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दिल्ली सरकार के न्यूनतम वेतन बढ़ाने के फैसले को दिल्ली हाईकोर्ट ने किया ख़ारिज

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने अदालत के फैसले से असहमति जताते हुए कहा कि इतनी महंगाई में हमने गरीब मज़दूरों का वेतन बढ़ाकर उन्हें बड़ी राहत दी थी. अदालत के आदेश को पढ़कर हम आगे की रणनीति तय करेंगे.

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल. (फोटो: रॉयटर्स)

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल. (फोटो: रॉयटर्स)

नई दिल्ली: दिल्ली की अरविंद केजरीवाल सरकार द्वारा न्यूनतम वेतन बढ़ाने की वर्ष 2017 में जारी की गई अधिसूचना को दिल्ली हाईकोर्ट ने बीते शनिवार को ख़ारिज कर दिया. अधिसूचना को ख़ारिज करते हुए अदालत ने कहा कि दिल्ली सरकार ने निर्णय जल्दबाज़ी में लिया था.

अदालत ने यह भी कहा कि अधिसूचना जारी करने से पहले नियोक्ता और कर्मचारियों की राय नहीं ली गई, जो संविधान का उल्लंघन है.

218 पन्नों के फैसले में दिल्ली हाईकोर्ट की कार्यकारी मुख्य न्यायाधीश गीता मित्तल और जस्टिस सी. हरिशंकर ने दिल्ली सरकार द्वारा वर्ष 2016 में जारी अधिसूचना को भी ख़ारिज कर दिया है, जिसमें न्यूनतम वेतन सलाहकार समिति बनाने की बात कही गई थी. अदालत ने समिति के निर्णय को ख़ारिज हुए कहा कि इसका निर्णय लेते हुए संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन हुआ है.

मालूम हो कि दिल्ली सरकार ने दो अधिसूचनाएं जारी की थी. एक के ज़रिये न्यूनतम वेतन सलाहकार समिति बनाने के लिए कहा गया था और दूसरी में न्यूनतम वेतन के संबंध में निर्देश दिए गए थे.

निर्देश के अनुसार, अकुशल कर्मचारी के लिए 9,724 से 13,500 रुपये, अर्ध कुशल का 10,764 से 14,698 रुपये और कुशल कर्मचारी के लिए 11,830 से 16,182 रुपये प्रति माह न्यूनतम वेतन तय किया गया था.

हिंदुस्तान टाइम्स की खबर के अनुसार, दिल्ली सरकार ने 15 सितंबर, 2015 को न्यूनतम वेतन बिल (दिल्ली) को पारित कर केंद्र के पास भेजा था, जिसे केंद्र ने कुछ बदलाव के लिए वापस भेज दिया था. उस अधिसूचना को फिर मार्च 2017 में लाया गया था, जिसमें उपराज्यपाल ने न्यूनतम वेतन को 37 प्रतिशत बढ़ाये जाने पर मंजूरी दी थी.

अदालत ने फैसला व्यापारियों, पेट्रोल व्यापारी और रेस्टोरेंट मालिकों द्वारा दायर याचिका पर लिया, जिसमें व्यापारियों ने दिल्ली सरकार के तीन मार्च, 2017 को न्यूनतम वेतन की अधिसूचना को ख़ारिज करने की मांग की थी. व्यापारियों का कहना है कि समिति ने उनका पक्ष जाने बिना ही फैसला ले लिया.

अदालत ने कहा कि मज़दूरी वेतन में संशोधन की जरूरत है. लेकिन जल्दी प्रयास और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के उल्लंघन के कारण दुर्भाग्यवश इस संशोधन को रोकना पड़ा. अदालत ने ‘एलिस इन वंडरलैंड’ किताब से लुईस कैरोल द्वारा एक पंक्ति का जिक्र किया जिसमें लिखा है, जितना तेजी से आगे बढ़ते हैं, उतनी तेजी से पीछे रह जाते है.

पीठ ने आगे कहा कि दिल्ली में न्यूनतम वेतन की दर को इसलिए नहीं बढ़ाया जा सकता क्योंकि दिल्ली में वेतन दर पड़ोसी राज्यों से ज़्यादा है.

व्यापारियों की याचिका पर पीठ ने कहा कि व्यापारियों का तर्क सही है और समिति में उनका प्रतिनिधित्व का अलावा उनका पक्ष सुना जाना चाहिए क्योंकि अधिसूचना से वे भी प्रभावित हो रहे हैं. समिति में उनका प्रतिनिधित्व न होने से फैसला उनके हित में नहीं होगा. व्यापारियों ने यह भी कहा था कि 2016 में गठित की गई समिति में जो लोग व्यापारियों का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं, वो लोग इस मामले के जानकार नहीं हैं.

अदालत ने कहा कि दिल्ली सरकार की अधिसूचना व्यापारियों को भी प्रभावित करेगी, इसलिए उनका पक्ष सुना जाना चाहिए.

अदालत ने अपना फैसला सुनाते हुए 15 सितंबर, 2016 में गठित समिति को न्यूनतम वेतन, 1948 के क़ानून के अनुसार गलत और नियम-विरुद्ध करार दिया.

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने अदालत के फैसले से असहमति जताते हुए ट्वीट किया, ‘इतनी महंगाई में हमने गरीब मज़दूरों का वेतन बढ़ाकर उन्हें बड़ी राहत दी थी. कोर्ट ने हमारे निर्णय को ख़ारिज कर दिया. कोर्ट के आदेश को पढ़कर हम आगे की रणनीति तय करेंगे. गरीबों को राहत दिलवाने के लिए हम प्रतिबद्ध हैं.’

हिंदुस्तान टाइम्स के अनुसार, दिल्ली सरकार के वकील रमेश सिंह ने बताया कि दिल्ली में अकुशल, अर्ध कुशल और कुशल कर्मचारी की संख्या 55 लाख है.

दिल्ली के श्रम मंत्री गोपाल राय ने भी अदालत के फैसले पर ट्वीट करते हुए कहा, ‘आम आदमी पार्टी की सरकार द्वारा दिल्ली में न्यूनतम वेतन बढ़ाने के फ़ैसले पर हाईकोर्ट द्वारा लगाई गई रोक को लेकर सोमवार को 12 बजे श्रम विभाग के उच्च अधिकारियों के साथ होगी बैठक. सरकार कर्मचारियों और मज़दूरों की ज़िंदगी में बेहतरी लाने के लिए प्रतिबद्ध, क़ानूनी सलाह भी ले रही है सरकार.’

निर्माण मज़दूर पंचायत संगठन के सचिव ईश्वर शर्मा ने अदालत के फैसले पर दुख जताते हुए कहा कि अदालत के फैसले से मज़दूर काफी प्रभावित होंगे और दिल्ली में लगभग 10 लाख मज़दूर असंगठित क्षेत्र में काम करते हैं.

उन्होंने आगे कहा, ‘बेरोज़गारी और प्रतियोगिता के कारण लोगों को न्यूनतम मज़दूरी से कम पर काम करने के लिए मजबूर होना पड़ता है. ज्यादातर मज़दूर, विशेष रूप से असंगठित क्षेत्रों जैसे निर्माण, जो न्यूनतम मज़दूरी के करीब कहीं भी भुगतान नहीं करते हैं.’

(समाचार एजेंसी भाषा इनपुट के साथ) 

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