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मिर्चपुर दलित हत्याकांड: हाईकोर्ट ने 20 और लोगों को दोषी ठहराया, कहा- जाटों का हमला सुनियोजित था

2010 में हरियाणा के हिसार ज़िले के मिर्चपुर में दलित बाप-बेटी को ज़िंदा जलाने के मामले में कुल 33 लोगों को दोषी मानते हुए दिल्ली हाईकोर्ट ने हरियाणा सरकार को पलायन कर चुके दलितों के पुनर्वास का निर्देश दिया.

(फोटो: पीटीआई)

(फोटो: पीटीआई)

नई दिल्ली: हरियाणा के बहुचर्चित मिर्चपुर दलित हत्या मामले में दिल्ली उच्च न्यायालय ने 20 व्यक्तियों को बरी करने का निचली अदालत का फैसला शुक्रवार को पलट दिया. न्यायालय ने इन 20 लोगों को दोषी ठहराया है. अदालत ने माना कि आज़ादी के 71 साल बाद भी अनुसूचित जाति के खिलाफ अत्याचार की घटनाएं कम नहीं हुई हैं.

इसके अलावा अदालत ने 13 अन्य व्यक्तियों की दोषसिद्धि एवं सज़ा के ख़िलाफ़ उनकी अपील भी शुक्रवार को ख़ारिज कर दी. ये कुल 15 लोग थे लेकिन सुनवाई के दौरान इनमें से दो लोगों की मौत हो चुकी है.

उच्च न्यायालय ने इस मामले में कुछ दोषियों की सज़ा बढ़ाते हुए उन 13 व्यक्तियों की दोषसिद्धि को भी बरक़रार रखा, जिन्हें निचली अदालत ने मामले में दोषी ठहराया था. न्यायालय ने मामले में निचली अदालत द्वारा 13 व्यक्तियों की दोषसिद्धि तथा सज़ा को चुनौती देने वाली उनकी अपील पर यह फैसला सुनाया.

अदालत ने शुक्रवार के फैसले में 33 दोषियों में से 12 को आईपीसी के तहत हत्या और अजा/अजजा (अत्याचार रोकथाम) कानून के तहत अजा/अजजा से इतर समुदाय के एक सदस्य द्वारा आग या विस्फोटक सामग्री से हानि पहुंचाने, अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति समुदाय के किसी सदस्य की संपत्ति को नुकसान पहुंचाने के अपराधों के लिए उम्रक़ैद की सज़ा सुनाई.

साल 2010 में हरियाणा के हिसार ज़िले के मिर्चपुर गांव में प्रभुत्व वाले जाट और दलित के बीच हुए विवाद में दलितों के दर्जनों घर जला दिए गए थे. इस दौरान एक घर में दलित समुदाय के 70 वर्षीय ताराचंद और उनकी 17 वर्षीय शारीरिक रूप से अक्षम बेटी की मौत हो गई थी.

इस घटना के बाद फैले डर की वजह से दलित समुदाय के 150 से ज़्यादा परिवारों को मिर्चपुर गांव से पलायन करना पड़ा था.

जस्टिस एस. मुरलीधर एवं जस्टिस आईएस मेहता की पीठ अपने 209 पृष्ठ के फैसले में कहा, ‘19 एवं 21 अप्रैल 2010 के बीच मिर्चपुर में हुई घटनाओं ने भारतीय समाज में नदारद उन दो चीज़ों की यादें ताज़ा कर दी हैं जिनका उल्लेख डॉ. बीआर आंबेडकर ने 25 नवंबर, 1949 को संविधान सभा के समक्ष भारत के संविधान का मसौदा पेश करने के दौरान किया था. इनमें से एक है समानता और दूसरा है भाईचारा.’

इसमें कहा गया कि हरियाणा सरकार दोषियों से जुर्माने के रूप में मिली धनराशि का इस्तेमाल पीड़ितों को आर्थिक राहत एवं पुनर्वास के प्रावधानों के लिए करे, जो वर्ष 2010 की इस घटना के बाद विस्थापित हो गए थे.

अदालत ने कहा कि जाट समुदाय के लोगों ने वाल्मीकि समुदाय के सदस्यों के घरों को जान-बूझकर निशाना बनाया. इस मामले में जाट समुदाय के सदस्यों का मकसद ‘वाल्मीकि समुदाय के लोगों को सबक सिखाना था और आरोपी अपने इस मक़सद में पूरी तरह कामयाब भी हुए.’

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, अदालत ने निर्देश दिया है कि जिन दोषियों को उच्च न्यायालय और ट्रायल कोर्ट द्वारा उम्रक़ैद की सज़ा सुनाई गई है वे एक सितंबर तक या जल्द से जल्द आत्मसमर्पण कर दें.

अदालत ने कहा कि वाल्मीकि समुदाय के लोगों पर जाट समुदाय की ओर से किया गया यह हमला सुनियोजित था. ट्रायल कोर्ट जज के फैसले में ख़ामियों की ओर इशारा करते हुए दिल्ली उच्च न्यायालय ने कहा, यह अदालत इस मामले में ट्रायल कोर्ट द्वारा निकाले गए निष्कर्षों को समझ नहीं पा रही है.

पीठ ने कहा, ‘गांव की स्थिति से पता चलता है कि वाल्मीकि समुदाय की बस्ती गांव के एक छोर पर दक्षिण की ओर बसी है. यह बस्ती चारों ओर से जाट समुदाय के लोगों के घरों से घिरी हुई है. इस लिहाज़ से वाल्मीकि समुदाय के लोगों को आसानी से निशाना बनाया जा सकता था. जाटों के लिए वाल्मीकि समुदाय के लोग की पहचान करने और उनके घरों पर हमला करने में कोई दिक्कत नहीं हुई होगी.’

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, साल 2010 में दलित समुदाय के कुछ युवाओं और उच्च जाति (जाट) लोगों के बीच तक़रार हो गई थी. यह विवाद इस वजह से शुरू हुआ क्योंकि उच्च जाति के एक व्यक्ति ने उस कुत्ते को पत्थर मार दिया जो उन पर भौंक रहा था.

इसके बाद विवाद बढ़ गया और जाट समुदाय के लोगों ने दलित बस्ती के तकरीबन एक दर्जन घरों में आग लगा दी थी.

निचली अदालत ने 24 सितंबर, 2011 को जाट समुदाय से संबद्ध 97 व्यक्तियों में से 15 को दोषी ठहराया था और 82 लोगों को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया था. अपील के विचाराधीन रहने के दौरान दो दोषियों की मौत हो गई थी. अक्टूबर 2012 में 98वें आरोपी के ख़िलाफ़ मुकदमा चला और निचली अदालत ने उसे बरी कर दिया. आरोपी इससे पहले फ़रार चल रहा था.

निचली अदालत ने 31 अक्तूबर, 2011 को भारतीय दंड संहिता की धारा 304 के तहत ग़ैरइरादतन हत्या के अपराध के लिये कुलविंदर, धरमबीर और रामफल को उम्रक़ैद की सज़ा सुनाई थी. उच्च न्यायालय ने इन प्रावधानों को संशोधित करते हुए उन्हें आईपीसी की धारा 302 के तहत हत्या के अपराध का दोषी ठहराया.

इसके अलावा पांच अन्य बलजीत, करमवीर, करमपाल, धरमबीर और बोबल को दंगा फैलाने, जानबूझकर नुकसान पहुंचाने, हानि पहुंचाने और पीड़ितों के घर को आग के हवाले करने तथा अजा/अजजा (अत्याचार रोकथाम) कानून के प्रावधानों समेत उनके अपराधों के लिये पांच साल जेल की सज़ा सुनाई गई थी.

हल्के दंड प्रावधानों के तहत दोषी ठहराए गए सात अन्य दोषियों को निचली अदालत ने परिवीक्षा पर रिहा कर दिया था.

अब तक का घटनाक्रम

हरियाणा के मिर्चपुर में गांव में अप्रैल 2010 में एक दलित परिवार के दो सदस्यों को ज़िंदा जलाकर मारने की घटना से संबंधित विवरण इस प्रकार है…

21 अप्रैल 2010: हिसार ज़िले के मिर्चपुर गांव में जाट समुदाय के 100 से ज़्यादा लोगों की भीड़ ने दलित समुदाय के दर्जनों घर का आग के हवाले कर दिया. आग में एक 70 वर्षीय बुज़ुर्ग और उसकी 17 वर्षीय शारीरिक रूप से अक्षम बेटी की ज़िंदा जलकर मौत हो गई. गांव से 150 से ज़्यादा दलित परिवारों को भागना पड़ा और उन लोगों ने दिल्ली में एक मंदिर में पनाह ली.

अगस्त 2010: उच्चतम न्यायालय के कड़े रुख़ के बाद हरियाणा पुलिस ने आरोपियों को गिरफ़्तार किया.

08 दिसंबर 2010: पीड़ितों के परिवारों की याचिका पर निष्पक्ष मुक़दमा सुनिश्चित करने के लिए उच्चतम न्यायालय ने मामला हिसार से दिल्ली स्थानांतरित किया.

23 दिसंबर 2010: अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश कामिनी लॉ ने सुनवाई शुरू की और हरियाणा सरकार को मुक़दमे के लिए विशेष लोक अभियोजक नियुक्त करने का आदेश दिया.

09 जनवरी 2011: अदालत ने आरोपियों को हिसार जेल से तिहाड़ जेल स्थानांतरित करने का आदेश दिया. कुल 98 आरोपियों को स्थानांतरित किया गया. कुल 103 आरोपियों में पांच नाबालिग थे और एक जमानत पर बाहर था.

15 जनवरी 2011: जाट समुदाय ने फिर से जांच कराने की मांग करते हुए मामला स्थानांतरित करने का विरोध किया.

20 जनवरी 2011: सीबीआई से जांच का ज़िम्मा अपने हाथ में लेने को कहा गया.

01 फरवरी 2011: अदालत ने अभियोजन के गवाहों की सुरक्षा के लिए मिर्चपुर गांव में सीआरपीएफ की तैनाती का आदेश दिया.

10 फरवरी 2011: अदालत ने दिल्ली एवं हरियाणा के मुख्य सचिवों से गवाहों के आने-जाने और ठहरने का प्रबंध सुनिश्चित करने को कहा.

10 मार्च 2011: निचली अदालत ने 97 लोगों के ख़िलाफ़ आरोप पर आदेश जारी किया .

24 सितंबर 2011: निचली अदालत ने 15 को दोषी ठहराया और 82 लोगों को बरी कर दिया.

31 अक्टूबर 2011: तीन दोषियों को उम्रक़ैद, पांच दोषियों को पांच साल की सज़ा और बाकी सात को प्रोबोशन पर रिहा किया गया.

साल 2012: दोषियों, पीड़ितों और राज्य ने दोषसिद्धि और सज़ा के ख़िलाफ़ दिल्ली उच्च न्यायालय में अपील दायर कीं.

06 अक्टूबर 2012: निचली अदालत ने पूर्व में फ़रार रहे एक आरोपी को सभी आरोपों से बरी कर दिया.

16 मई 2018: उच्च न्यायालय ने अपीलों पर सुनवाई पूरी की.

24 अगस्त 2018: उच्च न्यायालय ने 13 दोषियों की दोषसिद्धि और सज़ा को बरक़रार रखा, 20 के बरी किए जाने के फैसले को पलटा और उन्हें दोषी क़रार दिया.

(समाचार एजेंसी भाषा के इनपुट के साथ)

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