कैंपस

क्या राजस्थान का इकलौता संस्कृत विश्वविद्यालय बंद होने के कगार पर पहुंच गया है?

वसुंधरा सरकार की बेरुख़ी, कुलपति-शिक्षक विवाद और भर्तियों में धांधली की वजह से जयपुर स्थित जगद्गुरु रामानंदाचार्य राजस्थान संस्कृत विश्वविद्यालय में इस बार 200 से भी कम एडमिशन हुए हैं.

जयपुर स्थित जगद्गुरु रामानंदाचार्य राजस्थान संस्कृत विश्वविद्यालय. (फोटो: अवधेश आकोदिया/द वायर)

जयपुर स्थित जगद्गुरु रामानंदाचार्य राजस्थान संस्कृत विश्वविद्यालय. (फोटो: अवधेश आकोदिया/द वायर)

संस्कृत और संस्कृति की दुहाई देने वाली भाजपा की सरकार में राजस्थान का इकलौता संस्कृत विश्वविद्यालय बंद होने के कगार पर पहुंच गया है. जयपुर स्थित जगद्गुरु रामानंदाचार्य राजस्थान संस्कृत विश्वविद्यालय में इस बार 200 से भी कम एडमिशन हुए हैं. विश्वविद्यालय के 17 साल के इतिहास में छात्रों की यह सबसे कम संख्या है.

विश्वविद्यालय में छात्रों की संख्या बढ़ाने के लिए तमाम तरह के प्रयास किए जा रहे हैं, लेकिन छात्र बढ़ने की बजाय घटते ही जा रहे हैं. इसी के चलते कार्यवाहक कुलपति प्रो. आरके कोठारी पिछले दिनों एक कार्यक्रम में यहां तक कह चुके हैं कि यही स्थिति रही तो संस्कृत विश्वविद्यालय का अंजाम भी हरिदेव जोशी विश्वविद्यालय जैसा होगा.

गौरतलब है कि हरिदेव जोशी पत्रकारिता व जनसंचार विश्वविद्यालय की स्थापना अशोक गहलोत सरकार ने 2012 में की थी, लेकिन वसुंधरा सरकार ने छात्रों की कम संख्या का हवाला देते हुए 2015 में इसका विलय राजस्थान विश्वविद्यालय के जनसंचार केंद्र में कर दिया.

संस्कृत विश्वविद्यालय के शिक्षकों और छात्रों को भी अब यह डर सता रहा है कि कहीं हरिदेव जोशी पत्रकारिता व जनसंचार विश्वविद्यालय की तर्ज पर उनका विलय राजस्थान विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग में न हो जाए. वे विश्वविद्यालय में छात्रों की संख्या बढ़ाने के लिए भरसक प्रयास कर रहे हैं, लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिल रही.

हैरत की बात यह है कि वसुंधरा सरकार ने संस्कृत विश्वविद्यालय को अपने हाल पर छोड़ रखा है. विश्वविद्यालय में पिछले छह महीने से स्थायी कुलपति नहीं है. राजस्थान विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. आरके कोठारी के पास इसका अतिरिक्त प्रभार है. वे संस्कृत विश्वविद्यालय कभी-कभार ही जाते हैं.

विश्वविद्यालय में रजिस्ट्रार का पद 10 महीने तक खाली रहा. सरकार ने 8 अगस्त को ही राज्य प्रशासनिक सेवा के अधिकारी अशोक कुमार शर्मा को इस पद पर तैनात किया है. उनसे पहले 10 महीने तक विश्वविद्यालय कार्यवाहक रजिस्ट्रार के भरोसे चला.

संस्कृत विश्वविद्यालय शिक्षक संघ के अध्यक्ष डॉ. माताप्रसाद शर्मा के अनुसार संस्कृत विश्वविद्यालय की इस दुर्गति की बड़ी वजह कुलपति प्रो. विनोद शास्त्री का कार्यकाल है.

वे कहते हैं, ‘प्रो. विनोद शास्त्री ने संस्कृत विश्वविद्यालय का अपने स्वार्थों के लिए जमकर उपयोग किया. विश्वविद्यालय के धन की बर्बादी तो की ही, भर्तियों में फर्जीवाड़ा करके विश्वविद्यालय की साख भी गिरा दी. उनके कार्यकाल में विश्वविद्यालय में गुटबाजी चरम पर रही.’

वे आगे कहते हैं, ‘प्रो. विनोद शास्त्री ने योजनाबद्ध तरीके से शिक्षकों को टारगेट किया, जिससे पढ़ाई और अनुसंधान का स्तर रसातल में चला गया. परीक्षा नियंत्रक समेत दूसरे शिक्षकों के निलंबन से विश्वविद्यालय का माहौल बिगाड़ा, जिसका बुरा असर छात्रों की संख्या पर पड़ा. जब माहौल इतना बिगाड़ गया तो कोई क्यों यहां पढ़ना चाहेगा?’

यदि प्रो. विनोद शास्त्री के कार्यकाल में छात्रों की संख्या पर गौर करें तो डॉ. माताप्रसाद शर्मा का कहा सही साबित होता है. प्रो. शास्त्री 2015 में जब विश्वविद्यालय के कुलपति बने तब यहां के संस्कृत पाठ्यक्रम संयुक्ताचार्य में पढ़ने वाले छात्रों की संख्या 670 थी. 2016 में यह संख्या घटकर 587, 2017 में 423 व 2018 में महज 278 रह गई.

इस दौरान विश्वविद्यालय में शोध कार्य में भी ठहराव आ गया. इसका अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि संस्कृत पांडुलिपियों के अध्ययन के लिए आवंटित 5 करोड़ रुपये में से 2.19 करोड़ रुपये विश्वविद्यालय ने सरकार को वापस लौटा दिए. वहीं, अनुसंधान केंद्र के निदेशक का पद लंबे समय से खाली होने की वजह से पीएचडी व एमफिल के पाठ्यक्रम तक ठप पड़े हैं.

प्रो. विनोद शास्त्री के कार्यकाल में हुई भर्तियां गहरे विवादों में रहीं. इन पर सत्ताधारी भाजपा के ही विधायक नरपत सिंह राजवी, प्रताप सिंह सिंघवी, प्रेम चंद बैरवा व राजेंद्र गुर्जर सवाल खड़े कर चुके हैं. राजवी और सिंघवी ने भर्तियों में हुई धांधली की सरकार और राज्यपाल कल्याण सिंह से कई बार शिकायत की.

2017 में योग विषय में असिस्टेंट प्रोफेसर बने डॉ. शत्रुघ्न सिंह व वंदना राठौड़ की नियुक्ति का मामला रोचक है. ये दोनों न सिर्फ पति-पत्नी हैं, बल्कि चयन होने से पहले ही इन दोनों के नामों की सूचना राजभवन को दे दी गई थी. इसकी वजह से एक बार साक्षात्कार को स्थगित भी किया गया, लेकिन बाद में विश्वविद्यालय ने आनन-फानन में इन्हें नियुक्ति दे दी. इसकी जांच भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो में चल रही है.

ऐसा ही वाकया इसी साल जनवरी में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी की भर्ती में भी हुआ. विश्वविद्यालय ने इस पद पर जिस सुरेश कुमार यादव का चयन किया, उसके नाम की सूचना वरिष्ठ भाजपा विधायक नरपत सिंह राजवी ने राज्यपाल कल्याण सिंह को साक्षात्कार से दो दिन पहले ही दे दी.

यही नहीं, राजस्थान हाईकोर्ट के भर्ती प्रक्रिया पर रोक लगाने के आदेश के बावजूद विश्वविद्यालय प्रशासन ने आदेश नहीं मिलने का बहाना बनाकर सुरेश यादव को नियुक्ति दे दी. इस पर हाईकोर्ट ने ऐतराज जताया तो विश्वविद्यालय ने यादव को नौकरी से हटा दिया. भर्तियों में धांधली की यह फेहरिस्त और भी लंबी होती यदि राज्यपाल कल्याण सिंह ने भर्ती प्रक्रिया पर रोक नहीं लगाई होती.

उल्लेखनीय है कि प्रो. विनोद शास्त्री ने अपने कार्यकाल के अंतिम दौर में करीब दो दर्जन पदों पर भर्ती की प्रक्रिया शुरू की थी, लेकिन गड़बड़ियों की आशंका के चलते राज्यपाल ने इस पर रोक लगा दी.

प्रो. विनोद शास्त्री पर परीक्षाओं में धांधली करने का आरोप भी लगा. पिछले साल दर्शन विभाग के 18 छात्रों के फेल होने का मामला तो विधानसभा तक पहुंचा. भाजपा विधायक नरपत सिंह रावजी के मुताबिक प्रो. शास्त्री ने षड्यंत्र रचकर इन छात्रों को फेल किया.

इन 18 छात्रों को पहले परीक्षक डॉ. गोपाल मिश्र ने पास किया था, लेकिन विश्वविद्यालय ने परिणाम घोषित करने की बजाय इनकी कॉपियां दूसरे परीक्षक के पास भेज दीं. जबकि विश्वविद्यालय के नियमानुसार दोबारा कॉपी जांचना छात्र की ओर से पुनर्मूंल्याकन का आवेदन करने पर ही संभव है.

यही नहीं, विश्वविद्यालय ने दोबारा कॉपी जांचने के लिए दिल्ली के राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान की जिन डॉ. रानी दाधीच को बुलाया वे परीक्षक बनने की योग्यता ही नहीं रखतीं. परीक्षक बनने के लिए असिस्टेंट प्रोफेसर के पद पर पांच साल का अनुभव होना अनिवार्य है. इसके बावजूद डॉ. रानी दाधीच ने कॉपी जांची और सभी छात्रों को फेल कर दिया.

परीक्षा नियंत्रक डॉ. नरेंद्र चतुर्वेदी ने दोबारा कॉपी चेक करने के निर्णय और डॉ. रानी दाधीच को परीक्षक बनाने पर आपत्ति जताई. उन्होंने बाकायदा नोटशीट पर लिखा कि डॉ. दाधीच राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान में इंस्ट्रक्टर के पद पर तैनात हैं, जो वरियता में असिस्टेंट प्रोफेसर से नीचे है. इसलिए उन्हें परीक्षक नहीं बनाया जा सकता.

अव्वल तो कुलपति प्रो. विनोद शास्त्री को परीक्षा नियंत्रक डॉ. नरेंद्र चतुर्वेदी की राय माननी चाहिए थी, लेकिन उन्होंने उल्टा उन्हें ही निलंबित कर दिया. साथ ही खुद को पाक साबित करने के लिए प्रो. धर्मचंद जैन को तीसरा परीक्षक नियुक्त कर दिया. उन्होंने भी सभी छात्रों को फेल कर दिया.

वरिष्ठ भाजपा विधायक नरपत सिंह राजवी ने राज्यपाल कल्याण सिंह को पत्र लिखकर इस प्रकरण में मुकदमा दर्ज करवाने का अनुरोध किया है. वे कहते हैं, ‘प्रो. विनोद शास्त्री और उनके चहेतों ने संस्कृत पढ़ रहे गरीब और पिछड़े वर्ग के बच्चों के भविष्य के साथ षड्यंत्रपूर्वक भारी खिलवाड़ किया. इनके खिलाफ मुकदमा दर्ज होना चाहिए. इसके लिए मैंने महामहिम राज्यपाल को पत्र लिखा है.’

राज्यपाल कल्याण सिंह ने राजवी के पत्र पर संज्ञान लेते हुए विश्वविद्यालय प्रशासन को नोटिस जारी किया है. इसमें पूरे प्रकरण की तथ्यात्मक रिपोर्ट मांगी है. सूत्रों के अनुसार राजभवन ने इस मामले में पूर्व कुलपति प्रो. विनोद शास्त्री, तत्कालीन परीक्षा मूल्यांकन संयोजक डॉ. भास्कर शर्मा, परीक्षक डॉ. रानी दाधीच व प्रो. धर्मचंद जैन के खिलाफ कार्रवाई का मानस बना लिया है.

विश्वविद्यालय की साख पर एक और बट्टा तब लगा जब एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. प्रमोद कुमार शर्मा के खिलाफ छेड़छाड़ की शिकायत दर्ज करवाने पर कार्रवाई करने के बजाय छात्रा को ही निष्काषित कर दिया. पीड़िता के मुताबिक कुलपति विनोद शास्त्री और कुलसचिव सांबशिवमूर्ति ने पुलिस की जांच पूरी होने से पहले ही मुझे दोषी करार दे दिया.

छात्रा कहती हैं, ‘इस मामले में विश्वविद्यालय का रवैया शुरू से ही पक्षपाती रहा. पहले मेरी शिकायत लेने में आनकानी की और फिर मेरा पक्ष सुने बिना ही मुझे दोषी मानते हुए विश्वविद्यालय से निकाल दिया. मामला अभी कोर्ट में है. मुझे न्यायपालिका से न्याय की उम्मीद है.’

इस मामले में राज्यपाल को पत्र लिखने वाले वरिष्ठ भाजपा विधायक प्रताप सिंह सिंघवी कहते हैं, ‘इस प्रकरण में विश्वविद्यालय प्रशासन ने न्याय के नैसर्गिक सिद्धांत तक का पालन नहीं किया. लड़की के बयान लिए बिना ही उसे दोषी मान लिया. पुलिस की जांच होने से पहले फैसला सुनाने का हक विश्वविद्यालय को किसने दिया.’

इन सभी विवादों का विश्वविद्यालय की छवि पर बुरा असर पड़ा. पिछले तीन साल में शायद ही कोई महीना ऐसा गुजरा हो जब स्थानीय मीडिया में संस्कृत विश्वविद्यालय की नकारात्मक खबर न आई हो. ऐसे में विश्वविद्यालय से छात्रों का मुंह मोड़ना लाजमी है. इसके बावजूद वसुंधरा सरकार ने विश्वविद्यालय की जरा सुध नहीं ली.

हालांकि संस्कृत शिक्षा मंत्री किरण माहेश्वरी इससे सहमत नहीं हैं. वे कहती है, ‘संस्कृत विश्वविद्यालय में छात्रों की संख्या कम होना चिंताजनक है, लेकिन इसके लिए सरकार जिम्मेदार नहीं है. विश्वविद्यालय स्तर पर जो कमियां रही हैं उन्हें दूर करने का प्रयास किया जा रहा है. अगले सत्र में छात्रों की संख्या में बढ़ोतरी होने की उम्मीद है.’

पूर्ववर्ती कांग्रेस की अशोक गहलोत सरकार में संस्कृत शिक्षा मंत्री रहे बृजकिशोर शर्मा संस्कृत विश्वविद्यालय की दुर्दशा के लिए मौजूदा सरकार को जिम्मेदार ठहराते हैं. वे कहते हैं, ‘यदि कोई कुलपति विश्वविद्यालय में मनमानी कर रहा है तो सरकार आंख मूंदकर नहीं बैठ सकती. भाजपा सरकार को संस्कृत विश्वविद्यालय को बर्बाद होने से बचाने के लिए सही वक्त पर कदम उठाने चाहिए थे.’

वहीं, पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने इसे भाजपा सरकार की नाकामी करार दिया है. वे कहते हैं, ‘संस्कृत विश्वविद्यालय हमारे कार्यकाल में 2001 में शुरू हुआ था. प्रदेश में भाजपा की सरकार बनने के बाद से ही इसके बुरे दिन शुरू हो गए. 320 बीघा में बने संस्कृत विश्वविद्यालय में 200 से कम एडमिशन सरकार के लिए शर्म की बात है. इससे एक बार फिर साबित होता है कि भाजपा संस्कृत और संस्कृति का नाम केवल वोट बंटारने के लिए लेती है.’

गहलोत ने संस्कृत विश्वविद्यालय की दुर्दशा के पीछे इसे बंद करने की साजिश की भी आशंका जाहिर की है. वे कहते हैं, ‘पूरी दुनिया में सरकारें संस्थानों को खड़ा करती हैं, लेकिन प्रदेश की भाजपा सरकार इन्हें बंद करने में भरोसा करती है. हमारी सरकार ने पत्रकारिता विश्वविद्यालय और आंबेडकर विश्वविद्यालय खोले जिन्हें इस सरकार ने बंद कर दिए. अब ये संस्कृत विश्वविद्यालय को भी बंद कर सकते हैं.’

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं और जयपुर में रहते हैं.)

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