भारत

आर्थिक मानकों पर देश के 10 करोड़ किसान परिवार बहुत ही असुरक्षित हैं

नाबार्ड के हालिया अध्ययन के मुताबिक भारत में 10.07 करोड़ किसानों में से 52.5 प्रतिशत क़र्ज़ में दबे हुए हैं. वर्ष 2017 में एक किसान परिवार की कुल मासिक आय 8,931 रुपये थी.

प्रतीकात्मक तस्वीर (फोटो: पीटीआई)

प्रतीकात्मक तस्वीर (फोटो: पीटीआई)

खेती और किसान के लिए यह वक्त जितना संघर्ष से भरा हुआ है, उससे ज्यादा संघर्ष से भरा हुआ भविष्य व्यापक समाज और माध्यम वर्ग के लिए होने वाला है. यह जरूरी ही नहीं अनिवार्यता है कि कृषि और कृषक के जीवन में आ रहे बदलावों से सक्रिय जुड़ाव रखा जाए.

अगस्त 2018 में ही राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड) ने ‘नफीस’ शीर्षक से एक रिपोर्ट जारी की है. इसका उच्चारण कुछ भिन्न हो सकता है, किन्तु मुझे ‘एनएएफआईएस’ (नाबार्ड अखिल भारतीय ग्रामीण वित्तीय समावेशन सर्वेक्षण 2016-17) का यह उच्चारण उपयुक्त लगा क्योंकि इस विषय को नफासत के साथ देखने और महसूसने की जरूरत है.

किसानों की मासिक आय- इस रिपोर्ट के मुताबिक (जिसके आंकड़े जनवरी से जून 2017 के बीच इकठ्ठा किए गए थे) भारत में वर्ष 2017 में एक किसान परिवार की कुल मासिक आय 8,931 रुपये थी. भारत में किसान परिवार में औसत सदस्य सख्या 4.9 है, यानी प्रति सदस्य आय 61 रुपये प्रतिदिन है.

दुनिया से सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शुमार भारत का यही असली चेहरा है. भारत को इस सच से शर्म नहीं आती है कि देश के एक प्रतिशत लोग 73 प्रतिशत संपदा पर कब्जा किए हुए हैं और इस कब्जे का दायरा ‘उपनिवेश’ की हद तक पहुंच चुका है.

जब राज्यों की स्थिति पर नजर डाली जाती है तो हमें किसानों की आय में गंभीर असमानता नजर आती है. नफीस रिपोर्ट के मुताबिक देश में किसानों की सबसे कम मासिक आय मध्य प्रदेश (7,919 रुपये), बिहार (7,175 रुपये), आंध्र प्रदेश (6,920 रुपये), झारखंड (6,991 रुपये), ओडिशा (7,731 रुपये), त्रिपुरा (7,592 रुपये), उत्तर प्रदेश (6,668 रुपये) और पश्चिम बंगाल (7,756 रुपये) है. जबकि तुलनात्मक रूप से किसानों की ऊंची औसत मासिक आय पंजाब (23,133 रुपये), हरियाणा (18,496 रुपये) में दर्ज की गई.

इस असमानता को देख कर यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से उभर रहा है कि वर्ष 2022 तक किसानों की आय दो गुना करने का सूत्र, समीकरण और सिद्धांत क्या होगा? आज की स्थिति में ही जब किसानों की आय में उत्तर प्रदेश और पंजाब के बीच साढ़े तीन गुना का अंतर है, तब क्या यह अंतर वर्ष 2022 में बदला जा पायेगा?

उत्तर प्रदेश और पंजाब के समाज और किसानों के लिए आय के दो गुना होने का मतलब एक जैसा ही नहीं है. बुनियादी बिंदु यह भी है कि किसानों की आय में वृद्धि का बाजार की कीमतों और गरिमामय जीवनयापन के लिए जरूरी आय से क्या संबंध होगा?

किसान परिवार के सदस्य और आय- वर्तमान स्थिति में परिवार के सदस्यों की संख्या के आधार पर यह असमानता और बढ़ जाती है. नाबार्ड का यह अध्ययन बताता है कि उत्तर प्रदेश में प्रति सदस्य आय 37 रुपये है. झारखंड में किसान परिवार (5.4 सदस्य प्रति परिवार) की आय के मौजूदा स्तर के हिसाब से प्रति सदस्य आय महज 43 रुपये है. इसी तरह मणिपुर में 51 रुपये, मिजोरम में 57 रुपये, छत्तीसगढ़ में 59 रुपये और मध्य प्रदेश में 59 रुपये है.

इसके दूसरी तरफ पंजाब में प्रति सदस्य आय 116 रुपये, केरल में 99 रुपये, नगालैंड और हरियाणा में 91 रुपये के स्तर पर है.

क्या बदलाव आया 5 सालों में?

वर्ष 2012-13 में नेशनल सैंपल सर्वे आर्गनाइजेशन ने भारत में किसान परिवारों की आय, व्यय, उत्पादक परिसंपत्तियों और कर्जे की स्थिति का अध्ययन (रिपोर्ट क्रमांक 576/2012-13) किया था. जिससे यह पता चला था कि वर्ष 2012-13 की स्थिति में भारत में एक किसान की औसत मासिक आय 6,426 रुपये थी. जिसमें 39 प्रतिशत की वृद्धि हुई है. लेकिन इस वृद्धि की परतों को खोलना बहुत जरूरी है. अंदर की परतों में खेती की बदहाली का ज्यादा दर्दनाक चेहरा छिपा हुआ है.

वर्ष 2012-13 की स्थिति में (एनएसएसओ रिपोर्ट) भारत में किसान परिवार की औसत मासिक आय 6,426 रुपये थी. इसमें से 48 प्रतिशत यानी 3,081 रुपये की आय फसल से हासिल होती थी, वर्ष 2016-17 में (नाबार्ड रिपोर्ट) यह आय घट कर 35 प्रतिशत पर आ गई. इस वर्ष किसान परिवार की कुल मासिक आय 8,931 रुपये थी, जिसमें से केवल 3,140 रुपये (35 प्रतिशत) की आय खेती से हुई यानी 5 साल में केवल 59 रुपये की वृद्धि हुई.

इसी तरह वर्ष 2012-13 में 763 रुपये (12 प्रतिशत) की आय पशुपालन से होती थी, इसमें तो कमी हुई है. वर्ष 2016-17 में किसान की पशुपालन से आय घट कर 711 रुपये (कुल मासिक आय में से 8 प्रतिशत) रह गई. यह भी संभावना है कि आने वाले कुछ महीनों में पशुपालन से आय शून्य ही हो जाए, क्योंकि जिस तरह से गाय के नाम पर आतंक फैलाया गया है, हत्याएं की जा रही हैं, आशंका है कि हत्याओं से भयभीत किसान गौमाता को सदैव के लिए वृद्धाश्रमों की तर्ज पर ‘गोआश्रम’ भेज दें.

वास्तव में इन पांच सालों में किसानों की कुल मासिक आय में हुई वृद्धि में सबसे बड़ा हिस्सा मजदूरी से होने वाली आय का रहा है, जो पांच सालों में 2,071 रुपये (32 प्रतिशत) से बढ़कर 3,025 रुपये (34 प्रतिशत) हो गई.

पांच सालों में किसान की मासिक आय में खेती, उत्पादन और पशुधन से होने वाली आय का हिस्सा अनुपातिक रूप से बहुत कम हुआ है.

वर्ष 2012-13 के अध्ययन के मुताबिक 6,426 रुपये की मासिक आय में से 3,844 रुपये (60 प्रतिशत) फसल और पशुधन से अर्जित हो रहे थे. पांच साल बाद यह योगदान 43 प्रतिशत पर आ गया. वर्ष 2016-17 में किसान की 8,931 रुपये की आय में से केवल 3,851 रुपये की आय फसल और पशुधन से हुई. शेष 57 प्रतिशत हिस्सा अन्य स्रोतों (मुख्यतः मजदूरी) से हासिल हुआ. वास्तव में सीधे कृषि से आय में केवल 7 रुपये प्रतिमाह की वृद्धि हुई है.

Farmers Index

भारत सरकार के कृषि लागत और मूल्य आयोग ने अपनी विभिन्न रिपोर्टों में किसान की आय दो गुनी करने के लिए 8 बातें कही हैं. आयोग अपनी सिफारिशों में कहता है कि किसान की आय को बढ़ाने के लिए उत्पादकता बढ़ानी है, खेती की लागत घटानी है, किसान की उपज को अच्छी और लाभदायक कीमत दिलवाना है, सिंचाई और सघनता बढ़ानी है, बेहतर नियोजन करना है, किसानों की क्षमता बढ़ानी है, किसान उत्पादक संगठनों को बढ़ावा देना है और आखिर में लोगों को खेती से निकाल कर गैर-कृषि काम में लगाना है.

यानी भारत में इस आयोग की आखिरी सिफारिश को ही लागू किया जा रहा है, शेष तो नीति सौंदर्य के बिंदु भर हैं. मौजूदा बेरोजगारी की दर (जो कि लगभग 6 प्रतिशत है) को देखते हुए, यह स्पष्ट रूप से दिखाई देता है कि खेती के उपक्रम से लोगों को निकाल कर उन्हें अन्य उपक्रमों में अवसर दिलवा पाने की भी कोई भी तैयारी लागू होती दिखाई नहीं देती है.

वस्तुतः हम भोजन की खेती को खतम करके, बेरोजगारी की खेती कर रहे हैं. किसानों की आय को दो गुना करने के सरकारी वायदे को पिछले पांच सालों के इस बदलाव (जिसमें खेती के बजाये मजदूरी पर निर्भरता बढ़ी है) के नजरिए से देखना समझना बहुत जरूरी है.

भारत में किसान समाज और खेती का उपक्रम

नाबार्ड के अध्ययन की रिपोर्ट के मुताबिक देश में 10.07 करोड़ परिवार (कुल परिवारों का 48 प्रतिशत) खेती पर निर्भर हैं. एक कृषि आधारित परिवार में वर्ष 2016-17 की स्थिति में औसतन सदस्य संख्या 4.9 थी. केरल में एक परिवार में 4 सदस्य हैं, तो वहीं उत्तर प्रदेश में सदस्य संख्या 6, मणिपुर में 6.4, पंजाब में 5.2, बिहार में 5.5, हरियाणा में 5.3 कर्नाटक और मध्य प्रदेश में 4.5 और महाराष्ट्र में 4.5 थी.

यह अध्ययन बताता है कि भारत के भीतर विभिन्न राज्यों के बीच कृषि क्षेत्र से संबंधित ढेर सारी विविधताएं हैं. पश्चिम बंगाल, जम्मू, हिमाचल प्रदेश और बिहार में एक किसान के पास औसतन आधा हैक्टेयर जमीन है. इसी तरह उत्तरखंड में 0.7, उत्तरप्रदेश में 0.8, तमिलनाडु में 1.1, मध्यप्रदेश, हरियाणा और महाराष्ट्र में 1.7 राजस्थान में 1.9 और नगालैंड में 2.1 हैक्टेयर कृषि भूमि है. ऐसे में कृषि को ‘औद्योगिक उपक्रम’ बनाने की कोशिश या तो असफल साबित होगी या फिर किसानों को खेती से बेदखल करेगी.

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कितने सुरक्षित हैं किसान?

आर्थिक मानकों पर किसान बेहद असुरक्षित हैं, कम आय, बढ़ती लागत और नीतिगत दुर्व्यवहार ने कृषि संस्कृति को संकट में डाला है. कृषि संस्कृति के संकट से ध्यान हटाने के लिए राजनीति के जरिये सांप्रदायिकता और धार्मिक संस्कृति के नए संकट रचे गए.

बढ़ती भीड़ हिंसा, असुरक्षा और गैर-बराबरी के बीच इस तथ्य की तरफ हमारा ध्यान गया ही नहीं कि भारत में 10.07 करोड़ किसानों में से 52.5 प्रतिशत किसान कर्जे में दबे हुए हैं. देश में एक किसान के पास औसतन 1.1 हेक्टेयर जमीन हैं, जिसमें से 60 प्रतिशत सिंचित नहीं होती है. ऐसे में हर कर्जदार किसान पर 1.046 लाख रुपये का कर्ज है.

यह बीमा यानी इंश्योरेंस का जमाना है. यानी प्रत्यक्ष रूप से सहजता से किसान को संरक्षण नहीं मिलेगा और बीमे की व्यवस्था से जूझना किसान की अपनी निजी जिम्मेदारी है. केवल 26 प्रतिशत किसान के पास किसी भी तरह का बीमा है.

17 प्रतिशत किसान ही ऐसे हैं, जिनके पास जीवन बीमा है. पिछले 20 सालों में यह बार-बार बताया गया है कि स्वास्थ्य सेवाएं हासिल करने के लिए सबसे ज्यादा कर्ज लिया जा रहा है और यह खर्च लाखों लोगों को गरीबी के जाल में धकेल रहा है.

भारत में केवल 5 प्रतिशत किसानों के पास स्वास्थ्य बीमा है. 66.8 प्रतिशत किसान कहते हैं कि उनके पास इतना धन भी नहीं बचता है कि वे बीमा करवा सकें. जबकि 32.3 प्रतिशत किसान नियमित आय न होने के कारण बीमा नहीं करवा पाते हैं.

क्या नीति बनाने वाले यह सच जानते हैं?

भारत में खेती में मशीनीकरण की व्यापक नीति को लागू किया जा रहा है. जोतों के छोटे आकार के कारण यह एक चुनौतीपूर्ण और अव्यवहारिक नीति है. नाबार्ड का अध्ययन बताता है कि भारत में केवल 5.2 प्रतिशत किसानों के पास ट्रैक्टर हैं, 1.8 प्रतिशत के पास पावर टिलर, 0.8 प्रतिशत के पास स्प्रिंकलर, 1.6 प्रतिशत के पास ड्रिप सिंचाई व्यवस्था और 0.2 प्रतिशत के पास हार्वेस्टर हैं.

इस मामले में भी देश के राज्यों में बहुत असमानता है. पंजाब में 31 प्रतिशत किसानों के पास ट्रैक्टर हैं, गुजरात में 14 प्रतिशत और मध्यप्रदेश में 13 प्रतिशत किसानों के पास ट्रैक्टर हैं, जबकि देश का औसत 5.2 प्रतिशत है.

इसी तरह आंध्र प्रदेश में 15 प्रतिशत और तेलंगाना के 7 प्रतिशत किसानों के पास पावर टिलर हैं, जबकि भारत का औसत 1.8 प्रतिशत है.

यह अध्ययन और विश्लेषण एक नजरिये से भारत की सरकारों की नीतियों को वाजिब साबित करने का प्रयास भी है, जिसमें लोगों को खेती से बाहर लाने, खेती का मशीनीकरण करने और बाजार केंद्रित खेती को बढ़ाने के लिए राजनीतिक-सामाजिक माहौल बनाने जैसे पहलू शामिल हैं.

नाबार्ड का अध्ययन यह नहीं बताता है कि जिन लोगों ने खेती छोड़ी, उनका हुआ क्या? नाबार्ड साबित कर रहा है कि किसान अब भी कम ही कर्ज ले रहा है, लेकिन वह यह नहीं बता रहा है कि दो दशकों में सवा तीन लाख किसानों ने कर्जा लेकर आत्महत्या क्यों की?

(लेखक सामाजिक शोधकर्ता, कार्यकर्ता और अशोका फेलो हैं.)

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