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हिंदू-मुस्लिम 15 दिन न्यूज़ चैनल देखना छोड़ दें तो दोनों में प्यार हो जाएगा: अनुभव सिन्हा

रा वन, तुम बिन, गुलाब गैंग जैसी फिल्में बनाने वाले निर्देशक अनुभव सिन्हा ने कहा कि देश से हर हिंदुस्तानी प्यार करता है, उन्हें अपनी देशभक्ति साबित करने के लिए मजबूर न किया जाए.

निर्देशक अनुभव सिन्हा (बाएं), फिल्म निर्देशक और अभिनेता रजत कपूर के साथ. (फोटो साभार: फेसबुक)

निर्देशक अनुभव सिन्हा (बाएं), फिल्म निर्देशक और अभिनेता रजत कपूर के साथ. (फोटो साभार: फेसबुक)

लखनऊ: समाज में फैली नफ़रत, अपने देश को प्यार न करने की तोहमत और सोशल मीडिया पर अफ़वाहों से बेज़ार आम मुसलमान के अंतर्मन को टटोलती फिल्म ‘मुल्क’ के निर्देशक अनुभव सिन्हा का मानना है कि हिंदू और मुसलमान दोनों अपने धर्म और देश से प्यार करते हैं, लेकिन उन्हें इसे (देशभक्ति) साबित करने के लिए मजबूर न किया जाए.

उन्होंने कहा कि कवि और गीतकार गोपाल दास नीरज ने एक नज़्म लिखी थी, ‘अब कोई मज़हब ऐसा भी चलाया जाए, जिसमें इनसान को इनसान बनाया जाए.’

अनुभव सिन्हा का मानना है कि मज़हब कोई बुरा नहीं है, अगर एक दूसरे पर भरोसा किया जाए और एक दूसरे की नीयत पर शक न किया जाए तो 70 साल की नफरत को 70 घंटे में प्यार और खुलूस में बदला जा सकता है.

सिन्हा कहते हैं, ‘इस मुल्क में न हिंदू दंगा चाहता है और न ही मुसलमान, बस चंद लोग हैं जो इन दोनों को लड़ते देखना चाहते हैं क्योंकि इसमें उनका फायदा है.’

इसके लिए मीडिया और सोशल मीडिया को ज़िम्मेदार ठहराते हुए वह सलाह देते हैं कि अगर जनता न्यूज़ चैनल और सोशल मीडिया से नाता तोड़ ले तो प्यार की बरसात बरसने में ज़्यादा वक़्त नहीं लगेगा.

तीन अगस्त को रिलीज़ होने जा रही फिल्म ‘मुल्क’ एक ऐसे मुस्लिम परिवार की कहानी है जिसका एक सदस्य आतंकवाद में शामिल हो जाता है. समाज में हर तरफ़ से उठती उंगलियों की चुभन झेलते बनारस के एक मोहल्ले में रहने वाले इस परिवार की जद्दोजहद और ख़ुद पर लगे देशद्रोही के दाग को धोने के संघर्ष की कहानी है यह फिल्म.

फिल्म ‘मुल्क’ में ऋषि कपूर, तापसी पन्नू, आशुतोष राणा, रजत कपूर, और प्रतीक बब्बर अहम भूमिकाओं में नज़र आएंगे. फिल्म की 80 फीसदी शूटिंग उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के विभिन्न मोहल्लों में हुई है .

सिन्हा ने हिंदुओं और मुसलमानों के बारे में बात करते हुए बताया, ‘मैं बनारस का हूं. होश संभाला तो कभी मुरादाबाद, कभी इलाहाबाद तो कभी मेरठ में हिंदू-मुस्लिम फ़साद के बारे में सुनता था. यह दंगे-फ़साद हमेशा मुझे तकलीफ देते थे. फिर मैं अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में पढ़ने गया. वहां मैं अल्पसंख्यक था और जब कभी आसपास दंगे-फ़साद या तनाव होता था तो मेरे सारे मुस्लिम दोस्त मुझे उसकी आंच से महफूज़ रखने की कोशिश करते थे. वहां समझ में आया कि मुसलमानों को भी फ़साद पसंद नही है. मतलब ये कि दंगा-फ़साद कोई कौम नहीं चाहती.’

दोनो समुदायों में बढ़ती दूरियों से परेशान सिन्हा कहते हैं, ‘तमाम दुनिया के मसले हल हो रहे हैं, बर्लिन की दीवार गिर रही है, उत्तर कोरिया और दक्षिण कोरिया एक हो रहे हैं लेकिन हमारे मसले हल ही नहीं हो पा रहे हैं. मैं तो कहता हूं कि अगर हिंदू-मुस्लिम 15 दिन न्यूज़ चैनल देखना बंद कर दें तो दोनों को आपस में प्यार हो जाएगा.’

सिन्हा कहते हैं, ‘धर्म जबर्दस्ती की चीज़ नहीं है. कोई मेरे सिर पर बंदूक रख कर ‘जयश्री राम’ बोलने को कहेगा तो मैं नहीं बोलूंगा. मैं हिंदू हूं इस पर मुझे गर्व है. राम मेरे भीतर बसे हैं, लेकिन मैं दिखावा नहीं करता. मेरी मां मुझे रोज़ मंदिर ले जाती थी. आज भी मैं सुबह-शाम पूजा करता हूं. आखिर हिंदू क्यों साबित करे कि वह इस देश से और अपने धर्म से प्यार करता है और मुसलमान क्यों साबित करे कि वह देश प्रेमी है.’

शाहरूख खान की फिल्म ‘रा वन’, ‘दस’, ‘गुलाब गैंग’, ‘तुम बिन’ जैसी फिल्में दे चुके सिन्हा अपनी अगली फिल्म में भारतीय राजनीति को हल्के-फुल्के अंदाज़ में पेश करने जा रहे हैं.

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