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‘विश्व के कुल मनोरोगियों का 15% भारत में है’

आज विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस है. इस साल संसद में मानसिक स्वास्थ्य बिल भी पारित किया गया है. मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर एम्स के मनोचिकित्सा विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष डॉ. सुधीर खंडेलवाल से बातचीत.

प्रतीकात्मक फोटो (पीटीआई)

(यह साक्षात्कार पहली बार 7 अप्रैल 2017 को प्रकाशित हुआ था)

मेंटल हेल्थकेयर बिल का उद्देश्य क्या है? ऐसा कोई एक्ट या अधिनियम लाने ज़रूरत क्यों पड़ी?

किसी भी बीमारी के लिए कोई विशेष एक्ट या अधिनियम नहीं होता. मानसिक बीमारियों के लिए विशेष एक्ट की ज़रूरत इसलिए पड़ती है क्योंकि जब ब्रिटिश शासन था तब इंडियन ल्यूनासी एक्ट नाम का एक्ट था 1912 में. उसका उद्देश्य बहुत ख़राब था कि किसी सामान्य व्यक्ति या समाज को किसी दिमाग़ी रूप से परेशान व्यक्ति से कैसे बचाया जाए.

उनका उद्देश्य ऐसे दिमाग़ी मरीज़ों की सहायता करना नहीं था, बल्कि उनको पकड़कर शहर से बाहर दूर किसी ऐसी जगह पर छोड़ देना था, जिसे वे एसाइलम कहते थे. आज़ादी के बाद इस बात पर ध्यान गया कि जो दिमाग़ी रूप से बीमार मरीज़ हैं, उन्हें बहुत सारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है, जिसमें सबसे महत्वपूर्ण है भेदभाव या स्टिग्मा (लांछन) कि उनको उनकी बीमारी की वजह से ऐसे देखा जाता है कि जैसे वे कोई ग़लत काम करके आए हैं, उन्हें समाज से बाहर निकाल दिया जाता है, उनसे उनके अधिकार छीन लिए जाते हैं, उनके संवैधानिक अधिकार यानी राइट टू लाइफ और बाक़ी नागरिक अधिकारों से वंचित कर दिया जाता है.

तो आज़ादी के बाद पहला एक्ट बना, अब जो पिछले दिनों संसद में पास हुआ है, जिसे राष्ट्रपति की सहमति के बाद एक्ट के रूप में देखेंगे, ये मेंटल हेल्थकेयर एक्ट होगा. इससे उम्मीद है कि मानसिक बीमारियों से जुड़ी सुविधाओं के बारे में कई सुधार देखने को मिलेंगे.

बिल या एक्ट ज़मीनी स्तर पर कैसे कारगर होगा?

मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति में लॉस ऑफ़ जजमेंट हो जाता है यानी वह अपने फ़ैसले स्वयं नहीं ले सकता. या उनकी मानसिक क्षमता का ह्रास होता है, तो वे इस बात का भी ख्याल नहीं रख पाते कि उनको इलाज की ज़रूरत है. उन्हें यह पता नहीं होता कि उनके एक नागरिक के बतौर क्या अधिकार हैं.

उन्हें ये नहीं पता होता कि वे इलाज के लिए अपनी आवाज़ उठा सकते हैं या एक साधारण नागरिक के तौर पर उनके अधिकार छीने जा रहे हैं. तो ज़रूरी है कि किसी विशेष क़ानून की मदद से उनके मानवीय अधिकार और इलाज की सुविधाएं उपलब्ध करवाई जाएं.

इस नए एक्ट में इसके 3 मुख्य उद्देश्य हैं. पहला है कि समाज में मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी जानकारियों को बढ़ावा मिले, दिमाग़ी बीमारियों की रोकथाम के लिए कुछ किया जाए. और अगर कोई व्यक्ति किसी तरह के मानसिक स्वास्थ्य से संबंधी परेशानी से जूझ रहा है, तो उसे इससे सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं.

वर्तमान में उपलब्ध इंफ्रास्ट्रक्चर के साथ क्या जितने मानसिक रोगी हैं उनसे हम निपट सकते हैं?

अगर आंकड़ें देखे जाएं तो मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी सेवाओं की जितनी मांग है, उस मांग को पूरा करने के बीच बहुत बड़ा गैप है. इसे मेंटल हेल्थ गैप कहते हैं. कई सर्वेक्षणों में पता चला है कि यह गैप 80-85% है. यानी 100 में से सिर्फ़ 10-15 प्रतिशत लोगों को ही समय से उपलब्ध है.

दूसरा जब तक उन्हें इलाज की ज़रूरत हो, तब तक यह भी ज़रूरत है कि इलाज की उपलब्धता बनी रहे. यह भी मानसिक बीमारियों से जुड़ी एक बड़ी समस्या है कि बहुत से मरीज़ अपना इलाज जारी नहीं रखते. हमारे यहां ऐसी व्यवस्था नहीं है कि हम उसे सक्रिय होकर फॉलो करें.

मेंटल हेल्थ प्रोफेशनल्स यानी मनोचिकित्सक, क्लिनिकल साइकोलोजिस्ट और मनोवैज्ञानिक, सामाजिक कार्यकर्ता, इनका बड़ा अभाव है. यह सेवाएं हर जगह नहीं हैं, हर जगह मनोचिकित्सा विभाग नहीं है या जो सामान्य स्वास्थ्य सेवाएं हैं वहां मानसिक स्वास्थ्य को लेकर कोई इलाज उपलब्ध नहीं है. वहां जो मेडिकल अधिकारी है, उन्हें मानसिक बीमारियों के बारे में कोई जानकारी ही नहीं है. तो अगर कभी कोई मरीज़ पहुंच जाए तो वे उसका इलाज करते नहीं हैं.

इलाज करने वालों की कमी है, व्यवस्था की कमी है और जो सेवाएं हैं उनके बारे में जागरूकता की सबसे बड़ी कमी है. आंकड़ों की बात करें तो भारत में 66 हज़ार से ज़्यादा मनोचिकित्सक चाहिए, पर हैं लगभग 4000. भारत में कुल आबादी के 9 फ़ीसदी लोग दिमाग़ी मरीज़ हैं और विश्व के कुल मनोरोगियों का 15% भारत में है. ऐसे में इंफ्रास्ट्रक्चर का सुदृढ़ होना सबसे बड़ी ज़रूरत है.

इस बिल में आत्महत्या के प्रयास को अपराध की श्रेणी से हटा दिया गया है. इससे क्या फर्क पड़ेगा?

बहुत फ़र्क़ पड़ेगा. सबसे पहले दिल्ली हाईकोर्ट में इस बात को रखा गया था कि इस तरह के मरीज़ों को अपराधी मानने की बजाय इलाज उपलब्ध करवाया जाए. पर तब सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट के इस फ़ैसले को नकार दिया. अब तक यही था कि आत्महत्या का प्रयास करने वाला अपराधी है, पर अगर उसकी जान चली गई तब वो अपराधी नहीं होगा.

इससे सबसे बड़ा नुकसान यह था कि हम मानते हैं कि जिस व्यक्ति ने आत्महत्या का प्रयास किया है उसे किसी न किसी मानसिक बीमारी या तनाव की परेशानी रही होगी तो उसे इलाज उपलब्ध करवाना चाहिए न कि जेल.

अब इस नए क़ानून के अंतर्गत ऐसा नहीं होगा और उसे इलाज मुहैया करवाने की कोशिश की जाएगी, जिससे जो भी तनाव या बीमारी उसे है वह उससे उबरकर सामान्य ज़िंदगी बिता सके.

यानी अब ज़रूरत समझी गई है कि ख़ुदकुशी की कोशिश करने वाले को इलाज देना चाहिए, सज़ा नहीं?

मेडिकल प्रोफेशनल्स तो बहुत समय से इसके लिए संघर्ष कर रहे हैं. इस धारा 309 को ख़त्म कर देना चाहिए. पर इसका एक दूसरा पहलू भी है.

राष्ट्रपति की स्वीकृति के बाद यह सभी राज्यों में लागू हो जाएगा, जहां इसे अमल में लाया जाएगा. इसमें कुछ समय लग सकता है.

इससे पहले वाला जो एक्ट था, मेंटल हेल्थ एक्ट 1987, उसे पारित होकर अमल में आने में 6-7 साल लग गए थे, बावजूद इसके वो कई राज्यों में आज तक काम नहीं कर पाया. हमें उम्मीद है कि शायद इस बार जागरूकता ज़्यादा है तो यह सभी राज्यों में अमल में आ जाएगा.

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डॉ. सुधीर खंडेलवाल, पूर्व विभागाध्यक्ष, मनोचिकित्सा विभाग, एम्स

जिस तरह तनाव, स्ट्रेस हमारी रोज़मर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा बनते जा रहे हैं, उसमें बीमारियों के बारे जागरूकता कैसे फैला सकते हैं?

समाज में बड़े पैमाने पर जागरूकता लाने की ज़रूरत है, वो भी हर स्तर पर. स्कूलों-कॉलेजों में या मीडिया के माध्यमों से यह काम हो सकता है. सबसे बड़ा है कि किसी मरीज़ को इलाज उपलब्ध करवाकर. जब किसी भी जनरल अस्पताल में मनोचिकित्सा सेवाएं शुरू होती हैं, तो धीरे-धीरे मरीज़ों की संख्या बढ़ती है.

जब लोग देखते हैं कि किसी मानसिक बीमारी से जूझ रहा व्यक्ति ठीक हो गया तो उन्हें प्रोत्साहन मिलता है आगे आने का. मैं तो यह मानता हूं कि सिर्फ़ स्कूल-कॉलेज में समझा के नहीं होगा, इलाज की उपलब्धता बहुत ज़रूरी है. स्वास्थ्य सेवा मौजूद होगी तो जागरूकता धीरे-धीरे आएगी.

मानसिक रोगियों के संपत्ति अधिकारों पर भी बात की गई है. यह क्या है?

मैंने पहले भी बताया कि मानसिक बीमारियों से ग्रसित लोगों के मानवीय अधिकार वो उनसे छीन जाते हैं. संपत्ति को अपने नाम रखना, उसकी रक्षा करना भी किसी भी व्यक्ति का अधिकार है, जो उसे भारतीय संविधान के अनुसार मिलता है.

पर दुर्भाग्य से जब भी कोई व्यक्ति ऐसी किसी बीमारी का शिकार होता है, उसे इलाज नहीं मिलता वो ठीक नहीं होता, तब हमारा समाज या उस व्यक्ति का परिवार उसे संपत्ति के अधिकार से वंचित रखने की कोशिश करता है.

इस एक्ट में यह सुनिश्चित किया गया है कि ऐसा व्यक्ति जो किसी दिमाग़ी समस्या से परेशान है, जब वो सही हालत में हो, वो अपना एक प्रतिनिधि चुन सकता है, जो कोई परिजन हो सकता है या कोर्ट द्वारा नियुक्त कोई व्यक्ति हो, वो उसकी संपत्ति की रक्षा करेगा जिससे दूसरे उसे हड़प न सकें.

समस्या के समाधान के लिए उसकी पहचान बहुत ज़रूरी है, मानसिक रोगों की पहचान कैसे की जाए?

दो बहुत मुख्य चीज़ें हैं जिसे कोई भी पहचान सकता है. सबसे पहले जो पीड़ित व्यक्ति है उसके व्यवहार में बदलाव आ जाएगा. परिवार, समाज, साथ काम करने वाले सहयोगियों के प्रति उसके व्यवहार में चेंज आएगा. दूसरा, उसकी सोच में बदलाव आना, ऐसा बदलाव जिसकी कभी अपेक्षा नहीं की गई हो.

इन बदलावों की वजह से अगर वो ख़ुद को नुकसान पहुंचाए या परिवार के किसी सदस्य को नुकसान पहुंचाए या फिर अपने रोज़मर्रा के काम न कर पाए, तो समझना चाहिए कि उसे कोई मानसिक तकलीफ़ हो सकती है.

क्या मोबाइल टावर का रेडिएशन मानसिक रोगों के लिए ज़िम्मेदार हो सकता है?

ऐसा कई बार सुना जाता है, कई अध्ययन भी हुए हैं पर इसका कोई स्पष्ट परिणाम सामने नहीं आया है.

इस बिल में राज्यों को बड़ी ज़िम्मेदारी निभानी होगी पर आंकड़े बताते हैं कि 6 राज्यों में आज तक कोई मानसिक अस्पताल तक नहीं हैं.

देखिए मानसिक अस्पताल का होना उस राज्य की ज़रूरत के हिसाब से है. उससे ज़्यादा ज़रूरत है कि मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी सेवाएं उपलब्ध हों, भले ही वे मेडिकल कॉलेज में हों, ज़िला अस्पताल में या प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में, मानसिक रोगों के लिए इलाज मौजूद होना चाहिए.

आजकल तो सभी प्राइवेट अस्पतालों में मनोचिकित्सा विभाग हैं, जनरल अस्पतालों में मनोचिकित्सा यूनिट हैं, मेडिकल कॉलेजों में मनोचिकित्सा विभाग हैं. यानी सुविधाएं तो हैं पर इनका बढ़ना ज़रूरी है.

सामाजिक माहौल जहां लगातार तनाव बढ़ाने वाला है, उम्र के साथ तनाव का स्तर बढ़ रहा है, वहां क्या मानसिक स्वास्थ्य को बनाए रखने के लिए सामाजिक मापदंड बदलने की ज़रूरत है?

हमारा स्वास्थ्य चाहे शारीरिक हो या मानसिक वो किसी बंद माहौल में स्वस्थ नहीं रह सकता. स्वास्थ्य कई बातों पर निर्भर करता है. उसके लिए बहुत सारे पहलुओं पर काम और सुधार करना होगा. पहले तो सामान्य स्वास्थ्य सुविधाओं को सुधारना होगा, स्कूलों-कॉलेजों में किस तरह की शिक्षा दी जा रही है, वो देखना होगा, पढ़ाई के बाद नौकरी या व्यवसाय की क्या सुविधा या अवसर हैं, ये भी देखने चाहिए.

साथ ही मानसिक रूप से स्वस्थ रहने के लिए क्या-क्या ज़रूरी है, इस पर भी ध्यान देना होगा. सही खाना, सही समय पर सोना, एक्सरसाइज करना नशीली दवाइयों का सेवन न करना, इन सब के बारे में जागरूकता आनी चाहिए. कभी अगर ऐसा हो तो स्वास्थ्य सेवा का उपलब्ध होना बहुत ज़रूरी है.

क्या इस एक्ट में ऐसा कोई प्रावधान है कि मानसिक रोगियों को लोहे की चेन आदि से बांध कर नहीं रखा जाएगा?

यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि अब भी जब गांव आदि जगहों पर जाते हैं तब देखते हैं कि परिवार मरीज़ से परेशान हो गया है, इलाज उपलब्ध है नहीं, मरीज़ घर से भाग जाता है, मैंने तो ऐसे केस भी देखें हैं कि लोग उस पर पत्थर फेंकते हैं, वहां वो क्या करें.

ऐसा नहीं है कि वो अपने परिवार के उस सदस्य को प्यार नहीं करते पर और चारा क्या है. ऐसे में वे कई बार मरीज़ को कमरे में बंद करते हैं, या कई बार चेन से बांधते हैं. कभी-कभी तो ऐसी स्थिति हो जाती है कि अस्पताल में भी मरीज़ को बांधना पड़ता है.

तो इस बिल में कहा गया है कि अगर कभी ऐसी कोई ज़रूरत पड़े तो पूरी डिटेल्स दर्ज होनी चाहिए कि उसे कितनी देर में उस स्थिति में रखा जाएगा. हालांकि, अस्पताल में कभी चेन से तो नहीं बांधते हैं पर उसे किसी भी तरह रोकने की कोशिश करते हैं. इस बिल में ऐसी स्थिति में डॉक्टर की क्या ज़िम्मेदारी है, यह भी बताया गया है.

मानसिक रोग से परेशान पति को ट्रेन में चेन से बांधकर ले जाती एक महिला (फोटो : रायटर्स)

इसके अलावा इलेक्ट्रो-कन्वल्सिव थेरेपी (ईसीटी) यानी शॉक थेरेपी के बारे में भी इस एक्ट में गाइडलाइन्स दी गई हैं?

इस बिजली के इलाज के बारे में काफ़ी बहसें हुई हैं. बिल में जो प्रावधान लाये गए हैं, उससे हमारी भारतीय मनोचिकित्सक एसोसिएशन ख़ुश नहीं है. ईसीटी दो तरह से दी जाती है, एक तो एनेस्थीसिया देकर, दूसरा बिना एनेस्थीसिया के भी दिया सकता है.

इस बिल में बिना एनेस्थीसिया के दी जाने वाली ईसीटी को पूरी तरह से निषिद्ध कर दिया गया है. और उसकी कोई वैज्ञानिक या तथ्यपूर्ण वजह नही दी गई है. ये भावनात्मक आधार पर लिया गया फ़ैसला है.

इस बारे में अध्ययन हो चुके हैं कि इन दोनों ही तरह कि थेरेपी के परिणाम बिल्कुल एक-से ही हैं. बिना एनेस्थीसिया के दी गई थेरेपी में कई और परेशानियों से बच सकते हैं. क्योंकि एनेस्थीसिया के अपने जोखिम हैं, आप उससे तो बचते हैं. और सिवाय उस एक-दो मिनट के कुछ नहीं होता.

हां, बॉलीवुड फिल्मों को बहुत शौक है ये दिखाने का कि किसी भी बीमारी में सीधे बिजली का शॉक देते हैं, पर जैसा फिल्मों में दिखाते हैं वैसा नहीं होता. एकाध मिनट की बात है. दूसरा ये बहुत कारगर तरीक़ा है.

इस बिल में यह भी कहा गया है कि मरीज़ ख़ुद चुनेगा कि उसे कैसा ट्रीटमेंट करवाना है. इस पर कई डॉक्टरों को आपत्ति है.

इस बिल में एक प्रावधान है जिसे एडवांस डायरेक्टिव का नाम दिया गया है. जब कोई व्यक्ति मानसिक रूप से दुरुस्त हालत में है, कोई दिक्कत न हो, तब वह यह डायरेक्टिव छोड़ सकता है कि कभी अगर उसे भविष्य में यह परेशानी होती है, तब वह चुन सकता है कि उसका कौन-सा इलाज करवाया जाए.

या वो यह भी कह सकता है कि इलाज न करवाया जाए या कहे कि बिना दवाई के इलाज करवाया जाए. बहुत-से मनोचिकित्सकों का मानना है कि हमारे देश में अभी इतनी जागरूकता नहीं है कि मरीज़ ख़ुद ये फ़ैसला ले सके.

दूसरा इसका ग़लत इस्तेमाल हो सकता है. कोई ठीक भी होगा तो उससे कुछ ऐसा लिखवाया जा सकता है, जो उसके लिए ही नुकसानदायक हो सकता है.

तीसरी बात यह है कि कई बार इसका फ़ायदा भी नहीं होगा क्योंकि अगर उस व्यक्ति के परिवार या मनोचिकित्सक को लगता है कि उसका ये डायरेक्टिव उसके ही नुकसानदायक साबित हो रहा है, तब उन्हें मेंटल हेल्थ रिव्यू बोर्ड में जाकर उसे कैंसल करवाना होगा.

इसका क्या फ़ायदा होगा, यह तो अभी नहीं कह सकते पर मानवाधिकारों का ख़्याल रखते हुए ही इसे लाया गया है. इसके अलावा बिल में बच्चों के इलाज के लिए भी दिशा-निर्देश दिए गए हैं.

मानसिक रोगियों के पुनर्वास की बात कभी नहीं होती. सड़क पर घूमते हुए ऐसे लोग दिख जाते हैं, जिनकी मानसिक दशा ठीक नहीं है, घर वालों ने छोड़ दिया है. यह कैसे सुनिश्चित किया जाएगा कि उन्हें उनके नागरिक अधिकार मिलें?

पुनर्वास शुरू होता है इलाज के बाद, अभी तो हम इलाज से ही जूझ रहे हैं पर यह तो है कि जिन्हें इलाज मिल गया है उनका पुनर्वास किया जाएगा, पहले परिवार में, फिर समाज में और फिर किसी व्यवसाय में.

इलाज की सुविधाओं में कमी से यह भी होता है कि लोग मानसिक परेशानी या बीमारियों को अंधविश्वासों से जोड़कर देखने लगते हैं, पीर-फ़कीर, ओझा, भूत-प्रेत यह सब चलता है. क्या ऐसा इसलिए है कि सरकार द्वारा ज़रूरी मुद्दे पर ध्यान नहीं दिया गया?

यह समझना ज़रूरी है कि को लेकर अंधविश्वास होता क्यों है. क्योंकि समाज या व्यक्ति अपनी परेशानी को समझने की कोशिश करते हैं. जिन तक आधुनिक शिक्षा नहीं पहुंची है, वे उसे पुराने तरीक़े से ही समझते हैं. वो कहेंगे कि कोई भूत-प्रेत लग गया या जादू-टोना हो गया.

जैसे-जैसे हमारी सोच का, पढ़ाई-लिखाई का दायरा बढ़ जाता है, हम उन अंधविश्वासों से बाहर आ जाते हैं. कई बार लोग इस तरह की बातों में इसलिए भी पड़ते हैं क्योंकि इलाज का और कोई विकल्प ही नहीं है.

ये मरता क्या न करता वाली स्थिति है. वह ओझा के पास जाएगा, पुजारी के पास जाएगा, पीर बाबा की मज़ार पर जाएगा, परिवार ऐसे तो मरीज़ को नहीं छोड़ देता. पर दुर्भाग्य से यह सही इलाज होता नहीं है. यह देखा भी गया है कि जब स्वास्थ्य सुविधाएं बढ़ती जाती हैं, लोगों का इस तरह के इलाजों से विश्वास कम होता जाता है.

क्या लंबे समय तक किसी तनावपूर्ण इलाक़े में रहने, किसी प्राकृतिक आपदा का मानसिक स्वास्थ्य पर असर होता है?

ये बहुत समय से देखा गया है कि जब भी किसी सोसाइटी में लंबे समय तक कोई संघर्ष या समस्या चलती जा रही है, जैसे विश्व युद्ध के समय हुआ था या किसी भी प्राकृतिक आपदा के बाद वहां के रहने वालों को किसी न किसी तरह की मानसिक परेशानियों से गुज़ारना पड़ता है. सर्वाइवल पर ख़तरा हो, फिर इलाज की अनुपलब्धता, इससे मानसिक स्वास्थ्य तो प्रभावित होता ही है.

क्या रोज़मर्रा के बढ़ते तनाव का जघन्य अपराधों या हिंसा से कोई संबंध है?

जितने भी शर्मनाक अपराध हो रहे हैं, उनमें किसी भी तरह के दिमाग़ी बीमारी या किसी मानसिक बीमारी से संबंधित किसी व्यक्ति हाथ नहीं है. ये अपराध वही लोग कर रहे हैं, जिन्हें समाज समझदार या दिमागी रूप से स्वस्थ समझता है. दिमागी बीमार की किसी अपराध में संलिप्तता का अनुपात बहुत ही कम है, इस तरह के जघन्य अपराध करने वाले मानसिक बीमार नहीं हैं.

बिल में जागरूकता बढ़ाने की बात कही गई है, जिस तरह से कोटा जैसे शहरों में बच्चे बड़ी संख्या में सुसाइड कर रहे हैं, उसे देखते हुए क्या टीनएजर्स के बीच जागरूकता बढ़ाने के लिए कोई अलग प्रावधान होना चाहिए था?

कोटा में सिर्फ़ महत्वाकांक्षा परेशानी नहीं है. बच्चे घर छोड़कर हॉस्टल में रह रहे हैं, उन हॉस्टलों की क्या दशा है, हमें नहीं पता. कितने बच्चे एक साथ रह रहे हैं, कितने खा-पी रहे हैं, ठीक से पढ़ाई और आराम कर रहे हैं कि नहीं, हमें नहीं पता. ये सब देखने की भी ज़रूरत है.

अगर इन सबके बीच कोई संतुलन नहीं है, वह पढ़ाई के तनाव में है और सही से खा नहीं रहे, सो नहीं रहे तो समस्याएं तो बढ़ेंगी ही, तनाव बढ़ेगा. दुर्भाग्य से कुछ बच्चे इसे नहीं सहन कर आते और ऐसा कदम उठा लेते हैं. तो ऐसी जगहों पर इंफ्रास्ट्रक्चर के कुछ मापदंड बनने चाहिए. कोचिंग सेंटर, हॉस्टल या कॉलेज के लिए कुछ स्टैंडर्ड होने चाहिए. बहुत सारे कॉलेजों में वेलनेस सेंटर हैं, ऐसा होना चाहिए.

शरीर में होने वाली सभी बीमारियों के लिए इंश्योरेंस कवर मिलता है, पर मानसिक बीमारियों में नहीं मिलता. इस पर क्या कहेंगे?

यह भी दुर्भाग्यपूर्ण है. कई बार दिमाग़ी बीमारियां बहुत लंबे समय तक चलती हैं, तो इंश्योरेंस कंपनियों ने इन्हें अपनी सूची से निकाल दिया. इस पर इंडियन साईकेट्री सोसाइटी ने काफी शोर मचाया.

अब बेंगलुरु और एक-दो अन्य शहरों में एक इंश्योरेंस कंपनी ने इन बीमारियों में कुछ लाभ देने की कोशिश की है, उम्मीद है कि यह धीरे-धीरे और शहरों में भी फ़ैल जाएगा. इंश्योरेंस कंपनियों को मानसिक बीमारियों को भी लिस्ट में जोड़ना चाहिए इसमें कोई दो राय नहीं है.