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उत्तराखंड हाईकोर्ट ने ख़ुद को गाय का संरक्षक घोषित किया, गोवध और गोमांस की बिक्री पर भी प्रतिबंध

बीते 4 जुलाई को उत्तराखंड हाईकोर्ट ने पूरे पशु समाज को एक जीवित व्यक्ति के अधिकार, कर्तव्यों और देनदारियों के साथ एक क़ानूनी इकाई घोषित कर दिया था. 2017 में इसी कोर्ट ने गंगा को एक जीवित इकाई के रूप में मान्यता दी थी.

(फोटो: पीटीआई)

(फोटो: पीटीआई)

नैनीताल: उत्तराखंड हाईकोर्ट ने बीते सोमवार को खुद को राज्य में गायों का कानूनी अभिभावक के रूप में नियुक्त किया. अदालत ने 25 गांवों के हर समूह के लिए ‘गाय आश्रय’ स्थापित करने और अपने पशुओं को त्यागने वालों के खिलाफ मामला दर्ज करने सहित राज्य सरकार को 31 निर्देश जारी किए. इसके अलावा अदालत ने पूरे राज्य में गोमांस की बिक्री पर प्रतिबंध लगा दिया है.

हिंदुस्तान टाइम्स की ख़बर के मुताबिक़, हाईकोर्ट ने ‘पैरेंज़ पैट्री’ (Parens Patriae) के सिद्धांत के तहत खुद को गायों का अभिवावक नियुक्त किया है. ‘पैरेंज़ पैट्री’ सिद्धांत के तहत कोर्ट को किसी भी बच्चे या व्यक्ति, जिसे सुरक्षा की आवश्यकता है, के माता-पिता के रूप में कार्य करने का अधिकार है.

उत्तराखंड हाईकोर्ट के एक अधिकारी ने बताया कि इतिहास में ऐसा निर्णय पहली दफा लिया गया है, हालांकि इसकी पुष्टि नहीं हो पाई है कि ये भारत के इतिहास में पहली घटना है.

वरिष्ठ वकील डीके जोशी ने बताया कि अदालत अब राज्य में गाय के कानूनी अभिभावक के रूप में कार्य कर सकती है. गायों की सुरक्षा को लेकर निर्देशों पर खुद नज़र रख सकती है.

हरिद्वार निवासी अलीम अली द्वारा दायर एक जनहित याचिका में कहा गया है कि रूड़की के एक गांव में कुछ लोगों ने वर्ष 2014-15 में पशुओं का वध करने और मांस बेचने की अनुमति ली थी. हालांकि इस अनुमति का बाद में कभी नवीनीकरण नहीं हुआ.

याचिका में कहा गया है कि अब भी कुछ लोग गायों का वध कर रहे हैं और गंगा में खून बहा रहे हैं. यह न केवल कानून के खिलाफ है बल्कि यह गांव के निवासियों के स्वास्थ्य के लिए खतरा भी है.

राज्य सरकार का प्रतिनिधित्व करने वाले परेश त्रिपाठी ने ‘पैरेंज़ पैट्री’ (Parens Patriae) सिद्धांत का उल्लेख करते हुए कहा कि हाईकोर्ट राज्य में गायों और भटकने वाले मवेशियों की आवाज बन गया है.

मुख्य न्यायाधीश राजीव शर्मा और जस्टिस मनोज कुमार तिवारी की खंडपीठ ने पशु क्रूरता निवारण अधिनियम, 1960 के प्रावधानों के तहत आदेशों का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करने के आदेश दिए.

अपने 40 पन्नो के आदेश में हाई कोर्ट ने कई संदर्भ लिए हैं, जिनमें सुप्रीम कोर्ट के फैसले, उपनिषदों की बातें, अर्थशास्त्र के साथ, जैन और बौद्ध धर्म की शिक्षा, महात्मा गांधी के वचन, दलाई लामा की जानवरों के प्रति चिंता की बात शामिल हैं.

अदालत के समन पर पेश हुए वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (हरिद्वार) कृष्णा कुमार ने सूचित किया था कि ‘प्रत्येक 15 दिन में उत्तराखंड संरक्षण गाय अधिनियम, 2007 के प्रावधानों के तहत दो-तीन प्राथमिकी दर्ज की जाती है.’

अदालत ने कहा कि यह एक चिंताजनक संख्या है और कोर्ट ने इस ओर इशारा किया कि हरिद्वार जिले में गोवध प्रचलित है.

अदालत ने कहा कि अनुच्छेद 48ए के तहत ये राज्य की ज़िम्मेदारी है कि वे पर्यावरण की रक्षा और सुधार और देश के वनों और वन्यजीवन की सुरक्षा करें. अदालत ने सभी निकायों को आदेश दिया कि वे एक साल के भीतर गायों और अन्य भटक गए मवेशियों के लिए गोशाला या आश्रयों का निर्माण करे.

आदेश में कहा गया है, ‘गोशाला/आश्रयों को बिजली और पानी के कनेक्शन की आपूर्ति के लिए कोई वाणिज्यिक शुल्क नहीं लगाया जाएगा.’

अदालत ने पूरे प्रदेश के सरकारी पशु अधिकारियों और चिकित्सकों को सभी आवारा मवेशियों का इलाज करने निर्देश दिया और कहा कि उनके इलाज की जिम्मेदारी नगर निकायों, नगर पचायतों और सभी ग्राम पंचायतों के अधिशासी अधिकारियों की होगी.

कोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि वे कुमाऊं और गढ़वाल क्षेत्रों में उप पुलिस अधीक्षक के पद के बराबर एक अधिकारी द्वारा गायों की रक्षा के लिए एक पशु चिकित्सक के साथ एक विशेष दल की स्थापना करें.

4 जुलाई को उत्तराखंड हाईकोर्ट ने पूरे पशु समाज को एक जीवित व्यक्ति के अधिकार, कर्तव्यों और देनदारियों के साथ एक कानूनी इकाई घोषित कर दिया था.

2017 में इसी अदालत ने गंगा को एक जीवित इकाई के रूप में मान्यता दी थी और अन्य जीवित संस्थाओं के समान अधिकारों दे दिए थे, हालांकि बाद में सुप्रीम कोर्ट ने उस आदेश को उलट दिया था.

(समाचार एजेंसी भाषा के इनपुट के साथ)