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पैसा ऐंठने वाला धंधा बन गया है डॉक्टरी का पेशा: दिल्ली हाईकोर्ट

याचिका में मांग की गई है कि सुप्रीम कोर्ट के पूर्व में केंद्र सरकार को दिए उस निर्देश की पालना की जाए जिसमें कहा गया था कि नर्सिंग होम और निजी अस्पतालों में नर्सों के वेतन और कार्य परिस्थितियों को सुधारने के लिए एक समिति का गठन हो.

(फोटो :पीटीआई)

(फोटो :पीटीआई)

नई दिल्ली: दिल्ली उच्च न्यायालय ने निजी अस्पतालों और नर्सिंग होम में नर्सों की स्थिति को लेकर दायर एक जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान बुधवार को कहा कि शिक्षा और चिकित्सा धन ऐंठने वाले धंधे बन गए हैं.

कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश गीता मित्तल और जस्टिस सी हरिशंकर की पीठ ने केंद्र को नोटिस जारी कर याचिका पर अपना रुख स्पष्ट करने को कहा है.

जनहित याचिका में दावा किया गया है कि उच्चतम न्यायालय द्वारा नर्सों के अधिकारों की रक्षा को लेकर दिशा-निर्देश दिए जाने के बावजूद निजी चिकित्सा संस्थानों में नर्सों की स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ है.

केंद्र की ओर से अधिवक्ता मानिक डोगरा ने अदालत को बताया कि नर्सों के वेतन और काम से जुड़ी स्थितियों के बारे में दिशा-निर्देश तय किए जा चुके हैं और उन्हें लागू करना हर राज्य की जिम्मेदारी है.

पीठ ने कहा कि याचिका से नर्सों के शोषण का पता चलता है. उसने कहा, ‘अब शिक्षा और चिकित्सा फायदे का कारोबार बन चुके हैं.’

पीठ इसी तरह की एक याचिका के साथ इस पीआईएल पर भी आठ अक्टूबर को आगे की सुनवाई करेगी.

याचिका ट्रेन्ड नर्सेस एसोसिएशन ऑफ इंडिया (टीएनएआई) की ओर से दाखिल की गई थी. जिसमें कहा गया था कि सुप्रीम कोर्ट के 29 जून के केंद्र को दिए निर्देश कि नर्सिंग होम और निजी अस्पतालों में नर्सों का वेतन और कार्य करने के हालातों को सुधारने के लिए सिफारिश करने एक समिति का गठन करे, का अब तक पालन नहीं किया गया है.

अधिवक्ता रोमी चाको की ओर से दायर याचिका में दावा किया गया है कि निजी चिकित्सा प्रतिष्ठानों में नर्स मामूली वेतन पर काम कर रही हैं और अमानवीय परिस्थितियों में रह रही हैं.

सुप्रीम कोर्ट के उस निर्देश का पालन करने के अलावा याचिका में ऐसे आदेश दिए जाने की भी मांग की गई थी कि निजी अस्पतालों और नर्सिंग होम भी नर्सों को वही लाभ और वेतन उपलब्ध करें जो कि सरकारी अस्पतालों में उनके समकक्षों को मिलता है.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)

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