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एनजीटी ने गंगा के हालात बेहद ख़राब बताते हुए गंगाजल को इस्तेमाल योग्य नहीं बताया

एनजीटी ने सवाल उठाया कि अगर सिगरेट के पैकेटों पर ‘यह स्वास्थ्य के लिए घातक है’ चेतावनी लिखी हो सकती है, तो लोगों को नदी के जल के प्रतिकूल प्रभावों के बारे में जानकारी क्यों नहीं दी जाए.

FILE PHOTO: Untreated sewage flows from an open drain into the river Ganges in Kanpur, India, April 4, 2017. REUTERS/Danish Siddiqui/File Photo

कानपुर में गंगा नदी में गिरता सीवर का पानी. (फाइल फोटो: रॉयटर्स)

नई दिल्ली: राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण (एनजीटी) ने शुक्रवार को गंगा नदी की स्थिति पर नाराजगी जताते हुए कहा कि हरिद्वार से उत्तर प्रदेश के उन्नाव शहर के बीच गंगा का जल पीने और नहाने योग्य नहीं है.

एनजीटी ने कहा कि मासूम लोग श्रद्धापूर्वक नदी का जल पीते हैं और इसमें नहाते हैं लेकिन उन्हें नहीं पता कि इसका उनके स्वास्थ्य पर बुरा असर हो सकता है.

एनजीटी ने कहा, ‘मासूम लोग श्रद्धा और सम्मान से गंगा का जल पीते हैं और इसमें नहाते हैं. उन्हें नहीं पता कि यह उनके स्वास्थ्य के लिए खतरनाक हो सकता है.अगर सिगरेट के पैकेटों पर यह चेतावनी लिखी हो सकती है कि यह ‘स्वास्थ्य के लिए घातक’ है, तो लोगों को (नदी के जल के) प्रतिकूल प्रभावों के बारे में जानकारी क्यों नहीं दी जाए?’

एनजीटी प्रमुख एके गोयल की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा, ‘हमारा नजरिया है कि महान गंगा के प्रति अपार श्रद्धा को देखते हुए, मासूम लोग यह जाने बिना इसका जल पीते हैं और इसमें नहाते हैं कि जल इस्तेमाल के योग्य नहीं है. गंगाजल का इस्तेमाल करने वाले लोगों के जीवन जीने के अधिकार को स्वीकार करना बहुत जरूरी है और उन्हें जल के बारे में जानकारी दी जानी चाहिए.’

एनजीटी ने राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन को 100 किलोमीटर के अंतराल पर डिस्प्ले बोर्ड लगाने का निर्देश दिया ताकि यह जानकारी दी जाए कि जल पीने या नहाने लायक है या नहीं.

एनजीटी ने गंगा मिशन और केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को दो सप्ताह के भीतर अपनी वेबसाइट पर एक मानचित्र लगाने का निर्देश दिया जिसमें बताया जा सके कि किन स्थानों पर गंगा का जल नहाने और पीने लायक है.

बीते 19 जुलाई को एनजीटी ने गंगा नदी की साफ-सफाई पर असंतोष व्यक्त करते हुए कहा था कि नदी की हालात असाधारण रूप से खराब है. नदी की सफाई के लिए शायद ही कोई प्रभावी कदम उठाया गया है.

एनजीटी के अध्यक्ष जस्टिस एके गोयल की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा था कि अधिकारियों के दावों के बावजूद गंगा के पुनर्जीवन के लिए जमीनी स्तर पर किए गए काम पर्याप्त नहीं हैं और स्थिति में सुधार के लिए नियमित निगरानी की जरूरत है. साथ ही एनजीटी ने गंगा में प्रदूषण के बारे में जमीनी स्तर पर लोगों की राय जानने के लिए सर्वेक्षण कराने का भी निर्देश दिया था.

पिछले साल जुलाई में एनजीटी ने गंगा की सफाई के लिए एक फैसला दिया था जिसमें कहा गया था कि हरिद्वार और उन्नाव के बीच में नदी से 100 मीटर दूर तक के क्षेत्र को ‘नो डेवलपमेंट ज़ोन’ घोषित किया जाए और नदी से 500 मीटर की दूरी पर कूड़ा फेंकने से रोका जाए.

प्राधिकरण ने कहा था कि सरकार ने गंगा सफाई पर 7,000 करोड़ रुपये खर्च कर दिया है लेकिन गंगा अभी भी पर्यावरण के लिए एक गंभीर विषय बना हुआ है.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)