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भाजपा विधायक का आरोप: अलवर में भीड़ की नहीं, पुलिस की पिटाई से हुई रकबर की मौत

भाजपा के स्थानीय विधायक ज्ञानदेव आहूजा व घटना की सूचना देने वाले शख़्स के मुताबिक पुलिस रकबर ख़ान को अस्पताल ले जाने की बजाय थाने ले गई, जहां उसके साथ बेरहमी से मारपीट हुई. पुलिस ने आरोपों को खारिज किया. वहीं पूर्व विधायक जुबेर ख़ान ने भाजपा विधायक के आरोप को आरोपियों को बचाने की साज़िश बताया.

अलवर ज़िले में जहां रकबर ख़ान को पीटा गया वहां का मुआयना करती पुलिस और रामगढ़ से भाजपा विधायक ज्ञानदेव आहूजा. (फोटो साभार: एएनआई/राज्यसभा)

अलवर ज़िले में जहां रकबर ख़ान को पीटा गया वहां का मुआयना करती पुलिस और रामगढ़ से भाजपा विधायक ज्ञानदेव आहूजा. (फोटो साभार: एएनआई/राज्यसभा)

मॉब लिंचिंग के बढ़ते मामलों पर सर्वोच्च न्यायालय की ओर से सख़्त क़ानून बनाने के निर्देश के चार दिन बाद ही राजस्थान के अलवर ज़िले में कथित गोरक्षकों ने हरियाणा के रकबर ख़ान उर्फ अकबर की पीट-पीटकर हत्या कर दी.

हालांकि इस मामले में पुलिस की भूमिका भी सवालों के घेरे में है. रामगढ़ के भाजपा विधायक ज्ञानदेव आहूजा और इस घटना की सूचना देने वाले नवल किशोर शर्मा के मुताबिक पुलिस रकबर ख़ान को अस्पताल ले जाने की बजाय थाने ले गई, जहां उसके साथ बेरहमी से मारपीट हुई.

रामगढ़ थाना पुलिस के अनुसार, ललावंडी निवासी नवल किशोर शर्मा ने शुक्रवार रात 12.41 बजे सूचना दी कि कुछ लोग गायों को लेकर हरियाणा की तरफ जा रहे हैं. घटनास्थल थाने से महज़ तीन किलोमीटर दूर है, जहां पुलिस को पहुंचने में 10 मिनट से भी कम समय लगा.

मौके पर पहुंची तो कई लोग पुलिस की गाड़ी देखकर वहां से भाग गए, लेकिन ललावड़ी गांव के धर्मेंद्र और परमजीत वहीं खड़े मिले. जबकि रकबर ख़ान घायल स्थिति में कीचड़ में पड़ा हुआ मिला. पुलिस की मानें तो वह यहां से रकबर को सीधे अस्पताल लेकर गई जहां डॉक्टर ने उन्हें मृत घोषित कर दिया.

घटनास्थल से रामगढ़ सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र की दूरी चार किलोमीटर के आसपास है. यहां पहुंचने में 10-15 मिनट का समय नहीं लगता, लेकिन पुलिस को रकबर ख़ान को यहां लाने में तीन घंटे का समय लग गया. अस्पताल में रकबर का इलाज करने वाले डॉक्टर के मुताबिक पुलिस उसे सुबह करीब चार बजे अस्पताल लेकर पहुंची.

विधायक ज्ञानदेव आहूजा ने आरोप लगाया है कि पुलिस ने रकबर ख़ान को तीन घंटे तक थाने में रखकर उसके साथ मारपीट की, जिससे उसकी मौत हो गई.

द वायर से विशेष बातचीत में उन्होंने कहा, ‘लोगों ने मौके पर रकबर ख़ान से ज़्यादा मारपीट नहीं की. कुछ लोगों ने दो-चार थप्पड़-घूंसे ज़रूर मारे. सूचना पर पहुंची पुलिस उसे सही-सलामत वहां से लाई थी. थाने में उसकी पिटाई हुई, जिससे उसकी मौत हुई.’

घटना की सूचना देने वाले नवल किशोर शर्मा भी कुछ ऐसा ही बताते हैं. वे कहते हैं, ‘मौके पर अकबर कीचड़ में सना पड़ा था. पुलिस उसे सीधे रामगढ़ पुलिस थाने ले गई. यहां उसे नहलाया. धर्मेंद्र को भेजकर कपड़े मंगाए और उसे पहनाए. इस दौरान थाने में उसके साथ मारपीट की गई. इसी से अकबर की मौत हुई है.’

विधायक आहूजा की मानें तो उन्होंने गृह मंत्री गुलाब चंद कटारिया को इससे अवगत करा दिया है. वे कहते हैं, ‘इस मामले की न्यायिक जांच होनी चाहिए तभी सच सामने आएगा. मैंने गृह मंत्री को घटना की जानकारी दे दी है. मैंने उनसे न्यायिक जांच करवाने का आग्रह किया है.’

हालांकि पुलिस विधायक के इस आरोप को सिरे से खारिज कर रही है. मामले की जांच कर रहे सब इंस्पेक्टर सुभाष चंद कहते हैं, ‘विधायक का आरोप पूरी तरह से गलत है. घटनास्थल पर रकबर ख़ान हमें घायल अवस्था में कीचड़ में पड़ा हुआ मिला था. उसे काफी चोटें लगी हुई थीं. हालांकि वह बोलने की स्थिति में था. रास्ते में उसने ख़ुद का और अपने साथी का नाम-पता बताया और बयान दर्ज करवाए.’

वे आगे कहते हैं, ‘पुलिस रकबर ख़ान को थाने लेकर ही नहीं गई. उसे सीधे सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र लेकर गए थे. जहां डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया. थाने में मारपीट का आरोप पूरी तरह से बेबुनियाद है. पता नहीं विधायक ऐसा क्यों कह रहे हैं.’

जयपुर रेंज के आईजी हेमंत प्रियदर्शी भी इसी बात को दोहराते हैं. उन्होंने द वायर को बताया, ‘यह आरोप गलत है कि रकबर ख़ान के साथ थाने में मारपीट हुई. उसे घायल अवस्था में घटनास्थल से सीधे अस्पताल लाया गया, जहां डॉक्टर ने उसे मृत घोषित कर दिया. पूरी स्थिति पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट और साक्ष्यों से साफ हो जाएगी.’

विधायक आहूजा ने पुलिस की कार्रवाई पर भी सवाल उठाए हैं. वे कहते हैं, ‘पुलिस ने दो लोगों को फोन पर यह कहकर थाने बुलाया कि गो-तस्करों के ख़िलाफ़ रिपोर्ट लिखवानी है और उन्हें बिठा लिया. जबकि कहा जा रहा है कि इन्हें दबिश देकर पकड़ा गया. यह तरीका गलत है. इसीलिए मैंने न्यायिक जांच की मांग की है.’

गृह मंत्री गुलाब चंद कटारिया अपनी ही पार्टी के विधायक के आरोपों पर खुलकर बोलने से बच रहे हैं. वे कहते हैं, ‘इस घटना के लिए ज़िम्मेदार लोगों के ख़िलाफ़ कड़ी कार्रवाई करेंगे. घटना दुर्भाग्यपूर्ण है. पुलिस पूरे मामले की तत्परता से जांच कर रही है. दो आरोपियों को पकड़ लिया है जबकि बाकी की पकड़ने के लिए दबिश दी जा रही है. इस अपराध में जितने लोग भी शामिल हैं, उनमें से किसी को नहीं बख्शा जाएगा.’

हालांकि रामगढ़ के पूर्व विधायक जुबेर ख़ान, ज्ञानदेव आहूजा के आरोप को आरोपियों को बचाने की साज़िश करार देते हैं. वे कहते हैं, ‘सबको पता है कि रकबर ख़ान को गोरक्षा के नाम पर गुंडागर्दी करने वाले लोगों ने मारा है. इन्हें बचाने के लिए ज्ञानदेव आहूजा थाने में पिटाई का शिगूफा छोड़ रहे हैं. वे न सिर्फ ऐसे लोगों को संरक्षण देते हैं, बल्कि वे इन्हें उकसाते भी हैं.’

जुबेर ख़ान आगे कहते हैं, ‘भीड़ द्वारा बढ़ते हमलों पर सुप्रीम कोर्ट के सख़्त रुख़ और केंद्र सरकार के बदनाम होने के डर से विधायक आहूजा गोरक्षा के नाम पर गुंडागर्दी करने वालों के पक्ष में खुलकर नहीं बोल रहे हैं, लेकिन इन्हें बचाने की कोशिश अभी भी कर रहे हैं. यदि उनके इस आरोप को सही मान लें कि रकबर ख़ान की मौत पुलिस की पिटाई से हुई तो यह और भी गंभीर बात है.’

गौरतलब है कि पिछले साल अप्रैल में अलवर ज़िले में गो-तस्करी के शक में पहलू ख़ान की मौत के बाद ज्ञानदेव आहूजा ने विवादित बयान दिया था. उन्होंने कहा, ‘जो गो-तस्करी करेगा वो ऐसे ही मरेगा.’ इसके बाद भी वे कई बार कथित गोरक्षकों के समर्थन में बयान दे चुके हैं.

हालांकि ज्ञानदेव आहूजा रकबर ख़ान की मौत पर पहलू ख़ान प्रकरण जैसी प्रतिक्रिया देने से बच रहे हैं.

वे कहते हैं, ‘पहलू ख़ान के समय हालात दूसरे थे. अब गो-तस्करी भी कम हुई है और मैंने लोगों को भी समझाया है कि तस्करों से ज़्यादा मारपीट नहीं करें. उन्हें पकड़कर पुलिस को सौंप दें. क़ानून को अपना काम करने दें. हिंसा किसी को नहीं करनी चाहिए.’

इस सवाल पर कि क्या थोड़ी मारपीट करने की सलाह देना गलत नहीं है, विधायक आहूजा कहते हैं, ‘भारत मां का देश है. भारत माता, गंगा माता, धरती माता, गोमाता. गाय को लेकर जनता भावुक है इसलिए भड़कती है. उनके गुस्से को एक सीमा तक ही रोका जा सकता है. वैसे भी तस्कर पेशेवर बदमाश होते हैं. उन्हें मारपीट किए बिना नहीं पकड़ा जा सकता. वे पुलिस पर ही गोलियां चला देते हैं.’

आहूजा स्थानीय पुलिस पर गो-तस्करों से मिलीभगत का आरोप भी लगाते हैं. वे कहते हैं, ‘अलवर ज़िला हरियाणा के मेवात से लगा हुआ है. यहां से गो-तस्कर गायों को ले जाने आते हैं. पुलिस की मिलीभगत के बिना तस्करी संभव नहीं है. यदि पुलिस ही ठीक ढंग से काम कर ले तो इस तरह की घटनाएं हो ही नहीं.’

गौरतलब है कि पिछले साल अप्रैल में पहलू ख़ान की हत्या के बाद वसुंधरा सरकार ने अलवर और भरतपुर ज़िलों में गो-तस्करी रोकने के लिए कई नई पुलिस चौकियां खोली थीं. इनका काम केवल अवैध गोवंश की आवाजाही पर कार्रवाई करना है. इसके बावजूद कथित गोरक्षकों की गुंडागर्दी के मामले सामने आते रहते हैं.

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं और जयपुर में रहते हैं.)

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