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राजस्थान में बाबा रामदेव के ड्रीम प्रोजेक्ट पर हाईकोर्ट ने लगाई रोक

राजस्थान हाईकोर्ट ने विवादित ज़मीन पर किसी भी प्रकार के निर्माण, रजिस्ट्री व लीज़ डीड करने पर पाबंदी लगाते हुए देवस्‍थान विभाग को रिपोर्ट पेश करने के लिए कहा है. द वायर ने किया था गड़बड़ि‍यों का खुलासा.

मंदिर की ज़मीन पर प्रोजेक्ट का शिलान्यास करते हुए राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे और बाबा रामदेव. (फोटो साभार: फेसबुक/वसुंधरा राजे)

मंदिर की ज़मीन पर प्रोजेक्ट का शिलान्यास करते हुए राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे और बाबा रामदेव. (फोटो साभार: फेसबुक/वसुंधरा राजे)

राजस्थान के करौली जिले में प्रस्तावित बाबा रामदेव के ड्रीम प्रोजेक्ट पर हाईकोर्ट ने रोक लगा दी है. जस्टिस संजीव प्रकाश शर्मा की बेंच ने विवादित जमीन पर किसी भी प्रकार के निर्माण, रजिस्ट्री व लीज डीड करने पर पाबंदी लगा दी है.

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में देवस्थान विभाग के सहायक आयुक्त से श्री गोविंद देव जी मंदिर की संपत्तियों के संरक्षण के लिए उठाए गए कदमों की विस्तृत रिपोर्ट पेश करने के लिए कहा है. मामले की अगली सुनवाई 17 नवंबर को होगी.

हाईकोर्ट ने यह आदेश करौली निवासी राम कुमार सिंह की याचिका पर दिया है. याचिकाकर्ता की ओर से पैरवी करने वाले अधिवक्ता संजय जोशी कहते हैं, ‘याचिका में हमने पतंजलि ट्रस्ट और श्री गोविंद देव जी मंदिर ट्रस्ट के बीच हुई लीज डीड को चुनौती दी थी.’

वे आगे कहते हैं, ‘कोर्ट ने हमारी ओर से प्रस्तुत तथ्यों व दस्तावेजों से संतुष्ट होते हुए स्थगन आदेश दिया है. अब मंदिर से जुड़ी 729 बीघा विवादित भूमि पर न तो कोई निर्माण कार्य हो सकेगा और न ही रजिस्ट्री या लीज डीड की जा सकेगी. कोर्ट ने देवस्थान विभाग से पूरे प्रकरण की रिपोर्ट पेश करने के लिए भी कहा है.’

हाईकोर्ट के इस आदेश के बाद बाबा रामदेव के ड्रीम प्रोजेक्ट पर संकट के बादल मंडरा गए हैं. गौरतलब है कि रामदेव के पतंजलि ट्रस्ट ने करौली के श्री गोविंद देव जी मंदिर ट्रस्ट से 11 अगस्त, 2016 को 401 बीघा जमीन तीन साल के लिए लीज पर ली थी. रामेदव यहां योगपीठ, गुरुकुल, आयुर्वेदिक अस्पताल, आयुर्वेदिक दवाइयों का उत्पादन केंद्र और गोशाला बनाना चाहते हैं.

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राजस्थान हाईकोर्ट का आदेश

इस प्रोजेक्ट का शिलान्यास 22 अप्रैल को बाबा रामदेव की मौजूदगी में मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने किया था. सूत्रों के अनुसार रामदेव चाहते थे कि उनके ट्रस्ट को यह जमीन 20 साल के लिए लीज पर मिल जाए. चर्चा है कि मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने तो इसके लिए हरी झंडी दे दी, लेकिन अधिकारियों को ऐसा करने में कानूनी अड़चनें आड़े आ गईं.

इसी बीच ‘द वायर’ ने 20 जून को प्रकाशित रिपाेर्ट में खुलासा किया कि बाबा रामदेव का यह प्रोजेक्ट कैसे नियमों की कब्रगाह बन गया है. इसमें विधि विशेषज्ञों ने तफसील से साफ किया कि लीज डीड कैसे अवैध है. चूंकि जमीन सरकारी रिकॉर्ड में मंदिर के नाम दर्ज है इसलिए ट्रस्ट को यह अधिकार नहीं है कि वह इसे गैर कृषि कार्य के लिए किसी को लीज पर सौंप दे.

इस खुलासे के बाद वसुंधरा सरकार ने प्रोजेक्ट से हाथ खींच लिए. तय हुआ कि पतंजलि ट्रस्ट और श्री गोविंद देव जी मंदिर ट्रस्ट के बीच नए सिरे से लीज डीड होगी, जिसमें जमीन का प्रयोग केवल कृषि कार्य के लिए होने का जिक्र होगा.

पतंजलि ट्रस्ट और श्री गोविंद देव जी मंदिर ट्रस्ट के बीच नई लीज डीड का मजमून तैयार होता इससे पहले ही ‘द वायर’ ने 28 जून को प्रकाशित रिपोर्ट में खुलासा किया कि जिस जमीन को मंदिर ट्रस्ट अपनी बता रहा है असल में उस पर उसका हक ही नहीं है.

नई लीज डीड तैयार करने में आ रही कानूनी उलझनों से निकलने का रास्ता तलाश रहे पतंजलि ट्रस्ट और श्री गोविंद देव जी मंदिर ट्रस्ट के लिए हाईकोर्ट का स्थगन आदेश बड़ा झटका है. कानून के जानकारों के अनुसार इस जमीन में बड़ा गड़बड़झाला है, जो अब हाईकोर्ट के संज्ञान में आ चुका है.

अधिवक्ता संजय जोशी कहते हैं, ‘हाईकोर्ट ने देवस्थान विभाग के सहायक आयुक्त से पूरे प्रकरण की रिपोर्ट पेश करने के लिए कहा है. विभाग पहले ही श्री गोविंद देव जी मंदिर ट्रस्ट की जांच कर चुका है, जिसमें कई गंभीर खामियां सामने आई थीं.’

उल्लेखनीय है कि देवस्थान विभाग के सहायक आयुक्त कृष्ण कुमार खंडेलवाल ने 30 जुलाई, 2010 को ट्रस्ट का निरीक्षण किया तो उन्हें यहां खूबियां कम और खामियां ज्यादा मिलीं. जांच में उन्होंने सालाना बजट नहीं बनाने के साथ ऑडिट नहीं होने पर सवाल खड़े किए.

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राजस्थान हाईकोर्ट का आदेश

खंडेलवाल की ओर से पेश जांच रिपोर्ट में लिखा है, ‘इस ट्रस्ट के पास बहुत सी अचल संपदा है और आय के नियमित स्रोत हैं फिर भी ऑडिट नहीं कराया जाना अत्यंत गंभीर विषय है.’

सहायक आयुक्त की इस रिपोर्ट में ट्रस्ट की संपत्तियों को अवैध रूप से लीज पर देने का भी जिक्र है. ट्रस्ट ने एक मकान को 99 साल और जमीन के एक हिस्से को पेट्रोलियम कंपनी को 19 साल की लीज पर दिया. रिपोर्ट में इसे नियमों के खिलाफ बताते हुए आपत्ति जताई है.

निरीक्षण रिपोर्ट में इस पर विशेष रूप से ऐतराज जताया कि ट्रस्ट की संपत्ति का समुचित रूप से प्रबंधन नहीं हो रहा है. रिपोर्ट में लिखा है, ‘ट्रस्ट अपने उद्देश्यों के अनुरूप धन को खर्च नहीं कर रहा है. इसकी आय का ज्यादातर हिस्सा न्यायायिक कार्यों पर खर्च हो रहा है, जो उचित नहीं है.’

सहायक आयुक्त की इस रिपोर्ट पर श्री गोविंद देव जी मंदिर ट्रस्ट ने जवाब पेश किया कि जानकारी के अभाव में ऐसा हो गया. देवस्थान विभाग ट्रस्ट के रवैये से संतुष्ट नहीं हुआ और उसने 22 जून, 2011 को यह प्रकरण अग्रिम कार्रवाई के लिए जिला न्यायालय को भेज दिया.

हालांकि यहां ट्रस्ट की यह दलील काम कर गई कि जानकारी के अभाव में गलतियां हो गईं. न्यायाधीश ने यह भरोसा मिलने के बाद कि भविष्य में इन गलतियों को नहीं दोहराया जाएगा, प्रकरण का 8 फरवरी, 2016 को निस्तारण कर दिया.

इस रिपोर्ट के अलावा देवस्थान विभाग का रिकॉर्ड विवादित जमीन पर श्री गोविंद देव जी मंदिर ट्रस्ट के दावे पर सवाल खड़े करता है. ट्रस्ट के गठन के समय विभाग को दी गई अचल संपत्ति की सूची में इस जमीन का कोई जिक्र नहीं है.

गौरतलब है कि ट्रस्ट का पंजीकरण 29 जून, 1964 को हुआ. ट्रस्ट ने ‘राजस्थान सार्वजनिक प्रन्यास अधिनियम, 1959’ के मुताबिक अचल संपत्ति की जो सूची पेश की, उसमें मंदिर के नाम किसी भी प्रकार की कृषि भूमि होने का जिक्र नहीं था. सूत्रों के अनुसार देवस्थान विभाग सहायक आयुक्त को हाईकोर्ट में रिपोर्ट पेश करते समय न सिर्फ इन तथ्यों पर गौर करना पड़ेगा, बल्कि प्रमुखता से इन्हें रेखांकित भी करना होगा.

इसके अलावा हाईकोर्ट के संज्ञान में न्यायालय राजस्व मंडल, अजमेर का 14 सितंबर, 2016 का आदेश भी आ गया है. इससे यह साफ हो जाता है कि श्री गोविंद देव जी मंदिर ट्रस्ट कैसे पुराने रिकॉर्ड की भूलभुलैया के सहारे किसानों की जमीन पर अपना हक जता रहा है.

इस तरह के मामलों के विशेषज्ञ अधिवक्ताओं की मानें तो हाईकोर्ट में आने के बाद यह प्रकरण और पेचीदा हो गया है. इसके जल्द सुलझने की संभावना बहुत कम है. यदि ऐसा होता है तो बाबा रामदेव के ड्रीम प्रोजेक्ट को शीर्षासन भी करना पड़ सकता है.

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं और जयपुर में रहते हैं.)

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