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ग्राउंड रिपोर्ट: क्या मिर्चपुर का ज़ख़्म कभी भर सकेगा?

21 अप्रैल 2010 को हरियाणा के हिसार ज़िले के मिर्चपुर गांव में जाट समुदाय के लोगों ने दलितों के दर्जनों घरों में आग लगा दी थी और दो लोगों को ज़िंदा जला दिया था. हाल ही में दिल्ली हाईकोर्ट ने 33 लोगों को दोषी ठहराया और 12 लोगों को उम्रक़ैद की सज़ा सुनाई है.

Mirchpur Anoo Bhuyan the Wire

मिर्चपुर से विस्थापित दलित परिवार (फोटो: अनू भूयां/द वायर)

‘तुम्हें किस जाति के यहां जाना है’ अचानक से आए इस अप्रत्याशित सवाल ने मुझे हैरानगी में डाल दिया. क्योंकि दिल्ली से करीब डेढ़ सौ किलोमीटर दूर हरियाणा के इस गांव के लिए निकलने से पहले मैं इस सवाल के लिए बिल्कुल तैयार नहीं थी. मैं ऐसे सवालों की उम्मीद कर रही थी कि तुम किसके घर जाना चाहते हो, लेकिन किस जाति के यहां जाना चाहते हो, इसकी उम्मीद बिल्कुल नहीं थी.

पूछने वाले आदमी करीब 70 साल के रहे होंगे और उनके बोलने का अंदाज और उनकी वेषभूषा से जाहिर हो रहा था कि वो जाट हैं, जिसकी गिनती अगड़ी जाति में होती है. उनके चेहरे के भाव बिल्कुल सख्त थे और हमसे सवाल पूछने के बाद वो ऐसे तनकर खड़े हो गए मानों हमारा जवाब सुनने के लिए उनके कान ही नहीं, बल्कि पूरा शरीर ही बेताब था.

‘द वायर’ की कुल तीन सदस्यों की टीम थी हमारी- दो महिलाएं और एक पुरुष. हमारे लिए इस सवाल का जवाब तुरंत दे पाना मुश्किल था क्योंकि हम इसके लिए तैयार नहीं थे.

दरअसल मिर्चपुर के इस बुजुर्ग से हमारी मुलाकात होने से पहले, हम यहां से करीब 80 किमी दूर मौजूद तंवर फार्म हाउस हो आए थे. हिसार कस्बे से 10-12 किमी की दूरी पर स्थित उस फार्म हाउस में हम उन दलित परिवारों से रूबरू हुए थे जो पिछले 8 सालों से वहां रह रहे हैं.

मिर्चपुर में 21 अप्रैल, 2010 को हुई घटना के बाद करीब 120 दलित परिवारों को अपना घरबार छोड़कर वहां जाना पड़ा और फार्म हाउस के अंदर झोपड़ियां बनाकर जिंदगी गुजारने को मजबूर होना पड़ा.

मिर्चपुर कांड से चर्चित उस घटना में बड़ी संख्या में जाटों की भीड़ ने दलित बस्ती पर हमला करके दर्जनों घर जला दिए थे और दो दलितों को जिंदा जलाया था. मरने वालों में ताराचंद (60) और इनकी 17 साल की शारीरिक रूप से अक्षम बेटी सुमन शामिल थे.

सौ से ज्यादा लोगों पर मुकदमा चला और बीते 24 अगस्त को दिल्ली हाईकोर्ट ने इस मामले में 20 लोगों को दोषी ठहराया. 13 अन्य लोगों की सजा बरकरार रखी. इस फैसले पर पीड़ित समुदाय की प्रतिक्रिया क्या है और उनके सामने अब कौन-सी चुनौतियां हैं? आदि सवालों का जवाब खोजना हमारे दौरे का मकसद था. साथ ही, दोषी करार दिए जाने वालों के परिवारों से मिलकर उनकी प्रतिक्रिया भी जाननी थी.

तंवर फार्म हाउस में सबसे पहले हमारी मुलाकात सत्यवान से हुई थी जो मृतक ताराचंद के भतीजे हैं और इस केस के मुख्य गवाह भी. मिर्चपुर दलितों के हक में कानूनी लड़ाई की अगुवाई सत्यवान ही कर रहे थे. वो वहां नीम के पेड़ के नीचे खटिया डालकर बैठे हुए थे.

उनके साथ, उनका सुरक्षा गार्ड, तीन-चार ग्रामीणों के साथ-साथ कुछ पुलिस वाले भी थे, जिन्हें कोर्ट का फैसला आने के बाद वहां तैनात किया गया.

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मिर्चपुर कांड में गवाह सत्यवान (फोटो: अनू भूयां/द वायर)

जब उनसे इस फैसले के बारे में पूछा गया तो उन्होंने बताया कि फैसले से वो खुश हैं. लेकिन अभी भी उनको पूरी संतुष्टि नहीं है क्योंकि, अभी भी कुछ आरोपी छूट गए हैं. उनको सजा दिलाने के लिए सुप्रीम कोर्ट जाना है.

जब उनसे हमने इस फैसले के बाद वहां के माहौल के बारे में पूछा, तो उन्होंने बताया, ‘अब भी हम खुद को असुरक्षित महसूस कर रहे हैं.’ सत्यवान ने ये भी बताया कि मिर्चपुर गांव में जाट लोग एकजुट हो रहे हैं, और वो दलितों के साथ कभी भी कुछ भी कर सकते हैं. हालांकि उन्होंने ये भी कहा कि ‘मुझे मेरे मरने का डर नहीं है, मैं न्याय के लिए लडूंगा.’

जब उनसे हमने ये पूछा कि अब आप लोग वापस मिर्चपुर जाना चाहेंगे तो उन्होंने बताया, ‘अब हम वहां कभी नहीं जाना चाहते.’ सरकार ने उनके पुनर्वास के लिए ढंढूर गांव के पास 11 एकड़ जमीन और 4 करोड़ रुपये देने का ऐलान अभी कुछ दिन पहले ही किया था और उस बस्ती का नाम दीनदयालपुरम रखने की बात कही थी. लेकिन दलितों को उस प्रस्तावित बस्ती के नाम को लेकर आपत्ति है. दीनदयाल उपाध्याय आरएसएस के विचारक थे. मिर्चपुर के पीड़ितों का कहना है कि इस नाम से दलितों का कोई लेना-देना नहीं है.

वो चाहते हैं कि उस गांव का नाम मिर्चपुर हत्याकांड में मारे गए ताराचंद के नाम पर ताराचंदपुर रखा जाए. इसके लिए उन्होंने कोर्ट तक जाने की बात कही. उस जमीन का शिलान्यास मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने खुद आकर किया था. लेकिन अभी तक उसका कोई लिखित नोटिस नहीं आया है.

उसके बाद हमें कुछ लोग उस बस्ती को दिखाने के लिए अंदर ले गए. बस्ती में रह रहे दलितों ने हमें बताया कि वहां करीब 120 परिवार रह रहे हैं. उस बस्ती की स्थिति इतनी दयनीय है कि उसका वर्णन करना भी मुश्किल है. कोई बुनियादी सुविधाएं नहीं हैं.

वे पॉलीथिन के शीट, बोरों, कपड़ों तथा फ्लैक्स-बैनरों के टुकड़ों से छोटी-छोटी झोपड़ियां बना कर रह रहे हैं. उनकी झोपड़ियां लंबाई और चौड़ाई में 9 या 12 फीट से ज्यादा की नहीं हैं, जहां उनका पूरा परिवार रहता है.

घरों के इर्द-गिर्द चारों तरफ नलियां बहती रहती हैं जहां से हर वक्त बदबू आती रहती है और चारों तरफ मक्खियां तथा मच्छर फैले हुए हैं. उन्होंने बताया कि रोज दो बार गाड़ी से पानी पहुंचा दिया जाता है.

उसी पानी से उनको पीने और नहाने-धोने और अन्य कामों को निपटाना होता है. जगह-जगह गड्ढों में गंदा पानी भरा हुआ है. बता रहे थे बारिश में उनकी झोपड़ियों के अंदर भी पानी आ जाता है.

जब उनसे कोर्ट के फैसले के बारे में पूछा गया तो इस पर उन्होंने खुशी जाहिर की. साथ ही, ये भी कहा कि जो आरोपी बाकी बचे हैं उन्हें भी सजा होनी चाहिए. उन्होंने आगे कहा कि वो अभी भी असुरक्षित महसूस कर रहे हैं. उनका कहना है कि बदले की भावना में कब उन पर हमला होगा बता नहीं सकते, क्योंकि रोजी-रोटी के सिलसिले में उन्हें इधर-उधर जाना तो पड़ता है.

उनका कहना है कि मिर्चपुर कांड के बाद भी कुछ और घटनाएं हुई हैं. कुछ महीने पहले मिर्चपुर में फिर एक घटना हुई थी जिसमें एक पिछड़ी जाति के युवक के साथ मार-पीट कर, उसे जिंदा जलाने के इरादे से डीजल डाली गई थी. इसके अलावा, 2017 फरवरी में एक दलित युवक साइकिल प्रतियोगिता जीत गया तो दंबगों ने दलितों पर हमला कर दिया, जिसमें 9 लोग घायल हुए थे.

फार्म हाउस में रह रही एक पीड़ित महिला रेखा (37) ने हमें बताया, ‘कोर्ट के इस फैसले से हम खुश हैं. आठ सालों बाद हमें लगता है कि न्याय मिला है. लेकिन अभी भी हम डर-डर कर जी रहे हैं. हम पर कभी भी हमला हो सकता है.’

साथ ही, उन्होंने ये भी कहा कि 2010 के उस कांड में वहां की जाट महिलाएं भी शामिल थीं, उनको भी सजा होनी चाहिए थी.

मिर्चपुर कांड के जो गवाह हैं उनको हरियाणा पुलिस ने सुरक्षा दी है. सुरक्षा कर्मी भी वहां मौजूद पीड़ित परिवारों ही तरह बेहद छोटी-सी झोपड़ियों में रह रहे हैं. हमने सुरक्षा कर्मियों की एक झोपड़ी के अंदर जाकर देखा. उस एक झोपड़ी में पांच-छह पुलिस वाले रह रहे हैं.

एक कोने में खाना बनाने के लिए स्टोव लगा हुआ था और कुछ बर्तन थे. बीच में तीन-चार छोटे-छोटे खटिया बिल्कुल पास-पास बिछे हुए थे. खटिया बिछाने के बाद जो खाली जगह बची थी उसमें उनका पूरा सामान भरा हुआ था. उस झोपड़ी की ऊंचाई इतनी कम थी कि उसके अंदर सीधे खड़े हो पाना मुश्किल था.

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(फोटो: अनू भूयां/द वायर)

जब हमने कोर्ट के फैसले के बारे में उन सुरक्षाकर्मियों से बात की तो उन्होंने भी फैसले का स्वागत किया. साथ ही, उन्होंने भी आशंका जताई कि दलितों पर और भी हमले हो सकते हैं. ‘जिनको सजा हुई है उनमें से कुछ लोग आपराधिक प्रवृत्ति के हैं. वो कुछ भी कर सकते हैं.’

जब हमने सुरक्षा में तैनात इन कर्मचारियों की सामाजिक पृष्ठभूमि के बारे जानना चाहा तो उन्होंने बताया कि वो सभी पिछड़े वर्ग से आते हैं. 2012 से इन्हें यहां तैनात किया गया. जब हमने उनका नाम पूछा, तो उन्होंने सरकारी नौकरी में होने का हवाला देकर नाम नहीं छापने का अनुरोध किया.

इस केस के कुल 26 गवाहों में से 17 के लिए गनमैन की सुरक्षा का प्रबंध किया गया है. जबकि 9 गवाहों को अभी भी सुरक्षा नहीं दी गई है. उनके लिए भी सुरक्षा की मांग की जा रही है.

ये दलित जिस फार्म हाउस में रह रहे हैं वो वेदपाल तंवर नामक दलित नेता का है. जब 2010 में मिर्चपुर में दलितों के घरों को जला दिया गया, वहां के सारे दलित डर कर हिसार आ गए.

तब उन्होंने उनको रहने के लिए अपने फार्म हाउस के बगल की जमीन दिया. लोगों ने बताया कि उनको भी कई बार डराया-धमकाया गया. आज भी उन्हें धमकियों का सामना करना पड़ रहा है. हमने उनसे भी मिलने की कोशिश की लेकिन उनसे मुलाकात नहीं हो सकी.

इसके बाद हम वहां से 80 किलोमीटर दूर मिर्चपुर के लिए रवाना हुए. मिर्चपुर के मुहाने पर पहुंचते ही जिस पहले व्यक्ति से हम मुखातिब हुए थे उनका पहला सवाल था हमें किस जाति के यहां जाना है.

उस बुजुर्ग ने हमें गांव के अंदर जाने का रास्ता दिखाया. लगभग 2000 परिवार वाले इस गांव में रहते हैं. लगभग सभी के मकान पक्के हैं. साथ ही, कुछ बड़े-बड़े बंगले भी दिखाई दिए. यहां से विस्थापित होकर दलित परिवार जिन दमघोंटू झोपड़ियों में जी रहे हैं, उनसे इन मकानों की तुलना ही नहीं की जा सकती है.

गांव के लोगों से, खासकर जाटों से हमने इस मामले पर बात करने की कोशिश की लेकिन कोई भी हमसे खुलकर बात करने को तैयार नहीं हो रहे थे. सभी ने हमें सरपंच से बात करने की सलाह दी. जब हम सरपंच के घर गए तो वो वहां नहीं थे. कुछ लोगों से हमने जबरन बात छेड़ी तो हमारे सवालों पर सबका रवैया रूखा-रूखा सा ही था. उन्होंने बताया कि उनके साथ अन्याय हुआ है.

हमने बड़ी मशक्कत के बाद जगदीश नाम के शख्स से बात की, जिनको इस मामले में दिल्ली उच्च न्यायालय ने दो साल की सजा सुनाई है. उन्होंने बताया, ‘जिस समय ये कांड हुआ था उस समय मैं गांव में था ही नहीं. फिर भी मुझे सजा सुनाई गई है. मेरे खिलाफ किसी ने गवाही भी नहीं दी. फिर भी सजा हुई.’

जगदीश ने दलितों के प्रति अपमानजनक शब्द का प्रयोग करते हुए ये आरोप भी लगाया, ‘चूंकि जज भी नीची जाति से था इसलिए उन्होंने दलितों के हक में फैसला दिया.’

उनका आरोप है कि दलितों ने जानबूझकर उन्हें फंसा दिया. उन्होंने आगे कहा, ‘दलितों के घरों में आग उनके लोगों ने नहीं लगाई गई थी. आग खलिहान में लगाई गई थी. दलितों ने खुद ही अपने घरों को जलाया था. ये सब सरकार और एनजीओ से पैसा और मुआवजा पाने के लिए ऐसा किया.’

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मिर्चपुर गांव (फोटो: धीरज मिश्रा/द वायर)

मेरे जेहन में और भी कई सवाल थे. हमले के दिन जब वो गांव में थे ही नहीं तो उन्हें ये कैसे मालूम था कि दलितों के घरों में खुद दलितों ने ही आग लगाई थी? वो कैसे जानते हैं कि दलितों ने मुआवजा लेने के लिए ही खुद अपने ही बिरादरी के लोगों को जिंदा जलाया था?

पिछले 8 सालों से छोटी-छोटी झोपड़ियों में, जहां साफ पानी नहीं है, गंदी नालियों के इर्द-गिर्द, मक्खियों और मच्छरों के साथ रहने की मजबूरी क्या दलितों ने जानबूझकर मोल लीं? लेकिन इन सारे सवालों का जवाब देने के लिए न तो वो तैयार थे और न ही उनकी पत्नी हमें बर्दाश्त कर पा रही थीं. ऊपर से उन्होंने शराब पी रखी थी. लिहाजा हमें उनके घर से बाहर निकलना पड़ा.

बाद में हम अमित के घर गए. करीब 30 साल के अमित इस मामले में दोषी करार दिए गए राजेंद्र के दोस्त हैं. अमित ने हमें बताया, ‘2010 का झगड़ा दो पड़ोसियों के बीच का झगड़ा था जिसे जातिवाद का रंग दिया गया. पैसों के लिए ही दलित गांव छोड़कर चले गए.’

अमित से हमने जब ये पूछा कि क्या वो विस्थापित दलितों को फिर से गांव में आने देंगे तो उन्होंने हमसे पलटकर सवाल किया, ‘हमने कब मना किया?’ हालांकि अमित ने कहा कि गांव में भाईचारा का माहौल है, लेकिन उनके लहजे में दलितों के प्रति नकारात्मकता साफ झलक रही थी.

हमारी बातचीत चल ही रही थी तो किसी ने बताया कि सरपंच आ गये. फिर हमने उठकर उनसे मिलने के लिए जाने की बात कही. लेकिन हमारे बार-बार मना करने पर भी हमें चाय के लिए जबरन रोका गया. जब तक हम चाय पीकर वहां से बाहर आ गए तब तक सरपंच फिर से कहीं निकल चुके थे.

बाद में गली में कुछ बुजुर्ग हमें मिले थे. उन्होंने बताया कि आग सुअरबाड़ा में लगाई गई थी, न कि दलितों के घरों में. दलितों के घरों में आग लगाने के बारे में वहां मौजूद सभी लोगों का मत एक था- वो ये है कि ‘उन्होंने खुद ही आग लगाई थी.’

जब हमने वहां के लोगों से ये सवाल किया कि कोई चंद पैसों के लिए अपने ही घरों को कैसे जलाता है और अपने ही लोगों को कैसे जिंदा जलाता है तो कहने लगे कि ‘आप अभी छोटी लड़कियां हैं, इसलिए इन चीजों को समझ नहीं पाएंगी.’

उसके बाद हम मिर्चपुर से वापस दिल्ली के लिए निकल पड़े. मन में अभी भी कई सारे सवाल थे जिनका जवाब खोजना अभी बाकी है. अदालत का फैसला तो आया है लेकिन क्या 8 सालों से अमानवीय हालात में जी रहे मिर्चपुर के दलित फिर से अपना गांव जाकर अपने घरों में बिना किसी भय के सामान्य जिंदगी जी सकेंगे?

इन आठ सालों में उन्होंने जो कुछ झेला है क्या उसकी भरपाई कभी हो सकेगी? गांव में कदम रखते ही जाति पूछने वाली और जज की जाति को फैसले से जोड़कर देखने वाली जातिवादी मानसिकता का खात्मा हुए बिना क्या सचमुच में भाईचारा संभव है?

(संतोषी द वायर में इंटर्न हैं.)

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