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रेत समाधि: हिंदी साहित्य की बंधी-बंधाई परिपाटी को चुनौती देता उपन्यास

हिंदी की अमूमन लिखाइयों में किसी नए क्राफ्ट, नए शिल्प या बुनाई के खेल कम ही होते हैं. लेकिन इस किताब को सब बंधन को तोड़ देने के बाद ऐसे लिखा गया है जैसे कि मन सोचता है.

(फोटो साभार: राजकमल प्रकाशन)

(फोटो साभार: राजकमल प्रकाशन)

कोई किताब आपको पुराने दिनों की दुनिया में झम्म से ले जाए, वही दरवाज़ा, वही लड़की-लड़कौरी-सी अम्मा, जिनके बूढ़े बदन में पंद्रह साला लड़की बसे. जो चलते न चलते झपाझप कूदने-उड़ने लगे और आप अम्मा बन जाएं और अम्मा बन जाए किशोरी. इस उलट झापे में जीवन रिवाइंड हो, कि चलो एक बार फिर बीतते हैं, कि पहली दफा कुछ चूक-सी रह गई थी, कुछ जल्दीबाज़ी भी, अब इस बार ज़रा फिर से करते हैं जीवन के हिसाब-किताब.

रेत समाधि  उपन्यास है जिसका शिल्प बंधे-बंधाए लीक को अनावश्यक करता एक सरल प्रवाह में बहता है. इसकी फॉर्म कहानी और पात्र के परे है, घटनाओं और संवाद के परे है. पात्र अगर हैं तो अपनी सांकेतिक उपस्थिति में, घटनायें संदर्भ के तौर पर, संवाद है तो एकालाप के रूप में और उन सब को लेकर एक कैनवस रंगा गया है.

छोटी रोज़मर्रा की घटनाओं और अनूठे बिंब की उंगली पकड़ मन के बीहड़ गहरे अतल में उतर जाने की कथा है, जहां कभी आसमान है, घर है, चिड़िया है, तो कभी अंधेरा, बेचैनी और हाहाकार. कभी दुख, तकलीफ है…

तो बस यूं कहें कि यह किताब एक पूरा मन है, भरा-पूरा… उतना ही खाली जितना होना चाहिये और उतना भरा जिससे कि खाली का खालीपन ढनढन बोले, उसके बोल गूंजे. शरीर के भीतर अनुगूंज ऐसे विचरे जैसे आसमान में चक्कर काटता कोई बाज़… गोल गोल लगातार…

अम्मा कौन हैं, बेटी, रोज़ी? सब स्त्रियां हैं, लड़कियां, एक कुछ पुरुष भी, माने स्त्री के भीतर पुरुष मन या कुछ पुरुष का-सा शरीर भी. और जो पूरी स्त्री है, मां है, पत्नी से ज़्यादा प्रेमिका, उसके मन में कोई चंचल छोकरी है, कोई उद्दंड पुरुष.

फिर मन भी अपनी मनमानी करने वाला मन. अनवर की छाती पर सिर रख ठुमरी गा देने वाला मन, जीवन जी चुकने के बाद फिर जी लेने वाला मन. अपने मन की करने वाला मन. एक स्त्री से ज़्यादा उसका मन है, स्त्रियों का सामूहिक मन.

उस अर्थ में फीमेल इमोशनल जेंडर का प्रतिनिधित्व करता हुआ, बाहरी से ज़्यादा भीतरी. उसकी वर्जनायें, उसकी सोच, उसका मन सब किसी कंडीशनिंग के भीतर कैद मन है, जो कई बार स्थूल होता है, मूर्त होता है. फिर बाज़ वक्त किसी ऐसी खिड़की से खट बाहर निकल जाता है, इतना फैल जाता है कि निस्सीम हो जाता है. ऐसा है अम्मा का मन, उसकी दुनिया. ऐसी है औरत की अंतरंग दुनिया.

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एक अमूर्तन की दुनिया होती है. एक पक्की मूर्त… ऑब्वियस, लिनियर. नेपथ्य का कोई गोशा-रेशा नहीं, लेकिन सब प्रत्यक्ष हो ऐसा तो किसी सूफी-संत ने भी वादा करार नहीं किया. अपने मन तक की हमको खुद ख़बर नहीं होती.

अपने जीवन और आने वाली सांस तक नियंत्रण के बाहर है. सरहद के पार का धुंधलका है, नो मेंस लैंड है. तो कैसी बुनकारी से उसकी परत दर परत दुनिया खड़ी की जाए कि बाहर सब सुथरा हो, साफ हो, पीछे के धागे सिर्फ आपके हाथ हो, ऐसे अमूर्तन को रच देना मन के बड़े अमीर फैले कैनवस की सजावट है.

रेत समाधि  ऐसे अमूर्तन के ढांचे पर मन और दुनिया का विशाल संसार रचती है. साधारण रोज़मर्रा की घटनाओं में असाधारण तत्वों से एक ऐसी बुनावट है जिसकी कारीगरी बहुत पास से देखी नहीं जा सकती.

उसे देखने के लिए कुछ दूरी ज़रूरी है. उस दूरी से तस्वीर का पूरापन अपने समूचे मायने में दिखता है, लेकिन जब तक ये दूरी नहीं आती, अम्मा अपने साधारणपने में, अपने दिमागी उलझावों में एक अजीब किस्म के भोलेपन से ग्रसित दिखती है.

ये सच है कि ज़रूरी नहीं कि सिर्फ बाह्य कहन की कथा ही हो, ये भी ज़रूरी नहीं कि पात्र किसी घटना से बंधे कोई व्यवहार करें, या ये कि भावों के रस से डूबा सराबोर कोई प्रसंग हो.

लेकिन ये तो सच है कि भीतरी गूढ़ रहस्यों की यात्रा में कोई तार, कोई तरंग का स्पर्श हो. रेत समाधि  में, कई-कई बार होता है, लेकिन कुछ बार पकड़ में आने के पहले ही छूट-छूट भी जाता है, भीतर गहरे हृदय को छूने के ठीक पहले कहीं और चला जाता है.

बावज़ूद पढ़ते हैरानी भरी खुशी होती है, लगता है कोई साझा तार झनझना उठा या फिर कोई शार्प इनसाइट चमत्कृत कर गया.

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भाषा एक टूल है, अ मीडियम ऑफ एक्स्प्रेशन. उसको बरतने की एक कला होती है और अलहदा तरीके से बरतने का अलग हुनर. ज़ुबान की मिठास, मीठी बोली, शब्दों को उचारने का स्वाद, उस उचारने में नई ध्वनि ईज़ाद करने का सुख, उसको बोलने,ज़ोर से बोलने का संगीत.

रेणु, राही मासूम रज़ा, कुर्रतुलऐन हैदर को पढ़ते कितनी बार हुआ है कि रुककर फिर फिर ज़ोर से बोलकर पढ़कर उसके संगीत में उल्लासित होना. ऐसा कुछ रेत समाधि  के साथ भी होता है.

बहुत से शब्द हैं जिन्हें गीतांजलि ऐसे बरतती हैं, इतनी सहजता से, जैसे पुराने दिन बचा ले रही हों, जैसे उनको इस्तेमाल भर करने से कोई आंगन, कोई ठीया, कोई पुराने नीम के पत्ते से भरता सहन, कोई पुराना बसा भरा घर फिर से गुलज़ार हो जाए. इस नये चमचमाते बड़े शहर का अजनबीपन यूं ही बिला जाए.

उनकी भाषा में तरलता है. उनके वाक्य छोटे-छोटे बनते हुए एक सिरे से दूसरे सिरे तक खूबसूरत चक्करघिन्नियों में घूमते हैं. इस घुमाई में ताज़गी है, भोलापन है. उनके शब्द बेहद अलग बिंब रचते हैं और कुछ ऐसे प्रवाह से रचते हैं कि सब सहज स्फूर्त बहता है बिना हड़बड़ी के, एक नादान भोलेपन से, जैसे बच्चे के हाथ में चरखी.

ये इस भाषा का कमाल है कि कई हिस्से पहली पढ़ाई में पानी की तरह फिसल जाते हैं और इसके भाव सतह पर फूलों जैसे तैरते हैं. लेकिन कुछ हिस्से जो चैप्टर की शुरुआत में अमूर्तन का संसार रचते हैं उसकी बुनावट ही कुछ ऐसी है कि ठहरकर इंट्रोस्पेक्शन किया जाए, कि ठहर कर डूबने का एहसास लगातार होता रहे.

हिंदी की अमूमन लिखाइयां किसी पुराने धज को बचाये चलती हैं. विदेशी लिखाइयों के बरक्स एक ठहरी दुनिया बार-बार जैसे रिपीट होती चलती है. किसी नये क्राफ्ट, नये शिल्प या बुनाई के खेल कम ही होते हैं.

उम्मीद की जाती है कि कोई सामाजिक प्रसंग कोई नीति कथा कोई मोरल मैसेज अगर न हो तो उस लिखाई को फ्रिवलस [frivolous] यानी तुच्छ कैटेगरी में रख दिया जाए. गांव और गरीब की कहानी, चेतना और क्रांति की कहानी के परे जैसे कोई कहानी नहीं. जैसे लेखक लेखक न हुआ कोई मोरल प्रीचर हुआ, समाज सेवी ही हुआ.

लेखक ये सब है पर उससे विलग भी है. जितना समाज में धंसा है उतना ही जुदा भी है. वो एक दृष्टा है, एक तीसरा जो उस दूसरे को पहले को देखता देख रहा है. बावज़ूद इसके उसका संदर्भ सिर्फ बाह्य नहीं बल्कि कहीं भीतर अंतरंग संसार भी है.

मुझे हिंदी में बहुत सी किताबें याद आ रही हैं जो इस भीतरी संसार की महीन कारीगरी को बहुत ठहर कर सांस दर सांस खोलती हैं, जैसे कोई विलंबित आलाप… जो पूरे दिन चलता हो, पूरी रात चलती हो, सौ पन्ने चलती हो या उम्र भर.

निर्मल वर्मा, कृष्णा सोबती, कृष्ण बलदेव वैद, ज्योत्स्ना मिलन, कुर्रतुल ऐन हैदर… इधर के दिनों में जैसे ये हुनर कहीं तिरोहित हुआ था. फिर गीतांजलि के लिखे में वही आस्वाद, वही ठहराव.कोई खेल नहीं, कोई दिखावा नहीं, कोई सच का पाखंड नहीं.

गीतांजलि का यह उपन्यास उस मायने में अ-कहानी है. जैसे उन्होंने तय किया हो कि इस किताब में वो पारंपरिक तत्व नहीं होंगे. फिर सब बंधन को तोड़ देने के बाद उन्होंने ऐसे लिखा जैसे कि मन सोचता है, यहां से उड़कर वहां, फिर कहां-कहां.

शुरुआत में ऐसा लगता है कि कोई साहजिक बहाव है, बिना किसी तैयारी के, फिर क्रमश: ये बात अंदर पैठती है कि इस सेमल के बीज के से जंगली बहाव में भी एक बीहड़ और महीन किस्म का नियंत्रण है. एक ऐसा रियाज़ है इसके पीछे जो अपनी सहज सरलता में उसके पीछे के काम को अदृश्य बना देता है.

बहरहाल, गीतांजलि जो नहीं कहती और नहीं सोचती या जिसे उन्होंने नहीं लिखा कहा, उस सब अनकहे की भी एक कहानी है जो बेहद महत्वपूर्ण है. तस्वीर में जो नहीं दिखा उसकी अहमियत उसका भाव भी एक तरीके से सिलसिलेवार ठोस तरीके से उभरता है.

जैसे बेटी का अम्मा के साथ का रिश्ता जो एक चिढ़ के बावज़ूद बड़ा तरल-सा बहता है, जैसे किसी बच्चे को शामिल कर रही हो, या फिर रोज़ी को न बर्दाश्त करते रहते फिर रज़ा मास्टर के स्नेह में भी पड़ जाना, या केके के होने न होने के आवाजाही के बीच एक अनकहा-सा कुछ सिगरेट के धुंए-सा तिरते रहना, अपनी ज़िंदगी ऐसी बनाई कि अपनी मर्ज़ी का जीवन हो को बिखरते देखना और अम्मा और अनवर की कहानी को ऐसे स्वीकार कर लेना जैसे अंतत: माता-पिता अपनी प्रेम में भाग गई बेटी को मान स्वीकार लेते हैं.

बेटी जो जीवन अपनी मर्ज़ी जीती थी, अम्मा जो दूसरों की मर्ज़ी करते करते अचानक चिड़िया बन गई, रोज़ी जो जब तक जी ऐसे कि अपने हिसाब से अपने लिए. इनका जीवन कितने अप्रत्यक्ष तरीके से फेमिनिस्ट है, कितने सहज-सरल तरीके से, जैसे ऐसा होना एक वे ऑफ लाइफ है. कोई क्रांति, कोई मोर्चा नहीं है, बस जीवन है. कोई नाटक नौटंकी ड्रामा नहीं है.

इस किताब का लेकिन ये खतरा बड़ा ज़बरदस्त है कि बेटी को, अम्मा को फेमिनिस्ट मान लिया जाए. ऐसा करना पूरे किस्से को हल्का करना होगा कि किताब को फेमिनिस्ट मुद्दों की किताब समझ हाईजैक कर लिया जाए.

रेत समाधि  दरअसल एक मानवतावादी यानी ह्यूमनिस्ट उपन्यास है. नज़ीर भाई, अली अनवर, रज़ा मास्टर, अम्मा, केके, बड़े यहां तक भाभी…सब.

तीसरा हिस्सा जो पाकिस्तान में घटता है, किसी अदेखे समय की छाप में, विभाजन के बैकड्रॉप में, खैबर, लंडीकलां, जेल की कैद में, कलाश्निकोव के साये में, खिच्चे चिड़ियामुंह सिपाहियों के निगरानी में, जहां पौधे उगाये जा रहे हों, जहां पत्थरों के चट ज़मीन पर कोई नन्हा फूल खिल जाए ऐसे कोई आत्मीयता का रस फूट पड़े.

इस दुनिया में एक किस्म का हास्य है, एक तरीके की मानवता है, कुछ पगलैटी है, जादुई रहस्यवाद है और एक किस्म का बौगड़पना है. एक अजीब-सी खुशी भी है रेट्रोस्पेक्ट में. ये हिस्सा उन पहले दो हिस्सों को उड़ान देता है गोयाकि पहला हिस्सा था इसलिए दूसरा इतना ठहराव भरी खुशी लिए था और दूसरा था तो तीसरे का अक्स इतना साफ सुथरा पैना हुआ.

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जीवन क्या है, कहां है, ये तो पता है, लेकिन इसका अंत किन दिशाओं में जाएगा ये न तो अम्मा को, न ही बेटी को पता है. न उन सारी औरतों को जो अम्मा हैं, जिनका मन ऐसे ही भटकता है, किसी बेचैन बंधन में, किसी चारदीवारी के भीतर, जो आसमान और बादल और चांद और हवा से दोस्ती करती हैं इसलिए कि मन की उड़ान निस्सीम है, कि सच यही है और इसलिए तमाम उड़ान के बावज़ूद बेहद त्रासदायक है.

त्रासदायी इसलिए भी है कि आश्वस्तियों के बाद भी इतना साफ है कि ये आश्वस्तियां ऐसी औरत की हैं जो उन नियमों के भीतर कैद है और उसकी सारी कामनायें उन दायरों के भीतर बंधी हुई चाहतें हैं, जिसे पूरी उम्र निकालनी है उस ट्रैप से निकलने के लिए.

महत्वपूर्ण ये कि अस्तित्व की पड़ताल उतनी ही सामयिक है, शायद हमेशा रहेगी. मन के परतों को प्याज़ के छिलके सा उतारने पर, आंसू निकलेंगे ही, फिर हर परत उघड़ने के बाद नीचे क्या निकला का चमत्कार भी है.

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किताब के छपने के समाजशात्रीय पहलू भी गौरतलब हैं. ऐसी किताब जो हिंदी साहित्य समाज की बंधी-बंधायी परिपाटी से अलग चले, जिसमें शिल्प की संरचना ऐसी हो जो विस्तार ही विस्तार दे, जो हर नियम के विरुद्ध हो, जो पूरे तौर से डीफॉर्मटेड हो वैसी किसी भी चीज़ के स्वागत में उमगने की परिपाटी हमारी भाषा में कहां है.

मन रमने-रमाने का संसार हमेशा हमारे साहित्य में पेरीफेरल रहा है. तथाकथित आलोचक समय और समाज का एजेंडा तय करते हैं और जो चीज़ें इन तयशुदा दायरे के इर्दगिर्द घूमती हैं वे स्वीकृत होती हैं.

बाकी उनसे इतर जितनी भी दुनिया है उसकी उपस्थिति नोंक भर होती है. किसी भी भाषा के साहित्य की ज़रूरत अपने समय के अंतरलोक और बाह्यलोक के बीच एक सिम्फनी पैदा करने की होती है. हमारे समय और संदर्भ को पूरी ईमानदारी से दर्ज कर लेने की होती है.

डेविड सांसिग बताते हैं कि फाकनर को ज़रूरत महसूस नहीं हुई कि वो पात्रों को गढ़ें. रेत समाधि की खासियत ये कि गीतांजलि ने भी किरदारों को रचा नहीं उन्हें बस लिख दिया ऐसे जैसे ये दुनिया एकदम सांस लेती अपनी दुनिया हो.

रेत समाधि पढ़ते मुझे अनायास इंवेंशन ऑफ सॉलीट्यूड की याद आती रही, जबकि दोनों किताबों में साम्य सिर्फ इतना है कि पॉल ऑस्टर अपने पिता की दास्तान लिख रहे हैं, पिता जो अपनी मृत्यु से पहले भी अनुपस्थित थे और गीतांजलि एक काल्पनिक मां की कहानी लिख रही हैं जो इतनी उपस्थित हैं कि बीते उम्र में फिर छोटी उम्र की तरफ लौट पड़ रही हैं.

अरुंधति रॉय के अंजुम आफताब की भी याद आना वाजिब बात थी रोज़ी और रज़ा मास्टर को पढ़ते, लेकिन ‘मिनिस्ट्री ऑफ अटमोस्ट हैपीनेस’ संरचनात्मक और स्टाइलिस्टिक रूप से एक राजनीतिक उपन्यास है, जबकि रेत समाधि इसके विपरीत किरदार प्रमुख है.

तीसरे हिस्से का पाकिस्तान और पार्टीशन और अम्मा का जीवन, अनवर की कहानी राजनीतिक न हो कर ह्यूमन स्टोरीज़ की दास्तान है. उसमें विभाजन की क्रूर त्रासदी किसी तीखेपन से आने की बजाए कुछ मैजिकल रियलिज़्म की तरह आती है जैसे कोई नीति कथा हो ऐन अल्लेगॉरिकल टेल.

(प्रत्यक्षा स्वतंत्र रूप से लेखन करती हैं.)