभग डेढ़ साल तक खुद मोदी ने जीएसटी के बारे में ज्यादा बातें नहीं की. उन्होंने इस मुद्दे पर सर्वसम्मति बनाने का काम लगभग पूरी तरह वित्त मंत्री अरुण जेटली पर छोड़ दिया.

लेकिन, पिछले साल के मध्य के आसपास से मोदी ने जीएसटी को एक ऐसे गरीब हितैषी सुधार के तौर पर प्रचारित करना शुरू कर दिया था जिसका फायदा खासतौर से देश के सबसे गरीब राज्यों की बड़ी आबादी को होगा. निश्चित ही यह जीएसटी के पक्ष में एक अच्छा दांव था.

भाजपा की कुल लोकसभा सीटों का 60 फीसदी से ज्यादा इन्हीं मुख्यतः उपभोग पर टिके गरीब राज्यों से आता है, जिन्हें मोदी के हिसाब से जीएसटी का काफी फायदा होना है. संभवतः इस उपभोग आधारित कर का सबसे ज्यादा फायदा उत्तर प्रदेश को होगा. आने वाले वर्षों में यूपी के राजस्व संग्रह में उल्लेखनीय इजाफा हो सकता है.

इससे भाजपा को यूपी में कल्याण और बुनियादी ढांचा निर्माण की योजनाओं में ज्यादा खर्च करने में निश्चित ही मदद मिलेगी. इसलिए अगर सरकार जीएसटी को गरीबों की बड़ी आबादी वाले राज्यों के लिए फायदेमंद नुस्खे के तौर पर प्रचारित कर रही है, तो इसका कारण समझ में आता है.

जीएसटी के इर्द-गिर्द बुने जा रहे राजनीतिक संदेश का एक दूसरा आयाम भी है. इसके मुताबिक जीएसटी एक ज्यादा पारदर्शी राजनीतिक अर्थव्यवस्था के निर्माण की ज्यादा बड़ी योजना का एक हिस्सा है. नोटबंदी और डिजिटाइजेशन भी इसी योजना के अभिन्न अंग हैं.

अंततः एक साझा बाजार के निर्माण के अलावा जीएसटी का एक मुख्य लक्ष्य अर्थव्यवस्था को ज्यादा औपचारिक रूप देना है. ऐसा अनौपचारिक व्यवसायों को जीएसटी नेटवर्क के तहत रजिस्टर करके हासिल किया जाना है. इसका एक घोषित उद्देश्य यह पक्का करना भी है कि ऐसे कारोबारों के ग्राहक उनसे न छिटकें.

जीएसटी नेटवर्क के पीछे तर्क यह दिया जा रहा है कि खुद को रजिस्टर नहीं कराने वाले कारोबारों से ग्राहक किनारा कर सकते हैं. क्योंकि इलेक्ट्रानिक रूप से संचालित नेटवर्क में वैल्यू चेन के हिस्से के तौर पर औपचारिक रूप से न जुड़ने वाले कारोबारों से खरीदारी करने पर ग्राहकों को इनपुट क्रेडिट का लाभ नहीं मिलेगा.

यह देश के व्यापारों से जुड़े लाखों वैल्यू चेनों को डिजिटाइज करने का भी एक तरीका है. कुल मिलाकर मोदी का राजनीतिक संदेश यह हो सकता है कि नोटबंदी, डिजिटाइजेशन और अब जीएसटी का क्रियान्वयन एक ज्यादा स्वच्छ अर्थव्यवस्था का निर्माण करेगा और भविष्य में काले धन के निर्माण को हतोत्साहित करेगा और मौजूदा काले धन को भी कम करेगा.

राजनीतिक संदेश को थोड़ा परे रख दिया जाए, तो जमीन पर जीएसटी के परिणाम काफी अलग हो सकते हैं. पहली बात, जीएसटी को लेकर वैश्विक अनुभव हमें बताते हैं कि जीएसटी लागू करने वाले ज्यादातर देशों में अर्थव्यवस्था में छोटी अवधि से लेकर मध्य अवधि तक का गंभीर व्यवधान देखा गया.

मुद्रास्फीति बढ़ गयी और उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि नहीं देखी गयी. वास्तव में जिन देशों में जीएसटी लागू किया गया, वहां सत्ताधारी दल चुनाव हार गये. लेकिन, साथ ही यह भी सही है कि ज्यादातर देशों ने कम या ज्यादा कमियों और अपूर्णता के साथ ही जीएसटी को लागू किया.

भारत में भी जीएसटी ऐसी ही अपूर्णताओं से लैस है. कुछ समय पहले मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमन्यम ने यह बात स्वीकार भी की थी. मेरे हिसाब से कुछ अपूर्णताएं इतनी प्रकट हैं कि वे जीएसटी को सवालों को घेरे में ला खड़ी करती हैं.

A labourer prepares to unload sacks of potatoes from a truck at a wholesale vegetable and fruit market in New Delhi July 2, 2014. REUTERS/Anindito Mukherjee/Files

(फाइल फोटो: रॉयटर्स)

बात यहां से शुरू की जा सकती है- जेटली ने राज्यों के साथ एक चालाक और सुविधाजनक समझौता करते हुए पेट्रोलियम उत्पादों, शराब और रियल एस्टेट डेवलपमेंट को जीएसटी के दायरे से बाहर रखा है. यह समझौता साधारण जनता के लिए घाटे का सौदा साबित हो सकता है, क्योंकि केंद्र और राज्य, दोनों सरकारें आज की ही तरह पेट्रो उत्पादों पर लगनेवाले करों के साथ मनमाने ढंग से खिलवाड़ कर सकती हैं.

दरों में इस लचीलेपन को इसलिए बरकरार रखा गया है, क्योंकि केंद्र और राज्य के लिए ये राजस्व का मुख्य स्रोत हैं. अगर, तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमतों में गिरावट आती है, तो केंद्र और राज्य सरकारें इसका फायदा जनता को पहुंचाने की बजाय खुलकर पेट्रोलियम पर लगाया गया कर बढ़ा सकती हैं.

काले धन का सृजन करने के मामले में शराब और रियल एस्टेट सबसे आगे हैं. पिछले साल मोदी और जेटली दोनों ने सार्वजनिक तौर पर यह घोषणा की थी कि काले धन पर नोटबंदी के वार के बाद, वे काले धन की अर्थव्यवस्था के सबसे बड़े हिस्से- रियल एस्टेट पर हमला करेंगे.

इसी मकसद से सरकार ने बेनामी कानून को और कड़ा बना दिया. लेकिन आखिर वे रियल एस्टेट डेवेलपमेंट को जीएसटी के वृत्त से बाहर क्यों रख रहे हैं?

आखिर क्यों न, हर रियल एस्टेट डेवेलपर के लिए, फिर चाहे वह छोटा हो या बड़ा, जीएसटी नेटवर्क में शामिल होना अनिवार्य किया जाए और उन्हें जमीन की खरीद से शुरू होने वाली वैल्यू चेन को पारदर्शी तरीके से जाहिर करने के लिए कहा जाए?

लेकिन ऐसा करने से हर खित्ते के राजनीतिक नेताओं को नुकसान पहुंचेगा. तो क्या इसीलिए रियल एस्टेट डेवेलपर्स को काले धन का इंतजाम करने के लिए कुछ समय मिलना चाहिए!

इन हकीकतों के आईने में, कोई यह यकीन के साथ नहीं कह सकता कि आने वाले वर्षों में इस अधपके जीएसटी का अर्थव्यवस्था पर क्या प्रभाव पड़ेगा. एक बड़ा खतरा यह है कि इसे तब लागू किया जा रहा है, जब अर्थव्यवस्था पहले ही नोटबंदी के नकारात्मक प्रभावों से उबरने के लिए जूझ रही है.

कम अवधि के भीतर नोटबंदी और जीएसटी को एक के बाद एक लागू करना, कम प्रतिरोधी क्षमता वाले मरीज को एस्टेरायड का हेवी डोज खिलाने के समान ही है. फिलहाल अर्थव्यवस्था की सेहत अच्छी नहीं है.

नवीनतम आंकड़े बता रहे हैं कि जनवरी और फरवरी में सीमेंट और स्टील की खरीद में गिरावट आयी है. बैंकों का क्रेडिट विकास, 54 वर्षों के अपने न्यूनतम स्तर पर है. कपड़ा, चमड़ा, इंजीनियरिंग, आईटी, टूरिज्म जैसे श्रम सघन क्षेत्रों में रोजगार सृजन की दर बेहद कम है.

2016-17 के अप्रैल से लेकर अक्टूबर तक महज एक लाख से कुछ लोगो को रोजगार दिया गया. और यह बात ध्यान रखने वाली है कि यह नोटबंदी से पहले का आंकड़ा है. खुलकर कहा जाए, तो जीएसटी का ऐसी अर्थव्यवस्था पर क्या असर पड़ेगा, इसके बारे में सोचने से मुझे घबराहट होती है.

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