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अचानक इतने सारे ‘अर्बन नक्सल’ कहां से प्रकट हो रहे हैं?

पुलिस और कुछ टेलीविजन चैनलों के आपसी मिलीभगत से जिस तरह से वर्तमान समय में एक बड़े और लगातार विकसित हो रहे ‘अर्बन नक्सल’ (शहरी माओवादी) के नेटवर्क के प्रेत को खड़ा किया जा रहा है, उसे देखते हुए ऐसा लगता है कि हम फासीवाद की तरफ काफी तेजी से छलांग लगा रहे हैं.

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(प्रतीकात्मक तस्वीर: रॉयटर्स)

हाल ही में बर्लिन में पीपुल्स कोर्ट (जन अदालत), जिसे नाजी सरकार ने 1934 से 1945 के बीच ‘देश के दुश्मनों’ पर मुकदमा चलाने के लिए स्थापित किया था, पर एक प्रदर्शनी को देखते हुए मैं वहां नुमाइश के लिए रखी गई कुछ सामग्रियों के साथ परिचय के डरावने बोध से भर गई.

इस कारण नहीं कि हमारी वर्तमान न्यायिक व्यवस्था को बदल दिया गया है (कम से कम अभी तक तो ऐसा नहीं हुआ है), बल्कि कोर्ट के सामने पेश किए गए व्यक्तियों पर लगाए गए आरोपों की प्रकृति के कारण.

एक खदान मजदूर, जिसने अपने इलाके में पुलिसवालों को कम्युनिस्ट पर्चियां बांटी थीं; एक बैंकवाला जिसने प्रमुख नाजियों के बारे में चुटकुला बनाया था, एक साउंड टेक्निशियन जिसने हिटलर के बारे में व्यंग्यात्मक कविताएं बांटी थीं और एक रियल एस्टेट का एजेंट जिसने हिटलर का नाम लेते हुए पोस्टकार्ड भेजे थे- इन सारे ‘अपराधियों’ को ‘आला दर्जे के देशद्रोह’, राष्ट्रीय प्राधिकार के प्रति वफादारी, जो कि युद्ध के प्रयासों के लिए अनिवार्य है, को नष्ट करने’ (इस मामले में वह पोस्ट ऑफिस जहां पते पर नहीं पहुंचे पोस्टकार्ड्स मिले थे) और ‘शत्रु की मदद’ करने के आरोप में मौत की सजा सुनाई गई थी.

एक 22 वर्षीय स्विस मिशनरी के मामले में जिसे शुरू में तो सिर्फ बगैर टिकट यात्रा के लिए गिरफ्तार किया गया था मगर कठोर पूछताछ के दौरान जिसने संभवतः हिटलर की हत्या की योजना, क्योंकि हिटलर- ‘ईसाई धर्म और मानव जाति का दुश्मन था’, को कबूल किया था.

उसे मृत्यु की सजा सुनाए जाने का आधार यह था कि ‘प्रतिवादी ने जर्मनी को उसके रक्षक से, उस इनसान से जिसके लिए आठ करोड़ जर्मनवासियों का दिल बेशुमार मोहब्बत, श्रद्धा और आभार की भावना से धड़कता है, से महरूम करने का इरादा किया, जर्मनी को जिसकी ताकत और नेतृत्व की आज पहले से भी ज्यादा जरूरत है.’

टोपोग्राफी ऑफ टेरर फाउंडेशन द्वारा लगाई गई इससे पहले की एक प्रदर्शनी ने नाजी शासनकाल में प्रेस की भूमिका को अपना विषय बनाया था : जबकि, विरोधी प्रेस को नष्ट कर दिया गया था, एक बड़ा बहुमत ‘आगे बढ़कर सरकार का फरमाबरदार बन गया’.

युद्ध के बाद सक्रिय तरीके से नाजी समर्थन में खड़े कुछ पत्रकारों ने अपनी पहचान बदलकर खुद को फिर से स्थापित करने की कोशिश की, मगर उनकी पहचान कर ली गई.

पुलिस और कुछ टेलीविजन चैनलों के बीच आपसी मिलीभगत से जिस तरह से वर्तमान समय में एक बड़े और लगातार विकसित हो रहे ‘अर्बन माओइस्ट’ (शहरी माओवादी) के नेटवर्क के प्रेत को खड़ा किया जा रहा है, उसे देखते हुए ऐसा लगता है कि हम फासीवाद की तरफ काफी तेजी से ‘छलांग’ लगा रहे हैं.

प्रधानमंत्री की हत्या की ‘साजिश’ की ‘विस्फोटक’ चिट्ठी सबसे पहले रहस्यमय ढंग से टाइम्स नाउ के हाथों में नजर आई; जबकि वकील सुधा भारद्वाज द्वारा किसी कॉमरेड प्रकाश को लिखी गई तथाकथित चिट्ठियों का पर्दाफाश रिपब्लिक टीवी पर हांफ-हांफ कर किया गया था.

ऐसी चिट्ठियों, जिनमें स्पष्ट तौर पर नामों का उल्लेख किया गया है, जो पैसों के स्रोतों की बात करती है, कश्मीरी अलगाववादियों, पत्थरबाजों, मानवाधिकार वकीलों, जेएनयू और टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज, गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम या यूएपीए, कांग्रेस पार्टी और वैसी हर चीज जिसे भाजपा और पुलिस नापसंद करती है, को टांक लेती है- की अज्ञानता और असंभाव्यता से किसी का कोई लेना-देना नहीं है.

इसका मकसद बदनाम करना, धमकाना, ध्रुवीकरण करना और लोकतंत्रवादियों के खिलाफ घृणा पैदा करना साथ ही साथ मानवाधिकार के बुनियादी विचार पर हमला करना है.

अब तक कार्यकर्ता, पत्रकार, शोधकर्ता आदि को इस तरह से फंसाया जा रहा था, जबकि वकील इनकी रक्षा करने के लिए आगे आते थे. लेकिन आधी रात की दस्तक वकीलों के लिए भी सुनाई देने लगी: सुरेंद्र गाडलिंग, जो कि आदिवासियों, दलितों और राजनीतिक कैदियों की पैरवी करने के लिए जाने जाते हैं, एस. वंचिनाथन, जो तुतिकोरिन में स्टरलाइट के पीड़ितों की मदद कर रहे थे, हैदराबाद के मानवाधिकार वकील चिक्कुदु प्रभाकर, जिन्होंने बेतुके आरोपों के चलते छत्तीसगढ़ के सुकमा जेल में छह महीने बिताए.

अब गिरफ्तारियों के सिलसिले में सबसे नया नाम सुधा भारद्वाज का है, जिन्हें 28 अगस्त को फरीदाबाद के उनके घर से गिरफ्तार किया गया और महाराष्ट्र भेजा जा रहा है.

उनके खिलाफ लगाए गए आरोपों के हिसाब से अगर बात करें, जो आईपीसी की धाराओं, 153 ए, 505(1)(बी), 117, 120(बी), 34 और यूएपीए की धाराओं 13, 16,17, 18, 18(बी), 20, 38, 39, 40 के तहत लगाए गए हैं- तो किसी को भी यह लग सकता है कि वे एक खतरनाक आतंकवादी हैं न कि एक बेहद सम्मानित मजदूर संगठन कार्यकर्ता, श्रमिकों की वकील और नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी, दिल्ली की विजिटिंग प्रोफेसर, जो कि वे वास्तव में हैं.

बार काउंसिल द्वारा पेशेवर मानक के जो नियम तय किए गए हैं, उनमें कहा गया है कि ‘वकीलों को किसी अपराध के आरोपी की पैरवी करनी होगी, भले ही आरोपी के अपराध को लेकर उसकी अपनी धारणा जो भी हो. एक वकील को यह हमेशा याद रखना चाहिए कि उसकी निष्ठा कानून के प्रति है, जिसका बुनियादी उसूल यह कहता है कि किसी भी व्यक्ति को पर्याप्त सुबूतों के बिना सजा नहीं दी जानी चाहिए.’

इन निर्देशों को गंभीरता के साथ अपने पेशेवर जीवन में उतारने वाले वकीलों को निशाना बनाकर पुलिस एक तरह से यही कहना चाह रही है कि वह उसके खिलाफ मुकदमा लड़ने वालों को पेशेवर न मानकर, अपराधी मानती है.

उनका मकसद दूसरे वकीलों को भी डराना है ताकि वे संवेदनशील या विवादास्पद मामलों को लेने से बचें. हमें कहा जा रहा है कि कानून सिर्फ सत्ताधारी के प्रति सहानुभूति रखने वालों की पैरवी करनेवालों के लिए उपलब्ध होगा, भले वे बलात्कार या लिंचिंग या सांप्रदायिक हिंसों के आरोपी क्यों न हों.

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अरुण फरेरा, सुधा भारद्वाज, पी वरावरा राव, गौतम नवलखा और वेरनॉन गोंजाल्विस

पटियाला हाउस कोर्ट परिसर के भीतर छात्र नेता कन्हैया कुमार पर हमला करने वाले वकीलों की राह पर चलने वालों पर कोई कार्रवाई नहीं होगी. इससे पहले की बहुत देर न हो जाए, वकीलों को नींद से जागने और अपने पेशे की हिफाजत के लिए सामूहिक तौर पर आवाज उठाने की जरूरत है.

6 जून को ‘महाराष्ट्र के पांच लोगों’ की गिरफ्तारी- वकील सुरेंद्र गाडलिंग, अंग्रेजी के प्रोफेसर शोमा सेन, लेखक सुधीर धावले, वन अधिकार कार्यकर्ता महेश राउत और कैदियों के अधिकारों के लिए काम करने वाले रोना विल्सन और 28 अगस्त को सुधा भारद्वाज, गौतम नवलखा, वेरनॉन गोंजाल्विस और वरवर राव की गिरफ्तारी और इसके साथ ही फादर स्टेन स्वामी, अरुण फरेरा, सुज़ेन अब्राहम और आनंद तेलतुंबडे के घरों पर उसी समय छापेमारी साफ तौर पर एक संदेश देने के लिए की गई है.

यह तथ्य कि पुलिस ने पहले तो महाराष्ट्र के पांच कार्यकर्ताओं पर माओवादियों की तरफ से भीमा कोरेगांव हिंसा को भड़काने का आरोप लगाया, लेकिन तुरंत ही अपनी कहानी में मोड़ लाते हुए इन्हें राजीव गांधी के ही तर्ज पर मोदी की हत्या की साजिश के हास्यास्पद आरोप में फंसाने के लिए कहानी गढ़ने लगी, यह बताता है कि उन्हें पता है और वे हमें भी इसका एहसास कराना चाहते हैं कि सबूत, संभाव्यता और कानून का शासन जैसी ‘तुच्छ’ चीजें कोई मायने नहीं रखतीं.

वास्तव में उनके खिलाफ मामला कहीं से भी हिंसा का नहीं था. अगर ऐसा होता तो भीमा कोरेगांव के असली गुनहगार, मिलिंद एकबोटे और संभाजी भिड़े खुले नहीं घूम रहे होते.

सामाजिक कार्यकर्ता स्टेन स्वामी, जिन पर हाल ही में पत्थलगड़ी आंदोलन- जो कि पत्थर पर खुदे हुए संविधान की इबारत के जयघोष से ज्यादा कुछ नहीं है, को समर्थन देने के आरोप में राजद्रोह का आरोप लगाया गया था.

वे झारखंड में लंबे समय से लोगों के अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे हैं. उनके कामों में भोजन के अधिकार, विस्थापन विरोधी आंदोलन, गलत गिरफ्तारी का विरोध से लेकर जमीन से बेदखली का सवाल तक शामिल है. गौतम नवलखा दशकों से नागरिक स्वतंत्रता के कई प्रयासों में शामिल रहे हैं.

सरकार चाहे जितनी भी कोशिश कर ले, वे इनकी आवाजों को दबाने या इन आरोपों का इस्तेमाल करके दूसरों को डराने में कामयाब नहीं होगी. इंदिरा गांधी द्वारा लगाया गया आपातकाल दो साल चला था.

मोदी का अघोषित आपातकाल हो सकता है कि कुछ ज्यादा लंबा चल जाए, लेकिन आतंक आखिर में नाकाम होता है. लोकतंत्र और कानून के शासन की आखिरकार जीत होगी.

(नंदिनी सुंदर दिल्ली विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र पढ़ाती हैं.)

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