समाज

कैसे दूरदर्शन का सेक्स एजुकेशन पर बना सीरियल लोकप्रियता के शिखर पर पहुंच गया

दूरदर्शन का यह धारावाहिक बेहद सहज तरीके से सेक्स एजुकेशन, बच्चों में अंतर रखने और घरेलू हिंसा जैसे विषयों पर जानकारी दे रहा है. इसे अब तक 40 करोड़ से ज़्यादा दर्शकों ने देखा है.

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करवा चौथ का दिन है. सजी-धजी रत्ना उदास बैठी है, वो गर्भवती है. उदास रत्ना हल्की आवाज़ में कहती है, ‘वो नहीं आएंगे,’ चांद निकल चुका है पर रत्ना का पति अब तक नहीं लौटा है और वो भूखी-प्यासी उसके इंतज़ार में है. उसकी सास उसे खाना खा लेने के लिए कहती है पर वो नहीं मानती. उसका पति पूरब शराबी है. रत्ना चौथी बार मां बनने वाली है, कमज़ोरी के कारण उसकी हालत बिगड़ने लगती है. डॉक्टर को बुलाया जाता है, जो आकर बताती है कि बच्चों में सही अंतर न रखने की वजह से वो बहुत कमज़ोर है और उसे डांटती हैं कि उसे इस तरह व्रत नहीं रखना चाहिए.

यह दृश्य दूरदर्शन पर आने वाले धारावाहिक ‘मैं कुछ भी कर सकती हूं’ के शुरुआती एपिसोड का है. इसे अब तक 40 करोड़ से ज़्यादा दर्शकों ने देखा है, जिस हिसाब से यह भारतीय टेलीविज़न के इतिहास में सबसे ज़्यादा देखा गया धारावाहिक बन गया है. यौन स्वास्थ्य, शिक्षा और अधिकारों के बारे में शिक्षा देता यह धारावाहिक लैंगिक मुद्दों पर लंबे समय से काम कर रहे एनजीओ पॉपुलेशन फाउंडेशन ऑफ इंडिया ने बनाया है. 11 भाषाओं में डब इस धारावाहिक को 50 से ज़्यादा देशों में प्रसारित किया गया है, साथ ही ऑल इंडिया रेडियो पर भी इसका प्रसारण होता है.

पॉपुलेशन फाउंडेशन ऑफ इंडिया की कार्यकारी निदेशक पूनम मुटरेजा ने बताया, ‘इस शो को बनाने का विचार तब आया जब मुझे लगा कि दुनिया भर में सामाजिक बदलाव लाने के लिए लाखों डॉलर ख़र्च किए जा रहे हैं पर फिर भी कोई फायदा नहीं हो रहा. हम ऐसा कुछ चाहते थे जो भारतीय दर्शकों को बांध सके. उस समय महिलाओं का ध्यान इस बात पर जाने लगा था कि कैसे डेली सोप महिलाओं की छवि ख़राब कर चुके थे. हमने सोचा कि हम एक डेली सोप के जरिये ही अपनी कहानी कहेंगे. हमारे निर्देशन फ़िरोज़ अब्बास खान को भी यह आईडिया पसंद आया.’

पूनम बताती हैं, ‘हमारा उद्देश्य भारतीय टेलीविज़न के सबसे कम ताकतवर तबके तक पहुंचे का था पर यह सिर्फ उनके लिए नहीं था. लैंगिक मुद्दों पर हर किसी को शिक्षा की ज़रूरत है.’

मैं कुछ भी… के लिए विश्व के कई धारावाहिकों ने प्रेरणा का काम किया, जैसे दक्षिण अफ्रीका का ‘सोल सिटी’. इसे सिनेमा की परंपरा के अनुरूप बनाया गया है पर कहानी, उसका ट्रीटमेंट आदि भारतीय परिप्रेक्ष्य के हिसाब से बदल दिए गए.

यह कहानी एक छोटे–से काल्पनिक शहर प्रतापपुर की डॉक्टर स्नेहा माथुर की है, जो अपने छोटे शहर में काम करने के लिए मुंबई से अपनी नौकरी छोड़ के आ जाती है. प्रतापपुर में उसका भरा-पूरा परिवार है. रिटायर्ड शिक्षक पिता केशव, सीधी-सरल मां अलका, बाल-विधवा विमला बुआ, बहन प्रीता, भाई पूरब और उसकी पत्नी रत्ना. रत्ना के चार बच्चे हैं. कोई काम न करने वाला शराबी पूरब रत्ना के साथ बुरा बर्ताव करता है.

अन्य सीरियलों की तरह यहां भी नाटकीय संगीत और उतार-चढ़ाव है पर इसका संदेश उन सभी धारावाहिकों से बिल्कुल अलग है. इसमें कहानी के सहारे ही बच्चों में अंतर रखने की ज़रूरत, गर्भ निरोधक के उपयोग, सेक्स एजुकेशन और घरेलू हिंसा जैसे मुश्किल पर ज़रूरी विषयों के बारे में समझाया गया है. इसमें महिलाओं और किशोर उम्र के लिए ज़रूरी मुद्दों पर भी ध्यान दिया गया है, वे मुद्दे जो ज़रूरी तो हैं पर अमूमन उन पर बात नहीं की जाती. पर ऐसा मत सोचिये कि इन सब पर बात करने से ये कोई ‘लेक्चर’ सरीखा सीरियल बन गया. इसमें बहुत ही सहजता से इन विषयों को कहानी में गूंथ के दिखाया गया है, जिससे ऐसा भी न लगे कि कोई बात लोगों पर थोपी जा रही है.

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सीरियल का एक दृश्य (साभार : यूट्यूब स्क्रीनशॉट)

कहानी के कुछ हिस्से तो बिल्कुल उन्हीं सब धारावाहिकों का हिस्सा बन सकते थे जिन्हें अक्सर देखा जाता है पर बहुत-सी छोटी-छोटी बातें हैं जो इसे बाकी धारावाहिकों से अलग बनाती हैं. दर्शकों की रूचि बनाए रखने के लिए कुछ रोचक तरीके अपनाये गए हैं, जैसे मिसाल देखिए, वार्ड बॉय मुन्ना अपने साथी से पूछता है, ‘टकलू आदमी के सिर के दो बालों ने शादी करने से क्यों मना किया?’ ‘क्योंकि बाल-विवाह मना है.’

निर्देशकों ने इस बात का खास ध्यान रखा है कि जिन दर्शकों के लिए यह बनाया गया है, ये उनकी समझ में भी आए. इसके लिए कई तरीके भी आजमाए गए. जैसे जब यौन शिक्षा के मुद्दे पर बात होनी थी तब डॉ. स्नेहा ने ‘किशोर का शोर’ नाम का एक गेम शो शुरू किया था, जहां किशोर फोन करके यौन शिक्षा से जुड़े सवाल पूछ सकते थे.

मैं कुछ भी… के पीछे स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय का ‘साथिया’ कार्यक्रम भी है. साथिया किट मंत्रालय की तरफ से दी जाने वाली किट है, जिसमें यौन शिक्षा के बारे में जानकारी है. इसमें ऑनलाइन मैटेरियल भी होता है, साथ ही हम उम्र लोग ही किशोरों को इस विषय में जानकारी देते हैं. मैं कुछ भी… इसी किट के पीछे छिपी अवधारणा की प्रतिकृति है. पूनम बताती हैं, ‘जब हमने स्वास्थ्य मंत्री को अपने कुछ एपिसोड दिखाए, तब वे इस बात से काफ़ी प्रभावित हुए कि हमने अपना संदेश भारतीय मूल्यों और समाज को ध्यान में रखकर दिया है. हमने साथिया कार्यक्रम के लिए बनाई गईं 6 शॉर्ट फिल्में भी इसके साथ जोड़ दी थीं.’

इस सीरियल से जुड़ी सबसे दिलचस्प बात है इंटरैक्टिव वॉयस रिस्पांस सिस्टम (आईवीआरएस) यानी आप कार्यक्रम को लेकर अपनी प्रतिक्रिया एक टोल-फ्री नंबर पर कॉल करके दे सकते हैं. आंकड़ें बताते हैं कि इस नंबर पर करीब 14 लाख फोन कॉल आईं, जिनमें रैंडम सैम्पलिंग के आधार पर बताया गया कि करीब 30 फीसदी कॉल मध्य प्रदेश और बिहार से आई थीं. ये दोनों ही प्रदेश देश के उन क्षेत्रों में से हैं, जहां मातृ-शिशु स्वास्थ्य की स्थिति बहुत अच्छी नहीं है.

कई मशहूर हस्तियों ने भी इस शो का समर्थन किया है. फरहान अख्तर उनमें से एक हैं. वे सीरियल के दूसरे सीज़न के एक एपिसोड में नैरेटर की भूमिका में भी नज़र आए थे, वहीं उनकी संस्था ‘मर्द’ (मेन अगेंस्ट रेप एंड डिस्क्रिमिनेशन) ने भी शो के साथ मिलकर काम किया.

मैं कुछ भी… उन चंद टीवी सीरियलों में से एक है जिन्होंने असल में अपने दर्शकों को प्रभावित किया. 30,000 घरों में इस शो के शुरू होने से पहले करवाए गए सर्वे में पता चला था कि लगभग 35% महिलाएं गर्भनिरोधक का प्रयोग करने में झिझकती हैं, पर शो के बाद किए सर्वे में ऐसी महिलाओं के प्रतिशत में 13% की गिरावट देखी गई. ऐसे ही पहले 66% महिलाओं को लगता था कि पतियों का अपनी पत्नी को मारना जायज़ है. शो के बाद यह आंकड़ा 44% पर पहुंच गया, हालांकि यह भी कोई अच्छी स्थिति नहीं है पर यह इस शो के प्रभाव को साफ़ दिखाता है.

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इस तरह के रचनात्मक क्षेत्र में लोग सिर्फ सपना देखते हैं कि लोग उनसे कैसे जुड़ पाएंगे, मैं कुछ भी… ने यह सपना भी पूरा किया. सीरियल की वेबसाइट पर ढेरों लोगों ने अपनी कहानियां साझा की हैं. रतलाम (मध्य प्रदेश) के भील समुदाय से आने वाली संगीता डामर ने 12 स्वयं-सहायता समूहों और 150 सामुदायिक सदस्यों से संपर्क किया और फिर उनके साथ यह प्रण लिया कि वे समाज में बाल-विवाह को बर्दाश्त नहीं करेंगे. भोपाल की 16 साल की प्रिया ने बताया कि कैसे इस शो को देखने के बाद वे परिवार द्वारा उनकी पढ़ाई बंद कर देने के बाद एक एनजीओ को कॉल करने की हिम्मत जुटा पाईं. इसके बाद उनकी पढ़ाई दोबारा शुरू करवा दी गई.

पूनम बताती हैं, ‘हम इस शो पर बहुत कुछ लगा रहे हैं : वक़्त, एनर्जी, पैसा..इसको प्रभावी बनाने के लिए हमने सब किया. हमने बतौर सलाहकार यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्सास के अरविंद सिंघल को अपने साथ जोड़ा. 20 से ज़्यादा संचार और संस्कृति के जानकारों से प्रतिक्रियाएं लीं. आईवीआरएस पर मिली कॉल्स पर मिले कमेंट के आधार पर शो के हर सीज़न में बदलाव किए. हम बस चाहते थे कि यह अपना उद्देश्य पूरा करे.’

और हुआ भी ऐसा ही. मैं कुछ भी… ने समाज के एक हिस्से पर खासा प्रभाव डाला.

फिल्मकार और सेक्स-एजुकेशन प्रोजेक्ट ‘एजेंट्स ऑफ इश्क़’ की संस्थापक पारोमिता वोहरा के अनुसार इस शो के सफल होने की कई वजहें हैं. वे बताती हैं, ‘यह कला के प्लेटोनिक आदर्श की तरह है. प्लेटो ने कहा भी था कि कला सिखाने और मनोरंजन दोनों के लिए होती है: यही इस धारावाहिक ने किया है. हम इस फॉर्मेट से दूर हो गए थे. एक तरह से यह हौसला बढ़ाने वाला है. ये एक महिला की दूसरी महिलाओं की मदद करने वाली एक प्रेरणात्मक तस्वीर पेश करता है. पर यहां संदेश के सामने कहानी को भुलाया नहीं गया है. अगर आप कोई संदेश देते हुए कहानी सही से प्रयोग करते हैं तब ही लोग उसी हिसाब से उसके साथ जुड़ते या दूर होते हैं. वो खुद को उस जगह रखकर सोच पाते हैं कि वे इससे सहमत हैं कि नहीं. आप कला को जब इस तरह प्रयोग करते हैं, तब ये कामयाब होती है.’

मैं कुछ भी… का उद्देश्य मनोरंजन के साथ-साथ सामाजिक बदलाव भी है और एक हद तक इसने अपने दोनों उद्देश्यों को हासिल भी किया है. इतना तो इसके निर्माताओं ने भी नहीं सोचा था. ऐसे जटिल मुद्दों को इतनी रचनात्मकता से पेश करने की कोशिश पहले भी हुई थी पर वो ज़्यादा कामयाब नहीं हुई. शो देखने से यह पता चलता है कि जो जानकारी हमारे पास है किस तरह उसको सबसे अच्छे तरीके से सामने रखा जा सकता है, साथ ही शो के लिए रिसर्च कर रहे लोगों की मदद इस क्षेत्र में काम करने वाली अन्य संस्थाएं भी ले सकती हैं.

यह शो डीडी इंडिया पर मंगलवार-बुधवार को सुबह 10:30 बजे और डीडी नेशनल पर शनिवार-रविवार को शाम 7 बजे प्रसारित होता है.

इसे अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.