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राष्ट्रीय पुरस्कार से ​सम्मानित फिल्म ‘एक डॉक्टर की मौत’ के लेखक रामपद चौधरी का निधन

प्रख्यात बंगाली लेखक रामपद चौधरी फेफड़े और वृद्धावस्था से जुड़ी समस्याओं से जूझ रहे थे. उनकी रचना ‘बाड़ी बोदले जाए’ के लिए 1988 में उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया था.

रामपद चौधरी. (फोटो साभार: द टेलीग्राफ)

रामपद चौधरी. (फोटो साभार: द टेलीग्राफ)

कोलकाता: प्रसिद्ध बंगाली लेखक रामपद चौधरी का कोलकाता के एक अस्पताल में निधन हो गया. राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार से सम्मानित फिल्म ‘एक डॉक्टर की मौत’ उनकी कहानी ‘अभिमन्यु’ पर आधारित थी.

चौधरी 95 साल के थे. उनके परिवार में पत्नी के अलावा दो बेटियां हैं. उनकी बड़ी बेटी महुआ समांता ने बताया कि वह पिछले दो से ढाई महीने से बीमार चल रहे थे.

अस्पताल के एक प्रवक्ता ने बताया कि उन्हें फेफड़े से जुड़ी समस्या सहित वृद्धावस्था से जुड़ी बीमारियों के कारण 21 जुलाई को अस्पताल में भर्ती कराया गया था. उनका 29 जुलाई की शाम दिल का दौरा पड़ने के कारण निधन हो गया.

अभिमन्यु की कहानी डॉक्टर सुभाष मुखोपाध्याय की ज़िंदगी और कार्यों पर आधारित है, जिन्होंने साल 1978 में भारत के पहले और दुनिया के दूसरे टेस्ट ट्यूब बच्चे का सृजन किया था.

यह फिल्म एक डॉक्टर और उसके शोध की प्रशंसा और पहचान देने की बजाय उसका बहिष्कार, निंदा और बेइज़्ज़ती की कहानी है.

डॉ. सुभाष मुखोपाध्याय एक भारतीय फीजिशियन थे, जो ‘इन विट्रो फर्टिलाइजेशन’ ट्रीटमेंट से जुड़े शीर्ष डॉक्टरों में से हैं.

1990 में डॉ. सुभाष मुखोपाध्याय की कहानी अभिमन्यु पर तपन सिन्हा ने ‘एक डॉक्टर की मौत’ फिल्म बनाई थी. वहीं मृणाल सेन की हिंदी फिल्म ‘एक दिन अचानक’ भी चौधरी की कहानी ‘बीज’ पर आधारित थी.

फिल्म ‘एक डॉक्टर की मौत’ में पंकज कपूर, शबाना आज़मी के अलावा अनिल चटर्जी, इरफ़ान ख़ान दीपा साही प्रमुख भूमिकाओं में नज़र आए थे. 1990 में इस फिल्म को दूसरी सर्वश्रेष्ठ फिल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार, सर्वश्रेष्ठ निर्देशन का राष्ट्रीय पुरस्कार और अभिनेता पंकज कपूर को राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार का स्पेशल ज्यूरी अवार्ड मिला था.

चौधरी की कुछ प्रमुख कहानियों में प्रथम प्रहार (1954), बनपलाशिर पदाबलि (1990), एख्खोनि (1969), खारिज, बाड़ी बोदले जाए (1988), अभिमन्यु (1982) आदि हैं.

उन्हें 1988 में उनकी रचना ‘बाड़ी बोदले जाए’ के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया था.

रामपद चौधरी का जन्म 28 दिसंबर 1922 को खड़गपुर में हुआ था. दूसरे विश्व युद्ध के समय उन्होंने लेखन शुरू किया था. 50 से 80 के दशक में वे सक्रिय रहे. उनकी आख़िरी किताब ‘हरानो खाता’ साल 2015 में प्रकाशित हुई.

वह लंबे समय तक बंगाली दैनिक आनंद बाज़ार पत्रिका से भी जुड़े रहे. वह यहां रविवार को निकलने वाले विशेष पन्नों का संपादन करते थे.

उनकी बहुत सारी कहानियों से बंगाल की कुछ चर्चित फिल्में बनीं. जैसे- द्विपेर नाम तिरंग (1963), एख्खोनि (1970), पिकनिक (1972), बनपलाशिर पदाबलि (1973), जे जेखाने दांड़िये (1974), खारिज (1982) हैं.

उन्हें रबींद्र पुरस्कार, आनंद पुरस्कार और रबींद्रनाथ टैगोर मेमोरियल इंटरनेशनल पुरस्कार से नवाज़ा जा चुका है. पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने लेखक के निधन पर शोक ज़ाहिर किया है.

द टेलीग्राफ से बातचीत में साहित्यकार पबित्र सरकार कहते हैं, रामपद चौधरी के उपन्यास मध्यम वर्ग के ढोंग और छल-कपट को सामने लाते हैं. उनकी कहानी खारिज पीढ़ियों तक पढ़ी और याद की जाएगी.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)