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लोकसभा के पूर्व स्पीकर सोमनाथ चटर्जी का निधन

सोमनाथ चटर्जी दस बार लोकसभा सांसद रहे थे. हालांकि एक बार उन्हें ममता बनर्जी से हार का सामना करना पड़ा था. चटर्जी माकपा की केंद्रीय समिति के सदस्य भी रहे थे.

पूर्व लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी. (फोटो: पीटीआई)

पूर्व लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी. (फोटो: पीटीआई)

नई दिल्ली: लोकसभा के पूर्व स्पीकर सोमनाथ चटर्जी का आज यानी कि सोमवार को निधन हो गया. वे 89 साल के थे. न्यूज़ एजेंसी एएनआई की ख़बर के मुताबिक चटर्जी का कोलकाता के एक अस्पताल में निधन हुआ.

उनके कार्यकाल से जुड़ी एक महत्वपूर्ण घटना में, एक बार उन्होंने न्यायपालिका और विधायिका के अधिकार क्षेत्र को निर्धारित करते हुए उच्चतम न्यायालय के नोटिस को स्वीकार करने से मना कर दिया था.

अपने जीवन के अधिकांश समय मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) से जुड़े रहे सोमनाथ चटर्जी लोकसभा के सबसे उत्कृष्ट अध्यक्षों में से एक थे.

सोमनाथ चटर्जी पश्चिम बंगाल के अलग-अलग क्षेत्रों से दस बार लोकसभा चुनाव जीते थे. हालांकि एक बार उन्हें वर्तमान में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से हार का सामना करना पड़ा था.

 

पिछले महीने पूर्व लोकसभा अध्यक्ष को मस्तिष्काघात के बाद अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा था. रविवार को सोमनाथ चटर्जी को दिल का दौरा पड़ने की वजह से हालत बिगड़ने के बाद वेंटिलेटर पर रखा गया था. चटर्जी गुर्दे संबंधी समस्या से जूझ रहे थे.

एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, ‘पिछले 40 दिनों से चटर्जी का उपचार चल रहा था. स्वास्थ्य में सुधार के संकेत मिलने के बाद उन्हें अस्पताल से छुट्टी मिली थी लेकिन मंगलवार को हालत बिगड़ने के बाद उन्हें फिर से अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा था.’

दस बार लोकसभा के सदस्य रहे चटर्जी माकपा की केंद्रीय समिति के भी सदस्य रहे थे. वह 2004 से 2009 के बीच लोकसभा के अध्यक्ष रहे थे. हालांकि जब उनकी पार्टी ने यूपीए-एक सरकार से समर्थन वापस ले लिया था तो उनसे लोकसभा अध्यक्ष पद से इस्तीफा देने की मांग की गई.

उन्होंने लोकसभा अध्यक्ष पद से इस्तीफा देने से मना कर दिया था. उनका मानना था कि लोकसभा अध्यक्ष का पद किसी दलगत राजनीति से स्वतंत्र और निष्पक्ष होता है.

उन्होंने इससे इंकार कर दिया था जिसकी वजह से 2008 में उन्हें माकपा से निष्कासित कर दिया गया था. भारत-अमेरिका परमाणु समझौता विधेयक के विरोध में माकपा ने तत्कालीन मनमोहन सरकार से समर्थन वापस ले लिया था. चटर्जी 1968 में माकपा में शामिल हुए थे.

चटर्जी ने अपनी आत्मकथा ‘कीपिंग द फेथ: मेमोरीज़ ऑफ अ पार्लियामेंटेरियन’ में करात की आलोचना करते हुए उन्हें ‘घमंडी’ और ‘असहिष्णु’ व्यक्ति कहा था और 2009 के लोकसभा चुनाव के बाद देश में वामपंथी पार्टी के कमजोर होने के पीछे उनकी गलत और विनाशकारी नीतियों को दोषी ठहराया.

इसके बावजूद पार्टी के लिए उनका प्यार और उसकी विचारधारा के प्रति विश्वास बना रहा. सीताराम येचुरी द्वारा माकपा की बागडोर संभालने के बाद, ऐसी अफवाहें उड़ी थी कि यदि वह पार्टी नेतृत्त्व से माफी मांग लेंगे, तो उन्हें पार्टी में वापस ले लिया जाएगा, लेकिन चटर्जी को हमेशा यह लगता रहा कि उन्होंने एक अध्यक्ष के तौर पर कोई गलत काम नहीं किया और माफी का कोई सवाल ही नहीं उठता.

लोकसभा अध्यक्ष पद रहते हुये चटर्जी ने 2005 में न्यायापालिका और विधायिका के बीच खींचातानी को लेकर एक बार चर्चित बयान दिया था, जिसमें उन्होंने कहा था कि उच्चतम न्यायालय ने लोकसभा के अधिकार क्षेत्र को लेकर उन्हें नोटिस भेजकर ‘लक्ष्मण रेखा’ पार की है.

गौरतलब है कि 2005 में पैसे लेकर सवाल पूछने संबंधी मामले में चटर्जी ने लोकसभा के कुछ सदस्यों को बर्खास्त कर दिया था, जिस मामले की सुनवायी करते हुए उच्चतम न्यायालय ने उन्हें नोटिस भेज दिया था, जिसे चटर्जी ने स्वीकार करने से साफ मना कर दिया था और इसके लिए उन्होंने अपने अधिकार क्षेत्र का हवाला देते हुए सुप्रीम कोर्ट की तीखी आलोचना की थी.

बाद में उन्होंने इस मामले को लेकर पीटीआई को दिये एक साक्षात्कार में कहा था, ‘मैं कोई पुतला नहीं हूं… मेरा मामला बहुत साधारण है. संवैधानिक रूप से हम अनुच्छेद 122 के अंतर्गत काम करते हैं और सुप्रीम कोर्ट के आदेश को (विधायिका) मैं स्वीकार नहीं कर सकता.’

उन्होंने कहा था, ‘मेरे हिसाब से लक्ष्मण रेखा पार की गई है. मेरे लिए संविधान सबसे ऊपर है. संविधान से ऊपर न ही विधायिका है और न ही उच्चतम न्यायालय… मैं अपने क्षेत्र का सर्वोपरी हूं और न्यायालय अपने यहां सर्वोपरी हैं. लेकिन इस मामले को विधायिका बनाम न्यायपालिका बताना एक गढ़ा हुआ कृत्रिम विवाद है.’

उन्हीं की पहल पर 5 जुलाई 2006 से शून्यकाल की कार्यवाही का सीधा प्रसारण शुरू किया गया. चटर्जी के कार्यकाल के दौरान ही जुलाई, 2006 में पूर्ण रूप से 24 घंटे चलने वाला लोकसभा टेलीविजन चैनल शुरू किया गया.

उनका जन्म 25 जुलाई, 1929 को असम के तेजपुर में हुआ था. उनके पिता एनसी चटर्जी कभी ‘अखिल भारतीय हिंदू महासभा’ के अध्यक्ष रहे थे. उनकी मां का नाम वीणापाणी देवी था. उनकी शिक्षा-दीक्षा कोलकाता और ब्रिटेन में हुई.

ब्रिटेन के मिडल टेंपल से बैरिस्टर बनने वाले चटर्जी 1968 से 2008 तक चार दशक तक मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य रहे.

चटर्जी को 1996 में ‘उत्कृष्ट सांसद पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया था. अपने तर्क कौशल के लिए मशहूर चटर्जी को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों की व्यापक जानकारी थी.
वह कई संसदीय समितियों में सदस्य या अध्यक्ष पद पर सुशोभित रहे. विभिन्न पार्टियों के नेता उनका बहुत सम्मान करते थे.

लोकसभा के अध्यक्ष के तौर पर 2009 में कार्यकाल खत्म होने के साथ ही उन्होंने सक्रिय राजनीति से संन्यास ले लिया था.

माकपा के दिग्गज नेता ज्योति बसु के साथ उनका गहरा संबंध था. बसु ने उन्हें पश्चिम बंगाल औद्योगिक विकास निगम (डब्ल्यूबीआईसी) का अध्यक्ष बनाया था. उन पर राज्य में निवेश लाने और नए उपक्रम की शुरुआत करने की ज़िम्मेदारी थी.

उनके परिवार में पत्नी रेणु चटर्जी, एक बेटा और दो बेटियां हैं.

चटर्जी के निधन पर कई दलों के नेताओं ने श्रद्धांजलि व्यक्त की है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ट्वीट कर कहा, ‘पूर्व सांसद और स्पीकर श्री सोमनाथ चटर्जी भारतीय राजनीति का एक मज़बूत स्तंभ थे. उन्होंने हमारे संसदीय लोकतंत्र को समृद्ध बनाया और वे गरीबों और कमजोर लोगों के कल्याण के लिए एक मजबूत आवाज थे. उनके निधन से काफी दुख हूं. मेरे विचार उनके परिवार और समर्थकों के साथ हैं.’

वहीं राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने भी घटना पर अपनी संवेदनाएं व्यक्त की हैं. उन्होंने कहा, ‘श्री सोमनाथ चटर्जी के निधन की खबर सुनकर काफी दुखी हूं. यह भारत और बंगाल में सार्वजनिक जीवन के लिए नुकसान है. उनके परिवार और असंख्य शुभचिंतकों के प्रति मेरी संवेदनाएं.’

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने भी चटर्जी के निधन पर शोक जताया है. गांधी ने ट्वीट कर कहा, ’10 बार सांसद रहे पूर्व लोकसभा अध्यक्ष श्री सोमनाथ चटर्जी के निधन पर मैं शोक प्रकट करता हूं. वह अपने आप में एक संस्थान थे. सभी दलों के सांसद उनका सम्मान और प्रशंसा करते थे. दुख के इस क्षण में मेरी संवेदनाएं उनके परिवार के साथ हैं.’