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क्या हिंदी गीतों में कोई दूसरा ‘नीरज’ है जिसे आवाज़ दी जा सके कि गीतों का कारवां उदास है

संस्मरण: प्रख्यात गीतकार और कवि गोपालदास नीरज ख़ुद को जनता का कवि कहते थे. उनका मानना था कि जीवन को जीने के लिए मार्क्स को भी मानना होगा और कबीर को भी.

गीतकार और कवि गोपालदास नीरज. (फोटो: पीटीआई)

गीतकार और कवि गोपालदास नीरज. (फोटो: पीटीआई)

गोपालदास नीरज के जाने के साथ लग रहा है कि कुछ ठहर गया है. क्या हिंदी गीतों में कोई दूसरा नीरज है, जिसे आवाज़ दी जा सके कि कहां हो, गीतों का कारवां उदास है.

नीरज लोकप्रिय कवि थे. हिंदी के विश्वविद्यालयी और बौद्धिक कवियों की एक जमात उन्हें मंचीय कवि मानती रही तो क्या… मंचीय होना, अछूत होना है या फिर जनता से कटा हुआ माना जाना चाहिए.

मंचीय प्रहसनों के दौर में नीरज अपवाद थे. मंच पर नीरज बहुत अच्छा गा तो नहीं पाते थे बस एक अदा उन्होंने विकसित कर ली थी कि लोग उनके दीवाने हो जाते थे, इतने दीवाने कि उनके हाथ चूम लेते थे. रात-रात भर गुज़ार देते थे कि अभी नीरज सुनाने आएंगे.

वर्ष 2011 की एक तपती हुई दोपहर में मैं बरेली के होटल में उनके साथ था. उनके चाहने वालों से भरे हुए कमरे में अचानक एक अभिजात्य महिला आईं.

उनके हाथ में ‘नीरज की पाती’ नाम की किताब थी. उन्होंने बिस्तर पर बैठे नीरज तक पहुंचने का रास्ता मांगा और उनके पास पहुंच गईं. उन्होंने कहा कि मैं आपके गीतों की दीवानी हूं और आपकी भी.

उन्होंने इज़ाज़त मांगी कि क्या उनका हाथ अपने हाथ में ले सकती हैं. उन हाथों को छूकर वह महसूस करना चाहती थीं, जिन्होंने ऐसे गीत रचे कि हिया (हृदय) में जाकर बस गए हैं, अब निकलते ही नहीं.

उन्होंने ‘नीरज की पाती’ को उनके आगे बढ़ा दिया. नीरज ने उसके पहले पन्ने पर अपने दस्तख़त कर दिए, उनका नाम बिना पूछे. 20 साल से यह किताब अपने पास रखे हुए थीं, इस उम्मीद में कि कभी नीरज मिले तो वह किताब को उनके आगे बढ़ा देंगी कि वह इसे बस छू भर लें.

बातचीत में आधी अंग्रेज़ी बरतने वाली उन भद्र महिला से मैं पूछने वाला था कि नीरज के गीतों में ऐसा क्या है? हालांकि नहीं पूछ सका. सामने ख़ुद नीरज बैठे थे.

हालांकि मैंने उनसे इतना ज़रूर पूछ लिया कि क्या आपको नीरज के अलावा किसी और कवि से इतना प्यार है? उन्होंने ‘ना’ में सिर हिलाया और कमरे से निकल गईं.

मुझे लगा वह कहना चाहती हैं, प्रेम गली अति सांकरी जामे दो ना समाय.

यह दीवानापन कितना मदिर… कितना मधुर है. नीरज ने बताया था कि कोई उन्हें बरेली से अनाम ख़त लिखता था. तमाम शहरों से उन्हें प्रेम में डूबे ख़त आते थे.

इन बेनाम ख़तों में उनसे इज़हार-ए-मोहब्बत होता था. इन्हें लिखने वाली ऐसी महिलाएं या युवतियां होती थीं, जिन्होंने उनका चेहरा भी नहीं देखा था. नीरज कहते थे कि उन ख़तों की खुशबू आज भी नहीं गई.

नीरज ने जब यह शब्द मुझसे अलीगढ़ में कहे तो लगा कि यह कोई जादूगर है या कोई सम्मोहन करने वाला है. सोचता था कि इश्क-विश्क क्या इस दुनिया को रत्ती भर भी बदल सकेगा, नहीं. बाद में लगा, जब नीरज को जाना, पढ़ा, उनसे ख़ूब बातें की और ख़ुद प्रेम में डूबा तो ये ‘नहीं’, ‘हां’ में बदल गया.

जब वह गाते थे कि बस यही अपराध में हर बार करता हूं तो लगता था कि यह ‘अपराध’ कितना ज़रूरी है हमारे समय में. आदमी से आदमी के प्यार करने का ‘अपराध’ यह तो ख़त्म हो रहा है. शायद तभी उन्होंने लिखा है…

अब तो मज़हब कोई, ऐसा भी चलाया जाए
जिसमें इनसान को, इनसान बनाया जाए

आग बहती है यहां, गंगा में, झेलम में भी
कोई बतलाए, कहां जाकर नहाया जाए

मेरा मक़सद है के महफिल रहे रोशन यूं ही
ख़ून चाहे मेरा, दीपों में जलाया जाए

मेरे दुख-दर्द का, तुझ पर हो असर कुछ ऐसा
मैं रहूं भूखा तो तुझसे भी ना खाया जाए

जिस्म दो होके भी, दिल एक हो अपने ऐसे
मेरा आंसू, तेरी पलकों से उठाया जाए

गीत गुमसुम है, ग़ज़ल चुप है, रूबाई है दुखी
ऐसे माहौल में, ‘नीरज’ को बुलाया जाए.

इंसान को इंसान बनाने वाले मज़हब की बात करने वाले नीरज को जब एक सस्ता मंचीय कवि घोषित करने की अकुलाहट देखता हूं तो अफ़सोस होता है और उनकी कही यह बात याद आती है कि हर कोई नीरज होना चाहता है लेकिन नीरज होना आसान नहीं है.

उन्होंने कहा भी था कि कवि सम्मेलन उनके लिए घातक साबित हुए क्योंकि हिंदी साहित्य के तथाकथित ठेकेदार इसी आधार पर उनका आकलन करने लगे थे.

उन्हें ‘मंचीय कवि’ का तमगा दे दिया गया था जबकि वह ख़ुद को मंचीय नहीं ‘लोकप्रिय कवि’ कहते थे. वे कहते थे कि मेरे शब्दों में इतनी ताक़त है कि लोग झूम उठते हैं. ये हर किसी के बस की बात नहीं.

शुरुआती दौर में नीरज मुझे बहुत पसंद नहीं थे. एक बार एक मुलाकात के दौरान मैं उन पर आरोप लगा बैठा था कि आप रूमानी कवि हैं लेकिन समय और समाज से कटे हुए. वह तनिक भी नहीं तिलमिलाए.

उन्होंने कहा था मैं जनता का कवि हूं. जनवादी कवि हूं. आपके जनवाद की परिभाषा पता नहीं क्या है. मैं मनुष्य और मनुष्यता को बीच से तोड़ने वाली दीवारों का कड़ा विरोधी हूं.

मेरी जाति विहीन और वर्ग विहीन समाज के निर्माण में निष्ठा है. मैं मानता हूं कि जीवन को जीने के लिए मार्क्स को भी मानना होगा और कबीर को भी. उन्होंने लिखा भी है…

जब घायल सीना लिए एशिया तड़पेगा
तब बालमीक का धैर्य कैसे न डोलेगा?
भूखी क़ुरान की आयत जब दम तोड़ेगी
तब क्या न ख़ून फिरदौसी का कुछ बोलेगा!

सुंदरता की जब लाश सड़ेगी सड़कों पर,
साहित्य पड़ा महलों में कैसे सोएगा?
जब क़ैद तिजोरी में रोटी हो जाएगी
तब क्रांति-बीज कैसे न पसीना बोएगा?

हंसिये की ज़ंग छुड़ाने में रत हैं किसान
है नई नोक दे रहा है मजूर कुदाली को
नभ बसा रहा है नए सितारों की बस्ती
भू लिए गोद में नए ख़ून की लाली को.

बढ़ चुका बहुत आगे रथ अब निर्माणों का
बम्बों के दलबल से अब अवरूद्ध नहीं होगा,
है शांति शहीदों का पड़ाव हर मंज़िल पर
अब युद्ध नहीं होगा, अब युद्ध नहीं होगा.

वह कहते थे, कवि सम्मेलनीय लोकप्रियता मेरे लिए घातक साबित हुई. तमाम अनर्गल बातें मेरे बारे में हुई फिर भी ‘इतना बदनाम हुए हम तो इस ज़माने में, तुमको लग जाएंगी सदियां हमें भुलाने में.’

बाद में जब मैंने उन्हें पढ़ा तो उनको जान पाया और ये भी जान सका कि हर कोई नीरज नहीं हो सकता.

अपनी फेसबुक प्रोफाइल से 2017 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के दौरान अखिलेश, अखिलेश, अखिलेश… का नारा देने वाले नीरज अपनी कमज़ोरियों को मानवीय क़रार देते थे.

बरेली में एक मुलाकात पर मैंने उनसे यही सवाल तो किया था, मुलायम सिंह यादव का इतना गान अब पब्लिक को हज़म नहीं होता है.

उन्होंने जवाब दिया था, ‘राजसत्ता के क़रीब कौन नहीं जाना चाहता है, मैं खुल्लमखुल्ला मुलायम सिंह यादव के साथ हूं क्योंकि वह ऐसे अकेले राजनेता हैं, जिन्हें साहित्य की समझ है और उनके समय में हिंदी के लिए उत्तर प्रदेश में सबसे ज़्यादा काम हुआ.’

सपा की सरकार में नीरज को कैबिनेट मंत्री का दर्जा मिला हुआ था तब उन्होंने बड़ी दृढ़ता से कहा था, ‘यह मेरा सम्मान है. मैं राजकीय कवि नहीं हूं और न सुविधाभोगी हूं.’

नीरज 1967 के बाद मुंबई तब बंबई, फिल्मों में गीत लिखने चले गए. वह इसे ‘भावनगर से ‘अर्थनगर’ की यात्रा कहते थे. हिंदी सिनेमा को करीब 130 मधुर-मधुर गीत देकर वह वहां से लौट आए. फिल्मों से उन्हें ख़ूब नाम मिला, लेकिन बंबई और वहां के लोग उन्हें रास नहीं आए.

मुंबई जाने से पहले वे अलीगढ़ धर्म समाज कॉलेज से इस्तीफ़ा दे चुके थे इसलिए कवि सम्मेलनों का छूटा हुआ छोर उन्होंने फिर से पकड़ लिया. 2002 के दिसंबर में वह कोई बेहद सर्दीली शाम थी. उनके घर पहुंचा.

अलीगढ़ में मैरिज रोड पर उनके घर के बरामदे में दोस्तों की महफिल जमाता ताश का खेल, बीड़ी के लंबे-लंबे कश और गुलिस्ता दिनों की बातें… उस दिन मेरी रात वहीं गुज़री.

ताश खेलते हुए वह गुनगुना रहे थे, याद अगर तू आए बजने लगे शहनाई… और बात फिल्मी गीतों की तरफ मुड़ गई.

उन्होंने कहा, वह वाकई मायानगरी है प्यारे, वहां पारखी नहीं हैं, राज कपूर पारखी थे उन्होंने मुझे बुलाया तो छह दिन की छुट्टी लेकर चला गया. मैंने जब फिल्म मेरा नाम जोकर के लिए गीत, ए भाई! ज़रा देखकर चलो लिखा तो संगीतकार शंकर-जयकिशन ने मना कर दिया कि यह कोई गीत है. फिर मुखड़ा-अंतरा मैंने अपने अंदाज़ में गुनगुनाया तो राज कपूर को समझ आ गया. बाद में मन्ना डे ने इस गीत को गाया क्या शानदार गीत बन गया था.

उन्होंने आगे बताया कि राज कपूर कहते थे यह माया नगरी है प्यारे, यहां जो आया फिर नहीं लौटा, लेकिन मैं लौट आया वहां देवानंद से काफी दोस्ती हो गई थी. शोख़ियों में घोला जाए… रंगीला रे तेरे रंग में…फूलो के रंग से दिल की कलम से तुझको लिखी रोज़ पाती… जैसे तमाम गीत उन पर फिल्माए गए.

उन्होंने बताया था कि बाद के संगीतकारों के साथ काम करना थोड़ा मुश्किल हो गया था इसलिए मैं अलीगढ़ लौट आया. मुश्किल इसलिए क्योंकि वहां गीत लेखन की उनकी स्वाभाविकता ख़त्म हो रही थी. उन पर मांग (डिमांड) आधारित गीत लिखने का दबाव बढ़ रहा था और ऐसा करना उन्हें गंवारा नहीं था.

नीरज ने उसी समय कहा था कि हिंदी फिल्मों से गीत ख़त्म हो गए हैं अब केवल ‘धूम धड़ाका’ बचा है. उनकी ये बात शायद आज भी प्रासंगिक है.

हिंदी फिल्मों में गीत लेखन के क्षेत्र में एक निर्वात सा पैदा हो गया है. हर दूसरी फिल्म किसी पुरानी फिल्म के गीत की लाइनों में फेरबदल कर कानफोड़ू संगीत के साथ परोस दिया जा रहा है. ऐसा लगता है बॉलीवुड में अब न तो गीत बचे हैं और न ही उन्हें रचने वाले.

नीरज अपने गीतों में जिन शब्दों पर पिरोते थे, वे हमारे आसपास बिखरे होते हैं. लोगों द्वारा इस्तेमाल किए जाते हैं. इन शब्दों पर लोग का तवज्जो नहीं जाता था. नीरज के गीतों में ‘आम’ से लगने वाले ये शब्द ‘ख़ास’ हो जाते थे.

उनके गीतों में सजकर ‘चूड़ी’, चूड़ी न रहकर ‘दिल’ हो जाती थी. ‘ख़त’ हज़ारों रंग के ‘नज़ारे’ बन जाते थे. यही नहीं सवेरा होने पर ये ‘ख़त’, ‘फूल’ और रात होने पर ‘सितारे’ हो जाते थे.

मैं गीत गुनगुनाते हुए मरना चाहता हूं… अपनी आख़िरी इच्छा इस तरह व्यक्त करने वाले नीरज 93 साल की उम्र में बहुत हताश हो गए थे. अभी कुछ दिनों पहले की तो बात थी जब उन्होंने एक चिट्ठी अलीगढ़ के ज़िलाधिकारी को लिखी कि उन्हें दी जाने वाली दवाओं की डोज़ बढ़ा दी जाए, अब जीवन काफी मुश्किल हो गया है.

मैं नीरज की कही हुई वह बात याद कर रहा हूं. वे कहते थे, हिंदुस्तान में हवा गाती है… नदियां गाती हैं… फूल गाते हैं… झरने गा रहे हैं… हर जगह गेयता (गीत) है, इस वजह से गीत हमेशा ज़िंदा रहेंगे और नीरज हमारे दिलों में.

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं और बरेली में रहते हैं.)