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धर्मांधता के सामान्य हो जाने की ख़तरनाक सच्चाई को सामने लाती है ‘मुल्क’

‘मुल्क’ की सबसे बड़ी क़ामयाबी इसके द्वारा दी गई आतंकवाद की परिभाषा है, जोकि एक ऐसा शब्द है, जिस पर आज तक वैश्विक आम सहमति क़ायम नहीं हो सकी है.

(फोटो साभार: फेसबुक/@MulkFilm)

(फोटो साभार: फेसबुक/@MulkFilm)

मुराद अली मोहम्मद (ऋषि कपूर) की उम्र लगभग उतनी ही है, जितनी भारत की है. सात दशक पहले, उनके जन्म से पांच साल पहले, उसके परिवार ने विभाजन के समय भारत में रहने का फैसला किया. वाराणसी में पले-बढ़े मुराद अली ने अपने लिए एक मददगार तंत्र का विकास किया है, जिसमें उसके परिवार वालों के साथ उनके दोस्त भी शामिल हैं, जो अलग-अलग धर्मों को मानने वाले हैं. वह अपने हिंदू दोस्तों पर दावतों में बुलाता है, उनकी दुकानों पर रुकता है, चाय पीता है, उनके साथ चुटकुले सुनता-सुनाता है और उनके साथ हंसता-बोलता है.

लेकिन यह सब तब बदल जाता है, जब उसका भतीजा शाहिद (प्रतीक बब्बर), जो कि एक बम धमाके का आरोपी है, को पुलिस गोली मार देती है. शाहिद वास्तव में आतंकवादी था- इसमें कोई शक नहीं है- और उसका परिवार उसके अपराध से किसी भी तरह से सहानुभूति नहीं रखता है और यहां तक कि उसके शव को भी लेने से इनकार कर देता है.

लेकिन, सबसे खराब यह होता है कि मुराद के भाई (मनोज पाहवा) पर अपने बेटे को उकसाने का आरोप लगाया जाता है. पहले उसे जेल में डाल दिया जाता है, फिर कोर्ट में पेश किया जाता है. जल्दी ही मुराद को भी उसी अपराध में आरोपी बना दिया जाता है. अब उस पर अपने देश के प्रति अपनी वफादारी को साबित करने का जिम्मा आ जाता है. अगर वह अपनी देशभक्ति साबित नहीं कर सकता, तो सरकार उन्हें मार गिराएगी और उसे एक उदाहरण के तौर पर पेश करेगी.

अनुभव सिन्हा की फिल्म मुल्क एक आदमी द्वारा अपने घर को बचाने की जद्दोजद पर केंद्रित है. यह जद्दोजहद अभिधात्मक भी है और एक रूपक के तौर पर भी. पहली चिंता तात्कालिक हैः इस घटना के तुरंत बाद स्थानीय गुंडे उसके 90 साल पुराने पैतृक आवास पर पत्थर फेंकते हैं और बाहर की दीवारों को ‘आतंकवादी’ और ‘पाकिस्तान वापस जाओ’ से रंग देते हैं.

दूसरी तरफ मन को बेचैन करने वाली चिंता बड़े घर, अपने देश को लेकर है, जो कि उसकी जड़ों और नीयत के बारे में उसे एक अलग ही कहानी सुना रहा है.

जैसा कि इस प्रस्तावना से जाहिर है, मुल्क की नजर समकालीन राजनीति पर है, जिस पर हिंदू दक्षिणपंथ का दबदबा है और और जो मुस्लिमों को बाहरी मानता है.

कुछ उल्लेखनीय अपवादों को छोड़ दें तो ऐतिहासिक तौर पर बॉलीवुड राजनीति के प्रति उदासीन रहा है और अपवाद के तौर पर जब ऐसा नहीं होता है, तब चिंताओं को प्रकट करने के लिए चरित्रों, कहानियों और मुद्दों को घिसे-पिटे और अरुचिकर ढंग से प्रस्तुत करने का चलताऊ रास्ता अपनाता है.

सिन्हा द्वारा निर्देशित (जिनके खाते में भुला दी जाने लायक कैश, रा.वन और तुम बिन-2 जैसी फिल्में हैं) मुल्क अपने ट्रेलर से एक बेमेल गठबंधन की कोशिश करती दिखी: तरक्कीपसंद राजनीति का व्यावसायिक फिल्म निर्माण से मिलन. वास्तव में फिल्म के पहले दस मिनट ने इस डर को पुख्ता ही किया.

फिल्म के शुरुआती दृश्य में शाहिद और उसका भाई देश में मुस्लिमों की खराब हालत पर चर्चा करते दिखते हैं. अगला दृश्य एक मस्जिद में मुराद के नमाज पढ़ने का है. यहां से निकलकर वह अपने घर की ओर जाता दिखता है, जिसमें वह एक दीवार को पार कर रहा है, जिस पर त्रिशूल लिए भगवान शिव का चित्र बना है और उस पर बड़े अक्षरों में ‘ओम नमः शिवाय’ लिखा है.

आपको यह एहसास होने लगता है कि आखिर यह सब कुछ कहां जाने वाला है? कि यह भी अपने डिस्क्लेमर के विपरीत उन ढेर सारी फिल्मों में से ही होगी जहां किरदार मजहब की नुमाइंदगी करते हैं. जहां उनके जीवन को प्राथमिक तौर पर दया और उनके साथ होने वाले अन्याय के आईने में देखा जाता है.

यह एक तरह से वह दृष्टि है जो चीजों को या तो पूरी तरह से पवित्र मानती है, या उसे पूरी तरह से तिरस्कार के लायक मानती है. यह दृष्टि चीजों को सीमित करनेवाली और नुकसानदेह है, जिसमें एक खास पूर्वाग्रह छिपा हुआ है, क्योंकि लोगों को श्रेणियों में बांटना- उनका सिर्फ आदर करने के लिए या उनका मजाक बनाने के लिए- उन्हें मानवता से वंचित करना है.

मुल्क को इस बात का इल्म है. क्योंकि यह जल्दी ही यह अपनी दृष्टि दूसरी तरफ फेर लेती है. यह अपने किरदारों को किसी मजहब के अनुयायी के तौर पर न देख कर इंसान की तरह देखती है- ऐसे लोगों की तरह जिनमें कमियां हैं, इच्छाएं हैं, जटिलताएं और अंतर्विरोध हैं.

यह भी महत्वपूर्ण है कि मुल्क फिल्म का एक बड़ा हिस्सा कोर्टरूम के भीतर फिल्माया गया है, जो समाज की अंतरात्मा के रखवालों, सरकार के प्रतिनिधियों और नागरिकों को जमा करने वाली एक अनोखी जगह है.

यह टेक्निक सिन्हा को एक दमदार कहानी सुनाते हुए विषय के अलग-अलग रेशों को पकड़ने में मदद करती है. मिसाल के लिए फिल्म की एक मुख्य चिंता एक लापरवाही भरा, मगर कभी शांत न होने वाला इस्लाम-भय है.

संतोष आनंद (आशुतोष राणा) अपनी दलील को अपमान के लबादे में ढालकर पेश करते हैं, जिस पर ‘ह्यूमर’ का मुखौटा चढ़ा है- ‘मुस्लिमों के बड़़े परिवार होते हैं’, ‘वे ज्यादातर अशिक्षित होते हैं’, ‘उनका झुकाव जिहादी बनने की तरफ होता है’

ऐसे हर विकृत तंज के बाद कोर्टरूम में बैठे हुए लोग मुंह दबाकर हंसते हैं. अगर संतोष सामान्य भारतीय का एक कट्टर धर्मांध संस्करण है, तो जज हरीश मधोक (कुमुद मिश्रा) इसका एक दिग्भ्रमित, धुंधला चेहरा हैं : एक ऐसा व्यक्ति जो अपने ही पूर्वाग्रहों का आकलन कर रहा है और अच्छी नीयत के बावजूद उनके ही हाथों रंगे हाथ पकड़ा भी जा रहा है.

हालांकि हरीश एक पक्षपातरहित जज हैं, लेकिन कई बार वह संतोष की धर्मांधता का अनुमोदन भी करते हैं. एक दृश्य में वह बिलाल की बहू आरती (तापसी पन्नू) को ‘आरती मोहम्मद’ की जगह ‘मोहम्मद आरती’ के तौर पर संबोधित करता है.

मुल्क का प्रशंसनीय पहलू परिप्रेक्ष्य में होने वाला बदलाव है- एक क्षण में यह फिल्म अपने किरदारों की तरफ देखती है, तो दूसरे क्षण में यह आपके यानी दर्शकों की तरफ मुखातिब हो जाती है.

लेकिन मुल्क अप्रत्याशित इलाकों की भी यात्रा करती है और परिवार के अर्थों को लेकर सवाल उठाती है. शाहिद एक आतंकवादी था, लेकिन फिर भी उसके रिश्तेदारों को इसकी भनक नहीं थी. यह तथ्य हमें पारिवारिक और व्यक्तिगत के बीच की दूरी के बारे में सोचने के लिए हमें प्रेरित करता है.

यहां निस्संदेह बड़ा परिवार खुद स्टेट/सरकार है. शुरुआत के एक दृश्य से, जिसमें शाहिद के शरीर को पुलिसकर्मियों द्वारा सबकी नजरों के सामने में जमीन पर घसीटा जा रहा है, उस प्रसंग तक जब एक पुलिस अधिकारी घर में तोड़-फोड़ किए जाने की मुराद की शिकायत को दर्ज करने से इनकार कर देता है, मुल्क हमें असहज सवालों के सामने खड़ा करती हैः तब क्या होगा, जब स्टेट/सरकार खुद धर्मांध बन जाएगी?

मुल्क जैसी किसी फिल्म के नीरस उबाऊ भाषण बन जाने का खतरा हमेशा बना रहता है. यह खतरा रहता है कि फिल्म की पक्षधरता फिल्म कला को नुकसान पहुंचाए. लेकिन इसमें किसी का पक्ष न लेने की समझदारी दिखाई गयी है साथ ही इसमें मानवीय विवेक है कि इंसान, इंसान होते हैं- कुछ गुणवान, कुछ गलीज, कुछ उदासीन.

मुराद को एक बार से ज्यादा बार पेचीदा स्थिति का सामना करना पड़ता हैः उसे अपने मजहब और देश के बीच चुनाव करना होता है. एक स्थानीय मस्जिद में उसे शाहिद की मातमपुर्सी में बुलाया जाता है. लेकिन यह न्योता उसे भड़का देता है. उसका भतीजा उसे वाराणसी छोड़ कर चले जाने के लिए कहता है.

ऋषि कपूर ने काबिलेतारीफ संयम का प्रदर्शन किया है और अपनी भूमिका में गुस्से, हताशा और हास्यबोध को कुशलता के साथ मिलाया है. बाकी लोगों ने भी, जिनमें पाहवा, पन्नू और राणा जैसे अच्छे अदाकार हैं, कपूर का साथ अच्छी तरह से दिया है. सिन्हा ने अपने विषय को अपनी किस्सागोई पर हावी नहीं होने दिया है. इसका नतीजा यह रहा है कि यह फिल्म नाटकीय ढंग से संभावनाशील है, साथ ही साथ यह दिक्कततलब सवालों से भी टकराती चलती है.

इस फिल्म में व्यवहार और उपदेश के बीच फर्क नहीं है और यह चरित्रों को ‘हम बनाम तुम’ के द्विभाजन में बांटने से इनकार करती है. सभी मुस्लिम या हिंदू स्पष्ट तौर पर अलग-अलग नहीं किए गये हैं. मुराद का एक रिश्तेदार उसकी मदद करने से इनकार कर देता है, आतंकवाद निरोधी दस्ते का अफसर, दानिश जावेद (रजत कपूर) एक स्थानी मंदिर के हिंसक महंतों से कहीं ज्यादा इस्लाम से भयाक्रांत है.

लेकिन मुल्क एक विचित्र मुश्किल स्थिति में भी घिरती नजर आती है. चूंकि बिलाल और मुराद से जुड़ा हुआ मामला एक खोखली जमीन पर टिका हुआ है, जिसमें अनुमान ज्यादा सबूत कम हैं, इसलिए अदालत के दृश्यों में जुबानी हमलों की बौछार ज्यादा है, जो फिल्म की तीव्रता को कम करती है.

मुल्क की काफी चीजें आपको पिंक की याद दिलाती हैं. दोनों ही फिल्में एक व्यापक पैमाने पर मौजूद सामाजिक बुराई पर केंद्रित हैं. इन दोनों के ताकतवर दृश्य कोर्टरूम के भीतर के हैं. इन दोनों में तापसी पन्नू एक केंद्रीय भूमिका में हैं. वास्तव में एक दृश्य में जिसमें आरती, मुराद से उसके धर्म के बारे में सवाल पूछ रही है, उसमें पिंक के उस दृश्य की झलक दिखाई देती है, जिसमें अमिताभ बच्चन पन्नू से सवाल पूछते हैं, जिसका मकसद चुनाव और आजादी को लेकर व्यापक परिप्रेक्ष्य को सामने लाना होता है.

उसकी तुलना में मुल्क ज्यादा परिपक्व फिल्म है, जो उस धर्मांधता की पड़ताल करती है, उस पर सवाल उठाती है, और उसे रेखंकित करती है, जिसका खतरनाक स्तर पर सामान्यीकरण कर दिया गया है.

हालांकि, मुल्क की सबसे बड़ी कामयाबी इसके द्वारा दी गई आतंकवाद की परिभाषा है- जो कि एक ऐसा शब्द है, जिस पर आज तक वैश्विक आम सहमति कायम नहीं हो सकी है. फिल्म की राय में राजनीतिक मकसदों को पूरा करने के लिए हिंसा और आतंक का गैरकानूनी इस्तेमाल, खासतौर पर नागरिकों के खिलाफ, आतंकवाद है.

इस तरह से यह मानवीय बर्बरता से जोड़ने की कोशिश करती है, बजाय किसी धर्म या मजहब के. इस परिभाषा को आगे बढ़ाते हुए आरती हमसे ‘अछूतों और आदिवासियों पर ढाए जाने वाले अत्याचारों’ पर विचार करने के लिए कहती है. अगर यह आतंकवाद नहीं है तो और क्या है? यह हमारे जैसे देश के लिए एक साहसी और प्रासंगिक टिप्पणी है, जहां दलित और आदिवासी आज भी मूलभूत अधिकारों के लिए लड़ाई लड़ रहे हैं.

जहां मुस्लिमों को गोमांस रखने, खाने या उसका परिवहन करने के कथित जुर्म में या बिना किसी कारण के (आठ साल का बच्चा आखिर क्या अपराध कर सकता है?) पीट-पीट कर मार दिया जाता है. और इन्हें हमारी राष्ट्रीय चेतना पर बदनुमा दाग की तरह न देखकर इनके हत्यारों और बलात्कारियों को तिरंगे में लपेटा जाता है, एक केंद्रीय मंत्री द्वारा उन्हें माला पहनाया जाता है और वकीलों और साधारण लोगों द्वारा उन्हें समर्थन दिया जाता है.

अगर आप खुले मन से मुल्क की तरफ जाते हैं, तो यह आपको किसी पूर्वाग्रह से ग्रस्त रिश्तेदार, दोस्त या जान-पहचान वालों की याद दिलाएगी. लेकिन अगर यह फिल्म आपको किसी की याद नहीं दिलाती, अगर आप किसी ऐसे व्यक्ति को नहीं जानते जो मुस्लिमों से नफरत करता है- तो थोड़ी देर रुककर विचार कीजिए : आप इस देश के बहुत ही कम लोगों को जानते हैं.

एक बिंदु पर मुराद पूछता है, ‘प्यार साबित कैसे किया जाता है?’ थोड़ा थमकर वह खुद जवाब देता है, ‘प्यार कर के ही न?’ मुल्क को यह जवाब देने की जरूरत नहीं थी. एक देश के नाते जरूरत इस बात की है कि हम अपने जवाब खुद खोजें.

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