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‘हमरा नाम परपेंडीकुलर है और हम आपकी दुकान लूटने आए हैं’

गैंग्स आॅफ वासेपुर, बैंजो और धड़क जैसी फिल्मों में काम कर चुके अभिनेता आदित्य कुमार बॉलीवुड में अब तक की अपनी यात्रा के बारे में फ़ैयाज़ अहमद वजीह से चर्चा कर रहे हैं.

अभिनेता आदित्य कुमार.

अभिनेता आदित्य कुमार.

हमरा नाम परपेंडीकुलर है. फैजल खान हमरे बड़े भाई हैं. हम आपकी दुकान लूटने आए हैं. पुलिस को फोन मत करना, नहीं तो गोली मार देंगे…

सिनेमा प्रेमियों को याद रह जाने वाला यह डायलॉग अनुराग कश्यप की फिल्म गैंग्स ऑफ वासेपुर के आदित्य कुमार की पहचान कुछ इस तरह बना कि लोग आज भी इस युवा अभिनेता को बाबू ख़ान उर्फ़ बबुआ उर्फ़ परपेंडीकुलर के नाम से बुलाते हैं.

दिलचस्प यह है कि दिग्गज कलाकारों की मौजूदगी में आदित्य कुमार ने उस वक़्त अपनी तोतली ज़बान और अदाकारी की बदौलत ख़ूब वाहवाही बटोरी थी.

आदित्य आजकल अपनी नई फिल्म धड़क को मिली दर्शकों की प्रतिक्रिया से ख़ुश हैं. फिल्म में देवी सिंह के चरित्र के लिए अपने निर्देशक शशांक खेतान के यक़ीन को श्रेय देते हुए अपने अनुभव के बारे में कहते हैं कि मुझे उनके साथ काम करके एक एक्टर तौर पर काफ़ी कुछ सीखने को मिला.

धड़क के लिए आदित्य को मिली-जुली प्रतिक्रिया मिल रही हैं. आदित्य का कहना है कि मुझे सबसे ज़्यादा ख़ुशी तब होती है जब मेरे बचपन के दोस्त मेरी सराहना करते हैं. गैंग्स ऑफ वासेपुर देखकर दोस्तों की बातों से ही मुझे लगा था कि मैं बुरा एक्टर नहीं हूं और मैं एक्टिंग कर सकता हूं.

बताते चलें कि बिहार में पिछड़ेपन की मार झेलने वाले एक छोटे से गांव के आदित्य को 10वीं, फ़र्स्ट डिवीज़न से पास करने के बाद भी कभी लगा था कि पढ़ाई-लिखाई उनके बस की बात नहीं है.

गौरतलब है कि मैथ, फिजिक्स और केमिस्ट्री से पल्ला झाड़ लेने वाले आदित्य ने अपनी दूसरी और पहली रिलीज़ होने वाली फिल्म में परपेंडीकुलर के अर्थ को एक ख़ास दृश्य में जिस तरह से साकार किया था, वह शायद गणित का कोई शिक्षक सोच भी नहीं सकता.

द वायर  से ख़ास बातचीत के दौरान आदित्य, परपेंडीकुलर के चुनौतीपूर्ण किरदार को याद करते हुए अपने गांव की स्मृतियों में खो जाते हैं. वे कहते हैं, ‘मुझे रेलवे और बैंक वाली नौकरी के चक्कर में फंसकर नहीं रहना था और यूपीएससी मुझसे होता नहीं, तो बस मैं 10वीं के बाद ही अपने आप से ईमानदार हो गया था.’

गैंग्स ऑफ वासेपुर में हाफ पैंट और हवाई चप्पल में नज़र आने वाले आदित्य के छोटे से फिल्मी सफ़र की कहानी में छोटी-बड़ी कामयाबी भले आज उनको उत्साहित कर रही हो, लेकिन यह सब क़स्बे के एक लड़के की उड़ान भर नहीं है.

दरअसल आदित्य उस गांव से आते हैं जहां बिजली अभी 5 वर्ष पहले ही आई है. आदित्य अपने गांव और बचपन को याद करते हुए बताते हैं, ‘गांव में कच्ची सड़क थी, हमें मेन रोड तक जाने के लिए घुटने भर कीचड़ से जूझना पड़ता था और शहर जाने के लिए नदी पार करनी पड़ती थी. इन सब से मुझे निकलना था, कुछ बड़ा करना था, मुझे उस समाज में फंसकर नहीं रहना था, जहां रोज़ छोटी-छोटी बातों के लिए लड़ाई होती है.’

ऐसा नहीं है कि आदित्य को अपने गांव और उसके कीचड़ से घिन आती है, लेकिन वह अपने समाज की दरिद्रता से दुखी ज़रूर हैं. आदित्य कहते हैं, ‘मेरे पिताजी खेती-किसानी वाले साधारण आदमी हैं, साथ में छोटा-मोटा गाड़ियों का वर्कशॉप है. मैं यही सब देखता चला आ रहा था.’

26 वर्षीय आदित्य अपने समाज के पिछड़ेपन के साथ गांव की स्कूली शिक्षा पर भी सवाल उठाते हुए बताते हैं, ‘एक सुनहरे भविष्य के लिए बिहार से पलायन हर युवा की मजबूरी है. मैं भी दूसरे युवाओं की तरह वहां से निकलना चाहता था तो एक दिन मैंने पिताजी से कहा कि यहां कुछ नहीं होगा, उन्होंने हामी भरी और बोले पहले 10वीं कर लो फिर आईएएस की तैयारी के लिए चले जाना.’

वे कहते हैं, ‘उस समय मुझे भी सोचकर अच्छा लगा कि चलो यूपीएससी की तैयारी करेंगे. लेकिन 10वीं के बाद पता नहीं क्या हुआ कि अचानक मैंने फैसला कर लिया कि नहीं मुझे एक्टर बनना है. शायद यह मेरे बुद्धु मन की कल्पना थी या शायद दूरदर्शिता.’

आदित्य अपने सपने की जड़ों को टटोलने की कोशिश में गांव को ही याद करते हुए कहते हैं, ‘हर तरह के अभाव से संपन्न ज़िंदगी काट खाने को दौड़ रही थी, छोटी-छोटी चीज़ों को हासिल करने के लिए संघर्ष, नमक से लेकर साबुन तक के लिए जद्दोजहद मतलब इंसान अपने पूरे जीवन में बुनियादी चीज़ों के जंजाल से ही निकल नहीं पाता. फिर आस-पड़ोस की टोका-टोकी भी कि फलां के पास कितना बैंक-बैलेंस है, ढिमका के पास गाड़ी हो गई.’

अपने आसपास सिनेमा के सवाल पर कहते हैं, ‘मेरे गांव में चोरी-चोरी वीसीआर किराये पर चलता था. पुलिस आती थी तो लोग भाग जाते थे, 2-2 रुपये चंदा करके मिथुन की फिल्म देखी जाती थी. वीसीआर तो मेरे पिताजी का ही था. लेकिन उस वक़्त फिल्म देखते हुए भी कभी मन में नहीं आया कि मुझे फिल्मों में जाना है. सिर्फ तीन महीने में अचानक यह तय हुआ था…’ आदित्य इस बात से इनकार नहीं करते कि शायद वीसीआर वाली फिल्मों ने उनको सिनेमा से क़रीब किया.

आदित्य याद करते हुए बताते हैं, ‘गांव में कभी कुछ भी ऐसा नहीं किया जिसको आप एक्टिंग कहें, स्कूल में भी कोई कल्चरल प्रोग्राम नहीं होता था. हां, 15 अगस्त और 26 जनवरी को देशभक्ति वाली फिल्में ज़रूर दिखाई जाती थीं.’

बिहार के पटना ज़िले के पभेरा गांव में जन्मे आदित्य को आज यह सोचकर हैरत होती है कि इतने पिछड़ेपन में तो राह दिखाने वाला भी कोई नहीं था तो शायद प्रकृति ने ही मेरा मार्गदर्शन किया होगा.

हर तरह के अभाव में भी यूपीएससी के सपने देखने वाले इस समाज में आदित्य आज भी इस बात को समझ पाने में ख़ुद को बहुत ज़्यादा समर्थ नहीं पाते हैं कि उनके ज़ेहन में यह बात कैसे आई कि मुझे फिल्मों में जाना है, लेकिन वह उस पल को याद करते हैं, ‘जब मैंने घर में कहा कि मुझे हीरो बनना है तो पिताजी सन्नाटे में आ गए थे, और कोई प्रतिक्रिया नहीं देते हुए भी उन्होंने कहा था; पागल तो नहीं हो गया… फिर वह ख़ुद ही बोले ठीक है, मुझे थोड़ा वक़्त दो. शायद उन्होंने कुछ और भी सोचा होगा. लेकिन मैं भाग्यशाली था कि कुछ दिनों के लिए ही सही मुझे बैरी जॉन एक्टिंग स्टूडियो में सीखने का मौका मिला.’

बैरी के एक्टिंग स्टूडियो से ही आदित्य के सपने की शुरुआत हुई. वह साल 2006 में पहली बार दिल्ली आए, जहां उनके सामने एक नई दुनिया थी. दिल्ली में बिताए गए अपने दो साल के दिनों को याद करते हुए कहते हैं, ‘एक साल तक थियेटर करता रहा, लेकिन इंग्लिश… इंग्लिश मेरे लिए एक बड़ी समस्या बन गई थी तो मैंने इसके लिए भी मेहनत की.’

गांव से 10वीं के बाद ही दिल्ली आने वाले आदित्य ने यहां इस हैरत को भी जिया कि बड़ी-बड़ी गाड़ियों में शीशे की तरह चमचमाते जूते और महंगे कपड़ों से लदे-फंदे लोगों की दुनिया बड़ी मुख़्तलिफ़ थी और उनकी इंग्लिश…

एक तरह के कल्चरल शॉक को याद करते हुए आदित्य हंसते हुए कहते हैं, ‘यह सब मेरे वहम-व-गुमान में नहीं था, लेकिन मैंने इस नए माहौल को अपनाना शुरू कर दिया था. और चूंकि मैं बहुत छोटा था तो लोग मुझ से प्यार भी करने लगे थे.’

फिल्म गैंग्स आॅफ वासेपुर 2 का पोस्टर. (फोटो साभार: फेसबुक)

फिल्म गैंग्स आॅफ वासेपुर 2 का पोस्टर. (फोटो साभार: फेसबुक)

शाहरुख़ ख़ान और मनोज बाजपेयी जैसे दिग्गज अभिनेताओं को एक्टिंग सिखाने वाले बैरी जॉन के स्नेह को याद करते हुए आदित्य बताते हैं कि पहले उनका स्टूडियो दिल्ली में ही था जो अब मुंबई आ गया है.

आदित्य बैरी जॉन के साथ बिताए दिनों के बारे में कहते हैं, ‘उनकी निगरानी में स्वयं को जानने-समझने का मौका मिला. हालांकि उन दिनों दिल्ली में मुझे कोई संजीदगी से नहीं ले रहा था. मुझे अपने ही बैच में जहां इस बात को लेकर भी कमेंट सुनने पड़ते थे कि मैं बिहारी हूं वहीं बैरी मुझे बहुत सपोर्ट करते थे, मेरी हौसला अफ़ज़ाई करते थे.’

बैरी की चर्चा करते हुए आदित्य हर्ष से भर जाते हैं और कहते हैं; ‘मैंने उनके साथ दिल्ली में तीन प्ले किए जो हनी ट्राइलॉजी के तहत हुआ था; It’s All About Money, Honey, It’s All About God, Honey और It’s All About Sex, Honey. यह सब हिंदी और इंग्लिश में था, बैरी के साथ प्ले करते हुए मैंने किसी हद तक एक्टिंग की बारीकियों को समझा.’

अपनी इस बात को और स्पष्ट करते हुए कहते हैं, ‘बैरी की टीचिंग का अंदाज़ कमाल का था. वह कभी यह नहीं बताते थे कि ऐसे करना है, वह कहते थे तुम्हारे भीतर सारी संभावनाएं हैं, बस उसको एक्स्प्लोर करो. उनकी कही यह बात मेरे लिए आज भी मंत्रोच्चारण के समान है. मैं अपने आप को नसीब वाला समझता हूं कि मुझे उनसे सीखने का मौका मिला.’

थियेटर के अपने छोटे से अनुभव को शेयर करते हुए आदित्य सिनेमा और फिल्म निर्देशक अनुराग कश्यप की चर्चा एक साथ करते हैं, ‘चूंकि यह एक अलग तरह का मीडियम है तो सेंस ऑफ सिनेमा पहली बार अनुराग की संगत में पैदा हुआ. उनके साथ रहकर मैं वर्ल्ड सिनेमा की हैरतों से दो-चार हुआ. फिर मुझे समझ आया कि हमारी इंडस्ट्री में क्या एक्टिंग होती है? हम तो बहुत पीछे हैं.’

अनुराग कश्यप को गॉडफादर का दर्जा देने वाले आदित्य बताते हैं, ‘मेरी पहली फ़िल्म मुंबई कटिंग थी जो रिलीज़ नहीं हो पाई, अनुराग से इसी फिल्म के दौरान मुलाक़ात हुई, उन्होंने हौसला बढ़ाया और फिर उनका दफ़्तर मेरे लिए घर जैसा हो गया. यहीं मुझे सिनेमैटिक एक्सपीरिएंस हुआ. यहां अल पचिनो और लियोनार्डो डी. कैप्रियो जैसों के काम को जानने का अवसर मिला और फिर मैंने धीरे-धीरे सिनेमा को साहित्य की तरह लेना शुरू किया. पहले सिनेमा मेरे लिए मनोरंजन भर था.’

फिल्मों में आने से पहले के अपने संघर्ष को लेकर आदित्य बताते हैं, ‘मेरा संघर्ष वह नहीं था जो आम तौर से फिल्मों को हासिल करने के लिए होता है. मेरा संघर्ष ज्ञान को लेकर था, अपनी अज्ञानता को दूर करने को लेकर रहा और अपनी समझ को विस्तार देने को लेकर मेरा संघर्ष बहुत ज़्यादा रहा. जहां तक पैसे की कमी और सीमित संसाधनों और इस तरह के संघर्ष की बात है तो मैं इसको संघर्ष मानता ही नहीं हूं क्योंकि जब आप एक ख़ास परिवेश से आते हैं तो वह रहता ही है.’

फिल्म कैरी आॅन कुत्तों का पोस्टर. (फोटो साभार: फेसबुक)

फिल्म कैरी आॅन कुत्तों का पोस्टर. (फोटो साभार: फेसबुक)

आदित्य अपने आपको लकी बताते हुए कहते हैं, ‘मुझे शुरू से ही अच्छे लोग मिलते चले गए और अनुराग ने जो विश्वास मुझ पर दिखाया शायद कोई और नहीं दिखाता, इंडस्ट्री में ऐसे चुनिंदा लोग ही हैं. परपेंडीकुलर जैसे मुश्किल रोल के लिए बाहर से आए किसी लड़के पर यक़ीन करना अनुराग जैसे निर्देशक ही कर सकते हैं उन्हीं में वह जज़्बा है.’

अनुराग और परपेंडिकुलर का बार-बार ज़िक्र करने वाले आदित्य कहते हैं, ‘इसी रोल को देखकर लोगों को यक़ीन हुआ कि लड़का अच्छा है, अच्छा काम करता है. लेकिन मैं चाहता हूं कि मुझे परपेंडीकुलर से ज़्यादा चुनौतीपूर्ण रोल ऑफर हो. मैं हर तरह के रोल के लिए तैयार हूं, निर्देशक मुझ पर विश्वास करें तो मैं हर बार ख़ुद को साबित करना चाहता हूं.’

अपने काम पर यक़ीन करने वाले ऊर्जा से भरपूर आदित्य बताते हैं, ‘अभी मैं इस स्थिति में नहीं हूं कि रोल को लेकर चुनाव करूं. हां, सामने से जो आएगा वो करना होगा, मगर उसमें अच्छा करने का संकल्प अपने आप से है क्योंकि एक्टिंग मेरे लिए सिर्फ़ स्क्रिप्ट नहीं है अपने जीवन का अनुभव भी है. अभी मेरी शुरुआत है धीरे-धीरे परिपक्वता भी आएगी.’

गैंग्स ऑफ वासेपुर के बाद के फिल्मी सफ़र पर आदित्य कहते हैं, ‘यहां सब कुछ आसान नहीं होता. बैंजो फिल्म भी मुझे इसलिए मिली कि पहले वह आदित्य नारायण करने वाले थे लेकिन लास्ट मिनट में कुछ हुआ तो फिर मुझे मिल गई. हां, फिल्म कैरी ऑन कुत्तों मुझे गैंग्स ऑफ वासेपुर की वजह से मिली थी.’

अपने इस अनुभव पर मिले-जुले एहसास के साथ आदित्य कहते हैं, ‘इंडस्ट्री में यह सब चलता है. आप अच्छा काम जानते हैं, आपके क्राफ्ट में दम है तो थोड़ी देर ज़रूर होती है लेकिन चीज़ें आपके पास होती हैं.’

सिनेमा के कल्चर पर बात करते हुए आदित्य कहते हैं, ‘अपने यहां अभी वह ट्रेंड उस तरह से शुरू नहीं हुआ कि एक्टर को अपने रोल के लिए अलग से काम करने और तैयारी का मौक़ा मिले.’

आदित्य अपने छोटे से एक्टिंग करिअर पर बात करते हुए साहित्य की भी बात करते हैं और बताते हैं कि मेरे घर में हिंदी साहित्य की किताबें बहुत हैं, लेकिन बीच में ज़रा दूरी हो गई थी, मैंने फिर से पढ़ना शुरू किया है. साहित्य क्यों के सवाल पर आदित्य कहते हैं कि साहित्य इसलिए ज़रूरी है क्योंकि इससे आपको अपने समाज की समझ के साथ अपनी कल्पना को विस्तार देने में हर तरह से मदद मिलती है.

आदित्य अपनी बात इस तरह मुकम्मल करते हुए कहते हैं, ‘मुझे साहित्य की समझ का दावा नहीं है लेकिन मैं पढ़ता रहता हूं, इन दिनों हारुकी मुराकामी की किताबों के साथ मेरा समय बीत रहा है और कुछ फिल्में भी हैं जिन को लेकर बात चल रही है.’

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