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आपराधिक मामलों वाले नेताओं के बारे में जानकारी न देने पर सुप्रीम कोर्ट की केंद्र को फटकार

जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा सरकार नेताओं के खिलाफ दायर मामलों का हल निकालने के लिए तैयार नहीं दिख रही है. जबकि कोर्ट को आदेश पारित करने के लिए बाध्य किया जा रहा है.

(फोटो: पीटीआई)

(फोटो: पीटीआई)

 

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने आपराधिक मामलों वाले सांसद-विधायकों के बारे में जानकारी नहीं देने पर केंद्र सरकार को फटकार लगाई है.

कोर्ट ने नेताओं की संलिप्तता वाले मुकदमों की सुनवाई के लिए विशेष अदालतें गठित करने के बारे में केन्द्र द्वारा विवरण मुहैया नहीं कराने पर नाखुशी जाहिए करते हुए कहा कि सरकार इस मुद्दे पर तैयार नहीं लगती है.

जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा, ‘सरकार इस मामले में कुछ आदेश पारित करने के लिए बाध्य कर रही है जो हम इस समय नहीं करना चाहते हैं. केंद्र सरकार तैयार नहीं है.’

पीठ ने कहा, ‘भारत सरकार लगता नहीं है कि इसके लिए तैयार है.’

पीठ ने न्यायालय के निर्देशानुसार इस मामले में सरकार द्वारा दायर अतिरिक्त हलफनामे का अवलोकन किया जिसमे कहा गया था कि 11 राज्यों को ऐसी 121 विशेष अदालतें स्थापित करने के लिये धन उपलब्ध कराया गया है.

ऐसी प्रत्येक विशेष अदालत में लंबित मुकदमों की संख्या के संबंध में न्यायालय के सवाल पर केंद्र ने कहा कि विधि एवं न्याय मंत्रालय इन अदालतों को सौंपे गये और इनमें लंबित तथा यहां निबटाये गये मुदकमों की सूचना प्राप्त करने के लिये संबंधित प्राधिकारियों के बारे में बात कर रहा है.

पीठ ने संक्षिप्त सुनवाई के बाद इस मामले को 12 सितंबर के लिये स्थगित कर दिया।

केन्द्र ने अपने हलफनामे में कहा है कि दिल्ली में दो और आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु, बिहार, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश में एक एक विशेष अदालत गठित की गयी है.

हलफनामे में कहा गया है, ‘तमिलनाडु के अलावा, जहां बताया गया है कि मामला मद्रास उच्च न्यायालय के पास विचाराधीन है, सभी राज्य सरकारों और उच्च न्यायालयों ने अपने अपने राज्यों में विशेष अदालतें गठित करने के लिए अधिसूचनायें जारी कर दी हैं.’

इन 12 विशेष अदालतों के अलावा और अदालतें गठित करने के बारे में न्यायालय के सवाल पर केंद्र ने हलफनामे में कहा है कि कर्नाटक, इलाहाबाद, मध्य प्रदेश, पटना, कलकत्ता और दिल्ली उच्च न्यायालयों ने सूचित किया है कि अतिरिक्त विशेष अदालतों की आवश्चकता नहीं है जबकि बंबई उच्च न्यायालय ने एक और अदालत की आवश्यकता बताई है.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)

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